रविवार, 20 अगस्त 2017

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

Swami Balendu जब मैं सुनता हूँ "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा" तो ये "विजयी विश्व" सुनकर मेरे मन में युद्ध, रक्तपात और मारकाट का चित्र उभर आता है! क्योंकि बिना इसके कोई "विजयी विश्व" हो भी कैसे सकता है? इतिहास में भी जब किसी ने "विश्व विजयी" होने की कल्पना से कदम बढ़ाया तो उसने खून खराबा ही मचाया. आखिर कोई भी "विजयी विश्व" या "विश्व गुरु" क्यों होना चाहता है? ये कल्पना ही कितनी हिंसक है! हम विद्यार्थी बनकर सभी जगह से कुछ भी अच्छा सीखने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते! आखिर अपने घर, गाँव, देश से किसे प्रेम नहीं होगा! मुझे भी है परन्तु माफ़ करना मैं राष्ट्रवादी नहीं हूँ और सोचता हूँ कि जैसे मुझे अपनी जगह से प्रेम है वैसे ही अन्य देशों में रहने वालों को भी होगा! फिर मैं "विश्व विजयी" क्यों बनना चाहूँगा! आखिर सबको अपनी जगह से प्रेम करने और अपने ढंग से जीने का अधिकार है!

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