धार्मिक कर्मकांडों का ढकोसला है श्राद्ध कर्म
संतोष शर्मा
मृत्यु के बाद मृत्य आत्मा की मुक्ति के नाम पर पाखंडी पंडितों और पुरोहितों द्वारा विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों के जरिये अपनी उल्लू सीधा कर रहे हैं।
इंसान की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा की भी मौत हो जाती है। किन्तु पाखंडी पुरोहित और पंडित द्वारा मृत आत्मा को सदगति प्राप्त कर के नाम पर श्राद्ध जैसे कर्मकांडों को बनाया गया है। और इन कर्मकांडों के सहारे इन पाखंडों की दुकान आज भी चल रही है।
परन्तु मेरे जैसे युक्तिवादी इन कर्मकांडों को अन्धविश्वास बताकर उसे मानने से इंकार करता तो , उस व्यक्त ये पंडित या पुरोहित विभिन्न प्रकार से यह समझने या डराने का प्रयास किया करते हैं कि यदि मृत व्यक्ति का धार्मिक रीति-रिवाज के साथ दाह-संस्कार नहीं किया गया तो उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। आत्मा भटकती रहेगी।
किन्तु सच तो यह है कि किसी इंसान की मृत्यु के साथ ही उसकी आत्मा की भी मृत्यु हो जाती है। और मृत्य आत्मा के भटकने की बात एक कल्पना मात्र है।
वास्तव में धर्म और अंधविश्वास के नाम पर ठगी का धंधा चलने वाले इन पंडितों और पुरोहितों को यह पता है कि अगर लोग आत्मा , ईश्वर में विश्वास करना छोड़ दे तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी। दूसरों की खून-पसीने की कमाई पर हाथ मरने के मौका नहीं मिलेगा।
आज मुझ जैसे युक्तिवादीओं की वजह से मुफ्त की कमाई खाने वाले पंडितों और पुरोहितों की रातों की नींद उड़ने लगी हैं।
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