Sanjeev Mongia
हमे जब भी मौका मिलता है ,हम पाश्चात्य सभ्यता को खूब लताड़ते है . और अपनी संस्कृति पर जम कर गर्व करते है . क्या बुरा करते है गोरे ? eat , drink and be merry ,क्या खराबी है , इस कथन में ? कम से कम वो दोगले तो नही है . जम कर पांच दिन मेहनत करते है और दो दिन ऐश.
और हम हिन्दुस्तानी . खूब गीता का महिमागान करेगे . लेकिन असलियत यह है की हम कर्म में नही भाग्य में विश्वास करते दिखते है . हर दूसरा , तीसरा आदमी , जन्हा तन्हा कुंडलिया बनवा कर , अपनी अंगूठी तैयार करता नजर आता है . अब तो टेरो कार्ड, वास्तुशास्त्र जैसी नई बलाए भी आ गई है . हर आदमी सोचता है , वेष्णु देवी या तिरुपति जैसी जगह जाने पर उसको मनवांछित फल मिल जाएगा .
और सब प्रयासों के बावजूद जब फल नही मिलता तो शनि देवता के साडे साती का प्रकोप समझ कर कर शांत हो जाता है . इस तरह के सब विचार , आदमी को बिलकुल निष्क्रिय बना देते है
इन बाबायो का पैदा होना उनकी चतुराई नही , बल्कि हमारा ... निठल्लापंन है .
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
गुरुवार, 31 अगस्त 2017
हमारी संस्कृति
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