बुधवार, 21 जून 2017

कथनी करनी

संजय कुमार

ऐसा क्यों है?-

ऐसा क्यों है की भारतीय जैसा कहते हैं वैसा अपने निजी जीवन मानते नहीं हैं?अर्थात कथनी करनी में इतना भारी अन्तर क्यों होता है? अक्सर जिन आदर्शो की बाते सार्वजानिक रूप से दुनिया के सामने करते हैं निजी जीवन में उन्ही आदर्शो के उलट काम करते हैं।

जैसे-

1- रोमेंटिक फिल्म यानि लड़का लड़की प्रेम आधारित फिल्मे भारत में खूब हिट होती हैं जिससे साफ़ जाहिर होता है की भारतीय लोग प्रेम / मुहब्बत को ज्यादा पसंद करते हैं ।पर जब इन्ही प्रेम पसंद लोगो के खुद के लड़का/ लड़की किसी दुसरे से प्रेम करने लग जाते हैं तो यही लोग इतने क्रोधित होते हैं की उनका क़त्ल तक कर देते हैं।

2- भारतीय हमेशा शौच ( साफ सफाई आदि स्वक्षता) की बाते करते हैं पर आदत यह है की कूड़ा घर के बाहर जंहा खाली जगह देखी डाल दिया। जंहा थोड़ी सुनसान दीवार देखी वंही हल्का हो लिए। गुटका पान खा के जंहा तहा धूकना तो जैसे जन्म जात हक़ हो भारतीयों का।

3- कहने को तो 'विश्व गुरु' कहते हैं पर बहुत बड़ी जनसँख्या अब भी निरक्षर है। संस्कृति की दुहाई देने वाले अपने बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाते हैं।

4- कहने को तो ' बसुधैव कुटुम्बकम' पर सड़क पर कितना ही दीन हीन व्यक्ति पड़ा रहे उससे बचकर ऐसे निकल जाते हैं जैसे वह कोई जीता जागता इन्सान न होक कोई कूड़े का ढेर पड़ा हो।

5- हर भारतीय स्वदेशी अपनाने का नारा लगाये रहता है ,पर खुद के घर में ऐसी विदेशी चीजे होंगी की अंग्रेज भी नहीं समझ पायेगा की वह अपने घर में है या भारतीयों के घर में। चड्डी से लेके सूट तक और संडास की सीट से लेके लक्स्जरी कार तक सब अंग्रेजी स्टाइल। विदेशी वस्तुओ का उपयोग करने में अंग्रेज को भी मात देते हुए भारतीय

7- भारतीय ' सत्य' की बाते करते नहीं थकते परन्तु यदि की निजी जीवन में देखेंगे तो हमारे निजी जीवन में सत्य कही नहीं है ।हम अपना काम ' साम-दंड- भेद' की नीति से करवाने में यकीं रखते हैं । बच्चो को ईमानदारी का पाठ पढवाते नहीं थकते पर खुद ईमानदारी के ' ई'में भी विश्वास नहीं रखते।
हम दुनिया को दिखाने के लिए बेशक ' अहिंसा' के पुजारी कहलवाते नहीं हिचकिचाते पर हमारे आदर्श हमेशा से ' लौह पुरुष' ही रहते हैं। हम ताकतवर के सामने तुरंत हथियार दाल देते हैं और कमजोरो को दबाने के लिए हमेशा तैयार।

8- धर्म कर्म /मज़हब की बाते और ढोंग सारा दिन करेंगे किन्तु मानव मानव फर्क इतना करते हैं की दूसरे को अछूत और काफ़िर कह अपने से नीचा समझते हैं।

ये तो केवल कुछ मुख्य बाते थी,कोई भी विदेशी आसनी से ऐसी बहुत सी बातो के भारतीयों के जीवन में देख सकता है जो कहने और करने में सर्वदा भिन्न है रहती हैं ।यानि भारतीयों के आदर्शो में और कार्यो में एक दम उलट बाते मिलती हैं।

ऐसा क्यों है कुछ समझ आता है आपको?

- संजय

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