शनिवार, 17 जून 2017

धर्म और विज्ञान


Sukhvinder Sidhani

#विज्ञान_और_धर्म-2

विज्ञान और धर्म के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि जहाँ विज्ञान अग्रमुखी है यानी आगे की ओर देखता है, वहीं धर्म पश्चमुखी है यानी पीछे की ओर देखता है। उदाहरण के लिए विज्ञान के अनुयायियों के लिए विज्ञान के प्रकाशन जितने आधुनिक होंगे, अद्यतन(अपडेट) होंगे, उतने ही बेहतर माने जाएँगे। जबकि धर्म के अनुयायी जिन शास्त्रों पर निर्भर होते हैं, वे आमतौर पर प्राचीन होते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में वर्तमान वैज्ञानिकों का सबसे अधिक महत्व होता है जबकि धर्मक्षेत्र, धर्म के वे संस्थापक सबसे सम्मानित माने जाते हैं जो सुदूर अतीत में कार्यरत रहे हों। विज्ञान के समर्थकों के लिए जो घटनाएँ आज घट रही हैं और जो कल घट सकती हैं, उनका सबसे अधिक महत्व है, जबकि धर्म के अनुयायियों के लिए जो अतीत में घटा वही सर्वोपरि है। समय बीतने के साथ विज्ञान की तकनीकों में सुधार और निखार आता जाता है और इस सुधार की प्रेरणा विज्ञान की विधि के बुनियादी ढांचे में ही गुँथी हुई है। दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांड में समयानुसार बुनियादी तौर पर कोई खास सुधार नज़र नहीं आता। अगर कुछ परिवर्तन धर्म में होते भी हैं तो धर्म से बाहर के दबाव से होते हैं, जैसे कि स्वयं विज्ञान के दबाव से।

विज्ञान का एक आंतरिक गुण है, प्रश्न पूछने का अधिकार। लोग प्रश्न पूछने के अधिकार का उपयोग करते हैं, उसी से ज्ञान का विस्तार होता है और विज्ञान प्रगति करता है। दूसरी ओर धर्म अपने सिद्धांतों और रूढ़िवादी मान्यताओं के बारे में चाहता है कि उन पर कोई सवाल उठाए बिना सब लोग उन्हें स्वीकार कर लें। अगर धर्म पर सवाल उठाया जाए तो केवल किसी बात को समझने के लिए उठाया जा सकता है, शंका या संदेह प्रकट करने के लिए नहीं।

वैज्ञानिक तो किसी अपराध-बोध या संकोच के बिना यह स्वीकार कर सकता है कि 'मैं नहीं जानता'। लेकिन कोई धर्मगुरु ऐसा कहे तो उस पर तो पहाड़ ही टूट पड़ेगा। वह तो होता ही है सर्वज्ञ। प्रत्येक धर्म के संस्थापक अतीत कल से ही, ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर देते रहते हैं, जो कि पूछे जा सकते हैं। विज्ञान में तो ऐसा दावा करना आडंबर और विडम्बना माना जाएगा। ऐसा पाखंड धर्म ही दिखा सकता है।
Promeethews Pratap Singh Thakur की वाल से

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