Nikhilesh Mishra
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारतीय गणराज्य का नागरिक होने के नाते ख़ुशी से ज्यादा मुझे दुःख है कि 5 में से मात्र 2 न्यायाधीश ये कहने का साहस जुटा पाये कि तीन तलाक संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। मुझे हैरत है उन दो माननीयो की सोच पर, जिनके अनुसार तीन तलाक सिर्फ इसलिए जायज है क्योंकि ये हजार साल से चली आ रही प्रथा है?
हजार लानत है उस तीसरे न्यायधीश पर, जिनके अनुसार तीन तलाक सिर्फ इसलिए नाजायज है क्योंकि ये कुरान का हिस्सा नही है? ये संविधान की आत्मा के लिए शर्मनाक पल है कि इतनी जद्दोजहद के बावजूद इस देश के माननीय अभी तक हलाला और बहुविवाह जैसी अमानवीय प्रथाओ की सुनवाई करने का आत्मबल नही दिखा पाये और इस मुद्दे को भविष्य की सुनवाई के लिए टाल दिया गया है?
देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में धर्मसत्ता के विरुद्ध खड़े होने के साहस का अभाव क्यों है?
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प्राचीन इस्लाम का हिस्सा मात्र होने के कारण अगर सब कुछ जायज है तो क्या इस्लाम छोड़ने पर व्यक्ति के क़त्ल के फरमान पे माननीय ठप्पा लगायेगे?
अगर हजारो साल की परम्परा मात्र किसी अमानवीय प्रवत्ति को क़ानूनी जामा पहनाने के लिए पर्याप्त है तो क्या माननीय हिन्दुओ की प्राचीन प्रथाए जैसे सती प्रथा, बाल विवाह आदि को क़ानूनी संरक्षण प्रदान करेगे?
आखिर इस्लाम के नाम पे ही माननीयो के मुह में दही क्यों जम जाता है?
सौहार्द बिगड़ने का डर है अथवा इस्लाम के चरमपंथ से जीवन का भय?
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ये बात इस देश के हर नागरिक को समझ लेनी होगी की ये देश हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाइयो के ईश्वर के बनाये कानून से नही चलेगा।
संवैधानिक संस्थाये चलती है.. शक्ति के जोर से !!!
Power To Enforce !!!!
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देश के संविधान ने नागरिको को अपने धार्मिक मान्यताओ में विश्वास रखने की आजादी मात्र दी है लेकिन समानता और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जहां आपके विश्वास संविधान से टकराएंगे.. वहा नागरिको की नियति का फैसला आपका अल्लाह अथवा भगवान नही बल्कि.. कानून का डंडा करेगा !!!
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मैं सही मायने में भारत का पुनर्जागरण तभी मानुगा जब भारत की सर्वोच्च संस्थाये बिना लिंग,जाति, मजहब के भेदभाव के अपनी अंतिम नागरिक के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा के लिए खड़े हो कर सबके लिए समान कानून यानी समान नागरिक संहिता लागू कर पाने का साहस दिखा पाएगी।
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प्रधान सेवक जी। गेंद अब आपके पाले में है। आसमानी खुदा की सल्तनत के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाइए। तभी सही मायने में मानवता के नायक कहलायेगे
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हम इंसानो ने ये खूबसूरत दुनिया, चमकते चाँद सितारे, ब्लैकहोल्स, न्युट्रान, प्रोट्रान आदि नही बनाये हैं।
लेकिन.. इस दुनिया की बेहतरी के लिये फैसले.. हम लेते हैं !!!
पृथ्वी पर खुदाओं, ईश्वरो, आसमानी फरिश्तों की जरुरत नही है।
इंसानो की दुनिया के नियम हम इंसान स्वयं बनायेगे
Our Decision !!!
...........विजय सिंह ठकुराय
गांधी जी अहिंसा वादी थे, आदर्शवादी थे... वो शांतिमय तरीके से आज़ादी चाहते थे
(जैसा कि एक पक्ष कहता है)
तो
भगत सिंह भी आज़ादी चाहते थे...
भगत सिंह आक्रामक थे, उन्होंने ज़ुर्म के खिलाफ हिंसक तरीके से आवाज़ उठाई, अंग्रेजों को मारकर भगाया।
(जैसा कि दूसरा पक्ष कहता है)
भगत सिंह के मानने वालों की नज़र में गांधीजी दोगले थे ।
गलती है आप लोगों की सोच की...
क्योंकि आप उनकी नीयत न देखकर तरीका देखने चले...
मेरी नज़र में हिंसा गलत है तो दूसरे की नज़र में ज़ुर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना सही है... हिंसक होना सही है लेकिन सिर्फ अपनी इन वजहों के कारण हम दूसरे शहीदों या महापुरुषों के चरित्र पर लांछन नहीं लगा सकते।




