मंगलवार, 30 मई 2017

राष्ट्र भाषा और मातृ भाषा का महत्व

अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाला आपका बच्चा अपनी मातृ भाषा या राष्ट्र भाषा में ठीक से बात नहीं कर सकता या नहीं समझ सकता तो यह गर्वित होने की नहीं लज्जित होने की बात है|

धर्मेन्द्र गूगल

मोहल्ले की दुकान पर खड़ा था। 12-13 साल की एक लड़की आई और उसने दुकानदार से कॉर्न-फ्लैक्स मांगा। दुकानदार ने रैक से निकालकर दे दिया। लड़की ने पूछा, कितने पैसे दूं। दुकानदार बोला, पैंतीस रुपये। लड़की के चुप रह जाने पर दुकानदार दो-तीन बार पैंतीस-पैंतीस कहता रहा। अंत में लड़की बोली, मींस..। तब दुकानदार बोला, थर्टी फ़ाइव। थर्टी फ़ाइव कहने पर लड़की समझ पाई। यह है हमारे बदलते समाज की स्थिति। बच्चों को हिंदी के अक्षर और अंकों का ज्ञान भी नहीं हो पा रहा और वे अंग्रेजी में फटाफट बोलने लगे हैं। चेतन भगत का कहना है कि अंग्रेजी के सिवा कोई चारा नहीं। अंग्रेजी हमें इंटरव्यू फ़ेस करना सिखाती है। यह हमें सबसे बेहतर टेक्स्ट बुक उपलब्ध कराती है और दुनिया से इंटरनेट के जरिये साक्षात्कार कराती है। बात बहुत हद तक सही है। लेकिन, अंग्रेजी पढ़ना और अंग्रेजी दां बनना, बिल्कुल दो बातें हैं। अंग्रेजी पढ़ने का मतलब यह नहीं कि हम अपने समाज को भूल जाएं। अपनी मातृ-भाषा को त्याग दें। चेतन भगत कहते हैं कि हिंदी हमारी मां है, तो अंग्रेजी पत्नी। लेकिन पत्नी के प्रेम में पागल होकर मां की ममता को भूल जाना सभ्य होने का सूचक नहीं। हम चाहे जितनी अंग्रेजी जान लें, अगर इस लड़की की तरह पैंतीस का अर्थ नहीं समझ पाएंगे, तो हमारा विकास अधूरा रहेगा।
~बिपेन्द्र

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