शनिवार, 15 जून 2019

कर्मेण्येव अधिकारस्ते..

गीता के श्लोक पर सवाल नहीं लेकिन हमसे भूल हो सकती है ।
*******
गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं| मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा डी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
     कई लोगों से मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ|
  
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम्

      गीता का यह चित्र  श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
       सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए"नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
    
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्नमधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य (अभ्युत्थानम् धर्मस्य) कहा गया होगा|
         **"*"**"
       जो संस्कृत का कखग भी नहीं जानते खुद को महा ज्ञानी समझते हैं |फिर भी बकबक करते हैं इससे अनावश्यक परेशानी होती है । कृपया ऐसे लोग दूर रहें ।
           जो संस्कृत के जानकार होते हैं वे ज्यादातर लकीर के फ़कीर होते हैं । कुछ भी नया सुनना भी पसंद नहीं करते ।
             हाई स्कूल तक सभी संस्कृत पढ़ते हैं उनसे निवेदन है मेरे संदेह पर गौर करें तथा तर्क आधार सह अपना विचार व्यक्त करें ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें