मंगलवार, 22 अगस्त 2017

पुनर्जन्म?

Rattan Lal Gottra
🔴🔴🔴🔴
अगर पुनर्जन्म सही है तो श्राद्ध-पक्ष कैसा?
धर्म के “धंधे” का सबसे हास्यास्पद और विकृत रूप देखना है तो पितृ पक्ष श्राद्ध और इसके कर्मकांडों को देखिये. इससे बढ़िया केस स्टडी दुनिया के किसी कोने में आपको नही मिलेगी. एसी भयानक रूप से मूर्खतापूर्ण और विरोधाभासी चीज सिर्फ विश्वगुरु के पास ही मिल सकती है. एक तरफ तो ये माना जाता है कि पुनर्जन्म होता है, मतलब कि घर के बुजुर्ग मरने के बाद अगले जन्म में कहीं पैदा हो गए होंगे. दूसरी तरफ ये भी मानेंगे कि वे अंतरिक्ष में लटक रहे हैं और खीर पूड़ी के लिए तडप रहे हैं.
अब सोचिये पुनर्जन्म अगर होता है तो अंतरिक्ष में लटकने के लिए वे उपलब्ध ही नहीं हैं. किसी स्कूल में नर्सरी में पढ़ रहे होंगे. *अगर अन्तरिक्ष में लटकना सत्य है तो पुनर्जन्म गलत हुआ*. *लेकिन हमारे पोंगा पंडित दोनों हाथ में लड्डू चाहते हैं इसलिए मरने के पहले अगले जन्म को सुधारने के नाम पर भी उस व्यक्ति से कर्मकांड करवाएंगे और मरने के बाद उसके बच्चों को पितरों का डर दिखाकर उनसे भी खीर पूड़ी का इन्तेजाम जारी रखेंगे.*
अब मजा ये कि कोई कहने पूछने वाला भी नहीं कि महाराज इन दोनों बातों में कोई एक ही सत्य हो सकती है ... उसपर दावा ये कि ऐसा करने से सुख समृद्धि आयेगी. लेकिन इतिहास गवाह है कि ये सब हजारों साल तक करने के बावजूद यह देश गरीब और गुलाम बना रहा है ..... बावजूद इसके हर घर में हर परिवार में श्राद्ध का ढोंग बहुत गंभीरता से निभाया जाता है .... और वो भी पढ़े लिखे और शिक्षित परिवारों में .... ये सच में एक चमत्कार है.👁🙏🏼👁
- ओशो
♣♣♣♣

खुद को जगाओ

Rattan Lal Gottra
जगाना खुद को है
और पत्थरों को
घंटा बजाकर जगाते हो।
अंधेरा मन में है,
और दीये
मंदिरों मे जलाते हो
सपने आपके हैं और उम्मीद
पंडे पुजारियों से लगाते हो

रविवार, 20 अगस्त 2017

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

Swami Balendu जब मैं सुनता हूँ "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा" तो ये "विजयी विश्व" सुनकर मेरे मन में युद्ध, रक्तपात और मारकाट का चित्र उभर आता है! क्योंकि बिना इसके कोई "विजयी विश्व" हो भी कैसे सकता है? इतिहास में भी जब किसी ने "विश्व विजयी" होने की कल्पना से कदम बढ़ाया तो उसने खून खराबा ही मचाया. आखिर कोई भी "विजयी विश्व" या "विश्व गुरु" क्यों होना चाहता है? ये कल्पना ही कितनी हिंसक है! हम विद्यार्थी बनकर सभी जगह से कुछ भी अच्छा सीखने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते! आखिर अपने घर, गाँव, देश से किसे प्रेम नहीं होगा! मुझे भी है परन्तु माफ़ करना मैं राष्ट्रवादी नहीं हूँ और सोचता हूँ कि जैसे मुझे अपनी जगह से प्रेम है वैसे ही अन्य देशों में रहने वालों को भी होगा! फिर मैं "विश्व विजयी" क्यों बनना चाहूँगा! आखिर सबको अपनी जगह से प्रेम करने और अपने ढंग से जीने का अधिकार है!

हमारी दिमागी गुलामी

Swami Balendu 70 साल हो गए आपको राजनैतिक रूप से स्वतंत्र हुए, परन्तु यदि आप किसी भी संगठित धर्म के अनुयायी हैं तो आपका मन मस्तिष्क अभी भी गुलाम है! हर संगठित धर्म आपके सोचने समझने की शक्ति पर कुठाराघात करके काल्पनिक भ्रम, भय और लालच में फँसा देता है. सही मायने में आप स्वतंत्र तब होंगे जबकि स्त्री और शूद्र को पाप योनि बताने अथवा धरती को चपटी बताने वाली, अन्धविश्वास, रूढ़ियाँ, संकीर्णता और नफरत फैलाने वाली किताबों से स्वयं को मुक्त करके अपने विषय में कुछ खुद के दिमाग से भी विचार करेंगे. याद रखिये हजारों सालों से मानवता की जितनी हानि धर्म ने करी उतनी किसी ने भी नहीं करी. आज भी इन मजहबों के कारण इंसानियत का खून बह रहा है. स्वतंत्र करो खुद को इनसे, हिन्दू और मुसलमान नहीं इंसान बनो.

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसा वाली रानी थी

संजय कुमार "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी " यह कविता देशभक्ति का पर्याय मानी जाती है और रानी लक्ष्मीबाई को देशभक्तो के शिखर पर माना जाता है क्यों की उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध किया था । हो सकता है की यह सही हो और रानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजो से युद्ध करने के कारण देश भक्त हों ,पर कुछ सवाल है की- 1-यदि अंग्रेजो ने उनके दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराअधिकारी मान लिया होता तो क्या लक्ष्मीबाई अंग्रेजो से लड़तीं? 2-यदि अंग्रेज सरकार लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर राव द्वारा अंग्रेजी सरकार से लिए कर्ज की वसूली न करती तो क्या लक्ष्मीबाई अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध करतीं? 3- यदि अपने राज को बचाने के लिए अंग्रेजी वकील की सलाह पर लन्दन में दायर याचिका ख़ारिज न होती तो क्या लक्ष्मीबाई अंग्रेजो से युद्ध लड़तीं? लक्ष्मीबाई ने युद्ध( बगावत) तब किया जब अंग्रेजो ने उनके निजी हित की एक बात भी न मानी अन्यथा वे अंग्रेजो से न लड़तीं । यदि अंग्रेज रानी लक्ष्मी बाई को राज करने देते तो शायद सुभद्रा कुमारी चौहान जी ' खूब लड़ी मर्दानी' जैसी कविता लिखने से वंचित रह जातीं :) - केशव ( संजय)

नास्तिकता की जरुरत क्यों?

Swami Balendu नास्तिकता की जरुरत क्यों और कब तक* कुछ लोग खामखाँ कुतर्क करते है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों एक ही बात है या एक ही सिक्के को दो पहलू हैं या नास्तिकता भी एक धर्म अथवा विश्वास है और मैं न तो आस्तिक और न ही नास्तिक बल्कि वास्तविक हूँ. वैसे इस तरह की बातें केवल कन्फ्यूज आस्तिक ही करते हैं, जो वस्तुतः नास्तिक है वो कभी नहीं करेंगे! अब आइये जरा इसका विश्लेषण करते हैं कि यह कुतर्क कैसे है: मैंने यह बातें पहले भी कही हैं एक बार फिर से- नास्तिकता स्वयं में कोई पथ या मार्ग नहीं है बल्कि एक विरोध और विद्रोह है, आस्तिकता के ईश्वर रूपी असत्य और भ्रम के खिलाफ! यदि आस्तिकता न होती तो नास्तिकता की कोई आवश्यकता ही नहीं थी. और जब आस्तिकता न होगी तब नास्तिकता भी न होगी. किसी बच्चे के पैदा होने पर यदि उसे धर्म, आस्तिकता और ईश्वर की छाया से दूर रखा जाये और उसके मन में किसी काल्पनिक सर्वशक्तिमान की छवि को स्थापित न किया जाये तो वो बच्चा सहज मनुष्य ही होगा न कि नास्तिक! मतलब यह कि आस्तिकता कृत्रिम है, ओढ़ी हुई तथा असहज है. बच्चे को कभी जातकर्म संस्कारों द्वारा हिन्दू, सुन्नत के द्वारा मुस्लिम और बप्तिस्मा करके ईसाई बना दिया जाता है. और फिर उसके मन में किसी सर्वशक्तिमान की कृपा का लालच और दण्ड का भय बैठा दिया जाता है. नास्तिकता वस्तुतः इसी मिथ्या जाल और शोषण के खिलाफ एक विद्रोह की आवाज है न कि आस्तिकता के सिक्के का दूसरा पहलू! नास्तिकता की जरुरत तो मुझे पड़ी क्योंकि मैं आस्तिकता के मिथ्या भ्रम में पड़ा हुआ था. परन्तु मेरी साढ़े तीन साल की बेटी के लिए बन्दर और हनुमान में या गणेश और हाथी में कोई अंतर नहीं, उसे अभी ही पता है कि भगवान किसी कार्टून कामिक्स का भूत, स्पाइडर मैन इत्यादि की तरह एक ऐसा पात्र है जोकि केवल किताबों में होता है वास्तविकता में नहीं! वो जिसके अन्दर ईश्वर के प्रति कोई श्रद्धा, आस्था, विश्वास या आस्तिकता नहीं है, वो अथवा उसके जैसे बच्चे बड़े होकर हिन्दू, मुसलमान का तो सवाल ही नहीं उठता बल्कि नास्तिक भी नहीं बनेंगे बल्कि सहज मनुष्य ही रहेंगे. नास्तिक तो मैं बना क्योंकि मैं आस्तिक था. और जब तक धर्म और काल्पनिक सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति आस्तिकता का मिथ्या भ्रम बना रहेगा केवल तब तक ही नास्तिकता की जरुरत रहेगी! इसके साथ ही दुनिया भर में होने वाले सर्वे बताते हैं कि पूरी दुनिया में ही लोग धर्म और ईश्वर की मिथ्या कल्पना से दूर होकर नास्तिक हो रहे हैं. तथा जहाँ विकास नहीं है और गरीबी जादा है वहां ही धर्म और ईश्वर का प्रभाव जादा है तथा जहाँ विकास और सम्पन्नता है वहां धर्म और ईश्वर का प्रभाव कम है. एक बात और भी कह दूँ कि यह सब बातें केवल उसी को समझाई जा सकतीं हैं जोकि समझने की इच्छा रखे परन्तु आस्थावान आस्तिक जोकि अपनी समझ को संगठित धर्मों के समक्ष गिरवी रख चुके हों, स्वयं की नहीं बल्कि हजारों साल पहले लिखी किसी किताब के अनुसार चलते हों उन्हें आप कभी नहीं समझा पाएंगे. मैं भी एक सीमा तक ही बात करने का प्रयास करता हूँ और यदि मुझे यह लगे कि यह लाइलाज केस है तो उसमें अपनी उर्जा और समय नष्ट न करके, क्विट करके आगे बढ़ जाता हूँ.

विश्व शांति यज्ञ -


संजय कुमार > ‎भारतीय चिंतन
विश्व शांति यज्ञ - जनता को ठगने का नया तरीका
मित्रो,आपने ऐसे बहुत से पाखंडी या धोखेबाज देखे होंगे जो लोगो को धर्म के नाम पर मुर्ख बना के उनको ठगते हैं जैसे फलित ज्योतिष, गंडे -ताबीज वाले, भूतप्रेत बाधा दूर करने वाले, शनि महाराज, आदि।
पर कई सालो से एक प्रचालन और बढ़ गया है जिसपर लोगो का ध्यान कम गया है वह है ' विश्व शांति यज्ञ'करना। विश्व की शांति के नाम पर बड़े बड़े पंडाल लगते हैं जिसमे बड़े बड़े धर्म गुरु विश्व शांति के नाम पर यज्ञ हवन करते हैं, इसमें भाग लेने वाले अधिकतर संपन्न घर के ही होते हैं। लाखो रूपये की सामग्री के साथ साथ करोडो रूपये दान दक्षिणा में चढ़ा दिए जाते है ।
विश्व शांति के नाम पर बड़े बड़े टन्ट घंट किये जाते हैं ऐसे कार्यकर्मो में ,पर वास्तव में क्या इनसे विश्व में शांति आती है? विश्व तो छोडिये क्या जिस राज्य में यह यज्ञ किये जाते हैं उस राज्य के सिर्फ उस क्षेत्र में शांति आ पाती है?
क्या उस क्षेत्र में अपराध रुक जाते हैं? क्या उस क्षेत्र में शांति आ जाती है? यदि ऐसा होता है तो राज्यों और मोहल्लो में थाने बनाने और पुलिस रखने की क्या जरुरत ?सिर्फ महीने दो महीने में एक यज्ञ करवा दो सब शांत रहेगा।
इन यज्ञो से लेश मात्र का भी फर्क नहीं पड़ता ,यदि यज्ञो या हवनो से विश्व शांति आती तो हवन यज्ञ करने वाले यज्ञ करके सीरिया, गाजा इजराइल, ईराक आदि देशो में शांति कर के दिखाए?
यज्ञ से पाकिस्तान में शांति कर के दिखाए. चलो यह भी नहीं तो केवल भारत में ही शांति कर के दिखाए।
दरअसल , इन कर्मकांड और पाखंडो से यदि किसी को शांति मिलती है तो वह सिर्फ पुरोहित को मिलती है जो दक्षिणा में यजमानो को मुर्ख बना के हजारो लाखो ठग लेता है।
बाकी किसी और को या किसी स्थान , देश में इन पाखंडो से रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता।
जरुरत है ऐसे पाखंडो से जनता का धन और समय दोनों बचाने के लिए जागरूक करने की।
ऐसे विश्व शांति के यज्ञ पुरे साल कंही न कंही चलते ही रहते हैं और पुरोहितो के घर ' शांति' बनी रहती है ।

विनोबा, दुर्गा, इंदिरा के संग मेरे जीवन के अनमोल पल -

विनोबा, दुर्गा, इंदिरा के संग
मेरे जीवन के अनमोल पल -
************************
1-
1970 में आजादी की लड़ाई में गांधी जी के सहयोगी, भूदान यज्ञ आंदोलन के संस्थापक विनोबा भावे जी के पचहत्तरवीं जन्म दिवस के अवसर पर हम लोइंग गांव के पंद्रह लोग
{श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता, उनकी पत्नी दुर्गावती गुप्ता , जनार्दन गुप्ता (प्रधान पाठक/चुंटी मास्टर /सरोज गुप्ता के पिता जी, उनकी पत्नी शशि गुप्ता, धर्नीधर प्रधान (मेरे ताऊ जी/ चतुर्भुज गुप्ता के पिता जी ), रुक्मिणी विश्वाल ( किशोर श्रवण के पिता जी ), हुई बाई ( चंद्रभूषण गगुप्ता की नानी), पदुम गुप्ता (सुबोध प्रधान के पिताजी ), दामोदर प्रधान (देवेश प्रधान के पिताजी ),मेरे चचेरे भाई/ मित्र जयप्रकाश गुप्ता (प्रवीण अरविंद के पिता जी ), मैं स्वयं...}
हमारे दादा जी सर्वोदयी नेता श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता जी के साथ गांधी आश्रम वर्धा गए थे।
गांधी आश्रम में में पांच दिन ठहरे थे। आश्रम, पुस्तकालय, गांधी जी के जीवन वृत फिल्म देखकर गांधी को जानने का समझने का अच्छा अवसर मुझे मिला ।
गांधी आश्रम परिसर में विनोबा जी के जन्म दिन पर उन्हें हमारे देश के सभी राज्यों के राज्यपाल /मुख्य मंत्री अपने अपने राज्य से एकत्रित राशि की थैली भूद यज्ञ
के लिए भेंट किए । दोपहर में उनके साथ जमीन पर बैठ कर भोजन करने का सौभाग्य मिला । हमारे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण और केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण के पास ही मैं बैठा था। सभी लोग राज्यपाल, मुख्य मंत्री, मंत्री भी भोजन पश्चात अपना दोना पत्तल उठाकर बाहर फेंके
दूसरे दिन हम लोग बस से विनोबा आश्रम पनवार गए। विनोबा जी धोती पहने, सर पर हरे रंग का एक कपड़ा बांधे घासपात से बने छत के नीचे चबुतरे पर बैठे थे। गर्मी के कारण एक तसले के पानी में भीगा भीगा कर अपना बदन पोंछ रहे थे। बहुत लोग लाइन में खड़े थे ।
वर्धा के लिए आखिरी बस का समय हो रहा था। लोग जल्दी जल्दी एक एक कर विनोबा जी का चरण स्पर्श कर बाहर जा रहे थे। विनोबा जी आशीष दे रहे थे। मुझे यह अच्छा नहीं लगा.. चरण स्पर्श कर चलते बनो? मैं कुछ देर उनसे बात करना चाहता था। मैं चुपचाप लाइन से हट गया। हमारे गांव के सभी चरण स्पर्श कर चबुतरा के पास मुझे खोजे । मैं उन्हें देख रहा था। पास ही था चबुतरा के एक खंभा के पीछे था। श्री जनार्दन गुप्ता जी बोले - ଈତକେ ଥାଇ ଦିୟା ବୋ , ଇ ନତଠୁ ସଲା ଏନତିଚ୍ କରସୀ , ଆସୀ ଯିବା ହୁଶିୟାର୍ ଆୟ इसको छोड़ो रहने दो ये नत्थू साला ऐसा ही करता है । चलो सब, वह आ जाएगा किसी तरह, होशियार लड़का है। वे चले गए । और कुछ लाइन में थे सब चले गए
मैं विनोबा जी का चरण स्पर्श किया । मैंने कहा कि मैं आपके सर्वोदय आंदोलन में शामिल होना चाहता हूं। उन्होंने मेरा परिचय जानने के बाद कहा - तुम शिक्षक हो। अपना काम अच्छे से करो। ड्युटी के अलावा भी विद्यार्थियों के लिए, समाज के लिए कुछ कर सकते हो। और भी कुछ बात हुई । मैंने अंत में पूछा - ये सर में हरी पट्टी क्यों बांधते हैं? उन्होंने चारों तरफ हाथ से दिखाकर कहा - कुछ नहीं, ये हरा भरा.. ये हरियाली । मैं फिर से चरण स्पर्श कर चला गया। बस लेट थी इसलिए मुझे मिल गई ।
मेरे जीवन को दिशा देने के उनके शब्द मेरे धरोहर हैं ।
2-
सन् 1970- 75 में प्रधान मंत्री इंदिरा जी बिलासपुर आई थीं। मेरे चाचा तथा मित्र श्री सुभाष चंद्र गुप्ता शिक्षक तब बिलासपुर में बी एड कर रहे थे। मै और मेरे मित्र /चचेरा भाई जयप्रकाश गुप्ता इंदिरा जी को देखने बिलासपुर गए । प्रधान मंत्री जी का रघुराज स्टेडियम में कार्यक्रम था। मैं और सुभाष चाचा इंदिरा जी को जल्दी देखने के लिए बहुत उतावले हो रहे थे। हम दोंनो स्टेडियम से पैदल एयरपोर्ट की ओर तेज तेज चलने लगे । लगभग तीन किलोमीटर बाद इंदिरा जी की कार दिखाई दी । हम बहुत उत्साहित थे। इंदिरा गांधी की जय का नारा लगाने लगे जोर जोर से। सुभाष चाचा उछल उछल कर नारा लगा रहे थे। कार नजदीक आते ही हम दोंनो कार के किनारे पकड़कर चलने लगे नारा लगाते हुए । चाचा जी उछल रहे थे । पोलिस वाले बीच बीच में हमें कार से दूर हटने के लिए कहते लेकिन इंदिरा जी उन्हें संकेत से मना कर देती । हम उनकी कार को पकड़े पकड़े नारा लगाते स्टेडियम के गेट तक आए। यादगार के वे पल अविस्मरणीय हैं।
3- .
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाली दुर्गा भाभी श्रीमती दुर्गावती बोहरा ( भगत सिंह के साथी शहीद श्री भगवती चरण बोहरा जिनकी बम का परीक्षण करते मृत्यु हो गई थी, की पत्नी) से मेरा पत्र व्यवहार था। दुःख है कि उनके सभी पत्र नष्ट हो गए।
1981-82 में मैं और मेरी बहन स्वरुपा (वर्तमान श्रीमती स्वरुपा साहू अध्यापिका सरस्वती शिशु मंदिर गेरवानी) आरोग्य मंदिर गोरखपुर से परीक्षा देकर लौटते हुए लखनऊ में दुर्गा भाभी के दर्शन के लिए रूके । उनके घर में
चरण स्पर्श कर उनके संस्मरण सुनते रहे दिन भर। वर्तमान स्थिति पर उनसे पूछा ।उन्होंने कहा - मेरा वश चले तो कुछ नेताओं को लाइन में खड़ा कर गोली मार देती।
बीच बीच में वे हमें चाय नास्ता खुद बनाकर खिलाई। दुर्गा जी के साथ मेरी बहन की एक फोटो लिया । कुछ ख़राब हो गया है फिर भी यह फोटो मेरे लिए एक अमूल्य धरोहर है। (फोटो निचे है)
शाम को हम उनके चरण स्पर्श कर विदा लिए । वे सुनहरे पल थे मेरे जीवन के ।

मेरे नाम यशपाल जैन की पहली चिट्ठी

मेरा सौभाग्य है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और लेखक,पद्म भूषण से सम्मानित यशपाल जैन (भगत सिंह के साथी ) की पहली चिट्ठी ही मेरे पास सुरक्षित है। मेरा दुर्भाग्य कि और चार पत्र नष्ट हो गए ।
देश की आजादी के बाद उन्होंने "सस्ता साहित्य मंडल " की स्थापना कर हिंदी साहित्य की पुस्तकें कम कीमत पर उपलब्ध कराने का बीड़ा उठाया था। वे आजादी की लड़ाई के अपने संस्मरण लिखे हैं । एक जगह उन्होंने लिखा है - "हम सोचते थे कि आजादी के बाद हमें कम से कम पोलिस की कोई नौकरी तो मिल जाएगी लेकिन मिली नहीं ।"

झूठ और अफवाह

एक वर्ग की आदत है  झूठ और अफवाह फैलाना। यह इनका महान संस्कार है। सिक्का और नोट की खोज कर ली गई| आगे आगे देखिए क्या क्या खोज कर लेंगे ये ...

सांस्कृतिक परिवर्तन कोई खतरा नहीं जरूरत है।

Swami Balendu
पच्चीस साल पहले कितने प्रेमविवाह होते थे और अब कितने होते हैं? उसी तरह पच्चीस साल पहले कितना छुआछुत और घूँघट पर्दा था और अब कितना है? ये सब सांस्कृतिक बदलाव हैं या नहीं! जोकि पहनावे से लेकर खानेपीने तक और रहनसहन तथा व्यवहार सभी में दिखाई देता है. हमारे सोचने का ढंग बदला या नहीं! क्या हम आज भी पांच सौ साल पुरानी संस्कृति में जी रहे हैं जबकि विधवा को सती होते के लिए फ़ोर्स किया जाता था? संस्कृति वही होती है जो देश काल परिस्तिथी के अनुसार हर समय बदलती है. फिर क्यों प्राचीन संस्कृति के नाम का रोना रो रहे हो और पब्लिक को खाली फ़ोकट में ‘संस्कृति खतरे में पड़ गई’ कहकर झूठा डर दिखा रहे हो.

शनिवार, 19 अगस्त 2017

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

Kishan Sahay _
ज़रा सोचिए ..!
आखिर तुम्हें कब मिलेगी आजादी ?
……………………..
दुनियां चाँद पे चली गई !
मंगल की छाती पर
नासा ने रोबोट उतार दिया!
शनि मंगल
सूर्यग्रहण- चन्द्रग्रहण के
हर रहस्य से पर्दा उठ गया !
मगर फिर भी तुम
ग्रह नक्षत्रों को
शनि मंगल को
जन्मकुंडली में देख -देख कर
काँप रहे हो !
अपना भविष्य सुधारने के लिए
बाबा बाबियों का रास्ता
नाप रहे हो!!
क्या इसी दिन के लिए तुमने
बीएससी एमएससी पीएचडी
की थी !
कि तुम पढ़ेलिखे जाहिलों की
फौज में शामिल हो जाना !
क्या इसी दिन के लिए तुम
डॉक्टर इंजीनियर वकील
मजिस्ट्रेट या प्रोफेसर बने थे ?
कि बंगले पर
काली हांडी टांगना !
निम्बू मिर्ची टांगना !
और अपने उज्ज्वल भविष्य की भीख
किसी बाबा बाबी के दरबार में
नाक रगड़ कर माँगना !!
देश आजाद हो गया !
दुनिया आजाद हो गई !
आखिर
कब मिलेगी तुम्हें आजादी!
मानसिक गुलामी से ???
बंद कमरे में तुम्हारी चोंटी
कट जाती !
अँधेरे में अकेले में
तुम्हें भूत -पलीत सताते हैं !
तुम्हें ही सारी दुनिया की
नजर लगती है !
डायन तो तुम्हारे
हर घर में
मौजूद है !!
तुम्हारे तंत्र मंत्र यंत्र
काम क्यों नहीं करते हैं !
रक्षा सूत्र तुम्हारी चोंटी
क्यों नहीं बचाता है !
आखिर कब तक
तुम मानसिक गुलाम रहोगे !
क्या भारत
पुनः विश्व गुरु
तुम्हारे जैसे मनोरोगियों की
वजह से
कभी बन पाएगा ?
दुनिया रोज नए- नए आविष्कार कर रही है !
तुम हजारों साल पुरानी भाषा संस्कृति रीति रिवाजो की
वैज्ञानिक व्याख्या करने में
लगे हो !
कब तक शब्दों के साथ
बलात्कार करोगे ?
कब तक धोखे में रखोगे !
भारत की भोली भाली जनता को
हर सिद्धान्त हर आविष्कार को
शास्त्रों ऋषि मुनियों के
माथे मड़ोगे !!
तुम्हारी समस्याएं लौकिक हैं
मगर तुम्हें हर समस्या का हल
परलोक में नजर आता है !
संसार तुम्हारे लिए स्वप्नवत् है
माया है !
भगवान की लीला है
नाटक है ! भ्रम है !
आखिर तुम्हें इस सपने से कौन जगाए ?
जो जगाए वही
जातिद्रोही,धर्मद्रोही,देशद्रोही
या नास्तिक है ?
पहले भी कईयों ने
खूब प्रयास किए
मगर फिर भी तुम्हारा
विवेक नहीं जागा !
क्योंकि तुम विश्वगुरु के
अहंकार की
दारू पीकर
गरीबी अनपढ़ता
लिंगभेद जातिभेद
भाषाभेद क्षेत्रभेद
साम्प्रदायिकता
की नाली में पड़े हो !
आखिर तुम्हें कब मिलेगी
आजादी ?
मानसिक गुलामी से ????
अब
अंधविश्वास मुक्त
वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त
परम्परागत धर्म विहीन

आस्तिकता से अधार्मिक

Dinesh Aastik -
संसार का सबसे बड़ा अधर्म तो धर्म है। पहले खूब चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, शोषण, कुकर्म करो फिर आस्तिक बनकर गंगा में नहाकर या खुदा से तौबा करके अधर्म के पाप से मुक्त हो जाओ। पापियों ने धर्म का निर्माण अपनी सुरक्षा के लिेय किया होगा। यानि आस्तिकता मनुष्य को अधार्मिक बनाती है।

मंदिर मस्जिद के बदले साइंस म्युजियम

Dr Vijay Mehta
हिंदू और मुसलमानों को कोई काम करने का मौका मिले तो उन्हे मंदिर /मस्जिद बनाने का ख़याल ही क्यों आता है ??सार्वजानिक प्लॉट ,सरकारी ज़मीन ,सड़क ...कहीँ भी धर्मस्थल ही बनाने को उत्सुक. ...लॉग पैसे देने को भी तैयार .
देष में स्कूलों से ज्यादा मंदिर है .अब और ज़रूर नहीँ .(कम करने है )मंदिर के घंट से ज्यादा स्कूल का घंट समाज को ज्यादा उपयोगी साबित हुआ है .
कोई गाँव ,शहर में कितने पुस्तकालय है उससे उस शहर का CI- culture index नापा जा सकता है .
मुजे खुशी होती अगर UAE मे मंदिर के बदले science museum के लिये जगह मिलती .

अंधविश्वास छोड़़ो हकीकत पहचानो

Shrawan Bishnoi -

भावनाएं आहत

Mithilesh K Sinha 
नास्तिक कहते हैं कि ऊपरवाला नहीं है तो आस्तिकों की भावनाएं आहत हो जाती हैं, लेकिन जब आस्तिक कहते हैं कि उपरवाला है तो क्या नास्तिको की भावनाएं आहत नही होती ?
- Ricky Gervais

रास्ते अलग , लक्ष्य एक

गांधी जी आज़ादी चाहते थे
गांधी जी अहिंसा वादी थे, आदर्शवादी थे... वो शांतिमय तरीके से आज़ादी चाहते थे
(जैसा कि एक पक्ष कहता है)
तो
भगत सिंह भी आज़ादी चाहते थे...
भगत सिंह आक्रामक थे, उन्होंने ज़ुर्म के खिलाफ हिंसक तरीके से आवाज़ उठाई, अंग्रेजों को मारकर भगाया।
(जैसा कि दूसरा पक्ष कहता है)
लेकिन गांधीवादियों की नज़र में भगत सिंह एक हिंसक व्यक्ति थे
और
भगत सिंह के मानने वालों की नज़र में गांधीजी दोगले थे ।
इसमें शहीद भगत सिंह या गांधी जी की गलती नहीं;
गलती है आप लोगों की सोच की...
क्योंकि आप उनकी नीयत न देखकर तरीका देखने चले...
मेरी नज़र में हिंसा गलत है तो दूसरे की नज़र में ज़ुर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना सही है... हिंसक होना सही है लेकिन सिर्फ अपनी इन वजहों के कारण हम दूसरे शहीदों या महापुरुषों के चरित्र पर लांछन नहीं लगा सकते।

एक मंदिर जहाँ कोई प्रतिमा नहीं

एक मंदिर जहां देवी देवताओं की कोई प्रतिमा नही है। यहां साक्षात देवी देवता शिक्षार्थियों को शिक्षा देते हैं।.          द्वार पर देवों के देव महादेव श्री शशिधर पंडा (संस्थापक बटमूल आश्रम महाविद्यालय महापल्ली जिला रायगढ़ छत्तीसगढ़ )
के साथ उनके गण विचार विमर्श में तल्लीन हैं |                  यह महाविद्यालय दान से चलता है। न्यूनतम शुल्क,  अच्छी पढ़ाई, बेहतर परीक्षा परिणाम इसकी विशेषताएं हैं। प्राचार्य तथा प्राध्यपक गण बहुत कम वेतन लेकर गुणवत्तायुक्त अध्यापन करते हैं।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

तर्क से नास्तिक

धार्मिक पुस्तकों को समझने के लिये बुद्धि और तर्क की जरूरत नहीं है, बल्कि अज्ञान और अन्धविश्वास की आवश्यकता होती है। यदि आपके पास तार्किक बुद्धि है तो इन्हें पढ़ने के बाद आपका इनकी सच्चाई से विश्वास उठ जायेगा। आपके मन में जो सवाल उठेंगे, उनका उत्तर न मिलने के कारण आप आस्तिक से नास्तिक बन जायेगे। कहने का अर्थ है कि धार्मिक पुस्तकें तार्किक बुद्दि के कारण मनुष्य को नास्तिक बनाती हैं।

मस्जिद में औरतों से खतरा?

Meraj Anwar
क्या मस्जिद (खुदा के घर) में भी औरतों को, मर्दों से खतरा है?? क्या तुम लोगों का वहां भी पुरुषत्व जाग जाएगा??? तो फिर औरतों को मस्जिद जाने से मनाही क्यों???
मेरी भोली-भली आधी आबादी, आप समझती क्यों नहीं कि आपको धर्म कभी आज़ाद कर ही नहीं सकता, आप गुलाम बनके क्यों रहना चाहती हैं??? आप बगावत क्यों नहीं करती???

धार्मिक ग्रंथ नारी लिखी होती तो

Dinesh Aastik
यदि धार्मिक पुस्तकें नारी ने लिखी होतीं???
इसे केवल सवाल न समझे, यही सच्चाई होती।
यदि सभी धर्मों की किताबें नारी ने रचाई होती।
हम पुरुष किसी भगवानी का व्रत रख रहे होते,
कई पति रखने वाली से हमारी सगाई होती।।

मतिर्भिन्ना

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना । ऐसा ही होना चाहिए । अगर brain wash कर कोई विचारधारा भर दिया जाय तो एक ही तरह के विचार वाले हो सकते हैं जो कदापि उचित नहीं है। रोबोट एक ही विचार धारा के हो सकते हैं।
मेरे विचार या मेरे द्वारा शेयर किए गए दूसरों के विचारों, जानकारियों से सहमत होना जरुरी नहीं है

सोमवार, 14 अगस्त 2017

कृपया अवश्य पढ़ें । हृदयाघात

Dr Bharti _
.
~आवश्यक सूचना~
जरा सोचिये कि शाम के 7:25 बजे है और आप घर जा रहे है वो भी एकदम अकेले ।
ऐसे में अचानक से आपके सीने में तेज दर्द होता है जो आपके हाथों से होता हुआ आपके जबड़ो तक पहुँच जाता है ।
आप अपने घर से सबसे नजदीक अस्पताल से 5 मील दूर हैं और दुर्भाग्यवश आपको ये नहीं समझ मे आ रहा कि आप वहां तक पहुँच पाएंगे कि नहीं ।
आप सी पी आर में प्रशिक्षित हैं मगर वहां भी आपको ये नहीं सिखाया गया कि इसको खुद पर प्रयोग कैसे करें ।
ऐसे में दिल के दौरे से बचने के लिए ये उपाय आजमाए :-
चूँकि ज्यादातर लोग दिल के दौरे के वक्त अकेले होते हैं l
बिना किसी की मदद के उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है ।
वे बेहोश होने लगते हैं और उनके पास सिर्फ 10 सेकण्ड्स होते है ।
ऐसे हालत में पीड़ित जोर जोर से खांस कर खुद को सामान्य रख सकता है ।
एक जोर की सांस लेनी चाहिए हर खांसी से पहले और खांसी इतनी तेज हो कि छाती से थूक निकले ।
जब तक मदद न आये ये प्रक्रिया दो सेकंड से दोहराई जाए ताकि धड्कन सामान्य हो जाए ।
जोर की साँसे फेफड़ो में ऑक्सीजन पैदा करती हैं और जोर की खांसी की वजह से दिल सिकुड़ता है जिससे रक्त संचालन नियमित रूप से चलता है ।
जहाँ तक हो सके इस सन्देश को हर एक तक पहुंचाए ।
एक ह्रदय के डॉक्टर ने तो यहाँ तक कहा कि अगर हर व्यक्ति यह सन्देश 10 लोगो को भेजे तो एक जान बचायी जा सकती है ।
आप सबसे निवेदन है कि चुटकले भेजने के बजाय यह सन्देश सबको भेजे ताकि लोगों की जान बच सके ।
अगर आपको यह सन्देश बार बार मिले तो परेशान होने के बजाय आपको खुश होना चाहिए कि आपको यह बताने वाले बहुत जन है कि दिल के दौरे से कैसे बचा जाये ।
धन्यवाद !!
कृपया अपने सभी मित्रों से शेयर करना न भूलें।

धर्म और धम्म

Rattan Lal Gottra
*बुध्द कहते हैं- ईश्वर कहीं भी नही हैं उसे ढूढ़ने में अपना वक़्त और ऊर्जा बर्बाद मत करों ।*
*धर्म और धम्म मेँ अंतर-*
👉 *धर्म में आप ईश्वर के खिलाफ नहीँ बोल सकते, धर्म ग्रंथो की अवेहलना नहीँ कर सकते, अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीँ कर सकते।*
*जबकि धम्म मेँ तो स्वयं को जाँचने परखने और अपनी बुद्धि का प्रयोग करने की शिक्षा हैँ।*
👉 *धर्म कहता हैँ कि तेरा भला करने तथाकथित ईश्वर जैसी कोई ताकत आयेगी।*
*जबकि धम्म कहता हैँ- अत्त दीप भवः अर्थात अपन दीपक स्वयं बनो।*
👉 *बुध्द भी कहते हैँ: "ना मैँ मुक्तिदाता हुँ, ना मैँ मोक्षदाता हुँ। मैँ सिर्फ मार्ग दिखाने वाला हूँ। धम्म अर्थात जीवन जीने का सर्वोतम मानवतावादी आधार ।*
👉 *बहुत से लोग मानते होँगे कि धर्म और धम्म एक ही हैँ। उनको विश्लेषण करने की जरुरत हैँ। धर्म मेँ जन्म लेना पङता हैँ, जबकि धम्म में (शिक्षा) प्राप्त करनी पङती हैँ। जिसे कोई भी प्राप्त कर सकता हैँ।*
👉 *बुद्ध ने अपने अनुयाइयोँ से कहा था कि धर्म में अतार्किक बातेँ हैँ। जैसे आत्मा, परमात्मा,भूत, ईश्वर, देवी-देवता आदि। जबकि धम्म वैज्ञानिक द्रष्टिकोण पर आधारित हैँ। धम्म तर्क और बुद्धि को प्राथमिकता देता है। इसलिये ईश्वर को नकारता हैँ।*

👉 *धर्म मेँ असामनता है, भेदभाव है, ऊँच-नीच है। जबकि धम्म मेँ सब एक है। सब बराबर हैँ। कोई भेदभाव नही है। धम्म एक शिक्षा है, एक ज्ञान है, जो सबके लिये है। धर्म मेँ विभाजन है। अधिकार वर्गोँ मेँ विभाजित है। जबकि धम्म मेँ वर्गहीनता है। अधिकार और ज्ञान सभी के लिये है।*
👉 *धर्म मेँ कोई ब्रम्हा को सृष्टि का रचयिता बताता है, तो कोई स्वयं को ईश्वर का दूत कहता है। जबकि धम्म की शिक्षा देने वाले ने खुद को ईश्वर का दूत ना बताकर खुद को एक सच्चा मार्ग दिखाने वाला मनुष्य बताया।*
👉 *तथागत गौतम बुध्द, ’बुध्द’ का अर्थ बताते हुए कहते हैँ: "बुध्द" एक’अवस्था अथवा स्थिति का नाम हैँ। एक ऐसी स्थिति जो मानवीय ज्ञान की चरम अवस्था है। जब मनुष्य अपने तर्क और ज्ञान से एक दुर्लभ अवस्था (बोधिसत्व) को प्राप्त कर लेता है वो ‘बुध्द’ कहलाता है।*
👉 *बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर को भी बोधिसत्व का दर्जा दिया गया हैँ, जो कार्य तथागत गौतम बुध्द ने अपने ज्ञान की बदौलत किया, वैसा ही कार्य डॉ. आम्बेडकर ने अपने ज्ञान की बदौलत किया। अतः वो भी ‘बोधिसत्व’ हुए।*
👉 *धर्मोँ मेँ कानून की कठोरता है। जबकि धम्म को मानने या ना मानने मेँ आप पूर्णतया स्वतंन्त्र है।*
👉 *धम्म आप पर कोई कानून नहीँ थोपता। धर्म मेँ सब कुछ फिक्स होता है। जैसे: जो धर्म ग्रंथों मेँ लिखा है, वही सत्य है। उसका पालन किसी भी कीमत पर आवश्यक है। जबकि धम्म परिस्थितियों के आधार पर मानव हित के लिये परिवर्तन को मानता है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता हैँ।*
👉 *धम्म ‘ज्ञान’ है। इसलिये इससे तर्क-वितर्क और शिक्षा मे बढोतरी हो सकती है।* *जबकि धर्म मानव निर्मित ‘कानून’ है। ये जो भी नीला -पीला हैँ वही धर्म है।*
*वैज्ञानिक तर्क वितर्क ही सफल जीवन का मूल आधार हैं !*

धर्म का अपडेट कब?

आप लंगोट से जौकी पर आ गये। पायजामे से पतलून पर आ गये। नाड़े से बेल्ट पर आ गये। खड़ाऊँ से बूट पर आ गये। कलम से कीबोर्ड पर आ गये। पगडंडियों से एक्सप्रेस वे पर आ गये। चूल्हे से इंडक्शन कुकर पर आ गये। जंगलो से अपार्टमेंट तक आ गये। हल से ट्रैक्टर पर आ गये। पैदल से लक्ज़री जहाज़ों पर आ गये। दीये-मशाल से एलईडी पर आ गये। तीर-कमान और गदा से ऑटोमैटिक बंदूकों और मिसाइलों पर आ गये। आप पाँच हज़ार ईसापूर्व और पाँचवी-छठवीं शताब्दी से इक्कीसवी शताब्दी में आ गये।
आप लगातार अपडेट होते रहे हैं।
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आपका धर्म कब अपडेट होगा?
आपकी आस्था कब अपडेट होगी?
आपका ईश्वर कब अपडेट होगा?
आपकी सोच कब अपडेट होगी?
आपके धर्म की किताबें कब अपडेट होंगी॥
ज्ञान का दीपक जलाओ ॥
अंधभक्ति मिटाओ ॥ 🙏🏽

हम इंसान गवां बैठे

Dharmaraj Mahapatra
मस्ज़िद तो हासिल हमको , खाली इमान गवा बैठे.....
मंदिर को बचाया लड़-भीड़ कर, खाली भगवान गवा बैठे.....
धरती को हमने नाप लिया, हम चाँद सितारों तक पहुचे....
पूरी कायनात को जीत लिया, हम खाली इंसान गवा बैठे.....
मजहब के ठेकेदारों ने फिर आज, हमे यू भड़काया....
काजी और पंडित जिन्दा थे, हम अपनी जान गवा बैठे

कृपया अवश्य पढ़ें

Dr Bharti _
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जरा सोचिये कि शाम के 7:25 बजे है और आप घर जा रहे है वो भी एकदम अकेले ।
ऐसे में अचानक से आपके सीने में तेज दर्द होता है जो आपके हाथों से होता हुआ आपके जबड़ो तक पहुँच जाता है ।
आप अपने घर से सबसे नजदीक अस्पताल से 5 मील दूर हैं और दुर्भाग्यवश आपको ये नहीं समझ मे आ रहा कि आप वहां तक पहुँच पाएंगे कि नहीं ।
आप सी पी आर में प्रशिक्षित हैं मगर वहां भी आपको ये नहीं सिखाया गया कि इसको खुद पर प्रयोग कैसे करें ।
ऐसे में दिल के दौरे से बचने के लिए ये उपाय आजमाए :-
चूँकि ज्यादातर लोग दिल के दौरे के वक्त अकेले होते हैं l
बिना किसी की मदद के उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है ।
वे बेहोश होने लगते हैं और उनके पास सिर्फ 10 सेकण्ड्स होते है ।
ऐसे हालत में पीड़ित जोर जोर से खांस कर खुद को सामान्य रख सकता है ।
एक जोर की सांस लेनी चाहिए हर खांसी से पहले और खांसी इतनी तेज हो कि छाती से थूक निकले ।
जब तक मदद न आये ये प्रक्रिया दो सेकंड से दोहराई जाए ताकि धड्कन सामान्य हो जाए ।
जोर की साँसे फेफड़ो में ऑक्सीजन पैदा करती हैं और जोर की खांसी की वजह से दिल सिकुड़ता है जिससे रक्त संचालन नियमित रूप से चलता है ।
जहाँ तक हो सके इस सन्देश को हर एक तक पहुंचाए ।
एक ह्रदय के डॉक्टर ने तो यहाँ तक कहा कि अगर हर व्यक्ति यह सन्देश 10 लोगो को भेजे तो एक जान बचायी जा सकती है ।
आप सबसे निवेदन है कि चुटकले भेजने के बजाय यह सन्देश सबको भेजे ताकि लोगों की जान बच सके ।
अगर आपको यह सन्देश बार बार मिले तो परेशान होने के बजाय आपको खुश होना चाहिए कि आपको यह बताने वाले बहुत जन है कि दिल के दौरे से कैसे बचा जाये ।
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शनिवार, 12 अगस्त 2017

जाति धर्म के नाम पर वोट

Yash Baghel
जितने जाति और धर्म के नाम पर वोट देने वाले हैं
सब के सब अपराधी हो
हिन्दू हो या मुसलमान