Swami Balendu
पच्चीस साल पहले कितने प्रेमविवाह होते थे और अब कितने होते हैं? उसी तरह पच्चीस साल पहले कितना छुआछुत और घूँघट पर्दा था और अब कितना है? ये सब सांस्कृतिक बदलाव हैं या नहीं! जोकि पहनावे से लेकर खानेपीने तक और रहनसहन तथा व्यवहार सभी में दिखाई देता है. हमारे सोचने का ढंग बदला या नहीं! क्या हम आज भी पांच सौ साल पुरानी संस्कृति में जी रहे हैं जबकि विधवा को सती होते के लिए फ़ोर्स किया जाता था? संस्कृति वही होती है जो देश काल परिस्तिथी के अनुसार हर समय बदलती है. फिर क्यों प्राचीन संस्कृति के नाम का रोना रो रहे हो और पब्लिक को खाली फ़ोकट में ‘संस्कृति खतरे में पड़ गई’ कहकर झूठा डर दिखा रहे हो.
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
रविवार, 20 अगस्त 2017
सांस्कृतिक परिवर्तन कोई खतरा नहीं जरूरत है।
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