रविवार, 30 जुलाई 2017

अंधविश्वास

मनोज Poet ने भेजा है_ 👇👇👇👇👇👇👇👇
*यह हमेशा ध्यान रखे*
1) 🤑🌶🍒 *निम्बू-मिर्च* खाने के लिये है.. कही *टाँगने* के लिए नहीं है....
2) 😱🐈 *बिल्लियाँ* पालतू जानवर है, बिल्ली के *रास्ता काटने* से कुछ गलत नहीं होता.. बल्कि चूहों से होनेवाले नुक्सान को बचाया जा सकता है.....
.
3) 🗣💨 *छिंकना* एक नैसर्गिक क्रिया है , छींकने से कुछ *अनहोनी* नहीं होती ना हि किसी काम में बाधा आती है- छींकने से शरीर की *सुप्त पेशियां* सक्रीय हो जाती है...
4) 💀🌳 *भुत* पेड़ों पर नहीं रहते - पेड़ों पर *पक्षी*रहते है.....
5) 🔬🔭 *चमत्कार* जैसी कोई चीज नहीं होती - हर घटना के पिछे *वैज्ञानिक* कारण होता है.....
6) ⛄☃ *भोपा, बाबा* जैसे लोग *झुठे* होते है- जिन्हें *शारारिक मेहनत* नहीं करनी ये वही लोग है.....
7) ⛈🌪👺🔥 *जादू टोणा*, या *किसीने कराया* ऐसा कुछ नहीं होता, ये दुर्बल लोगोंके *मानसिक वीकार* है....
जादू-टोणा करके आपके ग्रहो की दिशा बदलने वाले बाबा, हवा और मेघोंकी दिशा बदलकर बारिश नहीं ला सकते...?⛈☁🌒💫
8 ) 🌏🐠 *वास्तुशास्त्र* भ्रामक है. सिर्फ दिशाओ का *डर* दिखाकर लूट...
वास्तविक तो पृथ्वी ही खुद हर क्षण *अपनी दिशा* बदलती है.... अगर *कुबेरजी* उत्तर दिशा में है तो एक ही स्थान या दिशा में *आमिर* और *गरीब* दोनों क्यों पाये जाते है?..... .
9) 👼🐓🐐🍇🍎 *मन्नत,पूजा, बलि, टिप* या *चढ़ावे* से भगवान प्रसन्न होकर *फल* देते है, तो क्या भगवान् *रिश्वतखोर* है?..... आध्यात्म *मोक्ष* के लिए है, *धन* कमाने के लिए नहीं.....
10) 👆🏼 ये जो *पढ़* रहे हो इसका अनुकरण करे, और अपने *मित्रों* को भी send करे...
यह मेसैज दूसरे ग्रुप पर भेजने से कोई *खुश खबर* नहीं मिलेगी... पर अपने मित्र *महेनत*और *कर्म* का महत्त्व जरूर जान सकेंगे... 🙏🏽
*कर्मण्ये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनं* 👈🏼 "श्रीमद् भगवद् गीता"

ईश्वर की सच्चाई

P. M. Panda _ ईश्वर को मानने वाले लोगों की कमी नहीं है। ईश्वर के पक्ष में बात करने के लिए उनके पास अनेक प्रकार के तर्क हैं। पर आज तक वे नास्तिकों के प्रश्नों का संतोष जनक उत्तर नहीं दे पाए हैं। नास्तिकों के प्रश्नों को सुनकर कई बार वे आपे से बाहर हो जाते हैं। मूल प्रश्न फिर वही है कि क्या वास्तव में ईश्वर जैसी कोई शक्ति है? यदि ईश्वर है तो उसे हम किस तरह से जान सकते हैं? ईश्वर के क्रियाकलापों का क्या कोई प्रमाण मिल सकता है? ईश्वर यदि समस्त ब्रह्मांड का मालिक है तो क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है क्या ईश्वर का उनसे कोई लेना देना नहीं है? दुनिया में जो कुछ भी घटित होता है क्या ईश्वर की ही इच्छा से ही होता है? बुद्ध और ओशो जैसे महान विचारक तो ईश्वर की अवस्थिति से ही इंकार करते हैं।महान साहित्यकार श्री प्रेमचंद व व्यंग्य विधा को प्रसिद्धि देने वाले श्री हरिशंकर परसाई भी ईश्वर के अस्तित्व से साफ इंकार करते हैं। तर्क और बुद्धि की कसौटी पर भी ईश्वर के पक्ष में निराशा जनक उत्तर ही प्राप्त होते हैं। वैज्ञानिकों ने भी अब तक ईश्वर के अस्तित्व को मान्यता नहीं दी है। दरअसल ईश्वर के नाम पर रोजी रोटी का साधन जुटाने वाले कभी नहीं चाहते कि ईश्वर का भय समाप्त हो हाँ ईश्वर के नाम पर दान दक्षिणा भेंट की राशि सदैव यूँ ही मिलती रहे! "ईश्वर के रूप में एक हौआ खड़ा कर दिया गया है। उस ईश्वर को कोई भी नहीं जानता!ईश्वर को मानने वाले लोग भ्रम और भय से पीड़ित हैं। काश; वे सच्चाई को स्वीकार कर सुखी जीवन व्यतीत करते तो संसार का भी भला हो सकता।" [पद्ममुख पंडा महापल्ली]

मतिर्भिन्ना

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना | किसी विचार का कोई विरोध करे तो उसे गलत नहीं मानना चाहिए | उस पर भी विचार करना चाहिए |

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

भाईचारा


Baldev johal

मैं भूखा हँ साहिब

Sheotosh Singh

संस्था में दो चार होशियार हों बस

दो चार हांकने वाले होशियार लोग हों बाकी गधे ..तो कोई भी संगठन  संस्था अच्छे से चल सकता है बिना किसी विवाद के|

धार्मिक कट्टरता

मुस्लिम धर्म में दाढी रखने का हुक्म है| हमारे हिंदू धर्म में आजादी है, मर्जी अपनी| यही कट्टरता दोनो धर्म में अंतर को बताती है|

विदेशी संस्कृति

Suresh Soni

हमारे देश के चंद लोगों को विदेश की सभ्यता ( तकनीकी ज्ञान काम लाभ ) तो चाहिए पर उनकी संस्कृति से परहेज है | उनकी संस्कृति पसंद नही ! यह कैसे संभव है ?

मिलो न तुम तो हम घबराएं , मिलो तो आंख चुराएं |

Side effect

Sanjeev Mongia

सफदरजंग हॉस्पिटल में एक मेरे मित्र है , सिनियर डाक्टर है . कभी कभी उनसे मिलने उनके कक्ष में चला जाता हु . अक्सर उनसे मरीज पूछते है , की इस दवाई का कोई साइड इफ़ेक्ट तो नही ... उनका एक ही जवाब होता है , साइड इफ़ेक्ट तो हर दवाई के होते है , लेकिन आप ओवरआल इसके इफ़ेक्ट देखिए , और दवाई ना लेने की वजह से अपने शरीर को होने वाले नुक्सान को देखिये . इसलिए तो आपको दवाई दे रहा हु .

अब यदि मै इफेक्ट्स और साइड इफ़ेक्ट की बात का धर्म के सन्दर्भ में विश्लेषण करू . तो अपने जन्म से पहले 1947के धर्म के आधार पर दंगो के बारे में तो सुन चूका ही चूका हु और अपनी आखो से १९८४ में देश भर में सिख विरोधी दंगे और 2002 के गुजरात में हुए दंगे , देखे ही है . और झुटपुट दंगे तो होते ही रहते है , जिनमे कइयो की जान जाती है . यदि इन सब बातो को रहने भी दे तो अपने देश के दो हिस्से ही धर्म के आधार पर हुए . आज हमे, अपने देश की GDP का एक अच्छा ख़ासा बजट , अपनी सुरक्षा परखर्च करते है . यानि धर्म के साइड इफ़ेक्ट तो साफ़ नजर आ रहे है . और यह साइड एफेक्ट , पुरे विश्व के इतिहास में आपको देखने को मिलेगे .

अब रही धर्म की बात . अच्छे बुरे इंसान हर धर्म में होते है . ऐसा तो कतई नही है की सिर्फ एक धर्म में अच्छे लोग है और दुसरे धर्म में बुरे लोग . यानि की अच्छा या बुरा , मनुष्य की पर्वृति पर निर्भर करता है , ना की धर्म पर . और यदि तोलना ही है तो आप के आस पास क्तिने राम मिले गे जो अपने पिता के कहने पर चौदह साल वनवास चले जायेगे . चौदह साल की बात छोडिये , यदि अपने पिता के लिए चोदह घंटे भी निकाल सको , तो गनीमत है . मै दूसरो की बात नही कर रहा हु , इसे अपने उपर ही लागू करके बता रहा हु . मुश्किल से हफ्ते में , उनके लिए दो चार घंटे ही निकाल पाता हु , जबकि मै बिलकुल फ्री हु . वैसे रामायण तो हम सबने पड़ी है , है कोई हममे से जो राम की तरह अपना राजपाट छोटे भाई को दे दे . यदि वसीयत में मिली प्रोपर्टी में से एक कमरा भी अधिक देना पड़ जाए तो जान निकल जायेगी . यही सच्चाई है , हमारे समाज की .और हम इस सच्चाई से मुंह नही मोड़ सकते .

मानिए या नही मानिए , धर्म ने इस दुनिया में समस्याए जायदा खड़ी की है , बजाय कुछ अच्छा करने के . यानि साइड इफ़ेक्ट ज्यादा है , बजाय एफेक्ट के ... लेकिन मन है की ... माने ना

God/ धर्म

Sonu Meena Mandawar
17 hrs · 
कई साल पहले मेरे छोटे भाई ने पूछा कि God है या नहीं ?
मैंने कहा, नहीं है.
मेरे भाई को बहुत सदमा लगा, उसको लगा कि मैंने उससे सबकुछ छीन लिया.. मैंने उससे आख़िरी उम्मीद भी छीन ली थी.
मैं उस दिन समझ गया कि समस्या कितनी गहरी है.
असल में God का नाम लोगों की उम्मीदों से जुड़ा है.. बुरे से बुरे हालात में भी वो सोचते हैं कि God सब ठीक करेगा.. इस उम्मीद को कोई खोना नहीं चाहता..
इस लिये मैं आस्तिक या अन्धविश्वासी लोगों का मज़ाक़ नहीं उड़ाता, बल्कि मुझे उनपे तरस आता है.
वे सोच भी नहीं सकते कि वे कितने बड़े झूठ पे विश्वास कर रहे हैं.
असल दोषी वे संत, बाबे या धार्मिक स्थानों में बैठे लोग हैं, जो सदियों पुराने झूठ का आज भी प्रचार करते हैं,
वे सत्ता और स्वार्थ के लिये लोगों को मूर्ख बनाते हैं.. वे नकली सुख-शान्ति, लालच और डर बेचते हैं..
सदियों से चली आ रही आस्था और विश्वास ने, लोगों के दिमाग़ को विकसित नहीं होने दिया,
वे झूठ और सच में फ़र्क़ नहीं कर पाते,
God के झूठे सहारे ने लोगों के आत्मिक बल को बहुत कमज़ोर कर दिया है.. वे God के बग़ैर जीने की कल्पना भी नहीं कर पाते.
क्या ऐसे लोगों को तरस करके अनदेखा कर देना चाहिये ?
बिल्कुल भी नहीं.. अगर हम बेहतर समाज में जीना चाहते हैं तो उनको जागृत करने की बहुत ज़रूरत है..
अगर लोग धार्मिक हैं, ये उनका निजी मामला नहीं है, ये पब्लिक मैटर बन गया है.. क्योंकि वे समझते हैं कि सिर्फ़ उनका धर्म, उनका God ही सच्चा है, बाकी सब झूठे हैं,
उनको लगता है कि सिर्फ़ उनके धर्म वाले ही इन्सान हैं, बाकी सबसे वे नफ़रत करने लगते हैं.. सिर्फ़ नफ़रत ही नहीं, बल्कि कुछ तो उनको ख़त्म करने की इच्छा भी रखते हैं.
आस्तिक या धार्मिक होने के सैंकड़ों साइड इफेक्ट्स हैं, जिन्हें पूरा समाज और देश भुगत रहा है.. धर्म ख़तरनाक हो रहे हैं, ख़तरे बढ़ रहे है..
सुबह-शाम लाउड स्पीकरों का शोर छोटा मामला है..मसले बहुत बड़े हैं..
कोई धर्म चाहे कितनी भी अच्छी सोच से शुरू हुआ हो, बाद में वो इन्सान की सोच को कुंद या बंद कर देता है..
धर्म की अच्छी बातें सिर्फ़ सुनने-सुनने के लिये रह जाती है, इस तरह एक ढोंगी समाज की रचना होती है..
वर्तमान में मानवता को सबसे बड़ा ख़तरा धर्म से है, लेकिन किसी धर्म पे उंगली उठाओ तो सिर कटने का ख़तरा भी है..
तो क्या किया जाये ?
धर्मों का ढांचा जिस काल्पनिक शक्ति की बुनियाद पे खड़ा है, उस शक्ति का कोई वजूद नहीं है, 
हमें बस ये साबित करते रहना है कि उस शक्ति का कोई वजूद नहीं है...
ये बुनियाद हिल जाये तो धीरे-धीरे बेबुनियाद ढांचे भी गिर जायेंगे...

रविवार, 23 जुलाई 2017

जीवन का सुर

सुविचार

अधिकार

Mithilesh K Sinha

यदि आपके पास आलौकिक शक्ति को मानने का अधिकार है.
तो मुझे भी अधिकार है कि मैं उस अलौकिक शक्ति पर प्रश्न पूछूं .
.
यदि आपको ये कहने का अधिकार है कि मैं नर्क में जाऊँगा. 
तो मुझे भी कहने का अधिकार है कि नर्क ऐसी कोई जगह नहीं.
.
यदि आपको ये अधिकार है कि आप मेरी बुद्धि सुधार के लिए प्रार्थना करेंगे.
तो मुझे आपको ये बताने का अधिकार है कि प्रार्थना एक कोरी बकवास है.

लड़कियाँ क्या पहनें

Meraj Anwar

लड़कियां, ये न पहने/वो न पहने। कपड़े को लेकर जितनी भी दिक्कतें है केवल पुरुषों को ही होती हैं, जबकि शिकार केवल औरतें होती हैं। क्या किसी औरत ने पुरुष के कपड़े को लेकर कोई ब्यानबजी की है?? लोग अपने घटिया दिमाग पे ताला क्यों नहीं लगा लेते??

*अरे  तुम अपना देख लो, लडकियां अपना देख लेंगी। और हाँ कपड़े की आड़ में बलात्कार को सही ठहराना, आपकी ओछी मानसिकता जाहिर करता है और कुछ नहीं

परछाई का सच

Arvind Jaiswal

ध्वज पर ईश्वर,दीवारों पर संतों की वाणी लिख कर
भीतर खून से सने मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे देखे हैं
परछाई का सच समझा है,धोखों को पहचाना है
चकाचौंध के जाल फेंकते चांद सितारे देखे हैं
. --विजय किशोर'मानव'


स्त्रियों की बदतर जिंदगी


Dinesh Aastik

भारतीय समाज की कू-रीतियों ने स्त्रीयों का जितना गला घोटा हैं उतना शायद ही किसी पुरुष ने घोटा होगा। पुरुषो की ऐसी मानसिकता के सबसे बड़े जिम्मेदार हमारे हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं जिसको एक बार किसी पुरुष ने पढ़ लेने के बाद स्वीकार लिया तो उस पुरुष के साथ स्त्री बद्द से भी बद्तर जिंदगी गुजारेंगी। 
क्या आपको नहीं लगता अब वो समय आ गया हैं कि हमें सही गलत में फर्क करना सीखना चाहिए अगर हमारे धर्मो में ऐसा कुछ हैं जो स्त्रियों को या किसी भी वर्ग को निचा दिखा रहा हैं तो उनको पूजना बंद कर देना चाहिए। गलती हर किसी से होती हैं हमको यें मानने में जरा भी शर्म नहीं आनी चाहिए की हमारे हिन्दू ग्रन्थ हम को सही दिशा नहीं दे सकते। अब हमको जम कर इन धर्म ग्रंथो का विरोध करना चाहिए जहाँ कही भी स्त्री को मनुष्य न मान कर एक जानवर से भी ज्यादा बद्तर सलूक किया जा रहा हैं तो कही न कही स्त्री को निचा दिखाने की मानसिकता यही से पनपी हैं क्यूँ न इनको जला कर थोडा आत्मा को शांत किया जाए। 
जहाँ कही भी स्त्री के स्वतंत्रता की बात आती हैं तो सबसे पहले धर्मो की आड़ ले ली जाती हैं या अपनी छोटी मानसिकता के आधार पर एक बाउंड्री बना दी जाती हैं और बता दिया जाता हैं कितना धीरे हँसना है कैसे कपडे पहनने हैं और किस समय घर आना हैं। आखिर यें बाउंड्री कब तक सिर्फ स्त्री के हिस्से में आएगी। इन बाउंड्री में से किसी भी विचार को अगर पुरुष पर थोप दिया जाएं तो वो एक महीना तो छोडो एक दिन भी बर्दाश नहीं कर पाएंगे। तो हम स्त्रियों पर तो न जाने कब से यें बाउंड्री थोपी हुई हैं। 
बर्दाश की हद होती हैं धर्मो को पूजना बंद करो वो तो वैसे भी मौन हैं हम स्त्रियों(इंसान) का क्या जो जिन्दा रह कर भी इतने समय से मौन हैं। — feeling बर्दाश की एक सीमा होती हैं और इस में न जाने कितनी सीमाए(स्त्रियाँ) मर चुकी हैं.
By Komal Bharti Gupta

शनिवार, 22 जुलाई 2017

बेचारे मुर्दे मुस्कराते हैं

नीतीश के. एस.

धर्म के नाम पर अपने बच्चों का कत्ल
धर्म के नाम पर अपने परिवार का कत्ल
धर्म के नाम पर सधर्मियों का कत्ल
धर्म के नाम दूसरे धर्म के लोगों का कत्ल
धर्म के नाम पर अपने गाँव-शहर वालों का कत्ल
धर्म के नाम पर अपने देशवासियों का कत्ल
धर्म के नाम पर दूसरे देश वालों का कत्ल

धार्मिक लोगों ने हर स्तर पर कत्ल करने के बहाने खोज रखे हैं। सुना है धर्म कभी ख़राब नहीं होता, धार्मिक लोग ख़राब होते हैं। धार्मिक ख़राब होते हैं तो सुधार कौन करेगा? या फिर जनसंख्या बैलेंस करने का ठेका ले रखा है सल्फेटों ने? खुद दस-दस बीस-बीस पैदा करते-करवाते रहते हैं और बैलेंस करने के लिये कटवाते-मरवाते रहते हैं।

धर्म से वर्चस्व को अलग कर के देखिये। बड़ा मज़ा आता है खुद को लाशों के ढेर के बीच में बैठा महसूस कर के। वही लाशें जो कभी दुश्मन थीं। अच्छा लगेगा मुर्दों की महक के बीच साँस लेते हुये.. क्योंकि मुर्दों से पसीने की बदबू नहीं आती। बेचारे मुर्दे सिर्फ मुस्कुराते

इंसानियत

Arun Kumar

मांसाहार मार कर

अगर हमारे किसी कर्म से किसी को पीड़ा होती है, हम उसकी पीड़ा को देख सुन रहे हैं तो निश्चित ही हम असहिष्णु हैं| मार कर खाना...

आधा प्रकाश/ आधा अंधेरा

Natthu Ram Pradhan

हम आधा प्रकाश आधा अंधेरा पसंद है| 
पूरा प्रकाश? ना बाबा ना..डर लगता है कुछ गड़बड़ न हो जाय|

Rattan Lal Gottra

मंदिर का मतलब होता है ......मानसिक गुलामी का रास्ता ...
स्कूल का मतलब होता है ......जीवन में प्रकाश का रास्ता .....!!

मंदिर की जब घंटी बजती है तो हमें सन्देश देती है की हम धर्म, अन्धविश्वास, पाखंड और मूर्खता की ओर बढ़ रहे.... हैं ....!
जब स्कूल की घंटी बजती है तो ये सन्देश देती हैं ....कि हम तर्कपूर्ण ज्ञान और वैज्ञानिकता की ओर बढ़ रहे हैं ...! अब तय आपको करना हैं की जाना कहाँ हैं ....?

गाय/भैंस में अंतर

गाय और भैंस की उपयोगिता में क्या अंतर है? कृषि, दूध में समानता है| भैंस का मांस नहीं खाते| इसीलिए गाय को माता मानते हैं क्या?

मंदिर मस्जिद बनाम स्कूल

हम आधा प्रकाश आधा अंधेरा पसंद है| 
पूरा प्रकाश? ना बाबा ना..डर लगता है कुछ गड़बड़ न हो जाय|

Rattan Lal Gottra

मंदिर का मतलब होता है ......मानसिक गुलामी का रास्ता ...
स्कूल का मतलब होता है ......जीवन में प्रकाश का रास्ता .....!!

मंदिर की जब घंटी बजती है तो हमें सन्देश देती है की हम धर्म, अन्धविश्वास, पाखंड और मूर्खता की ओर बढ़ रहे.... हैं ....!
जब स्कूल की घंटी बजती है तो ये सन्देश देती हैं ....कि हम तर्कपूर्ण ज्ञान और वैज्ञानिकता की ओर बढ़ रहे हैं ...! अब तय आपको करना हैं की जाना कहाँ हैं ....?

काश कोई मजहब न होता

B L Yadav

ना मस्जिद आजान देती, ना मंदिर के घंटे बजते
ना अल्ला का शोर होता, ना राम नाम भजते

ना हराम होती, रातों की नींद अपनी
मुर्गा हमें जगाता, सुबह के पांच बजते

ना दीवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता....
…….काश कोई मजहब ना होता....

ना अर्दय देते , ना स्नान होता 
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता

जब भी प्यास लगती , नदिओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती , नदिओं का गर्जन होता

ना भगवानों की लीला होती, 
ना अवतारों का नाटक होता
ना देशों की सीमा होती , 
ना दिलों का फाटक होता

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....

कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता

कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई, बेखबर ना होता

ना ही गीता होती , और ना कुरान होता
ना ही अल्ला होता, ना भगवान होता

तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.
ना मैं हिन्दू होता, ना तू मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।

~~अज्ञात~~ (via - Prem Ranjan)

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

ईश्वर ???

Padmamukh Panda _
आस्तिकों और नास्तिकों में ठन गया है
ईश्वर  एक विवादित विषय बन गया है
तर्क वितर्क का लंबा दौर जारी है
कभी एक तो कभी दूसरा भारी है
आस्तिकों के लिए ईश्वर जरूरी है
नास्तिकों ने बना रखी दूरी है
ईश्वर है या नहीं यही प्रमुख मसला है
निर्णय हो जाए तो सबका भला है
आस्तिकों के तेवर बहुत ही तीखे हैं
चोट खाए बब्बर शेर के सरीखे हैं
"इतने बड़े ब्रह्मांड को जो चलाता है
वह परम पिता परमेश्वर कहलाता है
चंद्र सूर्य तारे ग्रह जिसके अधीन हैं
बिना ईश्वर के यह सब क्या मुमकिन है
ईश्वर हमारा पिता है जन्मदाता है
वह संसार में यह लीला रचाता है
वह श्रष्टा पालक और मोक्ष दाता है
वही सर्वस्व हमारा भाग्य विधाता है
उसकी पूजा करो आराधना करो
उसे पाने के लिए कठिन साधना करो
ईश्वर की निंदा घोर निंदनीय कार्य है
नास्तिकों!हमें तुम्हारे तर्क अस्वीकार्य हैं
"नास्तिकों का यह कहना है
तुमने तो पाखंड का चोला पहना है
ईश्वर को आज तक किसने देखा है
पंडा पुजारी ने ले लिया ठेका है
ईश्वर महज एक कपोल कल्पना है
जो धर्म के ठेकेदारों के लिए बना है
ईश्वर का कोई अता पता नहीं है
इसे पूजने में कोई बुद्धिमत्ता नहीं है
न वह न्याय का कभी साथ देता है
न वह कोई जिम्मेदारी लेता है
ईश्वर समस्त बुराईयों की जड़ है
इसके नाम से ही  सब गड़बड़ है
ब्रह्मांड को ईश्वर ने नहीं बनाया है
ब्रह्मांड स्वयं अस्तित्व में आया है
यह प्रकृति संपूर्ण रूप से शाश्वत है
ऐसा हमारा दृढ़ अभिमत है
हे पाठक आप स्वयं विचार करें
अपना अभिमत तैयार करें
अपनी प्रतिक्रिया प्रेषित करें
स्पष्ट राय जरूर इंगित करें।

विनयावनत
पद्ममुख पंडा महापल्ली

मुस्लिम को किससे खतरा

ikhilesh Mishra

इस्लाम (मुसलमान) को किससे ख़तरा है ?
क्या ग़रीबी से ?
क्या आशिक्षा से ?
क्या राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी से ?
क्या प्रशासन में उनकी उपेक्षा से ?
पुलिस उत्पीड़न से ?
बढ़ती बहुसंख्यक संप्रदायिकता से ?
नही साहब बिलकुल नही 
ख़तरे उससे भी बड़े हैं 
सानिया मिर्ज़ा की मिनी स्कर्ट 
शमी की पत्नी के फ़ोटो 
इरफ़ान की वाइफ़ की नेल पोलिश 
रहमान का म्यूज़िक 
तसलीमा की क़लम 
समझ गए ना आप लोग 
या फिर इन्ही मुस्लिम चिंतकों से पूँछेंगे

.......शकील खान

दीर्घ कोण न्यून कोण

R Krishnan Sharma

कोण दीर्घ और न्यून

पक्का हिन्दू मुसलमानों का दुश्मन, 
और कट्टर मुसलमान हिन्दुओ का दुश्मन होता है, 
नास्तिक इन दोनों को नहीं पचता, 
नास्तिकों को यह दोनों अपना दुश्मन न. 1 जानते हैं. 
यहाँ वह फार्मूला नहीं काम करता कि 
"दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त" 
त्रिभुज में नास्तिक १५० अंश का दीर्घ कोण होता है 
यह दोनों धर्मी 15-15 अंश के न्यून कोण होते हैं. 
हिन्दू और मुस्लिम दूर दूर खड़े रह कर, 
अपनी न्यूनता की संकीर्णता से नास्तिकता की दीर्घता को देखा करते हैं 
कि जिस दिन यह पूर्ण हो जाएगा, 
उस दिन हमारे वजूद का अंत हो जाएगा.
दुन्या को एक सीधी १८० डिग्री की सड़क मिल जाएगी.
नास्तिकता इन दोनों या सभी धर्मियों का साँझा दुश्मन है. 
मैं सदाक़त का मतलाशी हूँ, 
सत्य का खोजी हूँ, 
हर वक़्त सच को सर पर लादने के लिए तैयार 
और धर्म व मज़हब हर सच को अवैध गर्भ के फूले पेट को, 
अपने तंग आँचल से ढकने की कोशिश में रहते हैं. 
हर धर्म, धर्मियों की छोटी बड़ी दुकानें होती हैं.
वह अपने समर्थक सवारियों पर अपने निर्मूल्य और भावुक विचार लादकर बस्तियों में घुमाया करते हैं.
देवालय इनकी केंद्र होते हैं, जहाँ यह अपने देवों को सजाए 
गाहकों का इंतज़ार किया करते हैं.
दुन्या में, खास कर उपमहाद्वीप में धर्म व मज़हब इर्तेका (रचना-काल) के पैरों में बेड़ियाँ डाले हुए हैं. पश्चिम कहाँ से कहाँ पहुँच गया है, 
हम अजानों और घंटा घडियालों से लोगों की नीदें हराम किए हुए हैं.
.

हम भारतीय हैं या हिंदू?

स्वामी मैत्रेय श्री श्री > ‎आओ तर्क करें

जापान में रहने वाला जापानी है! 
अमेरिका में रहने वाला अमेरिकन है! 
कनाडा में रहने वाला कनाडाई है. 
यहाँ तक की कथित हिंदू राष्ट्र में रहने वाला भी नेपाली है 
पर भारत में रहने वाला हिंदू क्यों है? ?

बुधवार, 19 जुलाई 2017

देवताओं के प्रकार

कोई बताएंगे?..
भगवानों के प्रकार
देवी देवताओं के प्रकार
देवियों के प्रकार
देवताओं के प्रकार
राक्षसों के प्रकार
मनुष्यों के प्रकार
गाय के प्रकार
बैल के प्रकार
........
..... ....

पाप धोने के सहज सरल उपाय

भ्रष्टाचार पाप धोने के सहज सरल उपाय हैं हमारे धर्म में| चिंता की कोई बात नहीं|

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

नवजात शिशु

Rattan Lal Gottra

नवजात शिशु का दिमाग एक रिक्त स्थान होता है । पैदा होने के बाद वह स्वयं उसमें कुछ नहीं भर सकता । लेकिन जिस धर्म या मजहब वाले के यहां वह पैदा होता है , वही धर्म उसके मासूम दिमाग में भर दिया जाता है ।
मैं भगवान और खुदा को तब मानूं जब मुसलमान का बच्चा पैदा होते ही "अल्लाह हू अकबर " बोले ,और हिंदू का बच्चा "जय श्री राम"

शुभ/अशुभ


R Krishnan Sharma

मैं समझता हूँ भारतीय इन्हीं के कारण पीछे रह गए की जब सारा दिमाग इसी में खर्च हो जाएगा की गुरुवार को नाख़ून नहीं काटने, अमावस्या को चावल नहीं बनाने, रविवार को तुलसी में पानी नहीं डालना, शनिवार को मूर्ति पर तेल चढ़ाना है, सोमवार को बेलपत्र तोड़ने हैं, मंगल को व्रत रखना है, बुध को घास गणेशजी को चढ़ानी है, बिल्ली रास्ता काटे तो अशुभ मानना है, छींक आए तो 5 मिनट रुकना है, 12 बजे घर से बाहर नहीं निकलना है।
तो घण्टा कोई ज्ञान हासिल करने या नया अविष्कार करने में अपना दिमाग लगा पाएगा। यह सब मनुष्य की उन्नति में बाधक है

Saurabh Varshney

सोमवार, 17 जुलाई 2017

प्रेम

Sonu Meena Mandawar
कितनी अजीब बात है , जब भागवत में बैठकर पंडा कहता है-
" प्रभु प्रेम के भूखे थे , हैं , पर्भु ने प्रेम किया. Etc...."

तब तो भक्त वाह वाह करते हैं...!!

और हम इसकी चर्चा भी करते हैं , तो लोग हमारी मानसिकता पर भी सवाल उठाते हैं..

इस शब्द को निंदा के साथ देखा जा रहा है..!

जबकि ये तो सोशल मिडिया के बुद्दिजीवियों का नमूना है,,

जब आप सोशल मिडिया पर इस विषय पर चर्चा नही कर सकते हैं , तो अपने बच्चों और युवाओ को इस विषय में कैसे गाइड करोगे ,, वो इसे बेहद गन्दा विषय समझेंगे...!!
- फिर वे इस विषय पर आपसे हमसे खुलकर बात क्यों करेंगे..??

जैसे ही वे मुँह खोलेंगे तुम उन पर टूट पड़ोगे....!!

फिर वे आपसे सलाह मशवरा क्यों करेंगे..??

- सीधा अवैध सम्बन्ध जोड़ेंगे और लास्ट में ट्रेन के निचे...!!

- युवाओ को बदलने से पहले बुद्दिजीवियों को अपनी स्वयँ की इस विषय में सोच बदलने की जरूरत हैं....!!

रविवार, 16 जुलाई 2017

नफरत के बीज

बचपन में हमारे दिमाग में कचरा और नफ़रत के बीज भरे जाते हैं Ruba Ansari is thinking about my childhood. स्कूल की एक हिन्दू टीचर मुझे बहुत पसंद थी। कुछ महीने पहले शादी हुई थी। उनका बोलना, पढाना, हंसना, प्यार से सर पे हाँथ फेरना सब कुछ मुझे बहुत अट्रैक करता था। यूं कह लीजिये वो मेरी क्रश थीं। एक बार वो कई दिन स्कूल नही आयी पता चला की उनका बच्चा पेट में ही मर गया। शाम में मेरी सहेली मेरे साथ खेलने आयी जो की रोज़ आया करती थी। हम ही दोनों छोटे और नासमझ थे। मैंने उसे सारी बात बतायी वो बोली- "पता है जो हिन्दू होते हैं वो जहन्नम में जाते हैं। वहां आग उन्हें जलाती है कीड़े मकोड़े सांप बिच्छू सब उनको काट काट... सब उनको काट काट के खाते हैं। उन्हें खाने के लिए मवाद और खून दिया जाता है"। मैं दौड़ कर अम्मी के पास गई उनसे पूछा कि "क्या सारे हिन्दू जहन्नम में जाते हैं??" उन्होंने कहा "हाँ"। मैंने पूछा क्यों? उन्होंने कहा "क्योंकि वो अल्लाह को नही मानते, गैर खुदा को पूजते हैं और गैरखुदा को मानना शिर्क कहलाता है। अल्लाह सारे गुनाह माफ़ कर देता है सिवाए शिर्क के"। उस नन्ही सी जान के लिए मुझे खौफ आने लगा मैं मन ही मन दुआ करने लगी की "उसकी कोई गलती नही उसे जहन्नम में ना डालियेगा"। मेरे स्कूल में ज़्यादातर हिन्दू स्टूडेंट्स और टीचर थे उनके जहन्नम में जाने के ख्याल से ही दिल सहम जाता था। कुछ दिन बाद वो टीचर फिर से स्कूल आने लगी। मैं नही चाहती थी की वो जहन्नम में जाएँ इसलिए हिम्मत करके मैंने उनसे कहा "मैम आप अल्लाह को माना करिये भगवान को नही" मैम ने मुझे अपने पास बैठाया और समझाया "बेटा भगवान अल्लाह गॉड सब एक ही होते हैं बस लोग अलग अलग नामों से पुकारते हैं जैसे की एप्पल को सेब भी कहते हैं" उनका जवाब मुझे संतुष्ट नही कर पाया क्योंकि मुझे लगता था कि उन्हें अलग खुदा ने बनाया है और मुझे अलग खुदा ने, जिनको मेरे खुदा ने बनाया है सिर्फ वही जन्नत में जायेंगे बाकी सारे दोज़ख में, भले वो कितने भी अच्छे क्यों न हो.....