गुरुवार, 18 मई 2017

धर्म का चेहरा


आर कृष्णन शर्मा
कुछ साल पहले की बात है। मैं ट्रैन से कही जा रहा था। उस ट्रैन में जिस सीट पर बैठा था वह सीट दो ही व्यक्ति के लिए था लेकिन मेरे बगल में एक बुढ़िया आकर बैठ गयी। उसपे मेरी नजर पड़ी तो देखा माथे पर लम्बी टिका लिए , गला में कंठीमाला लिए हुए और हाथ में कोई माला फेर रही थी और मन ही मन बुदबुदा रही थी। जैसे देखने से प्रतीत हुआ सम्पूर्ण धर्म का ठेका लेकर चल रही हो और ट्रेन में सफर के साथ। अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि उस बुढ़िया के तरफ से मेरे मान में एक सवाल गूंजा मैं स्तब्ध रह गया। बुढ़िया ने कहा कौन जाट हो बाबू मैं सकपका गया क्यूं कि मुझको इसकी उम्मीद कतई न थी। लेकिन कुछ छन मैं अपने नास्तिक मन टटोलने के बाद तपाक से जवाब दिया डोम हूँ। उसने कहा मजाक करते हो बबुआ देखने में तो नही लगते । मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था मैंने कहा चेहरे पर लिखा होता है क्या या फिर मैं आपको अपनी जाति सर्टिफिकेट दिखाऊं। इतने बोलने के बाद बुढ़िया ने मुझे गुरेर कर देखा और कहा बहुत बिगड़ल बच्चा है। और उसने राम राम कहते हुए अपनी सीट बदल ली। मै अब सीट पर आराम से पैर फैला कर बैठा था और मुझे सुकून मिल रही थी । ट्रैन के पैसेंजर मुस्कुरा रहे थे। तब एक बगल के बुजुर्ग ने कहा बिलकुल सही जवाब दिए । उस दिन धर्म का जीता जागता चेहरा देखते हुए मुझे भयावह महसूस हो रहा था और कई सवाल सोचते हुए ढूंढते हुए वो ट्रैन का सफर कट गया लेकिन ये घटना मेरे स्मृति पटल पर छप गयी।
© #आर_कृष्णन

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