रविवार, 9 जुलाई 2017

ईश्वर क्या है? कौन है?

Ram Bahadur Pandey

ईश्वर क्या है?
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इस विषय पर कई मित्रों के बीच गरमा गरम बहस चल रही है । इसे कुछ मित्र गण अपराध की श्रेणी में लेकर ऊट पटांग बाते करते हैँ , जो मेरी राय से उचित नही है । मैंने तो अपने अल्प अध्ययन एवं चिन्तन मनन से यही जाना है कि हिन्दू धर्म , विश्व के अन्य धर्मो से उदार और सुसंस्कृत इसी लिए रहा है , क्योंकि हमारे यहां सदैव धर्म पर , ईश्वर पर , करणीय और अकरणीय पर तर्क करने की स्वतन्त्रता ही नही रही , बल्कि दो चिन्तकों के बीच आमने सामने बहस भी होती थी , और इसी को "शास्त्रार्थ " कहा जाता था । 
इतिहास गवाह है कि ईसामसीह और सुकरात ने ईसाई धर्म की या ओल्ड टेस्टामेन्ट ( ईशाई धर्म शास्त्र ) की इतनी आलोचना नही की , जितनी हमारे यहां बुद्ध और महावीर ने वैदिक धर्म ग्रन्थों की किया था । अब सोचिए कि बुद्ध महावीर पश्चिम में होते तो , क्या बच पाते ?
हमारे यहां आडम्बर , कर्मकाण्ड और कट्टरता की शुरुआत पौराणिक युग से हुई और तभी से तत्कलिक ज्ञान विज्ञान के आधार पर जनहित में बनाए गए नियमों , जो धर्म के नाम से जाने जाते थे ,में कट्टरता का समावेश हुआ । 
कालान्तर में पश्चिम के कुछ वैज्ञानिकों जैसे गैलीलियो , कापरनिक्स आदि ने अपनी शोध से सिद्ध किया कि धर्मशास्त्रों में लिखी सारी बातें सत्य नही हैं । यद्यपि कि इनका शोध (आविष्कार ) सत्य था , परन्तु धर्म सम्मति न होने के कारण पोप पादरियों ने इन वैज्ञानिकों को कठोर यातना और दण्ड तो दिए , लेकिन बाद में इनकी शोधों से सबक लेकर अन्धानुकरण बन्द कर उत्तर आधुनिक काल की ओर अग्रसर हुए । 
हमारा यह दुर्भाग्य रहा है कि हमें इतिहास से , जो सबक लेना चाहिए था वह आज तक नही लिया जिसके कारण पूर्व में हम हजारों वर्ष गुलाम तो रहे ही ,और आज भी उत्तर आधुनिक काल की दौड़ में पीछे हो गए हैँ । शास्त्रों की , कथित धर्माचारियों की सैकडों बातें असत्य सिद्ध होने के बाद भी , उनका अन्धानुकरण तथा "लकीर का फकीर " बने रहना हमारे पिछड़ने का मुख्य कारण आज भी बना हुआ है ।
सम्पूर्ण अस्तित्व एक जीवन्त देह की भांति काम करता है ।प्रत्येक चीज अन्य हर चीज से सम्बंधित है । अस्तित्व स्वशासित है , और जो हो रहा है ,स्वत:स्फूर्त है । यह लोगों को समझ से परे लगा कि इतना बड़ा ब्रह्माण्ड बिना किसी स्रष्टा के कैसे अस्तित्व में आया , और विना किसी नियन्ता के , चल कैसे रहा है ? जब चिन्तन मनन करके चूर हो गए और अपनी कल्पना तथा तर्क शक्ति से इस रहस्य को जानने में नाकामयाब रहे , तो आत्म सन्तोष के लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया , उसी का नाम है " ईश्वर " ।
आदि काल में बहुत सी चीजों के विषय में न जान पाने के कारण ही हमने देवी , देवता , जादू , टोना , जन्तर मन्तर आदि की अवधारणा की थी।जहां जहां से ज्यों ज्यों रहस्य की परतें हटती जा रही हैं , वहां वहां हमारी पूर्व नियोजित अवधारणाएं भी समाप्त होती जा रही हैँ । कहने का तात्पर्य यह कि , किसी चीज को अन्तिम सत्य या अन्तिम खोज मान लेना ही प्रगति की सबसे बडी़ बाधा है । इस पर चर्चा शुरू रहनी चाहिए , बहस भी तार्किक ढंग होती रहनी चाहिए , क्योंकि " डिसकसन इज दि वेस्ट वे , फार नोइंग टु व्हाटिज राइट एन्ड व्हाटिज रांग "

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