कई साल से लोग होली मना रहे हैं, होली की बधाई देते हैं.. क्या इससे सुख समृद्धि में वृद्धि हो रही है? बुराई में कमी आ रही है ?
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
सोमवार, 29 मार्च 2021
रविवार, 28 मार्च 2021
अम्बेडकर का नहीं हमारा संविधान
हमारे संविधान सभा के अध्यक्ष
अम्बेडकर जी नहीं थे. वे drafting कमेटी के अध्यक्ष थे।
drafting कमेटी का काम संविधान सभा में पारित नियम कानून को धारा उप धाराओं में सजाकर लिखना था । उन्होने उन पारित नियम कानून नीतियों को कर संविधान का रूप दिया ।
यह काम विधि विशेषज्ञ अच्छे से कर सकते थे । इस लिये इसकी जिम्मेदारी अम्बेडकर जी को दी गई थी ।
अतः हमारे संविधान को अम्बेडकर का संविधान कहना गलत है ।
शनिवार, 20 मार्च 2021
कुल देवता कुल देवी
कुल देवी / कुल देवता
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हिंदू धर्म मानने वाले सभी जाति की एक एक कुल देवता / देवी होती है । पता नहीं, मुस्लिम इसाई लोगों के कुल देवता या कुल देवी होती है या नहीं ।
कोलता जाति की कुल देवी
श्री रामचंडी को मानते हैं । वे दुर्गा की रूप हैं ऐसा माना जाता है । आज कल हमारे इधर रायगढ़ पूर्वांचल के कई गांवों में श्री रामचंडी के मंदिर बना रहे हैं ।
देवी के नाम में श्री राम और श्री चंडी जुड़े हैं । इससे लगता है कि पाताल लोक की देवी महामाया ही ( जिन्हें देवी दुर्गा का रूप माना जाता है ) श्री रामचंडी देवी हैं जिनके सामने रावण का भाई पाताल का राजा अहिरावण श्री राम और श्री लक्ष्मण जी का बलि देने वाला था । वीर हनुमान जी ने अहिरावण को पराजित कर राम और लक्ष्मण को भूलोक में ले आये । हो सकता है हनुमान जी देवी महामाया / चंडी को भी अपने साथ ले आये हों । जिन्हें हम श्री रामचंडी कहते हैं जिन्हें हम कोलता जाति की कुल देवी मानते हैं ।
शनिवार, 13 मार्च 2021
वर्ण, जाति, उपनाम, पिछड़ी जाति, कोलता, गुप्ता
जाति और उनके उपनाम
पिछड़ी जाति OBC कौन ? -
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छत्तीसगढ़ में कोलता जाति के लोग भी उपनाम "गुप्ता" लिखते हैं, ओड़िशा में कोई नहीं लिखता ।
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आर्यों के मनु स्मृति के अनुसार चार वर्णों में से तीन वर्ण क्रमशः उच्च माने जाते हैं ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य। चौथा वर्ण है शुद्र ।
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शुद्र को अछूत माना गया । ब्राह्मण उनके घर में जाकर जन्म मृत्यु संस्कार, शादी विवाह, यज्ञ हवन आदि नहीं करते ।
हमारे भारत के मूल निवासी जंगलों में रहने वाले (S. T.) तथा मैदानी इलाके में रहने वाले (अन्य पिछड़ी जाति O. B. C. मुख्य काम खेती ) को आर्यों ने राक्षस कहा । आर्यों के पुराणों में इन्हें राक्षस कहा गया है । उनके कथा कहानियों में उन्हें कुरूप, झगड़ालु , बदमाश, मांसाहारी.. बताया गया । आर्यों और राक्षसों के बीच युद्ध होते रहे । कथित राक्षस बलिष्ठ और सरल स्वभाव के होते थे । आर्यों के कथित उच्च वर्ग (सवर्ण) बड़े दिमाग वाले तथा चालाक होते थे ।
O. B.C कोलता अघरिया कुर्मी..... खुद को सवर्ण वैश्य, क्षत्रिय कहलाना चाहते हैं खुद को उच्च जाति का बताकर सम्मान पाना चाहते हैं लेकिन शासन द्वारा मिलने वाली सहायता छात्रवृत्ति आरक्षण का लाभ लेते हैं ।
हम कोलता भी राक्षस कुल के हैं । छत्तीसगढ़ में हम कोलता लोगों के घर में विवाह/एकादश कर्म के पूजा हवन में पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं कहते हैं -
जम्बू द्वीपे भारतवर्षे उत्कल देशे राक्षस कुलस्य गुप्त वंशस्य . .......... (गुप्त के स्थान पर साहा, साहू, भोई भोय.... आदि )
ओड़िशा में क्या कहते हैं? कृपया बताएं।
इससे स्पष्ट है छत्तीसगढ़ के हम (कोलता ) के पूर्वज उत्कल देश (ओड़िशा) से आए हैं । ज्ञातव्य है कि ओड़िशा में कोलता कुल्ता कुलिता कोई अपना उपनाम "गुप्ता " नहीं लिखते ।
ओडिशा से कुलिता कुलता छत्तीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश) में आकर कोलता लिखने लगे । पधान से प्रधान, भोई से भोय, साहू से साहा साव सा, ....।
मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) रायगढ़ पूर्वांचल दो दो विद्वान जो बहुत पढ़ाकू थे महापल्ली के श्री हेम सुंदर प्रधान तथा लोइंग के श्री पूर्ण चंद्र प्रधान ।
अपने कुल / जाति को गर्वित करने के लिए उपर्युक्त दोनो ने अलग अलग विचार कर अपना उपनाम परिवर्तन किया ।
श्री हेम सुंदर जी अपनी पुस्तक "कुलिता " में लिखा है कि कोलता जाति काश्मीर से आकर उत्कल में बस गये । सम्राट अशोक के वंशज हैं । याने क्षत्रिय हैं । उन्होंने आगे लिखा है कि उनके काम के अनुसार अनुसार गुप्त (प्रधान मंत्री), खम्हारी (कोषाध्यक्ष), गढ़तिया (गढ़पति /कीलेदार).... कहा जाता था । कालांतर में यही सब कुल मिला कर 120 वर्ग हो गये। उन्होने कोलता को कलिंग से जोड़ा। उनके अनुसार गुप्त और प्रधान पर्यायवाची हैं । (कोलता जाति को (विंशसए) विशासहे कुल कहा जाता है ।) इसी लिये श्री हेम सुंदर प्रधान जी ने अपना उपनाम "गुप्त" लिखना आरम्भ किया ।
श्री पूर्ण चंद्र प्रधान जी ने कोलता को उच्च /श्रेष्ठ स्थान दिलाने के उद्देश्य से
मनु के चार वर्ण में से वैश्य वर्ण का बताने के लिए मनु के निर्देशानुसार सरनेम " गुप्त" लिखना उचित समझा । लेकिन वे हिंदी के अलावा अंग्रेजी के भी प्रेमी थे । उन्होने अपना सरनेम गुप्त का अंग्रेजी स्टाईल गुप्ता पसंद किया । वे पूर्ण चंद्र गुप्ता लिखने लगे । उनके बड़े भाई इन्द्रो जी भी, फिर लोइंग, भोजपल्ली के गौन्तिया /गौटिया परिवार के अधिकतर लोग उपनाम "प्रधान" लिखना छोड़ कर "गुप्ता" लिखने लगे । (लोइंग के गौटिया परिवार में भी सरनेम लिखने में एकरूपता नहीं थी। मेरे ताऊ श्री धरनीधर प्रधान, मेरे पिता श्री गजपति प्रधान, मेरे चाचा श्री जयराम गुप्ता, श्री उद्धव प्रधान, चचेरे भाई श्री शशिभूषण प्रधान ) । उसी वंश के दूसरे गांव महापल्ली, केंसरा, तुरंगा, पोटेबिर्नी, ..के लोग भी प्रधान सरनेम छोड़ कर गुप्ता लिखने लगे । यह गुप्ता सरनेम बड़े लोगों का, ऊँचा माना जाने लगा। फिर छत्तीसगढ़ के विभिन्न सरनेम प्रधान, भोई, खम्हारी, साहू, बारीक, बिश्वाल, स्वाईं .... ..अपना उपनाम गुप्ता लिखने लगे । कालांतर में छत्तीसगढ़ कोलता समाज की बैठक में बहुत विचार विमर्श के पश्चात गुप्ता सरनेम को मान्यता दी गई ।
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ज्ञातव्य है कि मनु स्मृति के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण , क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र का
काम क्रमशः -
ब्राह्मण - पढ़ना पढ़ाना, यज्ञ हवन पूजा पाठ करना , दान दक्षिणा लेना।
क्षत्रीय - अश्त्र शस्त्र धारण कर राज्य के लिये युद्ध करना ।
वैश्य - व्यापार करना। समय और स्थान परिवर्तन से किसी वस्तु, मुद्रा के मूल्य में वृद्धि अर्थात लाभ कमाना।
(वैश्य संस्कृत [संज्ञा पुल्लिंग] 1. हिंदू वर्णव्यवस्था में निरूपित तीसरा वर्ण, उक्त वर्ण का व्यक्ति 2. व्यापार करने वाला व्यक्ति ; व्यापारी।)
शुद्र - सेवा करना ।
मनु ने चारों वर्ण के लिये अलग अलग उपनाम लिखने का निर्देश दिये है। उच्च तीन वर्णों को निम्नानुसार अलग अलग जनेऊ धारण करने का निर्देश दिये हैं ।
वर्ण - उपनाम - जनेऊ
ब्राह्मण - शर्मा - रेशम
क्षत्रीय - सिंह - कपास
वैश्य - गुप्त - जूट
शुद्र - दास
(ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं | विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है | इन चार वर्णों के अतिरिक्त आर्यों में या श्रेष्ट मनुष्यों में पांचवा कोई वर्ण नहीं है।)
मनु स्मृति को रामायण, महाभारत काल से पहले का माना जाता है किन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता । क्योंकि मनु के निर्देशानुसार वर्ण अनुसार उपनाम लिखने का कोई प्रमाण रामायण, महाभारत,भगवद्गीता में नहीं मिलता । कहीं नहीं लिखा है.. राजा श्री दशरथ सिंह, श्री राम सिंह, श्री पांडु सिंह, श्री दुर्योधन सिंह, युधिष्ठिर सिंह
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कालांतर में जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी वर्णों के उनके काम के अनुसार कई कई वर्ग बन गए । तदनुसार अलग अलग सरनेम याने एक उपनाम के कई उपनाम ।
ब्राह्मणों शर्मा के - पंडा , द्विवेदी, त्रिवेदी. चतुर्वेदी, तिवारी ...
कोलता के - कोई राजा या जमीदार का मेनेजर का काम किया उनके वंशज दिवान/खम्हारी, कोई गांव का मुखिया बना तो उसके वंशज पधान /प्रधान, कोई साहुकारी करने लगा तो उनके वंशज साहू....
पधान प्रधान, साहू सा साव साहा शाह, भोई भोय, बारीक, खम्हारी , दिवान, बिश्वाल, ... ....
वर्तमान में
सरनेम देख कर जाति नहीं जान सकते ।
सरनेम लिखने के संबंध में कोई कानून नही है। याने उपनाम लिखने के लिए सभी स्वतंत्र हैं कोई कुछ भी लिखे । कई जाति के लोग पहले कोई उपनाम ही नहीं लिखते थे ।
बाद में दूसरों के देखा देखी कुछ लोग अपनी जाति को ही उपनाम लिखने लगे । कुछ शारीरिक जाति के नये नये उपनाम गढ़कर लिखने लगे । जैसे निर्मलकर, विमलकर, कुम्भकार, बसोड़, चर्मकार, किसान, सूर्यवंशी, ...
कुछ जाति के लोग दूसरी जाति के उपनाम को लिखने लगे । जैसे भोय, साहू, ठाकुर, चौहान, ...
ज्ञातव्य है कि पहले परीक्षा या अन्य फार्म में उपनाम का कालम नहीं होता था ।
आधुनिक काल में साहित्यकारों के द्वारा अपने स्वभाव कर्म योग्यता को व्यक्त करने के लिए अतिरिक्त उपनाम लिखने की परम्परा बनी । जैसे श्री रामधारी सिंह "दिनकर, श्री गोपाल दास "नीरज", श्री जय प्रकाश "मानस", .................
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मेरे विचार से मनु के निर्देशानुसार अपने वर्ण के मुख्य उपनाम के साथ उस के वर्ग का उपनाम लिखना चाहिए । इनके अलावा जो चाहें अपनी पसंद का अतिरिक्त उपनाम भी लिखना चाहिए ।
मेरे समझ में मनु स्मृति को छत्तीसगढ़ जिला रायगढ़ के निम्नांकित दो शिक्षक ठीक ठीक पढ़े और समझे थे । क्यों कि वे अपना नाम मनु के निर्देशानुसार लिखते थे ।
( उनसे कभी मनु स्मृति या जाति उपनाम के सम्बन्ध में मेरी चर्चा नहीं हुई ।
1 श्री नीलाम्बर प्रसाद शर्मा त्रिपाठी "शास्त्री" सेवा निवृत्त प्रधान पाठक लोइंग (जिला रायगढ़)
2 श्री कृतार्थ रथ शर्मा सेवा निवृत्त प्रधान पाठक नवाँपारा (पुसौर जिला रायगढ़ ) ।
यदि हमारी जाति "कोलता" को वैश्य मान लें तो लिखना चाहिए -
श्री हेम सुंदर गुप्त प्रधान (महापल्ली )
श्री पूर्ण चंद्र गुप्त प्रधान (लोइंग )
तदनुसार मैं लिखूं तो -
नत्थू राम गुप्त प्रधान "सत्यार्थी"
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कृपया मुझे जातिवादी या मनुवादी न समझें । यह बता दूं मैं मनु स्मृति पढ़ा हूं ।
मेरे इस लेख का मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है , सच को सामने लाना है ।
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अवलोकनार्थ संलग्न है स्व श्री हेम सुंदर गुप्त जी की पुस्तक "कुलिता" के कुछ अंश
शुक्रवार, 5 मार्च 2021
रामायण महाभारत के बाद मनु स्मृति रची गई
रामायण महाभारत के बाद मनु स्मृति की रचना हुई
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मनु स्मृति के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण , क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र का
काम क्रमशः -
ब्राह्मण - पढ़ना पढ़ाना, यज्ञ हवन पूजा पाठ करना , दान दक्षिणा लेना।
क्षत्रीय - अश्त्र शस्त्र धारण कर राज्य के लिये युद्ध करना ।
वैश्य - व्यापार करना। समय और स्थान परिवर्तन से किसी वस्तु, मुद्रा के मूल्य में वृद्धि अर्थात लाभ कमाना।
(वैश्य संस्कृत [संज्ञा पुल्लिंग] 1. हिंदू वर्णव्यवस्था में निरूपित तीसरा वर्ण, उक्त वर्ण का व्यक्ति 2. व्यापार करने वाला व्यक्ति ; व्यापारी।)
शुद्र - सेवा करना ।
मनु ने चारों वर्ण के लिये अलग अलग उपनाम लिखने का निर्देश दिये है। उच्च तीन वर्णों को निम्नानुसार अलग अलग जनेऊ धारण करने का निर्देश दिये हैं ।
वर्ण - उपनाम - जनेऊ
ब्राह्मण - शर्मा - रेशम
क्षत्रीय - सिंह - कपास
वैश्य - गुप्त - जूट
शुद्र - दास
(ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं | विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है | इन चार वर्णों के अतिरिक्त आर्यों में या श्रेष्ट मनुष्यों में पांचवा कोई वर्ण नहीं है।)
मनु स्मृति को रामायण, महाभारत काल से पहले का माना जाता है किन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता । क्योंकि मनु के निर्देशानुसार वर्ण अनुसार उपनाम लिखने का कोई प्रमाण रामायण, महाभारत,भगवद्गीता में नहीं मिलता । कहीं नहीं लिखा है.. राजा श्री दशरथ सिंह, श्री राम सिंह, श्री पांडु सिंह, श्री दुर्योधन सिंह, युधिष्ठिर सिंह
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