गुरुवार, 30 मई 2024

अभ्युत्थानमधर्मस्य

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं युगे युगे|

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गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं/कर रहे हैं? मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता पुस्तकों में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा जी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|

अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष

अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य

तद=तब

आत्मानं=स्वयं का

सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।

       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम् |

     सोचने की बात है कि गीता में 

"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए" नहीं ,

"धर्म के उत्थान के लिए" 

ही कहा गया होगा|

अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्थामधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य कहा गया होगा|.

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