रविवार, 31 मई 2020

हमारे देश के मूल निवासी शुद्र नहीं राक्षस


 हमारे देश के मूल निवासी शुद्र नहीं हैं । मूल निवासी जो जंगलों  में रहते थे  वे  ST अनुसूचित जन जाति, और जो मैदानी भागों में रहकर कृषि करते थे वे O. B.C. अन्य पिछड़ी जाति । उन्हें आर्यों ने राक्षस कहा ।
 आर्य के सवर्ण अपनी सेवा के लिए अपने साथ शुद्रों (दास) को लेकर आये थे ।

अंतरजातीय विवाह को मान्यता

महाभारत काल में अंतरजातीय विवाह को सामाजिक मान्यता थी । लेकिन कालांतर में जातीय भेद भाव, जातीय श्रेष्ठता का अहंकार बढ़ता गया । आज सामाजिक मान्यता नहीं मिलने के कारण हत्या,  आत्म हत्या कr लेते हैं प्रेमी या उन्हें और उनके परिवार वालों को प्रताड़ित किया जाता है, अर्थ दंड दिया जाता है जातीय समाज के द्वारा ।
             अंतरजातीय विवाह को समाज द्वारा भी मान्यता मिलनी चाहिए लेकिन लकीर के फ़कीर रोड़ा बनते हैं ।

धर्मों ने सिर्फ हिंसा और नफ़रत दिया

धर्म अंधेरा कर रहे हैं मैं तो यही देखा । पूरी दुनियां में धर्मों ने हिंसा मार काट नफ़रत दिया । तर्क प्रयोग से भक्तोंको दूर रखने की कोशिश की । 
हमारे हिन्दू धर्म की सैकड़ों पुस्तकें पत्रिका तथा ये कथित आध्यात्म की बहुत किताबें पत्रिकाएं मैं पढ़ा, अजपा जप किया, गायत्री मंत्र का जाप किया, बुद्ध का विपश्यना ध्यान,  महेश योगी का  भावातीत ध्यान किया । ऐसे बहुत सारे अध्ययन किया लेकिन ये कथित आध्यात्म से कोई खास कुछ नहीं मिला । यही जाना कि ध्यान से हर काम करना चाहिए । ध्यान  लगाकर  पढ़ाई करनी चाहिए । ध्यान एकाग्रता से किसी विषय पर तर्क युक्त सोच विचार करना चाहिए ।

शनिवार, 30 मई 2020

यदा यदा हि..

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं युगे युगे|
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गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं/कर रहे हैं? मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता पुस्तकों  में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा जी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
     कई लोगों को मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ| 
   तब मैं मई 2015 में फेसबुक में लिखा| 2016, 2017, 2018 में फिर से शेअर किया|  17-06-2018 को  फेसबुक और वाट्सएप कई ग्रुप में शेअर किया| 
     मेरे वाट्सएप ग्रुप "विचार मंच" में रचनाकार महेश शर्मा ने आज दिनांक 17-06-2018 के अर्थ बताया -
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम् |
   उसी दिन यथार्थवादी चिंतक, रचानाकार पद्ममुख पंडा महापल्ली मुझसे सहमत हुए| कुछ और भी| सहमत हुए|
      गीता का यह चित्र  श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
     सोचने की बात है कि गीता में 
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए" नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए" 
ही कहा गया होगा|
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्थामधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य कहा गया होगा|.
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शुक्रवार, 29 मई 2020

स्व श्री लखी राम अग्रवाल

स्व श्री लखी राम अग्रवाल 
के बारे में कोई बता रहा था कि  स्व. श्री लखी राम अग्रवाल अपने जीवन में दीन दुखियों की बहूत सेवा करते थे, उनकी चिकित्सा तथा दवा भी अपने खर्च से कराते थे । दूसरे आदमी बोले वे डाक्टर थे  सबका निशुल्क चिकित्सा करते थे। इसीलिए उनके नाम से रायगढ़ के मेडिकल कालेज का नाम "स्व लखी राम अग्रवाल चिकित्सालय रायगढ़ " रखा गया है ।
कोई तीसरा जोर से बोला. ये सब क्या बकवास करते हो. आप लोगों को पता नहीं है तो चुप रहो. लखी राम कोई समाज सेवक नहीं थे, एक व्यवसायी थे उनके खानदान का व्यवसाय  गुड़ाखू बनाने का कारखाना था । वही गुड़ाखू जिससे कैंसर होने का खतरा बताते हैं! 
किसी ने कहा लखी राम बनिया थे खरसियां के, वे छत्तीसगढ़ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे । इस लिए भाजपा के शासन काल में रायगढ़ मेडिकल कालेज का नाम उनके नाम से रख दिए।

गुरुवार, 28 मई 2020

वीर न कहें तो आधा वीर ही कहें

दामोदर सावरकर जी को देश की आजादी के लिए काला पानी की सजा हुई । अंडमान के उस कारागृह में कुछ समय रहने के बाद उन्होंने अंग्रेज सरकार से माफी मांग कर वचन दिया कि वे भविष्य में कभी अंग्रेज सरकार का विरोध नहीं करेंगे । 
             उन्हें RSS और भाजपा द्वारा वीर कहने से लोग को आपत्ति जताते हैं । क्यों कि वे माफी मांगने के बाद अपने वचन का पालन करते हुए अंग्रेज सरकार का कभी विरोध नहीं किया तथा देश की आजादी से कोई सारोकार नहीं रखा ।
            मेरे विचार से उन्हें  "वीर" न कहें तो कम से कम आधा वीर तो कहना चाहिये । हम तो उनके सौवां भाग के बराबर भी शायद ही देश के लिये  कुछ कर सकें ।

सोमवार, 25 मई 2020

वायरस जनित रोग की दवा नहीं होती

किसी भी वायरस को नष्ट करने की कोई दवा नहीं होती । कोरोना 19 की भी नहीं ।
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही वायरस को नष्ट करती है । यह क्षमता बढ़ाना ही उपाय है । आदर्श आहार,  उचित जीवन यापन ।
रोग प्रतिरोध क्षमता अच्छी है तो वायरस को खत्म होना ही है नहीं तो जीवन खत्म ।
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      वायरस मारने के लिए कोई भी दवा, कोई भी जड़ी बूटी,   मंत्र,  तंत्र, यंत्र , पूजा पाठ  प्रार्थना, नमाज.... नाटक होगा । लगेगा कि यही काम किया ।

गुरुवार, 14 मई 2020

OBC कौन? छत्तीसगढ़ में कोलता जाति के लोग भी लिखते हैं उपनाम "गुप्त"

पिछड़ी जाति कौन? -
छत्तीसगढ़ में कोलता जाति के लोग भी उपनाम "गुप्ता" लिखते हैं, ओड़िशा में कोई नहीं लिखता ।

                 आर्यों के मनु स्मृति के चार वर्णों में से तीन वर्ण क्रमशः उच्च माने जाते हैं ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य , चौथा वर्ण है शुद्र । 
           शुद्र को अछूत माना गया । ब्राह्मण उनके घर में जाकर जन्म  मृत्यु संस्कार, शादी विवाह, यज्ञ हवन आदि नहीं करते ।
                 आर्य हमारे भारत में आकर बस गये । यहाँ  के मूल निवासी जंगलों में रहने वाले  (S. T.) तथा मैदानी इलाके में रहने वाले (अन्य पिछड़ी जाति O.B.C. मुख्य काम खेती ) को आर्यों राक्षस कहा । आर्यों के पुराणों में इन्हें राक्षस कहा गया है । उनके कथा कहानियों में उन्हें कुरूप, झगड़ालु , बदमाश, मांसाहारी..  बताया गया। आर्यों और राक्षसों के बीच युद्ध होते रहे । राक्षस बलिष्ठ और सरल स्वभाव के  होते थे । आर्यों के कथित उच्च वर्ग (सवर्ण) बड़े दिमाग वाले तथा चालाक होते थे ।
             O.B.C  कोलता अघरिया कुर्मी.....  खुद को सवर्ण वैश्य,  क्षत्रिय कहलाना चाहते हैं खुद को उच्च जाति का बताकर सम्मान पाना चाहते हैं लेकिन शासन द्वारा मिलने वाली सहायता छात्रवृत्ति आरक्षण का लाभ लेते हैं ।
                 हम कोलता भी राक्षस कुल के हैं । विवाह/एकादश कर्म के पूजा हवन में पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं कहते हैं -
जम्बू द्वीपे भारतवर्षे उत्कल देशे राक्षस कुलस्य गुप्त वंशस्य  . ..........
इससे स्पष्ट है छत्तीसगढ़ के हम  (कोलता ) के पूर्वज उत्कल देश (ओड़िशा) से आए हैं । ज्ञातव्य है कि ओड़िशा में कोलता कुल्ता कुलिता कोई अपना उपनाम "गुप्ता " नहीं लिखते ।
                      ओडिशा से कुलिता कुलता छत्तीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश) में आकर कोलता लिखने लगे ।  पधान से प्रधान, भोई से भोय, साहू से साहा साव सा, ....।
            मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) रायगढ़ पूर्वांचल दो दो विद्वान जो बहुत पढ़ाकू थे महापल्ली के श्री हेम सुंदर प्रधान तथा लोइंग के श्री पूर्ण चंद्र प्रधान अपने कुल / जाति को गर्वित करने के लिए मनु के चार वर्ण में से वैश्य वर्ण का बताने के लिए मनु के निर्देशानुसार सरनेम " गुप्त" लिखने के लिये विचार किये ।
हेम सुंदर जी कोलता जाति को कलिंग से जोड़ा। बताया कि प्रधान और गुप्त पर्यायवाची शब्द हैं इसलिये प्रधान सरनेम वालों को गुप्त सरनेम लिखना चाहिए ।उन्होंने अपना सरनेम गुप्त लिखना आरम्भ किया। लेकिन पूर्ण चंद्र जी चाहते थे पूरी कोलता जाति को वैश्य मनवाने के लिये कोलता जाति के सभी सरनेम वालों को गुप्त सरनेम लिखना चाहिए । लेकिन वे हिंदी के अलावा अंग्रेजी के भी प्रेमी थे । उन्होने अपना सरनेम गुप्त का अंग्रेजी स्टाईल गुप्ता पसंद किया । वे पूर्ण चंद्र गुप्ता लिखने लगे । उनके बड़े भाई इन्द्रो जी भी, फिर लोइंग के गौन्तिया गौटिया परिवार के अधिकतर लोग उपनाम  "प्रधान" लिखना छोड़ कर "गुप्ता" लिखने लगे । (लोइंग के  गौटिया परिवार में भी सरनेम लिखने में एकरूपता नहीं थी। मेरे ताऊ श्री धरनीधर प्रधान, मेरे पिता श्री गजपति प्रधान,  मेरे चाचा श्री जयराम गुप्ता,  श्री उद्धव प्रधान,  चचेरे भाई श्री शशिभूषण प्रधान ) ।
 उसी वंश के दूसरे गांव महापल्ली, केंसरा, तुरंगा, पोटेबिर्नी, ..के लोग भी प्रधान सरनेम छोड़ कर गुप्ता लिखने लगे । यह गुप्ता सरनेम बड़े लोगों का, ऊँचा माना जाना लगा। छत्तीसगढ़ के विभिन्न सरनेम प्रधान, भोई, खम्हारी,  साहू, बारीक, बिश्वाल,  ....  ..अपना उपनाम  गुप्ता लिखने लगे । कालांतर में छत्तीसगढ़ कोलता समाज की बैठक में बहुत विचार विमर्श के पश्चात गुप्ता सरनेम को मान्यता दी गई ।
             ज्ञातव्य है कि मनु स्मृति के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण , क्षत्रीय,  वैश्य, शुद्र का 
काम क्रमशः -
ब्राह्मण - पढ़ना पढ़ाना,  यज्ञ हवन पूजा पाठ करना , दान दक्षिणा लेना। 
क्षत्रीय - अश्त्र शस्त्र धारण कर राज्य के लिये युद्ध करना ।
वैश्य - व्यवसाय करना ।
शुद्र - सेवा करना ।
चारों वर्ण के लिये अलग अलग उपनाम लिखने का निर्देश है ।
ब्राह्मण - शर्मा
क्षत्रीय - सिंह 
वैश्य - गुप्त 
शुद्र - दास 
कालांतर में जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी वर्णों के कई कई वर्ग बन गए । तदनुसार अलग अलग सरनेम याने एक उपनाम के कई उपनाम ।
ब्राह्मणों शर्मा के - पंडा , द्विवेदी,  त्रिवेदी. चतुर्वेदी, तिवारी ...
कोलता के - पधान प्रधान, साहू सा साव साहा शाह,  भोई भोय, बारीक, बिश्वाल, खम्हारी  ... .... 
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मनु के निर्देशानुसार अपने वर्ण के मुख्य उपनाम के साथ उस के वर्ग का उपनाम लिखना चाहिए । 
           आधुनिक काल में साहित्यकारों के द्वारा अपने स्वभाव कर्म योग्यता को व्यक्त करने के लिए कोई अतिरिक्त उपनाम लिखने की परम्परा बनी ।
              मेरे विचार से मनु स्मृति को निम्नांकित दो शिक्षक ठीक ठीक पढ़े और समझे थे । क्यों कि वे अपना नाम मनु के निर्देशानुसार निम्नानुसार  लिखते थे ।
( उनसे कभी मनु स्मृति या जाति उपनाम के सम्बन्ध में मेरी चर्चा नहीं हुई ।
नीलाम्बर प्रसाद शर्मा त्रिपाठी "शास्त्री" ( लोइंग) 
श्कृतार्थ शर्मा "रथ" (नवाँपारा पुसौर ) ।
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यदि हमारी जाति "कोलता" को वैश्य मान लें (सच नहीं है) तो लिखना चाहिए -
श्री हेम सुंदर गुप्त प्रधान (महापल्ली )
श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता प्रधान (लोइंग )
तदनुसार मैं लिखूं  तो -
नत्थू राम गुप्त प्रधान "सत्यार्थी"
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कृपया मुझे जातिवादी या मनुवादी न समझें ।
मेरे इस लेख का मकसद किसी को  को ठेस पहुंचाना नहीं है , सच को सामने लाना है ।

रविवार, 3 मई 2020

intellgency

intelligency याने मन में सवाल,  तरह तरह के सवाल ।   प्रश्न??????????????????????????????

श्री राम जी के मन में संदेह था

           श्री राम चंद्र जी राजा रहे थे अपनी नाक बचाने के लिए सीता को छुड़ा कर लाए, सीता से प्रेम के लिए नहीं। उनके मन में सीता जी के लिए संदेह था ।  किसी धोबा का कथन तो एक बहाना था अपनी पत्नी के त्याग के लिए। इसीलिए वे सीता का बार बार सतीत्व परीक्षा ली गई । सीता जी दुखी होकर किसी कुआँ में कूद कर जान दे दी। तब राम जी को समझ आया।  पश्चात्ताप हुआ।  सरयू नदी में डूब कर आत्महत्या कर लिये ।
             वे केवल कैकेई  की इच्छा पूर्ति के लिए 14 साल के लिए राजपाट छोड़ कर चल दिये। जबकि उनके पिता राजा दशरथ की इच्छा नहीं थी।  
 यदि सीता से प्रेम होता, धोबा के कथन को आम जनता का विचार माने तब उन्हें अपनी पत्नी के साथ राजपाट का त्याग कर देना चाहिए था।