शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

गुजरा हूँ उन कूंचों से

Abhay Vivek Aggroia added 9 new photos.

गुजरा हूँ उन कूंचों से--
इंसां मर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं की यह हिन्दू मरा , वह मुस्लिम मरा---
पोस्टमार्टम करने से पता चला की एक के दिल में राम थे और दूसरे के दिल में अल्लाह . और डॉक्टर ने रिपोर्ट में कहा यह हिन्दू का शव है और यह मुस्लिम का .
रासायनिक जाँच के लिए फिर उनके कुछ द्रव भेजे --लॅबोरेटरी में पाया गया एक में वेदों का रस था और एक में कुरान का.
अंगों को भी जाँच के लिए भेजा गया तो पाया गया एक में मंदिर है तो दूसरे में मस्जिद
सब साबित होने के बाद राजनैतिक नेताओं ने सच्चाई पेश की --इस देश में हिन्दुओं के लिए कोई जगह नहीं है-तो दूसरों ने कहा इस देश में मुस्लिमो की कोई जगह नहीं
जब एक दूसरों में इतना फर्क है तो उनकी पहचान और जान बचाने के लिए पंडितों और मौल्विओं ने अपने अपने भाषण देने शुरू किये 
सच्चाई पेश की गयी -एक गाय को बचाना है तो दूसरे सूअरों से घृणा करना--इसके इलावा जीवन कुछ ही नहीं है.
इसको सही सही अंजाम देने के लिए लड़ाकू संघठन बन गए 
एक अपनों को बचाने के लिए राम और अल्लाह के नारों के बीच धरती लाल होकर पुकारने लगी --रोते रोते बोली --तुम ऊपर बैठे तमाशा देख कर मुझे क्यों लहू लुहान कर रहे हो.
ऊपर से आवाज़ आयी --जब तक हम हैं ये खेल तो चलता ही रहेगा .
न जाने क्यों लोग एक दूसरे पर दोष लगाते हैं --जब तक ऊपर वाला हम सब की खबर और रक्षा और पालन कर रहा है तो यह खून खराबा भी तो अपने राम और अल्लाह को बचाने के लिए ही तो है-
इनके खिलाफ तो दूर की बात --अगर कहो मुझे जगरातों और मंदिर की आवाज़ों और अज़ान के बोलों से आपति है -- तो उसे संसार छोड़ ऊपर भेज दिया जायेगा --और राम और अल्लाह आपस में तय कर लेंगे-यह हिन्दू है या मुस्लिम --उनके पास तो सब से उत्तम प्रयोगशालाएं होंगी --मेरा तो यही मानना है .
मुझे बहुत घृणा होती है -जब कोई बेरोज़गारी, बेबसी , बेइज़्ज़त, कुपोषण , झुग्गी झोंपड़ी में पलते इंसान की खाल की मजबूरियां , बलात्कार , सूखा, बाढ़ से बर्बादी , भुखमरी के मुद्दे हूठाटे है --पापी हैं वो --उनको सबक सिखाने के लिए पुलिस तंत्र ,जेलों और अदालत और गुंडों की फौज तो है --यही तो देश द्रोही हैं --अगर इनको कुचल नहीं देंगे तो समाज और धर्म और राम और अल्लाह सब खत्म हो जायेगा-त्राहि त्राहि हो जाएगी---आओ और खून बहाएं और अपने धर्म का झंडा ऊपर लहराता रखें -

गुजरा हूँ उन कूंचों से जहाँ हवा में किसी मानस के जलने की ख़ुशबि से सरे बस्ती में महक है 
मुक्ति हो गई है जलती इमारतों में झुलस रही लाशें अल्लाह ईश्वर को इन से मिलने की तड़प है

===============अभय ===================
असली मुद्दों की लड़ाई के लिए जनजीवन को एकजुट कर एक लंबे संघर्ष से ही शोषण से मुक्ति मिल सकती है
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मुश्किल है ------------नामुमकिन तो नही
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