रविवार, 20 अगस्त 2017

विनोबा, दुर्गा, इंदिरा के संग मेरे जीवन के अनमोल पल -

विनोबा, दुर्गा, इंदिरा के संग
मेरे जीवन के अनमोल पल -
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1-
1970 में आजादी की लड़ाई में गांधी जी के सहयोगी, भूदान यज्ञ आंदोलन के संस्थापक विनोबा भावे जी के पचहत्तरवीं जन्म दिवस के अवसर पर हम लोइंग गांव के पंद्रह लोग
{श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता, उनकी पत्नी दुर्गावती गुप्ता , जनार्दन गुप्ता (प्रधान पाठक/चुंटी मास्टर /सरोज गुप्ता के पिता जी, उनकी पत्नी शशि गुप्ता, धर्नीधर प्रधान (मेरे ताऊ जी/ चतुर्भुज गुप्ता के पिता जी ), रुक्मिणी विश्वाल ( किशोर श्रवण के पिता जी ), हुई बाई ( चंद्रभूषण गगुप्ता की नानी), पदुम गुप्ता (सुबोध प्रधान के पिताजी ), दामोदर प्रधान (देवेश प्रधान के पिताजी ),मेरे चचेरे भाई/ मित्र जयप्रकाश गुप्ता (प्रवीण अरविंद के पिता जी ), मैं स्वयं...}
हमारे दादा जी सर्वोदयी नेता श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता जी के साथ गांधी आश्रम वर्धा गए थे।
गांधी आश्रम में में पांच दिन ठहरे थे। आश्रम, पुस्तकालय, गांधी जी के जीवन वृत फिल्म देखकर गांधी को जानने का समझने का अच्छा अवसर मुझे मिला ।
गांधी आश्रम परिसर में विनोबा जी के जन्म दिन पर उन्हें हमारे देश के सभी राज्यों के राज्यपाल /मुख्य मंत्री अपने अपने राज्य से एकत्रित राशि की थैली भूद यज्ञ
के लिए भेंट किए । दोपहर में उनके साथ जमीन पर बैठ कर भोजन करने का सौभाग्य मिला । हमारे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण और केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण के पास ही मैं बैठा था। सभी लोग राज्यपाल, मुख्य मंत्री, मंत्री भी भोजन पश्चात अपना दोना पत्तल उठाकर बाहर फेंके
दूसरे दिन हम लोग बस से विनोबा आश्रम पनवार गए। विनोबा जी धोती पहने, सर पर हरे रंग का एक कपड़ा बांधे घासपात से बने छत के नीचे चबुतरे पर बैठे थे। गर्मी के कारण एक तसले के पानी में भीगा भीगा कर अपना बदन पोंछ रहे थे। बहुत लोग लाइन में खड़े थे ।
वर्धा के लिए आखिरी बस का समय हो रहा था। लोग जल्दी जल्दी एक एक कर विनोबा जी का चरण स्पर्श कर बाहर जा रहे थे। विनोबा जी आशीष दे रहे थे। मुझे यह अच्छा नहीं लगा.. चरण स्पर्श कर चलते बनो? मैं कुछ देर उनसे बात करना चाहता था। मैं चुपचाप लाइन से हट गया। हमारे गांव के सभी चरण स्पर्श कर चबुतरा के पास मुझे खोजे । मैं उन्हें देख रहा था। पास ही था चबुतरा के एक खंभा के पीछे था। श्री जनार्दन गुप्ता जी बोले - ଈତକେ ଥାଇ ଦିୟା ବୋ , ଇ ନତଠୁ ସଲା ଏନତିଚ୍ କରସୀ , ଆସୀ ଯିବା ହୁଶିୟାର୍ ଆୟ इसको छोड़ो रहने दो ये नत्थू साला ऐसा ही करता है । चलो सब, वह आ जाएगा किसी तरह, होशियार लड़का है। वे चले गए । और कुछ लाइन में थे सब चले गए
मैं विनोबा जी का चरण स्पर्श किया । मैंने कहा कि मैं आपके सर्वोदय आंदोलन में शामिल होना चाहता हूं। उन्होंने मेरा परिचय जानने के बाद कहा - तुम शिक्षक हो। अपना काम अच्छे से करो। ड्युटी के अलावा भी विद्यार्थियों के लिए, समाज के लिए कुछ कर सकते हो। और भी कुछ बात हुई । मैंने अंत में पूछा - ये सर में हरी पट्टी क्यों बांधते हैं? उन्होंने चारों तरफ हाथ से दिखाकर कहा - कुछ नहीं, ये हरा भरा.. ये हरियाली । मैं फिर से चरण स्पर्श कर चला गया। बस लेट थी इसलिए मुझे मिल गई ।
मेरे जीवन को दिशा देने के उनके शब्द मेरे धरोहर हैं ।
2-
सन् 1970- 75 में प्रधान मंत्री इंदिरा जी बिलासपुर आई थीं। मेरे चाचा तथा मित्र श्री सुभाष चंद्र गुप्ता शिक्षक तब बिलासपुर में बी एड कर रहे थे। मै और मेरे मित्र /चचेरा भाई जयप्रकाश गुप्ता इंदिरा जी को देखने बिलासपुर गए । प्रधान मंत्री जी का रघुराज स्टेडियम में कार्यक्रम था। मैं और सुभाष चाचा इंदिरा जी को जल्दी देखने के लिए बहुत उतावले हो रहे थे। हम दोंनो स्टेडियम से पैदल एयरपोर्ट की ओर तेज तेज चलने लगे । लगभग तीन किलोमीटर बाद इंदिरा जी की कार दिखाई दी । हम बहुत उत्साहित थे। इंदिरा गांधी की जय का नारा लगाने लगे जोर जोर से। सुभाष चाचा उछल उछल कर नारा लगा रहे थे। कार नजदीक आते ही हम दोंनो कार के किनारे पकड़कर चलने लगे नारा लगाते हुए । चाचा जी उछल रहे थे । पोलिस वाले बीच बीच में हमें कार से दूर हटने के लिए कहते लेकिन इंदिरा जी उन्हें संकेत से मना कर देती । हम उनकी कार को पकड़े पकड़े नारा लगाते स्टेडियम के गेट तक आए। यादगार के वे पल अविस्मरणीय हैं।
3- .
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाली दुर्गा भाभी श्रीमती दुर्गावती बोहरा ( भगत सिंह के साथी शहीद श्री भगवती चरण बोहरा जिनकी बम का परीक्षण करते मृत्यु हो गई थी, की पत्नी) से मेरा पत्र व्यवहार था। दुःख है कि उनके सभी पत्र नष्ट हो गए।
1981-82 में मैं और मेरी बहन स्वरुपा (वर्तमान श्रीमती स्वरुपा साहू अध्यापिका सरस्वती शिशु मंदिर गेरवानी) आरोग्य मंदिर गोरखपुर से परीक्षा देकर लौटते हुए लखनऊ में दुर्गा भाभी के दर्शन के लिए रूके । उनके घर में
चरण स्पर्श कर उनके संस्मरण सुनते रहे दिन भर। वर्तमान स्थिति पर उनसे पूछा ।उन्होंने कहा - मेरा वश चले तो कुछ नेताओं को लाइन में खड़ा कर गोली मार देती।
बीच बीच में वे हमें चाय नास्ता खुद बनाकर खिलाई। दुर्गा जी के साथ मेरी बहन की एक फोटो लिया । कुछ ख़राब हो गया है फिर भी यह फोटो मेरे लिए एक अमूल्य धरोहर है। (फोटो निचे है)
शाम को हम उनके चरण स्पर्श कर विदा लिए । वे सुनहरे पल थे मेरे जीवन के ।

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