दोपहर की चिलचिलाती धूप और लगभग 40 डिग्री गर्मी , ऐसे में महिला सर से पाँव तक सिंथेटिक के काले कपड़े के बने बुर्के में पूरी तरह ढंकी हुई ।
ऐसा देख के ही उसकी दयनीय स्थिति का अंदाजा हो जाता है कि बुर्के में कितनी गर्मी और घुटन का सामना करना पड़ रहा होगा उस महिला को।
जबकि साथ में बैठा उसका पति गर्मी से बचाव के लिए हाफ स्लीव की शर्ट , पैंट और सैंडिल पहने हुए था।
जिस प्रकार की भारतीय जलवायु है उसमें बुर्का पहनने की जरूरत नहीं होती है , किन्तु आस्था के नाम पर अरब की नकल की जाती है जिसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है ।
महिलाओं को इस जबरन थोपे है 'काली कैद' से भी आज़ादी की मांग करनी चाहिए , उन्हें ऐसे परिधान पहनने का हक़ मिलना चाहिए जो मौसम के अनुसार सही हों । अरब की नकल से उन्हें मुक्ति की मांग करनी चाहिये, उन्होंने अरब का धर्म अपनाया है परिधान नहीं ।
- संजय
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