पिछड़ी जाति कौन? -
छत्तीसगढ़ में कोलता जाति के लोग भी उपनाम "गुप्ता" लिखते हैं, ओड़िशा में कोई नहीं लिखता ।
आर्यों के मनु स्मृति के चार वर्णों में से तीन वर्ण क्रमशः उच्च माने जाते हैं ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य , चौथा वर्ण है शुद्र ।
शुद्र को अछूत माना गया । ब्राह्मण उनके घर में जाकर जन्म मृत्यु संस्कार, शादी विवाह, यज्ञ हवन आदि नहीं करते ।
आर्य हमारे भारत में आकर बस गये । यहाँ के मूल निवासी जंगलों में रहने वाले (S. T.) तथा मैदानी इलाके में रहने वाले (अन्य पिछड़ी जाति O.B.C. मुख्य काम खेती ) को आर्यों राक्षस कहा । आर्यों के पुराणों में इन्हें राक्षस कहा गया है । उनके कथा कहानियों में उन्हें कुरूप, झगड़ालु , बदमाश, मांसाहारी.. बताया गया। आर्यों और राक्षसों के बीच युद्ध होते रहे । राक्षस बलिष्ठ और सरल स्वभाव के होते थे । आर्यों के कथित उच्च वर्ग (सवर्ण) बड़े दिमाग वाले तथा चालाक होते थे ।
O.B.C कोलता अघरिया कुर्मी..... खुद को सवर्ण वैश्य, क्षत्रिय कहलाना चाहते हैं खुद को उच्च जाति का बताकर सम्मान पाना चाहते हैं लेकिन शासन द्वारा मिलने वाली सहायता छात्रवृत्ति आरक्षण का लाभ लेते हैं ।
हम कोलता भी राक्षस कुल के हैं । विवाह/एकादश कर्म के पूजा हवन में पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं कहते हैं -
जम्बू द्वीपे भारतवर्षे उत्कल देशे राक्षस कुलस्य गुप्त वंशस्य . ..........
इससे स्पष्ट है छत्तीसगढ़ के हम (कोलता ) के पूर्वज उत्कल देश (ओड़िशा) से आए हैं । ज्ञातव्य है कि ओड़िशा में कोलता कुल्ता कुलिता कोई अपना उपनाम "गुप्ता " नहीं लिखते ।
ओडिशा से कुलिता कुलता छत्तीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश) में आकर कोलता लिखने लगे । पधान से प्रधान, भोई से भोय, साहू से साहा साव सा, ....।
मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) रायगढ़ पूर्वांचल दो दो विद्वान जो बहुत पढ़ाकू थे महापल्ली के श्री हेम सुंदर प्रधान तथा लोइंग के श्री पूर्ण चंद्र प्रधान अपने कुल / जाति को गर्वित करने के लिए मनु के चार वर्ण में से वैश्य वर्ण का बताने के लिए मनु के निर्देशानुसार सरनेम " गुप्त" लिखने के लिये विचार किये ।
हेम सुंदर जी कोलता जाति को कलिंग से जोड़ा। बताया कि प्रधान और गुप्त पर्यायवाची शब्द हैं इसलिये प्रधान सरनेम वालों को गुप्त सरनेम लिखना चाहिए ।उन्होंने अपना सरनेम गुप्त लिखना आरम्भ किया। लेकिन पूर्ण चंद्र जी चाहते थे पूरी कोलता जाति को वैश्य मनवाने के लिये कोलता जाति के सभी सरनेम वालों को गुप्त सरनेम लिखना चाहिए । लेकिन वे हिंदी के अलावा अंग्रेजी के भी प्रेमी थे । उन्होने अपना सरनेम गुप्त का अंग्रेजी स्टाईल गुप्ता पसंद किया । वे पूर्ण चंद्र गुप्ता लिखने लगे । उनके बड़े भाई इन्द्रो जी भी, फिर लोइंग के गौन्तिया गौटिया परिवार के अधिकतर लोग उपनाम "प्रधान" लिखना छोड़ कर "गुप्ता" लिखने लगे । (लोइंग के गौटिया परिवार में भी सरनेम लिखने में एकरूपता नहीं थी। मेरे ताऊ श्री धरनीधर प्रधान, मेरे पिता श्री गजपति प्रधान, मेरे चाचा श्री जयराम गुप्ता, श्री उद्धव प्रधान, चचेरे भाई श्री शशिभूषण प्रधान ) ।
उसी वंश के दूसरे गांव महापल्ली, केंसरा, तुरंगा, पोटेबिर्नी, ..के लोग भी प्रधान सरनेम छोड़ कर गुप्ता लिखने लगे । यह गुप्ता सरनेम बड़े लोगों का, ऊँचा माना जाना लगा। छत्तीसगढ़ के विभिन्न सरनेम प्रधान, भोई, खम्हारी, साहू, बारीक, बिश्वाल, .... ..अपना उपनाम गुप्ता लिखने लगे । कालांतर में छत्तीसगढ़ कोलता समाज की बैठक में बहुत विचार विमर्श के पश्चात गुप्ता सरनेम को मान्यता दी गई ।
ज्ञातव्य है कि मनु स्मृति के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण , क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र का
काम क्रमशः -
ब्राह्मण - पढ़ना पढ़ाना, यज्ञ हवन पूजा पाठ करना , दान दक्षिणा लेना।
क्षत्रीय - अश्त्र शस्त्र धारण कर राज्य के लिये युद्ध करना ।
वैश्य - व्यवसाय करना ।
शुद्र - सेवा करना ।
चारों वर्ण के लिये अलग अलग उपनाम लिखने का निर्देश है ।
ब्राह्मण - शर्मा
क्षत्रीय - सिंह
वैश्य - गुप्त
शुद्र - दास
कालांतर में जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी वर्णों के कई कई वर्ग बन गए । तदनुसार अलग अलग सरनेम याने एक उपनाम के कई उपनाम ।
ब्राह्मणों शर्मा के - पंडा , द्विवेदी, त्रिवेदी. चतुर्वेदी, तिवारी ...
कोलता के - पधान प्रधान, साहू सा साव साहा शाह, भोई भोय, बारीक, बिश्वाल, खम्हारी ... ....
********
मनु के निर्देशानुसार अपने वर्ण के मुख्य उपनाम के साथ उस के वर्ग का उपनाम लिखना चाहिए ।
आधुनिक काल में साहित्यकारों के द्वारा अपने स्वभाव कर्म योग्यता को व्यक्त करने के लिए कोई अतिरिक्त उपनाम लिखने की परम्परा बनी ।
मेरे विचार से मनु स्मृति को निम्नांकित दो शिक्षक ठीक ठीक पढ़े और समझे थे । क्यों कि वे अपना नाम मनु के निर्देशानुसार निम्नानुसार लिखते थे ।
( उनसे कभी मनु स्मृति या जाति उपनाम के सम्बन्ध में मेरी चर्चा नहीं हुई ।
नीलाम्बर प्रसाद शर्मा त्रिपाठी "शास्त्री" ( लोइंग)
श्कृतार्थ शर्मा "रथ" (नवाँपारा पुसौर ) ।
********************
यदि हमारी जाति "कोलता" को वैश्य मान लें (सच नहीं है) तो लिखना चाहिए -
श्री हेम सुंदर गुप्त प्रधान (महापल्ली )
श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता प्रधान (लोइंग )
तदनुसार मैं लिखूं तो -
नत्थू राम गुप्त प्रधान "सत्यार्थी"
****
कृपया मुझे जातिवादी या मनुवादी न समझें ।
मेरे इस लेख का मकसद किसी को को ठेस पहुंचाना नहीं है , सच को सामने लाना है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें