सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
मंगलवार, 10 दिसंबर 2024
श्रद्धा और भक्ति में अंतर
बुधवार, 13 नवंबर 2024
शुक्रवार, 8 नवंबर 2024
मुंडे मुंडे मतुर्भिन्ना
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024
प्रतिमा चित्र का महत्त्व
बुधवार, 25 सितंबर 2024
भूत प्रेत भगवान
रविवार, 22 सितंबर 2024
प्रश्न ही प्रश्न
प्रश्न प्रश्न ,, प्रश्न ही प्रश्न
जन्म मृत्यु पुनर्जन्म ,,,, सोच सोच कर पागल . . जिज्ञासा शांत करने के लिए अच्छा जवाब है कि सब कुछ भगवान ही करते हैं। वही संसार के संचालक हैं। मान लें तो मन शांत।
शनिवार, 21 सितंबर 2024
आस्तिकता नास्तिकता
आस्तिकता बंद मस्तिष्क वाले (जहां प्रश्न जिज्ञासा तर्क नहीं होते) समाज की देन है जो कल्पित है, असत्य पर आधारित है।
नास्तिकता वास्तविक है जो सत्य पर आधारित है जो खुले मस्तिष्क की देन है।
नास्तिकता
सोमवार, 16 सितंबर 2024
भगवान लोगों की भाषा
मंगलवार, 10 सितंबर 2024
आस्था
सोमवार, 9 सितंबर 2024
गुरुवार, 11 जुलाई 2024
धर्म
शुक्रवार, 21 जून 2024
सेकुलर
प्रणाम
मुझे नहीं पता..मैं नास्तिक हूं या नहीं| हां फिलहाल मैं आस्तिक नहीं हूं| लेकिन महापुरुषों के चित्र प्रतिमा समाधि को उनके सम्मान के लिए हाथ जोड़कर प्रणाम करता हू्| कभी कभी मंदिरों में भी प्रणाम करता हुं। हो सकता है वे भी देश दुनियां के हित में कुछ अच्छा किए हों।
लेकिन मत्था टेककर उनसे कुछ मांगता नहीं| कुछ चढ़ावा नहीं देता|
आत्मा और पुनर्जन्म
सोचने की बात तो है| तर्क करने से ये आत्मा की धारणा अवैज्ञानिक लगती है झूठ लगती है|
लेकिन आत्मा का पुरजन्म होना यह दर्शन "मृत्यु के बाद क्या ?" का एक खुबसूरत जबाब है| इसे मान लेना मन को सकून देता है, मृत्यु भय को कम करता है| वरना सोच सोच कर कि मृत्यु के बाद क्या होगा? नींद नहीं आती. मन व्याकुल पागल होने लगता है|
प्रेम और मानवता
Intelligent
जो पढ़ कर, देख कर सोच विचार करते हैं वे ही सवाल करते हैं । वही intelligent होते हैं ।
बाकी लोग बिना सवाल किए
अपने अणु मस्तिष्क में भरते जाते हैं ।
हवन
कहते हैं हवन से वेक्टेरिया नष्ट होते हैं । भारत में इतने हवन होते हैं, फिर भी विभिन्न वेक्टेरिया भरे हैं।
आस्तिक - नास्तिक - मानावता
धार्मिक पुस्तकों ग्रन्थों को पढ़ कर, समझ कर ही कोई नास्तिक बनता है।
नास्तिक व्यक्ति का धर्म होता है मानवता।
गुरुवार, 30 मई 2024
अभ्युत्थानमधर्मस्य
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं युगे युगे|
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गीता के श्लोक को लिखने में हम भूल कर सकते हैं/कर रहे हैं? मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता पुस्तकों में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा जी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम् |
सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए" नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्थामधर्मस्य) नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य कहा गया होगा|.
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सोमवार, 27 मई 2024
शनिवार, 25 मई 2024
मंगलवार, 21 मई 2024
आस्तिक नास्तिक
बचपन में लोग बताते हैं कि भगवान, देवी देवता, भूत प्रेत होते हैं। हम बिना सोचे समझे मान कर आस्तिक हो जाते हैं।
बड़े होकर जो सोच विचार करते हैं, जानने की कोशिश करते हैं वे नास्तिक हो जाते हैं।
नास्तिक याने भगवन देवी देवता भूत प्रेत को अपि न अस्ति।
गुरुवार, 16 मई 2024
मंगलवार, 14 मई 2024
ह्यूमैनिटी
किसी भी भगवान को हम न मानें, follow न करें, पूजा पाठ यज्ञ हवन प्रार्थना न करें तो क्या होगा? भगवन गुस्सा करेंगे? क्यों? उन्हे हम क्यों खुश करें?
हमें उचित कर्म करना चाहिए। Humanity का पालन करना चाहिए।
पिछड़ी जाति कौन
पिछड़ी जाति कौन? -
छत्तीसगढ़ में कोलता जाति के लोग भी उपनाम "गुप्ता" लिखते हैं, ओड़िशा में कोई नहीं लिखता ।
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आर्यों के मनु स्मृति के अनुसार चार वर्णों में से तीन वर्ण क्रमशः उच्च माने जाते हैं ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य। चौथा वर्ण है शुद्र ।
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शुद्र को अछूत माना गया । ब्राह्मण उनके घर में जाकर जन्म मृत्यु संस्कार, शादी विवाह, यज्ञ हवन आदि नहीं करते ।
हमारे भारत के मूल निवासी जंगलों में रहने वाले (S. T.) तथा मैदानी इलाके में रहने वाले (अन्य पिछड़ी जाति O. B. C. मुख्य काम खेती ) को आर्यों ने राक्षस कहा । आर्यों के पुराणों में इन्हें राक्षस कहा गया है । उनके कथा कहानियों में उन्हें कुरूप, झगड़ालु , बदमाश, मांसाहारी.. बताया गया । आर्यों और राक्षसों के बीच युद्ध होते रहे । कथित राक्षस बलिष्ठ और सरल स्वभाव के होते थे । आर्यों के कथित उच्च वर्ग (सवर्ण) बड़े दिमाग वाले intelligent तथा चालाक होते थे ।
O. B.C कोलता अघरिया कुर्मी..... खुद को सवर्ण /वैश्य/ क्षत्रिय कहलाना चाहते हैं, खुद को उच्च जाति का बताकर सम्मान पाना चाहते हैं ।लेकिन शासन द्वारा पिछड़ी जाति को मिलने वाली सहायता छात्रवृत्ति तथा आरक्षण का लाभ लेते हैं ।
हम कोलता भी राक्षस कुल के हैं । छत्तीसगढ़ में हम कोलता लोगों के घर में विवाह/एकादश कर्म के पूजा हवन में ब्राह्मण पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं कहते हैं -
जम्बू द्वीपे भारतवर्षे उत्कल देशे राक्षस कुलस्य गुप्त वंशस्य . .......... (गुप्त के स्थान पर साहा, साहू, भोई भोय.... आदि )
ओड़िशा में क्या कहते हैं? कृपया बताएं।
इससे स्पष्ट है छत्तीसगढ़ के हम (कोलता ) के पूर्वज उत्कल देश (ओड़िशा) से आए हैं । ज्ञातव्य है कि ओड़िशा में कोलता कुल्ता कुलिता कोई अपना उपनाम "गुप्ता " नहीं लिखते ।
ओडिशा से कुलिता कुलता छत्तीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश) में आकर कोलता लिखने लगे । पधान से प्रधान, भोई से भोय, साहू से साहा साव सा, ....।
कोलता जाति को (विंशसए 20+100 =120) विशासहे कुल कहा जाता है ।)
मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) रायगढ़ पूर्वांचल दो विद्वान जो बहुत पढ़ाकू थे महापल्ली के श्री हेम सुंदर प्रधान तथा लोइंग के श्री पूर्ण चंद्र प्रधान ।
अपने कुल / जाति को गर्वित करने के लिए उपर्युक्त दोनो ने अलग अलग विचार कर अपना उपनाम परिवर्तन किया ।
श्री हेम सुंदर जी अपनी पुस्तक "कुलिता " में लिखा है कि कोलता जाति काश्मीर से आकर उत्कल में बस गये । सम्राट अशोक के वंशज हैं । याने क्षत्रिय हैं । उन्होंने आगे लिखा है कि उनके काम के अनुसार अनुसार गुप्त (प्रधान मंत्री), खम्हारी (कोषाध्यक्ष), गढ़तिया (गढ़पति /कीलेदार).... कहा जाता था । कालांतर में यही सब कुल मिला कर 120 वर्ग हो गये। उन्होने कोलता को कलिंग से जोड़ा। उनके अनुसार गुप्त और प्रधान पर्यायवाची हैं । इसी लिये श्री हेम सुंदर प्रधान जी ने अपना उपनाम "गुप्त" लिखना आरम्भ किया ।
श्री पूर्ण चंद्र प्रधान जी ने कोलता को उच्च /श्रेष्ठ स्थान दिलाने के उद्देश्य से
मनु के चार वर्ण में से वैश्य वर्ण का बताने के लिए मनु के निर्देशानुसार सरनेम " गुप्त" लिखना उचित समझा । लेकिन वे हिंदी के अलावा अंग्रेजी के भी प्रेमी थे । उन्होने अपना सरनेम गुप्त का अंग्रेजी स्टाईल गुप्ता पसंद किया । वे पूर्ण चंद्र गुप्ता लिखने लगे । उनके बड़े भाई इन्द्रो जी भी, फिर लोइंग, भोजपल्ली के गौन्तिया /गौटिया परिवार के अधिकतर लोग उपनाम "प्रधान" लिखना छोड़ कर "गुप्ता" लिखने लगे । (लोइंग के गौटिया परिवार में भी सरनेम लिखने में एकरूपता नहीं थी। मेरे ताऊ श्री धरनीधर प्रधान, मेरे पिता श्री गजपति प्रधान, मेरे चाचा श्री जयराम गुप्ता, श्री उद्धव प्रधान, चचेरे भाई श्री शशिभूषण प्रधान ) । उसी वंश के दूसरे गांव महापल्ली, केंसरा, तुरंगा, पोटेबिर्नी, ..के लोग भी प्रधान सरनेम छोड़ कर गुप्ता लिखने लगे । यह गुप्ता सरनेम बड़े लोगों का, ऊँचा माना जाने लगा। फिर छत्तीसगढ़ के विभिन्न सरनेम प्रधान, भोई, खम्हारी, साहू, बारीक, बिश्वाल, स्वाईं .... ..अपना उपनाम गुप्ता लिखने लगे । कालांतर में छत्तीसगढ़ कोलता समाज की बैठक में बहुत विचार विमर्श के पश्चात गुप्ता सरनेम को मान्यता दी गई ।
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ज्ञातव्य है कि मनु स्मृति के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण , क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र का
काम क्रमशः -
ब्राह्मण - पढ़ना पढ़ाना, यज्ञ हवन पूजा पाठ करना , दान दक्षिणा लेना।
क्षत्रीय - अश्त्र शस्त्र धारण कर राज्य के लिये युद्ध करना ।
वैश्य - व्यवसाय करना ।
शुद्र - सेवा करना ।
चारों वर्ण के लिये अलग अलग उपनाम लिखने का निर्देश है ।
ब्राह्मण - शर्मा
क्षत्रीय - सिंह
वैश्य - गुप्त
शुद्र - दास
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कालांतर में जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी वर्णों के कई कई वर्ग बन गए । तदनुसार अलग अलग सरनेम याने एक उपनाम के कई उपनाम ।
ब्राह्मणों शर्मा के - पंडा , द्विवेदी, त्रिवेदी. चतुर्वेदी, तिवारी ...
कोलता के - पधान प्रधान, साहू सा साव साहा शाह, भोई भोय, बारीक, बिश्वाल, ... ....
आधुनिक काल में साहित्यकारों के द्वारा अपने स्वभाव कर्म योग्यता को व्यक्त करने के लिए अतिरिक्त उपनाम लिखने की परम्परा बनी । जैसे श्री रामधारी सिंह "दिनकर, श्री गोपाल दास "नीरज", श्री जय प्रकाश "मानस", .................
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मेरे विचार से मनु के निर्देशानुसार अपने वर्ण के मुख्य उपनाम के साथ उस के वर्ग का उपनाम लिखना चाहिए । इनके अलावा जो चाहें अपनी पसंद का अतिरिक्त उपनाम भी लिखना चाहिए ।
मेरे समझ में मनु स्मृति को निम्नांकित दो शिक्षक ठीक ठीक पढ़े और समझे थे । क्यों कि वे अपना नाम मनु के निर्देशानुसार निम्नानुसार लिखते थे ।
( उनसे कभी मनु स्मृति या जाति उपनाम के सम्बन्ध में मेरी चर्चा नहीं हुई ।
नीलाम्बर प्रसाद शर्मा त्रिपाठी "शास्त्री" सेवा निवृत्त प्रधान पाठक लोइंग (जिला रायगढ़)
श्री कृतार्थ रथ शर्मा सेवा निवृत्त प्रधान पाठक नवाँपारा (पुसौर जिला रायगढ़ ) ।
यदि हमारी जाति "कोलता" को वैश्य मान लें (सच नहीं है) तो लिखना चाहिए -
श्री हेम सुंदर गुप्त प्रधान (महापल्ली )
श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता प्रधान (लोइंग )
तदनुसार मैं लिखूं तो -
नत्थू राम गुप्त प्रधान "सत्यार्थी"
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कृपया मुझे जातिवादी या मनुवादी न समझें । यह बता दूं मैं मनु स्मृति पढ़ा हूं ।
मेरे इस लेख का मकसद किसी को को ठेस पहुंचाना नहीं है , सच को सामने लाना है ।