रविवार, 20 अगस्त 2017

नास्तिकता की जरुरत क्यों?

Swami Balendu नास्तिकता की जरुरत क्यों और कब तक* कुछ लोग खामखाँ कुतर्क करते है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों एक ही बात है या एक ही सिक्के को दो पहलू हैं या नास्तिकता भी एक धर्म अथवा विश्वास है और मैं न तो आस्तिक और न ही नास्तिक बल्कि वास्तविक हूँ. वैसे इस तरह की बातें केवल कन्फ्यूज आस्तिक ही करते हैं, जो वस्तुतः नास्तिक है वो कभी नहीं करेंगे! अब आइये जरा इसका विश्लेषण करते हैं कि यह कुतर्क कैसे है: मैंने यह बातें पहले भी कही हैं एक बार फिर से- नास्तिकता स्वयं में कोई पथ या मार्ग नहीं है बल्कि एक विरोध और विद्रोह है, आस्तिकता के ईश्वर रूपी असत्य और भ्रम के खिलाफ! यदि आस्तिकता न होती तो नास्तिकता की कोई आवश्यकता ही नहीं थी. और जब आस्तिकता न होगी तब नास्तिकता भी न होगी. किसी बच्चे के पैदा होने पर यदि उसे धर्म, आस्तिकता और ईश्वर की छाया से दूर रखा जाये और उसके मन में किसी काल्पनिक सर्वशक्तिमान की छवि को स्थापित न किया जाये तो वो बच्चा सहज मनुष्य ही होगा न कि नास्तिक! मतलब यह कि आस्तिकता कृत्रिम है, ओढ़ी हुई तथा असहज है. बच्चे को कभी जातकर्म संस्कारों द्वारा हिन्दू, सुन्नत के द्वारा मुस्लिम और बप्तिस्मा करके ईसाई बना दिया जाता है. और फिर उसके मन में किसी सर्वशक्तिमान की कृपा का लालच और दण्ड का भय बैठा दिया जाता है. नास्तिकता वस्तुतः इसी मिथ्या जाल और शोषण के खिलाफ एक विद्रोह की आवाज है न कि आस्तिकता के सिक्के का दूसरा पहलू! नास्तिकता की जरुरत तो मुझे पड़ी क्योंकि मैं आस्तिकता के मिथ्या भ्रम में पड़ा हुआ था. परन्तु मेरी साढ़े तीन साल की बेटी के लिए बन्दर और हनुमान में या गणेश और हाथी में कोई अंतर नहीं, उसे अभी ही पता है कि भगवान किसी कार्टून कामिक्स का भूत, स्पाइडर मैन इत्यादि की तरह एक ऐसा पात्र है जोकि केवल किताबों में होता है वास्तविकता में नहीं! वो जिसके अन्दर ईश्वर के प्रति कोई श्रद्धा, आस्था, विश्वास या आस्तिकता नहीं है, वो अथवा उसके जैसे बच्चे बड़े होकर हिन्दू, मुसलमान का तो सवाल ही नहीं उठता बल्कि नास्तिक भी नहीं बनेंगे बल्कि सहज मनुष्य ही रहेंगे. नास्तिक तो मैं बना क्योंकि मैं आस्तिक था. और जब तक धर्म और काल्पनिक सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति आस्तिकता का मिथ्या भ्रम बना रहेगा केवल तब तक ही नास्तिकता की जरुरत रहेगी! इसके साथ ही दुनिया भर में होने वाले सर्वे बताते हैं कि पूरी दुनिया में ही लोग धर्म और ईश्वर की मिथ्या कल्पना से दूर होकर नास्तिक हो रहे हैं. तथा जहाँ विकास नहीं है और गरीबी जादा है वहां ही धर्म और ईश्वर का प्रभाव जादा है तथा जहाँ विकास और सम्पन्नता है वहां धर्म और ईश्वर का प्रभाव कम है. एक बात और भी कह दूँ कि यह सब बातें केवल उसी को समझाई जा सकतीं हैं जोकि समझने की इच्छा रखे परन्तु आस्थावान आस्तिक जोकि अपनी समझ को संगठित धर्मों के समक्ष गिरवी रख चुके हों, स्वयं की नहीं बल्कि हजारों साल पहले लिखी किसी किताब के अनुसार चलते हों उन्हें आप कभी नहीं समझा पाएंगे. मैं भी एक सीमा तक ही बात करने का प्रयास करता हूँ और यदि मुझे यह लगे कि यह लाइलाज केस है तो उसमें अपनी उर्जा और समय नष्ट न करके, क्विट करके आगे बढ़ जाता हूँ.

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