Radheshyam Mahaseth
धर्म ही धंधा है और धर्म ही चंदा भी , अपने विकृत स्वरूपों में | और चंदा एवं धंधा के इस विकृत स्वरूप को जब वोट बैंक के कॉकटेल में डुबोया जाता , तब कभी रामपाल तो कभी राम रहीम सरीखे अवतारी पुरुष का बड़े भाग्य से इस मायावी दुनिया में आगमन होता | ताकि महिला मात्र का कल्याण हो सके | और तब क्या सत्ता और क्या समाज ,क्या लोक और क्या तंत्र ,न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका और खबरपालिका तक सब ऐसे अवतारी पुरुष के सामने कांपते नजर आते है | भरोसा न हो तो हरियाणा के मंत्री जी का बयान सुन लीजिए और इस सच्चाई को भी समझ लीजिए कि पिछले अरसठ वर्षों में अयोध्या मसले पर फैसला आया क्यों नही ,और क्यों सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि दोनों पक्ष आपस में मिल बैठकर मामला सलट ले , यानि बात जब धर्म की आई तो न्यायपालिका तक के हाथ -पाँव कापने लगे | इधर हरियाणा के मंत्री महोदय कह रहे कि पंचकुला और आसपास के इलाकों में धारा 144 बाबा राम रहीम के अनुयायियों के लिए नही है | तो मंत्री जी से पूछा जाना चाहिए कि फिर यह धारा किसके स्वागत में है मंत्री साहब ? कानून व्यवस्था पर संकट का खतरा किससे मंडरा रहा है ? आने -जाने वाले राहगीरों से ? खेलने -कूदने वाले मासूमों से ? या फिर तीन तलाक वाली महिलाओं से ? घर में बैठ आपको भले सबकुछ तमाशा -नौटंकी लग रहा हो , मगर मंत्री जी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जी तक की साँसे अटकी हुई है | पसीने छुट रहे है | याद नही है आपको , हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान अमित साह ने अपने चौवालीस विधायक उम्मीदवारों के साथ जाकर राम रहीम के दरबार में माथा टेका था , 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर आगे दिल्ली और हाल के पंजाब विधानसभा चुनाव में भी राम रहीम ने भाजपा को वोट देने की अपील अपने भक्तों से की थी | तो खट्टर साहब को अपनी हैसियत का अंदाजा बखूबी है | मोदी और साह को अच्छे से पता है कि राम रहीम के नाम पर तांडव मचाने वाली यही महिला उनके सत्ता की सीढ़ी है | राम रहीम के यौन शोषणकारी चरित्र की चर्चा 2002 में उस वक्त भी हुई थी जब केंद्र में वाजपेयी की सरकार थी | विपक्षी दवाब पर सीबीआई जांच की मांग स्वीकार भी हो गई मगर मामला उसके आगे बढ़ा नही , वाजपेयी ने कदम पीछे खींच लिया | 2013 में जब कांग्रेस के काल में बलात्कारी आसाराम की गिरफ्तारी हुई तब उमा भारती ने कहा कि यह हिन्दू आस्था पर हमला है , और याद कीजिए यह वही उमा भारती है जिसने बाबरी मस्जिद के मीनार पर चढकर उत्पातियों को उकसाते हुए नारा दिया था - तेल लगा के डाबर का ,नाम मिटा दो बाबर का | " रामलला हम आएँगे ,मंदिर वही बनाएँगे " नब्बे के दशक में जब वाजपेयी द्वारा गढे इस नारे को आडवानी ने सियासी फिजा में उछाला तो वह अनायास नही था | यह और बात है कि राज्य से लेकर केंद्र तक सत्ता मिलने के बावजूद आज तक मंदिर बन नही पाया | इसलिए आए दिन देश के अलग -अलग हिस्से में जो तरह -तरह के बाबा अपना जौहर दिखाते नजर आते है , वह सब ऐसे ही खलिया नही है , सब के सब राजनेताओं द्वारा पालित -पोषित और संरक्षित है | अंग्रेजों ने धर्म के राजनैतिक इस्तेमाल की जो तकनीक विकसित की , भारत के राजनेता उसकी गंभीरता को खूब समझते है | जिस मुल्क में बड़े -बड़े डिग्रीधारी तथाकथित रूप से शिक्षित डाक्टर ,इंजीनियर और कलक्टर पत्थर के लिंग पर दूध डालता नजर आए , धर्म का सियासी इस्तेमाल ऐसे जड़ -संकीर्ण ,रूढ़िवादी ,पिछड़े समाज में न हो सके तो फिर धर्म के होने पर भी तो लानत है |
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
रविवार, 27 अगस्त 2017
धर्म ही धंधा है
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