रविवार, 23 जुलाई 2017

स्त्रियों की बदतर जिंदगी


Dinesh Aastik

भारतीय समाज की कू-रीतियों ने स्त्रीयों का जितना गला घोटा हैं उतना शायद ही किसी पुरुष ने घोटा होगा। पुरुषो की ऐसी मानसिकता के सबसे बड़े जिम्मेदार हमारे हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं जिसको एक बार किसी पुरुष ने पढ़ लेने के बाद स्वीकार लिया तो उस पुरुष के साथ स्त्री बद्द से भी बद्तर जिंदगी गुजारेंगी। 
क्या आपको नहीं लगता अब वो समय आ गया हैं कि हमें सही गलत में फर्क करना सीखना चाहिए अगर हमारे धर्मो में ऐसा कुछ हैं जो स्त्रियों को या किसी भी वर्ग को निचा दिखा रहा हैं तो उनको पूजना बंद कर देना चाहिए। गलती हर किसी से होती हैं हमको यें मानने में जरा भी शर्म नहीं आनी चाहिए की हमारे हिन्दू ग्रन्थ हम को सही दिशा नहीं दे सकते। अब हमको जम कर इन धर्म ग्रंथो का विरोध करना चाहिए जहाँ कही भी स्त्री को मनुष्य न मान कर एक जानवर से भी ज्यादा बद्तर सलूक किया जा रहा हैं तो कही न कही स्त्री को निचा दिखाने की मानसिकता यही से पनपी हैं क्यूँ न इनको जला कर थोडा आत्मा को शांत किया जाए। 
जहाँ कही भी स्त्री के स्वतंत्रता की बात आती हैं तो सबसे पहले धर्मो की आड़ ले ली जाती हैं या अपनी छोटी मानसिकता के आधार पर एक बाउंड्री बना दी जाती हैं और बता दिया जाता हैं कितना धीरे हँसना है कैसे कपडे पहनने हैं और किस समय घर आना हैं। आखिर यें बाउंड्री कब तक सिर्फ स्त्री के हिस्से में आएगी। इन बाउंड्री में से किसी भी विचार को अगर पुरुष पर थोप दिया जाएं तो वो एक महीना तो छोडो एक दिन भी बर्दाश नहीं कर पाएंगे। तो हम स्त्रियों पर तो न जाने कब से यें बाउंड्री थोपी हुई हैं। 
बर्दाश की हद होती हैं धर्मो को पूजना बंद करो वो तो वैसे भी मौन हैं हम स्त्रियों(इंसान) का क्या जो जिन्दा रह कर भी इतने समय से मौन हैं। — feeling बर्दाश की एक सीमा होती हैं और इस में न जाने कितनी सीमाए(स्त्रियाँ) मर चुकी हैं.
By Komal Bharti Gupta

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