रविवार, 30 जून 2019

सबसे अच्छा सोशल मीडिया

उपन्यास कथा कहानी कविता निबंध में लेखक अपने मन की बात लिखता है । लोग खरीदकर पढ़ते थे लेकिन अब बहुत कम लोग खरीद रहे हैं ।मैं खुद दस बारह साल से छोड़ दिया ।
अब सोशल मीडिया अपना विचार ब्यक्त करने, विचार और जानकारी के आदान प्रदान के लिये सबसे अच्छा साधन है ।

अपने मन की बात

facebook twitter में कोई मेरे मन की बात पोस्ट करता है तो मैं शेअर कर देता हूं । टाईप करने से बच जाता हूँ । वैसे भी और  उनकी तरह अच्छी शैली में निबंध कविता नहीं लिख सकता ।
कभी कभी किसी पोस्ट पर मुझे संशय हो तो debate discuss के लिये और कोई पोस्ट दूसरों की जानकारी के लिये भी शेअर करता हूं ।

शुक्रवार, 28 जून 2019

सपनों के सौदागर सपना दिखाते हैं

सालों से अखंड भारत का सपना दिखाने वाले खुद कुछ किये नहीं , बस सपना दिखाते हैं ये सपनों के सौदागर ।
अब भी यह सपना दिखा रहे हैं कुछ तथा कथित देश भक्त  । क्या पाकिस्तान बंगला देश को भारत में जबर्दस्ती शामिल करने के लिए युद्ध करना उचित होगा?

अखंड भारत का सपना

अखंड भारत का सपना दिखाने वाले कुछ किये नहीं , बस सपना दिखाते हैं ये सपनों के सौदागर ।

गुरुवार, 27 जून 2019

मेरे गुरू


मैं किसी गुरू से कर्ण मंत्र नहीं लिया याने मेरा कोई कान फूंका गुरू नहीं है ।
मेरे गुरू हैं मेरे दादा जी,  माता पिता, मेरे स्कूल शिक्षक,  उपन्यासकार,  कथाकार, कवि,  लेखक,  सम्पादक,  सोशल मीडिया के विचारक, प्रकृति

बुधवार, 26 जून 2019

मेरा धर्म मानवता


मैं पूजा पाठ, अजपाजप,  भगवान देवी देवताओं की मुर्तियों के सामने मत्था टेकना उनसे कुछ मांगना सालों से छोड़ दिया । मैं किसी गुरू से कर्ण मंत्र नहीं लिया याने मेरा कोई कान फूंका गुरू नहीं है ।
कभी कभी ध्यान करता हूं ।
मन्दिरों में चढ़ावा नहीं देता जहाँ भगवान देवी देयताओं की मुर्तियाँ होती हैं । सिर्फ़ एक मंदिर में चढ़ावा दिया हूं जहाँ साक्षात् देवी देवता विद्यार्थियों को बहुत कम वेतन में अच्छी शिक्षा देते हैं । वह मंदिर है बटमूल आश्रम महाविद्यालय महापल्ली जिला रायगढ़  ।
मानवता मेरा धर्म है । विद्यार्थियों के हित में कुछ कुछ करता रहता हूं ।

मंगलवार, 25 जून 2019

पढ़े लिखे मुर्ख

हाँ सही कहा,  पढ़े लिखे मुर्ख पेड़ पर नहीं फलते। वे लकीर के फ़कीर होते हैं जो विज्ञान का क ख ग भी नहीं जानते । नये विचार को सुनना भी नहीं चाहते ।
ऐसे मुर्ख किसी विचार का तर्क आधार युक्त जबाब नहीं दे सकते,  वे दूसरों को मुर्ख कह कर खुश होते हैं ।

तिरस्कार बहिष्कार

मेरे विचार से अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करें न करें उनका तिरस्कार बहिष्कार नहीं करना चाहिए ।

सोमवार, 24 जून 2019

साजिश

सालों से नफ़रतों के बीज बो रहे हैं । अब फ़लने फ़ूलने लगे हैं ।
सब सोची समझी साजिश है । हिंदू मुस्लिम लड़ाई दंगा मारकाट..  मुस्लिम दूसरे देश में चले जाएंगे । हमारा देश हिंदुस्थान बन जाएगा ।

रविवार, 23 जून 2019

संविधान का पालन

संविधान का पालन करना चाहिए सब को लेकिन क्या भारत माता की जय और वंदे मातरम बोलना भी जरूरी है सब के लिये?  हम तो बोलते हैं लेकिन घटिया नीच संकीर्ण चोर अपराधी गद्दार राष्ट्र द्रोही घूसखोर लोग भी वंदे मातरम और भारत माता की जय कहते हैं ।

शनिवार, 22 जून 2019

अन्नदाता

शिक्षक गुरू राष्ट्रपति प्रधानमंत्री .. ...  सबसे महान
अन्नदाता

अन्तर्जातीय विवाह


मेरे विचार से अन्तर्जातीय विवाह को भले ही प्रोत्साहित न करें लेकिन उनका तिरस्कार बहिष्कार नहीं करना चाहिए ।
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हर जाति में उच्चता का दम्भ भरा है । कहते हैं अन्तरर्जातीय विवाह से खून का मिश्रण हो जाएगा जो उन्हें मंजूर नहीं । अब तक मिश्रण नहीं हुआ है ऐसा कहने का कोई आधार नहीं है । हमारे भारत में अधिकतर जाति के लोग mix colour के हैं याने एक जाति के लोग एक ही रंग रूप के नहीं हैं ।
पौराणिक काल, महाभारत काल में अंतर्जातीय विवाह प्रचलित थे । बाद में जातीय घमंड पनपा है ।
जरूरत पड़ने पर कथित नीची जाति का खून भी लेते हैं । कहते हैं हमारी जाति के संस्कार उच्च हैं । देख रहे हैं सब कहने की बात है । एक ही जाति में अलग अलग संस्कार होते हैं ।
कई बार युवा वर्ग में हत्या आत्म हत्या का कारण भी यह जाति दम्भ ही होता है ।
       अन्तर्जातीय विवाह को मान्यता देने वाले निश्चित ही किसी जाति धर्म से उपर मानवता के पुजारी होते हैं । जाति अहंकार वाले अंतर्जातीय विवाह करने वालों को जाति समाज से बहिष्कृत कर देते हैं ।
विज्ञान अनुसार जिन जातियों में सिकल सेल बीमारी होती है अन्तर्जातीय विवाह से भावी पीढी कम होगी ।
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मेरे विचार से अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित भले न करें लेकिन जो करते हैं उनका तिरस्कार बहिष्कार नहीं करना चाहिए ।
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कृपया coment box में बिना तर्क आधार के असहमति व्यक्त न करें । कोई व्यक्तिगत प्रश्न उपदेश न दें ।
लकीर के फ़कीर तो इस पोस्ट को पढ कर सोच विचार करना पसंद नहीं करेंगे । बाकी युवा विचार वालों में से कुछ लोग क्या कहेंगे सोच कर चाहते हुए भी like नहीं करेंगे ।

बुधवार, 19 जून 2019

कुम्भ

आस्तिक बताते हैं कुम्भ नहाने से पाप धुल जाते हैं !
हम पूछतें हैं इतने पाप करते ही क्यों हो , की कुम्भ जाना पड़े ...!!

सोमवार, 17 जून 2019

कर्मेण्येव अधिकारस्ते..

गीता के श्लोक पर सवाल नहीं लेकिन हमसे भूल हो सकती है ।
*******
गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं| मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा डी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
     कई लोगों से मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ|
  
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम्

      गीता का यह चित्र  श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
       सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए"नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
    
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्नमधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य (अभ्युत्थानम् धर्मस्य) कहा गया होगा|
         **"*"**"
       जो संस्कृत का कखग भी नहीं जानते खुद को महा ज्ञानी समझते हैं |फिर भी बकबक करते हैं इससे अनावश्यक परेशानी होती है । कृपया ऐसे लोग दूर रहें ।
           जो संस्कृत के जानकार होते हैं वे ज्यादातर लकीर के फ़कीर होते हैं । कुछ भी नया सुनना भी पसंद नहीं करते ।
             हाई स्कूल तक सभी संस्कृत पढ़ते हैं उनसे निवेदन है मेरे संदेह पर गौर करें तथा तर्क आधार सह अपना विचार व्यक्त करें ।

संस्कृति

लकीर के फ़कीर संस्कृति का रोना रोते रहते हैं । वे चाहते हैं पीछे ले जाना । आगे बढ़ना नहीं चाहते,  किसी को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहते ।
दरअसल हम जैसा जीते हैं वही संस्कृति है । परिवर्तन संशोधन के साथ सतत विकास ही संस्कृति है ।

शनिवार, 15 जून 2019

कर्मेण्येव अधिकारस्ते..

गीता के श्लोक पर सवाल नहीं लेकिन हमसे भूल हो सकती है ।
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गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं| मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा डी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
     कई लोगों से मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ|
  
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम्

      गीता का यह चित्र  श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
       सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए"नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
    
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्नमधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य (अभ्युत्थानम् धर्मस्य) कहा गया होगा|
         **"*"**"
       जो संस्कृत का कखग भी नहीं जानते खुद को महा ज्ञानी समझते हैं |फिर भी बकबक करते हैं इससे अनावश्यक परेशानी होती है । कृपया ऐसे लोग दूर रहें ।
           जो संस्कृत के जानकार होते हैं वे ज्यादातर लकीर के फ़कीर होते हैं । कुछ भी नया सुनना भी पसंद नहीं करते ।
             हाई स्कूल तक सभी संस्कृत पढ़ते हैं उनसे निवेदन है मेरे संदेह पर गौर करें तथा तर्क आधार सह अपना विचार व्यक्त करें ।

कर्मेण्येव अधिकारस्ते..

गीता के श्लोक पर सवाल नहीं लेकिन हमसे भूल हो सकती है ।
*******
गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं| मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा डी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
     कई लोगों से मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ|
  
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम्

      गीता का यह चित्र  श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
       सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए"नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
    
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्नमधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य (अभ्युत्थानम् धर्मस्य) कहा गया होगा|
         **"*"**"
       जो संस्कृत का कखग भी नहीं जानते खुद को महा ज्ञानी समझते हैं |फिर भी बकबक करते हैं इससे अनावश्यक परेशानी होती है । कृपया ऐसे लोग दूर रहें ।
           जो संस्कृत के जानकार होते हैं वे ज्यादातर लकीर के फ़कीर होते हैं । कुछ भी नया सुनना भी पसंद नहीं करते ।
             हाई स्कूल तक सभी संस्कृत पढ़ते हैं उनसे निवेदन है मेरे संदेह पर गौर करें तथा तर्क आधार सह अपना विचार व्यक्त करें ।

मंगलवार, 11 जून 2019

मृतक भोज

मेरे विचार से मृतक भोज के संबंध में  किसी जाति समाज द्वारा कोई नियम नहीं बनाना चाहिए । मृतक भोज का बहिष्कार तिरष्कार करना उचित नहीं । जब भी मौका मिला मैं विरोध किया हूं ।
जो मृतक भोज बंद करने की बात करते हैं उन्हें
अपने घर परिवार से पहल करनी  चाहिए । स्वयम् अपनी इच्छा  लिख कर अपने परिवार तथा समाज के चार - पांच लोगों को दे दें ।
इस संबंध में कोई नियम न बनाएं। कोई भोज दे , न दे । जैसा भोज देना चाहे, मीठा खिलाए जो जो खिलाए अपनी मर्जी ।
मेरा यह विचार पहले भी व्यक्त किया हूं फेसबुक में ।
       *******
मेरा यह भी सुझाव है धनी लोगों के लिये -
70-75 साल उम्र के बाद एक उत्सव मनाएं अपने जीने का ।  अपने परिवार,  रिश्तेदार,  मित्र्, परिचितों शुभ चिंतकों को आमंत्रित करें ।

मनोकामना पूरी होती है

पहले सुना था  देवी देवताओं की मुर्तियों के दर्शन करने से मनोकामना पूरी होती है । अब कहने लगे हैं उनकी मुर्तियों  के फोटो  सोशल मीडिया में शेअर करने से मनोकामना पूरी होती है । गज़ब ।