शनिवार, 5 अगस्त 2017

वैज्ञानिक दृष्टिकोण 

Ajaib Jalalana
वर्तमान भारतीय समाज के कायाकल्प की आवश्यकता है, क्योंकि इस देश में जिसे वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिला है, उनमें भी दूर-दूर तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण नज़र नहीं आता और यह स्थिति बेहद निराशाजनक है।
हमारे वैज्ञानिक जैसे ही घर पहुँचकर जूते उतारकर कपड़े बदलते हैं कि उसके साथ ही उनके मन-मष्तिष्क से तर्कशीलता और प्रयोगशीलता भी उतर जाती है और वे हर तरह की रूढ़ियों, रिवाजों और भ्रमजाल से बुनी आरामकुर्सी पर पसर जाते हैं। डॉक्टरों को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती कि उनके मरीज तिरुपति के बालाजी के मंदिर या स्थानीय मंदिर में अपने रोग मुक्ति के लिए पूजा-अर्चना करें, बल्कि वे स्वयं भी इस तरह के कर्मकांड से कोई परहेज नहीं करते। जब भी कोई नया वैज्ञानिक संस्थान बनता है या कोई बड़ा प्रयोग या अभियान शुरू किया जाता है तो हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी नारियल फोड़कर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाना और देवता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते, जैसे कि उनका प्रयास विज्ञान से नहीं, दैवी कृपा से ही सफल होगा। लेकिन मौका मिलने पर वैज्ञानिकों के बीच वे भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण की हिमायत करेंगे।
जो अन्धविश्वास में फंसे हैं उनके लिए हमारे देश के दैनिक समाचार-पत्र और साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ तमाम तरह की आकर्षक मगर तर्कहीन सामग्री छापने से नहीं चुकती। हर बड़े अख़बार में 'अपना भविष्यफल जानिए' जैसे स्तम्भों के लिए जरूर जगह रखी जाती है, जिसमें अगले सप्ताह के राशिफल दिए जाते हैं। इस सप्ताह लक्ष्मी की कृपा, स्वास्थ्य संबंधी, प्रेम, विवाह योग इत्यादि। यात्रा के लिए कुछ दिन शुभ-अशुभ माने जाते हैं। कुछ दिनों, संख्याओं और रंगों को विशेष रूप से भाग्यशाली माना जाता है।
वैज्ञानिकों का भी रूढ़िवादिता की ऐसी कीचड़ में लोट-पोट होना और इसके बावजूद लोगों में अन्धविश्वास और दैवी सत्ता पर ऊँगली उठाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, इसकी आशा करना? क्या इसकी कोशिश करना भी सम्भव है या उपयोगी है?

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