शनिवार, 30 सितंबर 2017

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास

Ram Kumar
राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ का इतिहास
हस करते रहते हैं और संघ के काले को सफेद करते रहते हैं ।
कुछ दिन से हर टीवी डिबेट में यह बता रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक कोई आज का पैदा नहीं है बल्कि 1925 का जन्म लिया अनुभवी संगठन है । सोचा संघ के 90 वर्ष के जीवन का पोस्टमार्टम किया जाए ।
1925 कहने का तात्पर्य सिन्हा जी या अन्य संघ के विद्वानों का इसलिए है कि उसी समय इनके एक योद्धा "सावरकर" ने एक संगठन बनाया था जिसका संघ से कोई लेना देना नहीं था सिवाय इसके कि संघ को सावरकर से जहर फैलाने का सूत्र मिला । सावरकर पहले कांग्रेस में थे परन्तु आजादी की लड़ाई में अंग्रेज़ो ने पकड़ कर इनको "आजीवन कैद" की सज़ा दी और इनको "कालापानी" भेजा गया जो आज पोर्ट ब्लेयर( काला पानी) के नाम से जाना जाता है ।संघ के लोगों से अब "वीर" का खिताब पाए सावरकर कुछ वर्षों में ही अंग्रेज़ों के सामने गिड़गिड़ाने लगे और अंग्रेजों से माफी मांग कर अंग्रेजों की इस शर्त पर रिहा हुए कि स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहेंगे और अग्रेजी हुकूमत की वफादारी अदा करते उन्होंने कहा कि " हिन्दुओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की बजाए अपनी शक्ति देश के अंदर मुसलमानों और इसाईयों से लड़ने के लिए लगानी चाहिए" ध्यान दीजिये कि तब पूरे देश का हिन्दू मुस्लिम सिख एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के लिए मर रहा था शहीद हो रहा था और तब ना कोई यह सोच रहा था कि हिन्दू मुस्लिम अलग भी हो सकते हैं , तब यह "वीर" देश में आग लगाने की बीज बो रहे थे , जेल से सशर्त रिहा हुए यह वीर देश की आपसी एकता के विरूद्ध तमाम किताबों को लिख कर सावरकर ने अंग्रेजों को दिये 6 माफीनामे की कीमत चुकाई देश के साथ गद्दारी की और आजाद भारत में नफरत फैलाने की बीज बोते रहे ।
1947 में देश आजाद हुआ और देश की स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का फैसला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लिया तो इसी विचार के लोग इसके विरोध में और अंग्रेजों को वफादारी दिखाते राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को जला रहे थे और पैरों से कुचल रहे थे और मौका मिलते ही देश के विभाजन के समय हिन्दू - मुस्लिम दंगों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और मौका मिलते ही देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी क्युँकि सावरकर हेडगेवार की यह सोच थी कि इस देश में "गाँधी" के रहते उनके उद्देश्य पूरे नहीं होंगे। संघ के जन्मदाता हेडगेवार और गोवलकर ने गाँधी जी की हत्या करने के बाद (सरदार पटेल ने स्वीकार किया ) अपने विष फैलाने की योजना में लग गये , तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र के निर्माण में लग गये और संघ के लोग भविष्य के भारत को ज़हर से भरने के औज़ार बनाने लगे , नेहरू पटेल को उदारवादी कहिए या उनकी मूक सहमति , संघ को पैदा होते ही उसके देश विरोधी क्रिया
कलाप देख कर भी आंखें मूंदे रहे ।इस बीच संघ ने देश की एकता को तोड़ने के सारे वह साहित्यिक हथियार पुस्तकों के रूप में बना लिए जिससे हिन्दू भाईयों की धार्मिक भावना भड़के जिसका मुख्य आधार मुसलमानों से कटुता और मुगलों के झूठे आत्याचार थे , न्यायिक प्रक्रिया में दंड पाए लोगों को भी हिन्दू के उपर किया अत्याचार किया दिखाया गया , शासकीय आदेशों को तोड़ मरोड़कर हिन्दू भाईयों पर हुए अत्याचार की तरह दिखाया गया तथा इतिहास को तोड़ मरोड़कर मुगल शासकों को अत्याचारी बताया कि हिन्दुओं पर ऐसे ऐसे अत्याचार हुआ और औरंगज़ेब को उस अत्याचार का प्रतीक बनाया गया , एक से एक भड़काने वाली कहानियाँ गढ़ी गईं और इसी आधार पर संघी साहित्य लिखा गया पर जिस झूठ को सबसे अधिक फैलाया गया वो था कि " औरंगज़ेब जब तक 1•5 मन जनेऊ रोज तौल नहीं लेता था भोजन नहीं करता था" अब सोचिएगा जरा कि एक ग्राम का जनेऊ 1•5 मन (60 किलो) कितने लोगों को मारकर आएगा ? 60 हजार हिन्दू प्रतिदिन , दो करोड़ 19 लाख हिन्दू प्रति वर्ष और औरंगज़ेब ने 50 वर्ष देश पर शासन किया तो उस हिसाब से 120 करोड़ हिन्दुओं को मारा बताया गया जो आज भारत की कुल आबादी है और तब की आबादी से 100 गुणा अधिक है ।पर ज़हर सोचने समझने की शक्ति समाप्त कर देती है तो भोले भाले हिन्दू भाई विश्वास करते चले गए ।इन सब हथियारों को तैयार करके संघ अपनी शाखाओं का विस्तार करता रहा और हेडगेवार और गोवलकर एक से एक ब्राह्मणवादी ज़हरीली किताबें लिखते रहे प्रचारित प्रसारित करते रहे जिनका आधार "मनुस्मृति" थी और गोवलकर की पुस्तक "बंच आफ थाट" संघ के लिए गीता बाईबल और कुरान के समकक्ष थी और आज भी है।नेहरू के काल में ही अयोध्या के एक मस्जिद में चोरी से रामलला की मुर्ति रखवा दी गई और उसे बाबर से जोड़ दिया गया जबकि बाबर कभी अयोध्या गये ही नहीं बल्कि वह मस्जिद अयोध्या की आबादी से कई किलोमीटर दूर बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाई थी , ध्यान रहे कि उसके पहले बाबरी मस्जिद कभी विवादित नहीं रही परन्तु नेहरू आंख बंद किये रहे ।नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का समयकाल प्रारंभ हुआ और सख्त मिजाज इंदिरा गांधी के सामने यह अपने फन को छुपाकर लुक छिप कर अपने मिशन में लगे रहे और कुछ और झूठी कहानियाँ गढ़ी और अपना लक्ष्य निर्धारित किया जो "गोमांस , धारा 370 , समान आचार संहिता , श्रीराम , श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर , स्वदेशीकरण थे । इंदिरा गांधी ने आपातकाल में जब सभी को जेल में ठूस दिया तो संघ के प्रमुख बाला साहब देवरस , इंदिरा गांधी से माफी मांग कर छूटे और सभी कार्यक्रम छुपकर करते रहे पर इनको फन फैलाने का अवसर मिला इंदिरा गांधी की हत्या के बाद , तमाम साक्ष्य उपलब्ध हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में संघ के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था ।राजीव गांधी बेहद सरल और कोमल स्वभाव के थे और उतने ही विनम्र , जिसे भाँप कर संघियों ने अपना फन निकालना प्रारंभ किया और हिन्दू भाईयों की भावनाओं का प्रयोग करके श्रीराम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद को हवा दे दी और आंदोलन चला दिया , पर पहले नरम अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटे के रूप में आगे किया जिसकी स्विकरोक्ती गोविंदाचार्य ने भी अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटा कह कर की , संघ का दोगलापन उजागर करने की कीमत उनको संघ से बाहर करके की गई और वह आजतक बाहर ही हैं । दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी तमाम तैयार हथियारों के सहारे हिन्दू भाईयों को उत्तेजित करते रहे जैसे आज योगी साध्वी और तोगड़िया करते हैं ।राजीव गांधी के पास संसद में इतनी शक्ति थी कि संघ को कुचल देते तो यह देश के लिए सदैव समाप्त हो जाते परन्तु सीधे साधे राजीव गांधी कुटिल दोस्तों की बातों को मानकर गलत ढुलमुल फैसलों से संघ को खाद पानी देते रहे , कारसेवा और शिलान्यास के नाम पर राजीव गांधी का इस तरह प्रयोग किया गया कि संघ को फायदा हो और संघ की रखैल भाजपा ने उसका खूब फायदा उठाया और दो सीट से 88 सीट जीत गई ।फिर वीपी सिंह की सरकार बनी भाजपा और वाम मोर्चा के समर्थन से तथा संघी जगमोहन को भेजकर काश्मीर में आग लगा दिया गया ।
अब सब हथियार और ज़मीन तैयार हो चुकी थी और प्रधानमंत्री नरसिंह राव का समय काल प्रारंभ हुआ जो खुद संघ के प्रति उदार थे , उड़ीसा में पादरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जलाकर मारने के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद संघ ने इसाईयों के प्रति नफरत फैलाने की नीति छोड़कर सारी शक्तियों को देश के मुसलमानों से नफरत फैलाने में लगा दिया , संघ ने प्रधानमंत्री राव की चुप्पी का फायदा उठाया अपने बनाए झूठे हथियारों से हिन्दू भाईयों के एक वर्ग की भावनाएँ भड़काई और अपने साथ जोड़ लिया । साजिश की संसद और उच्चतम न्यायालय को धोखा दिया और अपने लम्पटों के माध्यम से बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर को गिरा दी ।
इसके बाद अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो सारे जन्म स्थान के मंदिर 370 स्वदेशीकरण सब दफन कर दिया गया और हर छोटे बड़े दंगों में शामिल रहा संघ ने साजिश करके गुजरात में इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार कराया और अपने चरित्र के अनुसार एक नायक बनाया। फिर अपने असली रूप चरित्र और सिद्धांतों के अनुसार उसी असली नायक नरेंद्र मोदी को आगे किया और झूठ और फेकमफाक के आधार पर और आज सत्ता पर कब्जा किया।
संघ की यह सब राजनीति उत्तर भारत के प्रदेशों के लिए थी क्युँकि मुगलों का शासन अधिकतर उत्तर भारत में ही था। दक्षिण के राज्य इस जहर से अछूते थे इसलिए अब वहाँ भी एक मुसलमान शासक को ढूढ लिया गया और देश की आजादी से आजतक 67 वर्षों तक निर्विवाद रूप से सभी भारतीयों के हृदय में सम्मान पा रहे महान देशभक्त टीपू सुल्तान आज उसी प्रकिया से गुजर रहे हैं जिससे पिछले सभी मुगल बादशाह गुजर चुके हैं , मतलब हिन्दुओं के नरसंहारक बनाने की प्रक्रिया।और आज उनकी जयंती पर हुए विरोध में एक यूवक की हत्या भी कर दी गई।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो जुल्मों और लूट का जो इतिहास प्रमाणित रूप से दुनिया के सामने हैं यह उसकी निंदा भी नहीं करते , इस देश को सबसे अधिक लूटने वाले अंग्रेजों की ये कभी आलोचना नहीं करते जो देश की शान "कोहिनूर" तक लूट ले गये , जनरल डायर की आलोचना और जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए इनके आँसू कभी नहीं गिरते , आज संघ के पास शस्त्र सहित कार्यकर्ताओं की फौज है जो शहरों में दहशत फैलाने के लिए सेना की तरह फ्लैगमार्च करते हैं , संविधान की किस धारा के अनुसार उन्हे यह अधिकार है यह पता नहीं । भारतीय इतिहास में जुल्म जो हुआ वह अंग्रेज़ों ने किया और उससे भी अधिक सदियों से सवर्णों ने किया दलितों और पिछड़ों पर , जब चाहा जिसे चाहा सरेआम नंगा कर दिया जो इन्हे दिखाई नहीं देता क्योंकि इनको जुल्मों से मतलब नहीं आपस में लड़ाकर देश मे जहर फैलाकर सत्ता पाने से है और उसके लिए देश टूट भी जाए तो इनसे मतलब नहीं।
इसी लिये कहता हूँ साजिशें करने मे माहिर संघ को "संघमुक्त भारत" करके ही इस देश का भला हो सकता है और यह समय इस अभियान के लिए सबसे उपयुक्त है। jai bhim jai bharat ramkumar Singh.

मृत्यु का जश्न

कहते हैं की रावण और महिषासुर अनार्य थे याने दानव/ राक्षस/ असुर/ थे.
आश्चर्य है उनकी मृत्यु का जश्न मना रहे हैं अनार्य याने शुद्र और राक्षस कुल के लोग भी.
शायद उन्हें पता नहीं है वे किस कुल के हैं? जानने के लिए अपने अपने पुरोहित से पूछना चाहिए. उनके परिवार के किसी शादी क समय मंत्रोच्चार करते हैं तब बताते हैं - "दास कुलस्य/ राक्षस कुलस्य"
ज्ञातव्य है कि ब्राह्मण, क्षत्रीय, और वैश्य के अलावा सभी अनार्य हैं याने शुद्र और राक्षस. इनमें भारत के मूल निवासी भी हैं.मनु स्मृति अनुसार ब्राह्मणों को शर्मा, क्षत्रिय को सिंह , वैश्य को गुप्त और शुद्र को दास लिखना चाहिए.


शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

मोक्ष या जन्नत नहीं मिलने वाला


किसी भी धार्मिक ग्रन्थ को पढ़ कर सोच विचार करना चाहिए। जन्नत या मोक्ष पाने के लिए पढने से कुछ नहीं मिलेगा।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ऊपर वाले की_मर्जी

सभी धर्म चीख चीख कर रहे हैं कि जो भी होता है वह ईश्वर, अल्लाह या गॉड की मर्जी से होता है। सब कुछ खुदा, भगवान या गॉड द्वारा पूर्व निर्धारित होता है। इसे भविष्य का सब कुछ ज्ञात है। उसकी मर्जी बिना पत्ते के भी हिलने की औकात नहीं।
लेकिन फिर भी विभिन्न धार्मिक स्थलों, धार्मिक आयोजनों एवं धार्मिक लोगों की रक्षा करने में वह अपने आपको असहाय महसूस करता। इन सब पर वह अपनी शैतानित क्यों करता है? कोई भी धर्म इसका सही सही जवाब नहीं दे पाता। इसकी इस तरह की हरकतों से तो यही लगता है कि शैतान ही खुदा है। देखिये उसकी शैतानियतः-
जो ईसा मसीह उसके संदेश को जन जन तक पहुँचा रहा था उसीको लोगों ने (उसकी मर्जी से) सूली में चढ़ा दिया और वह (काल्पनिक खुदा, भगवान या गॉड) खामोशी से तमाशा देखता रहा। जो होता है उसकी मर्जी से होता है
प्रसिद्ध फिल्म डायरेक्टर एवं प्रसिद्ध म्यूजिक कम्पनी के मालिक ‘गुलशन कुमार’ जिनका सारा जीवन दुर्गा मां को समर्पित था। मन्दिर से पूजा करने के पश्चात बाहर आते समय दुष्टों की गोली का निशाना बन गये और मौत हो गयी। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
3 अगस्त 08 हाल ही में हिमाचल प्रदेश के विलासपुर जिले में नैना देवी मन्दिर की सीढ़ियों पर मौत का खेल देखा गया जिसमें 1150 व्यक्ति काल कलवित हो गये और अन्य सैकड़ों व्यक्ति घायल हो गये। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1854 प्रयाग में कुंभ मेले के दौरान मची भगदड़ में लगभग 800 श्रद्धालुओं की मौत हो गयी। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1983 नयना देवी-हिमाचल प्रदेश मन्दिर में भगदड़ से करीब 55 भक्तों की जीवन लीला समाप्त हो गयी। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1884 हरिद्वार के एक मंदिर में दर्शन के दौरान भगदड़ में 200 श्रद्धालुओं के जीवन का अन्त हो गया। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
1941 में बारिस और तूफान ने मक्का मस्जिद में मौजूद काबा को पानी में डुबो दिया। काबा पूरी तरह कीचड़ के गंदे पानी से भर गया। मुस्लिम मातम मना रहे थे। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
20 नवंबर 1979 इस्लामिक जेहाजिदों ने मक्का मस्जिद पर हमला कर दिया। जेहादी और वहाँ की सेना के बीच गोलीबारी में सैकड़ों हज यात्री मारे गये। काबा तवाह हो गया। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1989 हरिद्वार के कुंभ मेले के दौरान भगदड़ ने 350 तीर्थयात्रियों की जान ले ली। सन् 2005 महाराष्ट्र के सतारा जिले में मंदरा देवी मंदिर पर धार्मिक मेले के समय शार्ट सर्किट के चलते भगदड़ में 300 से ज्यादा भक्त मौत का शिकार हुए और 200 से ज्यादा घायल हो गये। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
15,16 जून 2013 को उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित केदारनाथ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों में हुई जल प्रलय की विपदा सभी के जहन में याद ताजा है,जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु काल के गाल में समां गए और लाखों लोग इस विपदा से प्रभावित हुए. मन्दिर के अन्दर ही लाशों के ढेर लग गए थे,और मंदिर परिसर में मलबे का अम्बार लग गया था। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
स्पेशल इंतजाम के बावजूद बकरीद पर आयोजित मक्का में हज के दौरान अनेकों बार भगदड़ में सैकड़ों हज यात्रियों की मौत हो जाती है। यह भगदड़ अक्सर शैतान को पत्थर मारने की रस्म अदा करते वक्त होती है। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
इसी प्रकार ईसाई धर्म के आयोजनों में भी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। पादरियों की हत्याएँ होना भी कम दर्दनाक उदाहरण नहीं है। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
जिन धार्मिक स्थलों पर वह काल्पनिक खुदा, भगवान या गॉड रक्षा नहीं कर सकता वह बाकी संसार में आम साधारण इंसानों की क्या रक्षा करेगा? जबकि इन सारी मुसीबतों की जड़ तो वही है।

बुधवार, 13 सितंबर 2017

पितृ श्राद्ध

मान्यता है कि पितरों को पितृ पक्ष में यमराज श्राद्ध ग्रहण करने के लिए पृथ्वी पर भेजते हैं ।
कि पितृ रिण से मुक्ति के लिए पितृ पक्ष में पितृ श्राद्ध करना चाहिए ।
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पितृ पक्ष होता है। मातृ पक्ष क्यों नहीं?
पितृ रिण से मुक्ति चाहिए?  मातृ रिण से नहीं?  क्यों?
यह कैसे पता चले कि पितर कब तक यमराज के चंगुल में रहेंगे? कब छूटकर पुनर्जीवित होंगे ?

सोमवार, 11 सितंबर 2017

सेवा निवृत्त शिक्षक पढ़ाएं

सेवा निवृत्त शिक्षकों को अपने गांव शहर के विद्यार्थियों को मार्गदर्शन करना चाहिए । इससे उनकी आयु में वृद्धि होती है । परीक्षित है।

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

इंसान से इंसान की दूरी

हम पत्थरों की पूजा करते करते खुद पत्थर हो रहे हैं | इंसान से इंसान की दूरी बढ़ती जा रही है|

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को नमन

शिक्षक दिवस के अवसर पर क्या द्रोणाचार्य जैसे रिश्वतखोर पक्षपाती शिक्षकों का भी सम्मान करना चाहिए? जो स्कूल का समय या पैसा खाते हैं वे सम्मान के पात्र हैं?
जो भी हो शिक्षक दिवस के अवसर पर योग्य अयोग्य,  इमानदार बेइमान, शराबी गंजेड़ी सभी शिक्षकों को नमन ।..

शिक्षक दिवस का औचित्य

शासन का आदेश है.   हर वर्ष 05 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाने के लिए छुट्टी रहेगी। तदनुसार स्कूलों में शिक्षक ही शिक्षक दिवस मनाते हैं। वे विद्यार्थियों को सिखाते हैं शिक्षकों का चरण स्पर्श कर फूल माला पहनाएं । फिर वही शिक्षक शिक्षकों का महत्व बताते हैं...  शिक्षक राष्ट्र निर्माता होते हैं। गुरू गोविंद दोऊ खड़े हैं...  याने शिक्षक भगवान के बराबर हैं उनका सम्मान करना चाहिए ।
डाॅ राधा कृष्णन जी को राष्ट्रपति पद का आफर मिलने से वे प्राध्यपक पद से स्तीफा दे दिए। कहते हैं कि उन्होंने शिक्षक पद की गरीमा बढ़ाई । मेरे विचार से यदि वे राष्ट्रपति पद स्वीकार न कर काॅलेज में ही अध्यापन करते तो निश्चित ही शिक्षक पद की गरीमा बढ़ी होती ।
उन्होंने कहा कि उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए । शिक्षकों की गरीमा बढ़ाने के बहाने खुद का जन्मदिन मनाने की इच्छा जाहिर करना भी आश्चर्य है ।
सभी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ऐसा कहें तो....
शिक्षक श्रमिक होता है जो पारिश्रमिक लेकर अध्यापन करता है। निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा करने की कोशिश करता है। हर साल शिक्षक दिवस मनाकर शिक्षकों के सम्मान करने का क्या औचित्य है? अन्नदाता कृषक जो खेतों में पसीना बहाकर हमारा जीवन रक्षा करता है,  बय ट्रेन जहाज का चालक जो हमें सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाता है,  पोलिस सेना जो जान पर खेलकर हमारी रक्षा करता हैं, स्कूल कार्यालय में जो सबकी सेवा कर कर्मियों अधिकारियों की कार्य क्षमता बढा़ते हैं भृत्य चपरासियों का हम कितना सम्मान करते हैं?  नहीं करते तो क्यों?

रविवार, 3 सितंबर 2017

देवी देवताओं से मांगना


निश्चित ही देवी देवता अपने जमाने के महान रहे होंगे । वे देश समाज के लिए अच्छा काम किए होंगें। इसी लिए वे अमर हैं।
मेरे विचार से आज उनसे कुछ मांगना निरर्थक है । बेहतर है उनसे प्रेरणा लें और
कुछ अच्छा काम करें । ईमानदार रहें ।

युवा जाग रहे हैं

मनुवादियों को नहीं चलेगी । अब युवा वर्ग जाग रहा है । वह लकीर के फकीर बनना नहीं चाहता ।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

नफरत बनाम मोहब्बत

Punjab kesari -

चमत्कार की आशा

Ajaib Jalalana
किसी चमत्कार की आस में इंसान अपनी पूरी जिंदगी को बर्बाद कर लेता है।वह भ्र्म पाल लेता है,शायद किसी चमत्कार से उसे स्वर्ग मिल जायेगा!! पूरी जिंदगी ही बदल जाएगी!! गुरबत(गरीबी)से छुटकारा तो पक्का मिल ही जाएगा!!परन्तु ये ख्वाब,ख्वाब ही बनकर रह जाते हैं।उधर अपनी कीमती जिंदगी किसी दांव पर लग गई होती है।
वैसे तो शताब्दियों से प्रत्येक धर्म के अगुवाओं को एक चमत्कारित रूप में पेश किया जाता रहा है।ताकि उनके भावी अनुयाइयों में आस्था के नाम पर अन्धविश्वासों को पक्का कायम किया जाये। और धार्मिक नेता को चमत्कारी घोषित करके अन्धविश्वासी लोगों की एक अच्छी खासी संख्या अपनी तरफ खींच ली जाये।
डेरा सिरसा से सबंधित पूर्व बाबा के अनेकों चमत्कारों को पुस्तकों में छपा हुआ देख सकते हैं;
एक बार की बात है,बाबा जी मौजगढ़ के पास भाखड़ा नहर के किनारे टहक रहे थे,वहां उन्होंने क्या देखा!नहर में एक बड़ी मछली छोटी मछलियों को शिकार बना करके उन्हें खा रही थी।ये देखकर बाबा जी का दिल पसीज गया!उन्होंने कहा ये तो अन्याय है! कलयुग है!घोर पाप!फिर क्या था,बाबा जी ने अपनी जेब में से कुछ बचा हुआ प्रसाद निकाला,और उस प्रसाद को पानी में डाल दिया।बड़ी मछली ने उस प्रसाद को चख लिया!उसके बाद एक ऐसा चमत्कार हुआ!!उस मासाहारी बड़ी मछली ने आगे से जीवों को खाना ही छोड़ दिया!!!
लो कर लो बात...भला कोई उनसे पूछे..पानी में रहने वाला जीव,प्रसाद के चमत्कार से अपने खाने का मीनू कैसे बदल सकता है??