सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
मंगलवार, 16 जनवरी 2018
मनुष्य के लिए मांसाहार बनाम शाकाहार
गुरुवार, 11 जनवरी 2018
दिमाग का उपयोग
जो अपने दिमाग का खूब उपयोग करते हैं वे intelligent होते हैं| जो तोता जैसे रटते हैं बिना सोचे समझे वे लकीर के फकीर होते हैं|
शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017
भारतीय संस्कृति और अंतर्जातीय विवाह
वैदिक, पौराणिक काल में, द्वापर त्रेता युग में क्या अंतर्जातीय विवाह होते थे| यदि हां तो कृपया उदाहरण सहित जानकारी दें|
मंगलवार, 26 दिसंबर 2017
मुर्गा मांस खाना उचित है?
मांसाहारी बकरा बकरी, भेड़, मछली, हिरण चिड़िया ...सब खाते हैं लेकिन कुछ जाति में मुर्गा मांस का निषेध है| जातीय सामाजिक संगठन वाले मुर्गा मांस खाने वाले को दंडित करते हैं?
मुर्गा मांस से क्यों परहेज करते हैं? इससे खाने वाले को या समाज को क्या क्या हानि होती है?
मुर्गा मांस खाना उचित है?
मांसाहारी बकरा, भेड़, मछली, हिरण चिड़िया ...सब खाते हैं लेकिन कुछ जाति में मुर्गा मांस का निषेध है|
निषेध के बावजूद बहुत लोग खाते हैं | सामाजिक नियम का पालन नहीं करते तो नियम बनाने का क्या औचित्य?
जातीय सामाजिक संगठन वाले मुर्गा मांस खाने वाले को दंडित करते हैं?
मुर्गा मांस से क्यों परहेज करते हैं? खाने वाले को या समाज को क्या क्या हानि होती है?
सोमवार, 25 दिसंबर 2017
लड़कियों की व्यथा
हमारे समाज के लड़के कम सुंदर लड़कियों को पसंद नहीं करते| फलस्वरूप कई लड़कियां घर से भाग कर अपनी मर्जी से शादी कर लेती हैं जिसे परिवार, समाज स्वीकार नहीं करता| कुछ विवाह की उम्मीद लिए बूढ़ी हो जाती हैं| यह बहुत दुखद स्थिति है| हमारा जाति समाज उन लड़कियों के जीवन बसाने के लिए कुछ नहीं करता किंतु दंडित करने के लिए तत्पर रहता है|
बुधवार, 20 दिसंबर 2017
अंतर्जातीय विवाह पर कठोर दंड
छत्तीसगढ़ जिला रायगढ़ पुसौर क्षेत्र के गाँव की एक इंटेलिजेंट लड़की के आई टी रायगढ़ से इंजिनियरिंग पढ़कर एक साल अध्यापन की| NIT राउरकेला में पी जी पढ़ाई पूरी कर वह इंजिनियर कॉलेज भुवनेश्वर में प्राध्यापक है|
एक विचारशील सज्जन श्री के एन प्रधान ने उस लड़की की व्यथा सुनाई|
उसके पिता जीअपने कई परिचितों रिश्तेदारों से बोले - "हामर झीअ र लागी पीला देखबअ (हमारी लड़की के लिए लड़का देखेंगे)| समय बीतता रहा| हमारे कोलता समाज का कोई पढ़ा लिखा लड़का उस लड़की को पसंद नहीं किया| क्योंकि वह सुंदर नहीं थी, काली थी| इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार नहीं थी|
शादी की उम्र निकल रही थी | अन्ततः उसने एक विजातीय लड़के से विवाह कर लिया| (उसके इस साहसपूर्ण कदम के लिए मैं बधाई देना चाहता था किंतु मेरे मोबाइल में उसका नम्बर डिलिट हो गया था|) उन्होंने आगे बताया कि उनके गाँव में उस परिवार को जात भात करने, जुर्माना करने, जाति बहिष्कार करने की चर्चा चल रही है| शायद उसके माता पिता को अपनी उस पुत्री को मृत मानकर बिसर खाना पड़ सकता है| जाति समाज को भोज देना पड़ेगा|
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हमारे जाति - समाज द्वारा उस लड़की के लिए सहयोग सहायता कुछ नहीं लेकिन भोज खाएंगे, दंडित करेंगे, उसे मृत मान लेंगे| उस लड़की का अपने माता पिता के घर आना प्रतिबंधित होगा| अन्यथा पूरे परिवार को जाति से बहिष्कार|
वाह! हम और हमारे समाज की यह क्रूरता भी अद्भुत है| हम महान| हमारी संस्कृति महान?
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श्री केदार नाथ प्रधान जी से मैंने कहा कि उस नव दम्पति को रायगढ़ में आशीर्वाद समारोह का आयोजन करना चाहिए|
हमें पहुँचकर उन्हें शुभकामना देनी चाहिए|
मेरे इस विचार से वे सहमत हुए|
समाज सेवी श्री एस डी पंडा
छत्तीसगढ़ रायगढ़ पूर्वांचल के एक महान समाज सेवी
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हेम सुंदर गुप्ता शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला महापल्ली के पूर्व प्राचार्य, सेवा निवृत शिक्षा अधिकारी श्री शशिधर पंडा जी ग्राम महापल्ली के निवासी हैं|
वे सेवा निवृत्ति पश्चात अपना पूरा समय समाज सेवा में देते हैं|
उन्होंने महापल्ली में जन सहयोग से दो मंदिरों की स्थापना की|
एक गायत्री मंदिर जहाँ देवी गायत्री तथा अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं| रोज सुबह शाम पंडा जी आकर पूजा करते हैं| कभी कभी यज्ञ हवन भी कराते हैं|
एक और मंदिर बटमूल आश्रम महाविद्यालय जहाँ किसी देवी देवता की प्रतिमा नहीं है| वहाँ साक्षात देवी देवताओं के द्वारा देवों के देव महादेव श्री शशिधर पंडा जी के मार्गदर्शन में शिक्षार्थियों को उत्तम शिक्षा दी जाती है|
श्रद्धेय श्री पंडा जी रोज महाविद्यालय में पूरा समय देते हैं|
इस विद्या मंदिर के महादेव और देवी देवताओं को नमन|
समाज सेवी श्री मनोज स्वाईं
समाज सेवा करने के लिए किसी जातीय सामाजिक संगठन का पदाधिकारी होना आवश्यक नहीं है|
शिक्षा के लिए समर्पित छत्तीसगढ़ रायगढ़ पूर्वांचल ग्राम कुकुर्दा के श्री मनोज स्वाईं जो स्कूल शिक्षा सुधार के लिए पागल हो चुके हैं, जो तन मन धन दे रहे हैं, स्कूलों में जाकर बहुत परिश्रम कर रहे हैं|
क्या यह समाज सेवा नहीं है?
मंगलवार, 19 दिसंबर 2017
समाज सेवा
एक जातीय सामाजिक संगठन के बड़े नेता ने मुझसे कहा - "आप सेवा निवृत्ति के बाद समाज सेवा करते हैं?"
मैंने कहा - "हाँ| अपने तरीके से मुझसे जो बनता है करता हूँ|
उन्होंने कहा - " नहीं, वो नहीं| मैं अपनी जाति समाज की बात कर रहा हूँ|"
मैंने कहा - "मैं ऐसा कुछ तो नहीं करता|"
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मैं अपने गाँव के सैकड़ों विद्यार्थियों को घर में सुबह शाम कई साल निःशुल्क पढ़ाया| अपने गाँव में गरीब विद्यार्थियों के सहयोग के लिए विद्यार्थियों के सहयोग से गाँधी निधि का संचालन किया| गाँव में एक पुस्तकालय की स्थापना कर सैकड़ों पुस्तकें देने के अलावा कई पत्रिकाएँ नियमित मंगाता था| अपने गाँव में हर साल होने वाले साँस्कृतिक कार्यक्रम में कई साल तक विद्यार्थियों के उत्साह वर्धनार्थ पुरष्कार का व्यय वहन किया|
अपने स्कूल के कई जरूरतमंद विद्यार्थियों को परीक्षा फीस, पाठ्य पुस्तक दिया हूँ| सेवा निवृत्ति के बाद बटमूल आश्रम महाविद्यालय महापल्ली जिला रायगढ़ के पुस्तकालय को जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए हर साल एक सेट विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित पुस्तकें देता हूँ| छ: पत्रिकाएँ (हंस, समर लोक, लोकाक्षर, अभियान, तर्कशील, आरोग्य) डाक से सीधे महाविद्यालय को भेजने के लिए आजीवन सदस्यता शुल्क पटाया हूँ| पत्रिकाएँ नियमित पहुँच रही हैं| इसके अलावा उस विद्या मंदिर में एक बार दान भी दिया| क्योंकि वह एक ऐसा मंदिर है जहाँ साक्षात देवी देवता देवों के देव महादेव श्री शशिधर पंडा जी के मार्गदर्शन में बहुत कम वेतन लेकर विद्या दान करते हैं|
कभी कभी मेरे मित्र आनंद प्रधान के साथ हमारे क्षेत्र के स्कूलों में जाकर विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं| इंटेलिजेंट बनने के गुर बताते हैं| सामान्य ज्ञान, स्वास्थ्य की बातें बताते हैं|
हमारे गाँव लोइंग के सेवा निवृत शिक्षक रविवारीय स्वाध्याय केंद्र में पढ़ाते हैं|
मैं इतने में ही खुश हूँ| इससे ज्यादा नहीं कर सकता|
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हमारे रायगढ़ पूर्वांचल में महान व्यक्ति भी हैं जो अपनी ही जाति के़ लिए नहीं सम्पूर्ण समाज की सेवा करते हैं| अधिकतम समय तथा तन मन धन दे रहे हैं| उन्हें नमन करते हुए उनकी गाथा लिखूंगा|
रविवार, 17 दिसंबर 2017
यः धारयति सः धर्मः
यः धारयति सः धर्मः| जो धारण करे वह उसका धर्म है|
जरूरी नहीं कि कोई हिंदू मुस्लिम.... धर्म ही धारण करे| वह मानवता सच्चाई प्रेम को भी धारण कर सकता है| वही उसका धर्म होगा|
शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017
संस्कृति रक्षा के ठेकेदारों का गणवेश
यह हाफ पेंट हमारे देश की संस्कृति के अनुरूप था? संस्कृति रक्षा के ठेकेदारों के द्वारा जांघ दिखाऊ गणवेश क्यों तय किया गया सौ साल तक चलाते रहे| इस वेष से क्या लाभ था? क्या कोई वैज्ञानिक तथ्य है या मशीनरी युग के लिए सुविधाजनक मानते रहे अब तक? अब बदल दिए फुल पेंट क्यों?
गुरुवार, 14 दिसंबर 2017
जैसा आहार वैसा विचार?
तो क्या हमारे देश में पश्चिम की अपेक्षा इंसानियत अधिक है?
क्या मांसाहारी क्रूर चोर डाकू घटिया भ्रष्ट कपटी बेइमान जलनखोर स्वार्थी .... ... होते हैं?
सोमवार, 27 नवंबर 2017
पूजा/प्यार
कब तक शव ममियों की पूजा करते रहोगेे? इतनी बड़ी दुनियां इतने सारे लोग| आओ सबसे प्यार करें|
सार्वजनिक जगह का दुरुयोग
कोई भी धार्मिक कार्य गतिविधि जुलुस सार्वजनिक जगह सड़क आदि पर नहीं होना चाहिए|
अम्बेडकर जी महान
अम्बेडकर जी ने संविधान का प्रारूप लिखा जिसे पारित किया सभा ने| अर्थात सब के मत से संविधान बना| केवल अम्बेडकर की नहीं चल सकती थी यह समझना चाहिए| अम्बेडकर जी महान थे बेशक लेकिन उन्हें सबसे महान सिद्ध करने के लिए बाकी सबको कमतर बताना गलत है , मूर्खता है|
शनिवार, 25 नवंबर 2017
संस्कृति परम्परा में परिवर्तन
हमारी संस्कृति परम्पराओं में परिवर्तन--
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पहले---
बहुपत्नी विवाह, सती प्रथा, बाल विवाह,. .., ...
धोती कुरता, साड़ी, बैल गाड़ी, .. , .. ......, ...
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आज--
परम्परा संस्कृति विरुद्ध _
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हिंदू विवाह अधिनियम, .., . , ....
आम जन के लिए स्कूल कॉलेज.. ,.. , ...
आधुनिक पहनावा, बिजली, स्टील प्लास्टिक बर्तन, गैस चुल्हा, रेफ्रिजेटर, कम्प्युटर, टी वी, मोबाइल.., ... , ..
शुक्रवार, 24 नवंबर 2017
अप्प दीपो भव
विभिन्न धर्मो के नियमों तथा मापुरुषों के विचारों में बहुत विभिन्नता है| सबका का पालन अनुसरण संभव नहीं| इसीलिए गौतम बुद्ध ने कहा अप्प दीपो भव|
इंसानियत ही मेरा धर्म
मैं धर्म निरपेक्ष secular हूं, धर्म निरपेक्ष रहूंगा| गाली गलौज करना मेरा धर्म नहीं है| इंसान हूं, इंसानियत मेरा धर्म है|
सुधार
पहले अपने अंदर के दोष को देखें | अपने और अपने धर्म की बुराई दूर करें तो हम और हमारा धर्म बेहत्तर होंगे| हम सुधरें तो युग सुधरेगा|
अंतर्जातीय विवाह
आश्चर्य है हम आज भी कितने असहिष्णु हैं|
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अंतर्जातीय विवाह भारतीय दंड संहिता के अनुसार कोई अपराध नहीं है| शासन ऐसे विवाह को प्रोत्साहन करती है|
लेकिन कुछ जातीय सामाजिक संगठन इस विवाह को स्वीकार नहीं करते| उस परिवार को बहिष्कार का दंड दिया जाता है| बहिष्कार से बचने के लिए समाज के पारम्परिक नियम अनुसार लड़़का/लड़की को मृत मानकर उनके घर के लोगों को बिसर खाना पड़ता है तथा डाति समाज को मृतक भोज देना पड़ता है|
हमारे समाज के इस क्रूरता के कारण अंतर्जातीय विवाह के इच्छुक लड़के लड़कियां आत्महत्या भी कर लेते हैं|
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क्या इसपर विचार नहीं करना चाहिए? या परम्परा को ढोते रहना ही उचित है?
******"
पौराणिक काल, महाभारत काल में अंतर्जातीय विवाह समाज में स्वीकार था| फिर आज क्यों नहीं?
हमारा संविधान बनता या नहीं
एक प्रश्न?
ये बाबा भीमराव अम्बेडकर जी नहीं होते तो हमारे भारत का संविधान बनता या नहीं?
आत्मा की अवधारणा
एक अनुत्तरित, मन को अशांत कर देने वाला प्रश्न - मृत्यु पश्चात क्या? इसका जबाब है आत्मा की कल्पित अवधारणा | मन को सकून देता है मान लेने से|
गीता में कहा है- जिस तरह शरीर पूराने वस्त्र को त्याग कर नया धारण करता है वैसे ही आत्मा समय आने पर पूराने शरीर को त्याग कर नए रूप में जन्म लेती है|
बुधवार, 15 नवंबर 2017
नकल करना ही धर्म है?
Meraj Anwar
ये तो सभी जानते हैं कि अपने पैग़म्बर की नक़ल करना सुन्नत कहलाता है। मसलन दाढ़ी रखना, क़ुर्बानी करना, कुर्ता पायज़ाम पहनना, बकरी चराना, लौकी खाना... ऐसी बहुत सारी चीज़ें हैं जिसे सुन्नत कहा जाता है।
पर कुल मिलाकर सारा का सारा सुन्नत केवल दाढ़ी बढ़ाना, मूँछे काटना, छोटा पायज़ाम पहनना और बड़ा कुर्ता पहनना पर ही क्यूँ अटक गया हैं? और लोग इसे कट्टरता से मानते भी हैं। माने दाढ़ी के बारे में कुछ कह दो तो लोग ग़ुस्सा हो जाते हैं। इस्लाम से ख़ारिज तक बता देते हैं। ज़िंदगी भर लोग धार्मिक कृत्य मानकर दाढ़ी ढोते रहते हैं...
जितनी कट्टरता से दाढ़ी ढोया जाता है उतनी कट्टरता से रोज़ लौकी खाना, बकरी चराना, खेत में लोटा लेकर जाना, ऊँट पर सवारी करना... आदि इत्यादि क्यूँ नही माना जाता है?
या फिर दाढ़ी-मूँछ कपड़े को एक धार्मिक सिम्बल बना देने की जगह... फ़ैशन के हिसाब से क्यूँ नही बदलते रहते हैं लोग? जैसे कि जब मन हो लौकी खाना और जब मन हो भिंडी..
रविवार, 12 नवंबर 2017
हमारी उदार संस्कृति
हमारी हिंदू संस्कृति मुस्लिम जैसी संकीर्ण नहीं, उदार है| हमारे ऋषि जाबालि चार्वाक, गौतम बुद्ध, भगत सिंह नास्तिक थे|
शनिवार, 11 नवंबर 2017
पोस्ट कार्ड से जन्म
हम बहुत चालाक हैं इसलिए हमने अधिक भगवान देवी देवता पैदा कर लिए| संतोषी माता और साईं भगवान का जन्म पोस्ट कार्ड से हु़आ|
इंसानियत
नास्तिक अधार्मिक नहीं होता| उसका धर्म इंसानियत होता है| जरुरी नहीं कि तथाकथित धार्मिक हिंदू मुस्लिम .. इंसानियत को मानते हों|
धार्मिक कट्टरता
मुस्लिम में हिंदुओं से अधिक कट्टरता और संकीर्णता होती है इसलिए हिंदुओं में सेकुलर , नास्तिक अधिक होते हैं मुस्लिम की अपेक्षा|
अहंकार
शुक्रवार, 10 नवंबर 2017
धर्म
सभी धर्म इंसानियत के दुश्मन हैं| जब तक दुनियां में ये धर्म बने रहेंगे प्रेम, इमानदारी, मानवता में कमी आती रहेगी|
गुरुवार, 9 नवंबर 2017
आस्तिक से नास्तिक
खाली दिमाग में आस्था भरकर आस्तिक बनाया जाता है| सोच समझकर बाद में कुछ लोग नास्तिक बन जाते हैं| जैसे ऋषि चार्वाक, ऋषि जाबालि, गौतम बुद्ध, भगत सिंह, डॉ कोबूर.... .....
बुधवार, 8 नवंबर 2017
मृत्यु के बाद
मृत्यु के बाद पता नहीं क्या होगा?
शव को जला देने या गाड़ देने की अपेक्षा मेडिकल कॉलेज को प्रदान करना उचित होगा|
कोई अंग किसी के काम आएगा|
विद्यार्थी प्रेक्टिकल कर सीखेंगे|
मंगलवार, 7 नवंबर 2017
धार्मिक कट्टरता
धार्मिक कट्टरता सोच विचार नहीं करती, तर्क नहीं करती| बसुधैवेकम् कुटुम्बकम् की दुश्मन होती है| आतंकवाद को जन्म देकर पालती है|
नई सोच को को स्वीकार करने में रोकती है|
सोमवार, 6 नवंबर 2017
मैं हूँ भ्रष्टाचार
मैं हूं भ्रष्टाचार | मैं सर्वब्यापी| | हर कोई मुझे चाहता है अंत समय से कुछ पहले मेरा साथ छोड़ कर परलोक सुधारने की कोशिश करता है|
रविवार, 5 नवंबर 2017
चुनाव में उम्मीदवारों को कसम
किसी संस्था, संगठन, पंचायत, विधान सभा संसद.... के चुनाव के पहले उम्मीदवारों को अपने कुलदेवी/ श्री दुर्गा देवी के मंदिर में या मस्जिद गुरुद्वारा ... में कसम करनी चाहिए कि वे कभी किसी संस्था संगठन सरकार का कभी रूपया पैसा नहीं खाए हैं| कभी नहीं खाएंगे| अपने पद का उपयोग निजी लाभ के लिए नहीं करेंगे|
शनिवार, 28 अक्टूबर 2017
गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017
श्री मनोज स्वाईं जी की शिक्षा क्रांति (facebook 25-10-2017)
सभा में आयोजित शिक्षा पर संगोष्ठी में उन्होंने अपना विचार रखा |
मंच के नए सदस्य भिलाई में कार्यरत श्री मनोज स्वाईं ग्राम कुकुरदा ने अपने शिक्षा क्रांति की जानकारी देते हुए कहा - "मैंने वर्ष 2017 को शिक्षा क्रांति वर्ष कहा है| मैं इस अंचल के तथा ओड़िशा के कई स्कूलों में जाकर पढ़ाई की मेरी टेकनिक से गणित को | तोड़ दिया हूँ| गणित को खेल बना दिया हूँ| जो बच्चे क्लास में बोलते नहीं थे वे गणित को खेल समझने लगे हैं |
आपको बता दूं कि मैं एक ही किडनी से चल रहा हूँ| कब क्या हो जाय पता नहीं| ज्यादा बोलने से मेरा शरीर बिगड़ने लगता है| लेकिन फिर भी मैं बोल रहा हूँ| मैं एक दिन में सौ किलोमीटर एक
बोतल पानी लेकर मोटर साइकिल से दौरा किया हूं| मैं जानता हूं यह मेरे जीवन के लिए ठीक नहीं है लेकिन करता हूं| एक दिन में कई स्कूलों में जाकर छः छः घंटे क्लास लिया हूँ| आज भी
मैं आपके पास आया हूँ| कुछ लेने नहीं कुछ देने आया हूँ |
मैंने कॉलेज स्तर के प्रतियोगिता परीक्षा में पूछे जाने वाला एह प्रश्न का हल कक्षा 6 वीं मे बताया मेरी टेकनिक से| फिर उस क्लास का एक विद्यार्थी 8 वीं के विद्यार्थियों को पुरे आत्म विश्वास के साथ समझाया |प्रायमरी मिडिल कक्षाओं में सिर्फ तीन घंटे पर्याप्त हैं| पाठ्यक्रम पूरा हो जाएगा|" अंग्रेजी शिक्षा संबंध में आगे कहा - "मेरे सिलेबस अनुसार पहली कक्षा में सिर्फ ए बी सी डी अल्फाबेट, दूसरी में सिर्फ सौ शब्द जानना है विद्यार्थियों को | गणित में पहली से पांचवीं तक जोड़ घटाना, |भाग गुणा, लघुत्तम महत्तम बस| पर्याप्त है|" इस पर श्री आर सी प्रधान प्राचार्य ने कहा कि हमें शिक्षा विभाग द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम तो पूरा करना पड़ेगा | फिर आपके सिलेबस अनुसार कैसे पढाएं? आपके अनुसार हमारे पाठ्यक्रम से कम क्यों पढाएं ? श्री मनोज स्वाई ने आगे कहा - आप विश्वास करेंगे| मैं जब दूसरी कक्षा में पढ़ता था एक उपन्यास पढ़ा | पूरा समझकर पढ़ा| क्या कोई अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाला अंग्रेजी का | उपन्यास पढ़ सकता है? कभी नहीं| हमें अपनी भाषा की और आना है | अपने बच्चों को | अंग्रेजी माध्यम में नहीं हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढ़ना चाहिए| विद्यार्थी अपनी भाषा में अच्छे से समझ सकता हैं अंग्रेजी में नहीं| इस पर श्री आनंद प्रधान सेवा निवृत शिक्षक ने कहा कि लगभग दो साल पहले हमारे विचार मंच द्वारा बटमूल महाविद्यालय महापल्ली में आयोजित विचार गोष्ठी में सभी एकमत थे कि अपने बच्चों को हिंदी माध्यम शालाओं में पढ़ाना चाहिए|
अंत में श्री स्वाई जी कहा - "मैं यहां कुछ लेने नहीं कुछ देने आया हूँ|
पूर्वांचल शिक्षक मंच के अध्यक्ष एन. आर. प्रधान ने कहा भगत सिंह आजादी के लिए पागल थे | मनोज स्वाई शिक्षा के लिए पागल हो गए हैं |वे कहते हैं अंग्रेजी के तीन काल पढाये जाते हैं | मैं पांच काल बनाया हूँ | मेरे इस काल को यदि पढ़ाया जाय तो विद्यार्थी फर्राटे के साथ इंग्लिश बोलेंगे | देखते हैं कौन सरकार मेरे इस टेक्निक को पहले अपनाती है | मैं वर्ष 2017 को शिक्षा क्रांति वर्ष नाम दिया हूँ | कौन कौन मेरा साथ देंगे? आप सब मेरे इस क्रांति में मेरा साथ दीजिये यही मेरा निवेदन है अंग्रेजी और गणित पढ़ाने का उनका टेकनिक कितना सार्थक होगा? उनके पाठ्यक्रम और टेकनिक को कौन कौन शिक्षकअपनाएंगे? यह समय बताएगा | अभी तो वे शिक्षा क्रांति के लिए तन मन और धन दे रहे हैं |
मनोज जी का कार्यक्रम पुर्व निर्धारित नहीं था| लगभग चालीस मिनट में उनकी बात पूरी नहीं हो सकी | उनकी बातों पर हमारे मंच में चर्चा अधूरी रही|
( मेरे विचार से श्री मनोज स्वाई जी चाहें तो हमारे छत्तीसगढ़ में शिक्षा का केंद्र माने जाने वाले भिलाई या राजधानी रायपुर या उनके जन्म क्षेत्र के जिला मुख्यालय रायगढ़ में एक स्कूल खोल कर शिक्षा के अपने विचारों, टेक्निक और पाठ्यक्रम को मूर्त रूप दे सकते हैं | )
समाज सेवा
इंसान बनो
विश्व विजयी
लाउड स्पीकर
खूब लड़ी मर्दानी वह झांसी वाली रानी थी
आस्तिक नास्तिक
मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017
गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
*राम राज्य कभी नही आना चाहिए*
----- ओशो----
राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे। कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता! और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगे, तो दरिद्रता निश्चित रही होगी, नहीं तो कोई बिकेगा कैसे ? किसलिए बिकेगा ? दीन और दरिद्र ही बिकते होंगे, कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे। कोई टाटा, बिड़ला, डालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं।
स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं! वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी। उनकी ही बेटियां होंगी। कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी। उसका तो स्वयंवर होता था। तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में ? और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे। क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग--आदमी और औरतें दोनों, विशेषकर स्त्रियां--राजा तो खरीदते ही खरीदते थे, धनपति तो खरीदते ही खरीदते थे, जिनको तुम ऋषि-मुनि कहते हो, वे भी खरीदते थे! गजब की दुनिया थी! ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे!
अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ। अब तो हम शादी होती है नई-नई, तो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं। हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं! राम के समय में, और राम के पहले भी--वधु का अर्थ होता था, खरीदी गई स्त्री! जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक है, लेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा! पत्नी और वधु में यही फर्क था। सभी पत्नियां वधु नहीं थीं, और सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं। *वधु नंबर दो की पत्नी थी।* जैसे नंबर दो की बही होती है न, जिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं! ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु।
*ऋषि-मुनि भी वधुएं रखते थे!* और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे। कुछ खास गजब के लोग नहीं थे। वैसे ऋषि-मुनि अभी भी तुम्हें मिल जाएंगे।
इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए। आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी! मगर यह जारी थी!
*रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर की बात थी, कि डाक्टर अम्बेडकर जैसा अतिशूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था!* असंभव !! खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था; यह उसका अपराध था। और *राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे।* क्या करना है? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है ? उसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ...!
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा; मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। *ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी! और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात खराब हैं!'*
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे ? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया! एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति!
उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान! क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो! यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं।
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी! हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे; इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका आदर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास था; पद कौरवों के पास था; प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे। और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है ?
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
*यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था।* और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं!'
निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे ? उस गरीब का कसूर क्या था ? अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो ? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है !!!
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी।
*तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया!* शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए!
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! *जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो!* मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी।
उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? *मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे!*
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया।
*---ओशो--*
बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
इमानदारी और भ्रष्टाचार 17-10-2017
"hired"/
"बोलने के लिए कितना पगार मिलता है"/ ........
ऐसा किसी पर कामेंट करने वाले निश्चित ही इमानदार होंगें। वरना ऐसा किसी को कहने का सहस कोई नहीं करेगा/
पता नहीं और दूसरे लोग कितने इमानदार हैं? बेहतर है सभी अपनी इमानदारी का परिचय दें विस्तार से। ईमानदारी और भ्रष्टाचार पर बहुत भाषण देते हैं। अपनी इमानदारी की गाथा भी सुनाएं ।
बहुत लोग किसी संस्था संगठन के पदाधिकारी होंगे, कोई नौकरी कर रहे होंगें । वे बताएं कि उन्होंने कभी किसी का निजी या सरकार का कोई रूपया या टाइम नहीं खाया है ।
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यादें - एक विवाह कार्यक्रम में बातचीत..
एक वरिष्ठ व्याख्याता इमानदारी और भ्रष्टाचार पर बहुत अच्छा बोले। चाय पीने के बाद उनके लड़के का हाल चाल मैंने पूछा । उन्होंने अपने लड़के की पढ़ाई आदि की बात बताए. फिर आगे बताए कि वह कहीं भी जाता है ट्रेन टिकट नहीं लेता । बहुत होशियार है। जिधर से टिकट चेकर आता है दूसरे तरफ चला जाता है या बाथ रूम चला जाता है।
दैवीय किताब में लिखी है
कैसी कैसी धारणाएं!
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€1} कोई कितना ही पापी दुष्ट और नीच हो मृत्यु के समय यदि वह भगवान का नाम लेता है तो वह मोक्ष या स्वर्ग धाम जाने का पात्र बन जाता है।
(2}तीर्थ यात्रा करने पर सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
{3}दान देने वाले को कई गुना बढ़ कर
धन संपत्ति की प्राप्ति होती ।
{4}गंगा नदी में अस्थियां विसर्जन किया जाता है तो मृतक को मोक्ष मिल जाता है।
{5}मृतक भोज का आयोजन करने पर पुरखों को तृप्ति मिलती है।
उपरोक्त बिन्दुओं का तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाए तो कह सकते हैं कि यह सब काल्पनिक व निराधार हैं।
ये सब भक्तों की संख्या बढ़ाने के लिए तथा अपना धंधा पक्का करने के लिए किया गया चतुराई भरा प्रयास है।

