शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता _ डाॅ मीनकेतन प्रधान

मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता
किसी व्यक्ति पर सायास कुछ लिखना कितना कठिन होता है, यह अभी महसूस कर रहा हूँ, खासकर ऐसे व्यक्ति पर जो बचपन से अब तक लगातार दिलोदिमाग में छाया रहे और अचानक संसार से उठ जाय, अभी उड़ीसा प्रवास से रायगढ़ लौटने पर पता चला - ‘‘दादा’’ पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता नही रहे... मंै धक् से रह गया, सोचता रहा.... नजरों के सामने उभर आता ....... खुला बदन, कमर के ऊपर नाभी से पैर तक पसरी सफेद धोती और दाहिने कंधे को कसता हुआ आखरी छोर-हल्का नील लगा हुआ.... जैसे भीतर का निर्विकार भाव था वैसा ही परिधान। तिलकता उन्नत माथा - दो तीन लकीरों का गंगा-जमुनी अन्तर्प्रवाह ...... जाने कहां से दौड़ रही होती सरस्वती की गुप्त धारा - धारीदार पुष्ट होठों में छलकती कभी न सूखने वाली स्वर-लहरियां, खींच लेने वाली ठसक भरी मोहक मुस्कान..... ओजस्वी वाणी...... जैसे कह रहे हों और प्रोफेसर साहब ...... मै संकुचित हो उठता........फूर्ति से आगे बढ़ प्रणाम् निवेदन करता तो.... कभी वे हथेली पकड़ हाथ मिलाते या कंधांे पर अपने स्नेहिल हाथों को रख इतने प्यार से हाल-चाल पूछते कि एहसास नहीं होता मेरी कुल उम्र 55 बरस से भी पहले स्वाधीनता आंदोलनों के सिपाही और महानतम् सामाजिक - मानवीय जीवन मूल्यों के पुरस्कर्ताओं में अग्रगण्य रहे हैं। नई पीढ़ी को इतनी ऊंचाई में प्रतिष्ठित कर उसके भीतर की समस्त सम्भावनाओं को दुलारने- उभारने की ऐसी उदार भावना आज के आत्मकेन्द्रित वैष्विक बाजार में भला कहाँ देखने को मिलती है।
दो-तीन बरसों से मैं उनसे मिलना चाह रहा था, नहीं मिल सका........... इसका अफसोस जीवन भर सालता रहेगा। आज उनके बारे मे जो कुछ सोचा जा रहा है, क्या बहुत पहले नहीं सोचा-लिखा जा सकता था? जीवन - संघर्ष के घने अंधेरे को चीर-फाड़कर पूनम की दूध धूली चांदनी रातों मंे जीवन चक्र पूर्ण कर वह शारदेय शीतल-चन्द्र अनंत आकाष की प्रभाती रष्मिवलयों मंे अब गुप्त एहसास दिलाता रहेगा अपने होने का.... ऐसे थे पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी।
बहरहाल ... बहुत पहले की एक साध थी - बहुआयामी व्यक्तित्व से महिमामण्डित श्रध्देय श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता के सामाजिक, राजनैतिक, संास्कृतिक प्रदेय को राष्ट्रीय-पृष्ठभूमि पर रेखंाकित होना चाहिए। उनके जीवन-काल में यह संभव न हो सका। होता भी कैसे- वे आत्मष्लाघा, भांैडा प्रदर्षन से कोसों दूर, कर्म के पथ पर संघर्षरत जननायक थे। प्रचार-प्रसार और छपास की भूख उन्हेें कभी छू न सकी। इसलिये यह बात सुकून दिलाती है कि उनके ज्येष्ठपुत्र डाॅ. सर्वेष षरण गुप्ता द्वारा यषस्वी काया के अस्थि-विसर्जन हेतु इलाहाबाद त्रिवेणी संगम प्रस्थित होने के बाद पैतृक गाँव लोई्रग के कर्मठ जनसेवी श्री सरोज गुप्ता द्वारा लिखित ‘‘रायगढ़ पूर्वांचल के पुरोधा श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता’’, स्मरणिका का प्रकाषन हो रहा है। स्वनाम धन्य बहुआयामी व्यक्तित्व सम्पन्न पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी के प्रेरक प्रसंगों को उजागर करने के उद्देष्य से ब्रिटिषकालीन राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता को झेलते हुए स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन-मूल्यों के उन्नयन की दिषा में समर्पित अक्षांषों को उभारा गया है। उनके स्नेहभाजक इस पुस्तक के लेखक श्री सरोज गुप्ता मूलतः ग्राम्य जन- संस्कृति की राजनैतिक - धारा के नैतृत्वकत्र्ता हैं, उनकी मार्मिक भावनाओं का यह अंष उल्लेखनीय है -
‘‘पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता ने महात्मागाँधी के ग्रामोदय की आस्था, नेहरु की उदारता, षास्त्री की सौम्यता, जयप्रकाष की निर्भीकता, लोहिया की कर्मण्यता, विनोबा की साधुता का अपने जीवन में अनुषरण किया ’’। वे लोकतन्त्र के हिमायती थे। गाँव में अपने विचारों को, अपने सिध्दान्तों को लोगों पर नहीं थोपते थे बल्कि लोगों का दिल जीतकर समझाबुझाकर कार्य करने वाले थे।
मनुष्यता के पर्याय कीर्तिषेष श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता छत्तीसगढ़ एवं रायगढ़ जिले के ग्राम्याचंलों मंे ‘‘पुरनो गौंटिया’’ के नाम से सर्वविख्यात थे; किसी पोस्टर-पम्पलेट के मोहताज बिल्कुल नहीं। उनके सर्वथा सुयोग्य कनिष्ठ पुत्र इंजिनियर श्री विक्रम गुप्ता के सद्प्रयासों से यह पुस्तक रुपाकार ग्रहण कर रही है यह मेरे लिये बहुत सुकून की बात है।
डाॅ. मीनकेतन प्रधान
शासकीय किरोड़ीमल कला विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय रायगढ़

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें