Sonu Meena Mandawar
17 hrs ·
कई साल पहले मेरे छोटे भाई ने पूछा कि God है या नहीं ?
मैंने कहा, नहीं है.
मेरे भाई को बहुत सदमा लगा, उसको लगा कि मैंने उससे सबकुछ छीन लिया.. मैंने उससे आख़िरी उम्मीद भी छीन ली थी.
मैं उस दिन समझ गया कि समस्या कितनी गहरी है.
असल में God का नाम लोगों की उम्मीदों से जुड़ा है.. बुरे से बुरे हालात में भी वो सोचते हैं कि God सब ठीक करेगा.. इस उम्मीद को कोई खोना नहीं चाहता..
इस लिये मैं आस्तिक या अन्धविश्वासी लोगों का मज़ाक़ नहीं उड़ाता, बल्कि मुझे उनपे तरस आता है.
वे सोच भी नहीं सकते कि वे कितने बड़े झूठ पे विश्वास कर रहे हैं.
असल दोषी वे संत, बाबे या धार्मिक स्थानों में बैठे लोग हैं, जो सदियों पुराने झूठ का आज भी प्रचार करते हैं,
वे सत्ता और स्वार्थ के लिये लोगों को मूर्ख बनाते हैं.. वे नकली सुख-शान्ति, लालच और डर बेचते हैं..
सदियों से चली आ रही आस्था और विश्वास ने, लोगों के दिमाग़ को विकसित नहीं होने दिया,
वे झूठ और सच में फ़र्क़ नहीं कर पाते,
God के झूठे सहारे ने लोगों के आत्मिक बल को बहुत कमज़ोर कर दिया है.. वे God के बग़ैर जीने की कल्पना भी नहीं कर पाते.
क्या ऐसे लोगों को तरस करके अनदेखा कर देना चाहिये ?
बिल्कुल भी नहीं.. अगर हम बेहतर समाज में जीना चाहते हैं तो उनको जागृत करने की बहुत ज़रूरत है..
अगर लोग धार्मिक हैं, ये उनका निजी मामला नहीं है, ये पब्लिक मैटर बन गया है.. क्योंकि वे समझते हैं कि सिर्फ़ उनका धर्म, उनका God ही सच्चा है, बाकी सब झूठे हैं,
उनको लगता है कि सिर्फ़ उनके धर्म वाले ही इन्सान हैं, बाकी सबसे वे नफ़रत करने लगते हैं.. सिर्फ़ नफ़रत ही नहीं, बल्कि कुछ तो उनको ख़त्म करने की इच्छा भी रखते हैं.
आस्तिक या धार्मिक होने के सैंकड़ों साइड इफेक्ट्स हैं, जिन्हें पूरा समाज और देश भुगत रहा है.. धर्म ख़तरनाक हो रहे हैं, ख़तरे बढ़ रहे है..
सुबह-शाम लाउड स्पीकरों का शोर छोटा मामला है..मसले बहुत बड़े हैं..
कोई धर्म चाहे कितनी भी अच्छी सोच से शुरू हुआ हो, बाद में वो इन्सान की सोच को कुंद या बंद कर देता है..
धर्म की अच्छी बातें सिर्फ़ सुनने-सुनने के लिये रह जाती है, इस तरह एक ढोंगी समाज की रचना होती है..
वर्तमान में मानवता को सबसे बड़ा ख़तरा धर्म से है, लेकिन किसी धर्म पे उंगली उठाओ तो सिर कटने का ख़तरा भी है..
तो क्या किया जाये ?
धर्मों का ढांचा जिस काल्पनिक शक्ति की बुनियाद पे खड़ा है, उस शक्ति का कोई वजूद नहीं है,
हमें बस ये साबित करते रहना है कि उस शक्ति का कोई वजूद नहीं है...
ये बुनियाद हिल जाये तो धीरे-धीरे बेबुनियाद ढांचे भी गिर जायेंगे...
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
मंगलवार, 25 जुलाई 2017
God/ धर्म
रविवार, 23 जुलाई 2017
अधिकार
यदि आपके पास आलौकिक शक्ति को मानने का अधिकार है.
तो मुझे भी अधिकार है कि मैं उस अलौकिक शक्ति पर प्रश्न पूछूं .
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यदि आपको ये कहने का अधिकार है कि मैं नर्क में जाऊँगा.
तो मुझे भी कहने का अधिकार है कि नर्क ऐसी कोई जगह नहीं.
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यदि आपको ये अधिकार है कि आप मेरी बुद्धि सुधार के लिए प्रार्थना करेंगे.
तो मुझे आपको ये बताने का अधिकार है कि प्रार्थना एक कोरी बकवास है.
लड़कियाँ क्या पहनें
लड़कियां, ये न पहने/वो न पहने। कपड़े को लेकर जितनी भी दिक्कतें है केवल पुरुषों को ही होती हैं, जबकि शिकार केवल औरतें होती हैं। क्या किसी औरत ने पुरुष के कपड़े को लेकर कोई ब्यानबजी की है?? लोग अपने घटिया दिमाग पे ताला क्यों नहीं लगा लेते??
*अरे तुम अपना देख लो, लडकियां अपना देख लेंगी। और हाँ कपड़े की आड़ में बलात्कार को सही ठहराना, आपकी ओछी मानसिकता जाहिर करता है और कुछ नहीं
परछाई का सच
ध्वज पर ईश्वर,दीवारों पर संतों की वाणी लिख कर
भीतर खून से सने मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे देखे हैं
परछाई का सच समझा है,धोखों को पहचाना है
चकाचौंध के जाल फेंकते चांद सितारे देखे हैं
. --विजय किशोर'मानव'
स्त्रियों की बदतर जिंदगी
भारतीय समाज की कू-रीतियों ने स्त्रीयों का जितना गला घोटा हैं उतना शायद ही किसी पुरुष ने घोटा होगा। पुरुषो की ऐसी मानसिकता के सबसे बड़े जिम्मेदार हमारे हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं जिसको एक बार किसी पुरुष ने पढ़ लेने के बाद स्वीकार लिया तो उस पुरुष के साथ स्त्री बद्द से भी बद्तर जिंदगी गुजारेंगी।
क्या आपको नहीं लगता अब वो समय आ गया हैं कि हमें सही गलत में फर्क करना सीखना चाहिए अगर हमारे धर्मो में ऐसा कुछ हैं जो स्त्रियों को या किसी भी वर्ग को निचा दिखा रहा हैं तो उनको पूजना बंद कर देना चाहिए। गलती हर किसी से होती हैं हमको यें मानने में जरा भी शर्म नहीं आनी चाहिए की हमारे हिन्दू ग्रन्थ हम को सही दिशा नहीं दे सकते। अब हमको जम कर इन धर्म ग्रंथो का विरोध करना चाहिए जहाँ कही भी स्त्री को मनुष्य न मान कर एक जानवर से भी ज्यादा बद्तर सलूक किया जा रहा हैं तो कही न कही स्त्री को निचा दिखाने की मानसिकता यही से पनपी हैं क्यूँ न इनको जला कर थोडा आत्मा को शांत किया जाए।
जहाँ कही भी स्त्री के स्वतंत्रता की बात आती हैं तो सबसे पहले धर्मो की आड़ ले ली जाती हैं या अपनी छोटी मानसिकता के आधार पर एक बाउंड्री बना दी जाती हैं और बता दिया जाता हैं कितना धीरे हँसना है कैसे कपडे पहनने हैं और किस समय घर आना हैं। आखिर यें बाउंड्री कब तक सिर्फ स्त्री के हिस्से में आएगी। इन बाउंड्री में से किसी भी विचार को अगर पुरुष पर थोप दिया जाएं तो वो एक महीना तो छोडो एक दिन भी बर्दाश नहीं कर पाएंगे। तो हम स्त्रियों पर तो न जाने कब से यें बाउंड्री थोपी हुई हैं।
बर्दाश की हद होती हैं धर्मो को पूजना बंद करो वो तो वैसे भी मौन हैं हम स्त्रियों(इंसान) का क्या जो जिन्दा रह कर भी इतने समय से मौन हैं। — feeling बर्दाश की एक सीमा होती हैं और इस में न जाने कितनी सीमाए(स्त्रियाँ) मर चुकी हैं.
By Komal Bharti Gupta
शनिवार, 22 जुलाई 2017
बेचारे मुर्दे मुस्कराते हैं
धर्म के नाम पर अपने बच्चों का कत्ल
धर्म के नाम पर अपने परिवार का कत्ल
धर्म के नाम पर सधर्मियों का कत्ल
धर्म के नाम दूसरे धर्म के लोगों का कत्ल
धर्म के नाम पर अपने गाँव-शहर वालों का कत्ल
धर्म के नाम पर अपने देशवासियों का कत्ल
धर्म के नाम पर दूसरे देश वालों का कत्ल
धार्मिक लोगों ने हर स्तर पर कत्ल करने के बहाने खोज रखे हैं। सुना है धर्म कभी ख़राब नहीं होता, धार्मिक लोग ख़राब होते हैं। धार्मिक ख़राब होते हैं तो सुधार कौन करेगा? या फिर जनसंख्या बैलेंस करने का ठेका ले रखा है सल्फेटों ने? खुद दस-दस बीस-बीस पैदा करते-करवाते रहते हैं और बैलेंस करने के लिये कटवाते-मरवाते रहते हैं।
धर्म से वर्चस्व को अलग कर के देखिये। बड़ा मज़ा आता है खुद को लाशों के ढेर के बीच में बैठा महसूस कर के। वही लाशें जो कभी दुश्मन थीं। अच्छा लगेगा मुर्दों की महक के बीच साँस लेते हुये.. क्योंकि मुर्दों से पसीने की बदबू नहीं आती। बेचारे मुर्दे सिर्फ मुस्कुराते
मांसाहार मार कर
अगर हमारे किसी कर्म से किसी को पीड़ा होती है, हम उसकी पीड़ा को देख सुन रहे हैं तो निश्चित ही हम असहिष्णु हैं| मार कर खाना...
आधा प्रकाश/ आधा अंधेरा
हम आधा प्रकाश आधा अंधेरा पसंद है|
पूरा प्रकाश? ना बाबा ना..डर लगता है कुछ गड़बड़ न हो जाय|
मंदिर का मतलब होता है ......मानसिक गुलामी का रास्ता ...
स्कूल का मतलब होता है ......जीवन में प्रकाश का रास्ता .....!!
मंदिर की जब घंटी बजती है तो हमें सन्देश देती है की हम धर्म, अन्धविश्वास, पाखंड और मूर्खता की ओर बढ़ रहे.... हैं ....!
जब स्कूल की घंटी बजती है तो ये सन्देश देती हैं ....कि हम तर्कपूर्ण ज्ञान और वैज्ञानिकता की ओर बढ़ रहे हैं ...! अब तय आपको करना हैं की जाना कहाँ हैं ....?
गाय/भैंस में अंतर
गाय और भैंस की उपयोगिता में क्या अंतर है? कृषि, दूध में समानता है| भैंस का मांस नहीं खाते| इसीलिए गाय को माता मानते हैं क्या?
मंदिर मस्जिद बनाम स्कूल
हम आधा प्रकाश आधा अंधेरा पसंद है|
पूरा प्रकाश? ना बाबा ना..डर लगता है कुछ गड़बड़ न हो जाय|
मंदिर का मतलब होता है ......मानसिक गुलामी का रास्ता ...
स्कूल का मतलब होता है ......जीवन में प्रकाश का रास्ता .....!!
मंदिर की जब घंटी बजती है तो हमें सन्देश देती है की हम धर्म, अन्धविश्वास, पाखंड और मूर्खता की ओर बढ़ रहे.... हैं ....!
जब स्कूल की घंटी बजती है तो ये सन्देश देती हैं ....कि हम तर्कपूर्ण ज्ञान और वैज्ञानिकता की ओर बढ़ रहे हैं ...! अब तय आपको करना हैं की जाना कहाँ हैं ....?
काश कोई मजहब न होता
ना मस्जिद आजान देती, ना मंदिर के घंटे बजते
ना अल्ला का शोर होता, ना राम नाम भजते
ना हराम होती, रातों की नींद अपनी
मुर्गा हमें जगाता, सुबह के पांच बजते
ना दीवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता....
…….काश कोई मजहब ना होता....
ना अर्दय देते , ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती , नदिओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती , नदिओं का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती,
ना अवतारों का नाटक होता
ना देशों की सीमा होती ,
ना दिलों का फाटक होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई, बेखबर ना होता
ना ही गीता होती , और ना कुरान होता
ना ही अल्ला होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.
ना मैं हिन्दू होता, ना तू मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।
~~अज्ञात~~ (via - Prem Ranjan)
गुरुवार, 20 जुलाई 2017
ईश्वर ???
Padmamukh Panda _
आस्तिकों और नास्तिकों में ठन गया है
ईश्वर एक विवादित विषय बन गया है
तर्क वितर्क का लंबा दौर जारी है
कभी एक तो कभी दूसरा भारी है
आस्तिकों के लिए ईश्वर जरूरी है
नास्तिकों ने बना रखी दूरी है
ईश्वर है या नहीं यही प्रमुख मसला है
निर्णय हो जाए तो सबका भला है
आस्तिकों के तेवर बहुत ही तीखे हैं
चोट खाए बब्बर शेर के सरीखे हैं
"इतने बड़े ब्रह्मांड को जो चलाता है
वह परम पिता परमेश्वर कहलाता है
चंद्र सूर्य तारे ग्रह जिसके अधीन हैं
बिना ईश्वर के यह सब क्या मुमकिन है
ईश्वर हमारा पिता है जन्मदाता है
वह संसार में यह लीला रचाता है
वह श्रष्टा पालक और मोक्ष दाता है
वही सर्वस्व हमारा भाग्य विधाता है
उसकी पूजा करो आराधना करो
उसे पाने के लिए कठिन साधना करो
ईश्वर की निंदा घोर निंदनीय कार्य है
नास्तिकों!हमें तुम्हारे तर्क अस्वीकार्य हैं
"नास्तिकों का यह कहना है
तुमने तो पाखंड का चोला पहना है
ईश्वर को आज तक किसने देखा है
पंडा पुजारी ने ले लिया ठेका है
ईश्वर महज एक कपोल कल्पना है
जो धर्म के ठेकेदारों के लिए बना है
ईश्वर का कोई अता पता नहीं है
इसे पूजने में कोई बुद्धिमत्ता नहीं है
न वह न्याय का कभी साथ देता है
न वह कोई जिम्मेदारी लेता है
ईश्वर समस्त बुराईयों की जड़ है
इसके नाम से ही सब गड़बड़ है
ब्रह्मांड को ईश्वर ने नहीं बनाया है
ब्रह्मांड स्वयं अस्तित्व में आया है
यह प्रकृति संपूर्ण रूप से शाश्वत है
ऐसा हमारा दृढ़ अभिमत है
हे पाठक आप स्वयं विचार करें
अपना अभिमत तैयार करें
अपनी प्रतिक्रिया प्रेषित करें
स्पष्ट राय जरूर इंगित करें।
विनयावनत
पद्ममुख पंडा महापल्ली
मुस्लिम को किससे खतरा
इस्लाम (मुसलमान) को किससे ख़तरा है ?
क्या ग़रीबी से ?
क्या आशिक्षा से ?
क्या राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी से ?
क्या प्रशासन में उनकी उपेक्षा से ?
पुलिस उत्पीड़न से ?
बढ़ती बहुसंख्यक संप्रदायिकता से ?
नही साहब बिलकुल नही
ख़तरे उससे भी बड़े हैं
सानिया मिर्ज़ा की मिनी स्कर्ट
शमी की पत्नी के फ़ोटो
इरफ़ान की वाइफ़ की नेल पोलिश
रहमान का म्यूज़िक
तसलीमा की क़लम
समझ गए ना आप लोग
या फिर इन्ही मुस्लिम चिंतकों से पूँछेंगे
.......शकील खान
दीर्घ कोण न्यून कोण
कोण दीर्घ और न्यून
पक्का हिन्दू मुसलमानों का दुश्मन,
और कट्टर मुसलमान हिन्दुओ का दुश्मन होता है,
नास्तिक इन दोनों को नहीं पचता,
नास्तिकों को यह दोनों अपना दुश्मन न. 1 जानते हैं.
यहाँ वह फार्मूला नहीं काम करता कि
"दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त"
त्रिभुज में नास्तिक १५० अंश का दीर्घ कोण होता है
यह दोनों धर्मी 15-15 अंश के न्यून कोण होते हैं.
हिन्दू और मुस्लिम दूर दूर खड़े रह कर,
अपनी न्यूनता की संकीर्णता से नास्तिकता की दीर्घता को देखा करते हैं
कि जिस दिन यह पूर्ण हो जाएगा,
उस दिन हमारे वजूद का अंत हो जाएगा.
दुन्या को एक सीधी १८० डिग्री की सड़क मिल जाएगी.
नास्तिकता इन दोनों या सभी धर्मियों का साँझा दुश्मन है.
मैं सदाक़त का मतलाशी हूँ,
सत्य का खोजी हूँ,
हर वक़्त सच को सर पर लादने के लिए तैयार
और धर्म व मज़हब हर सच को अवैध गर्भ के फूले पेट को,
अपने तंग आँचल से ढकने की कोशिश में रहते हैं.
हर धर्म, धर्मियों की छोटी बड़ी दुकानें होती हैं.
वह अपने समर्थक सवारियों पर अपने निर्मूल्य और भावुक विचार लादकर बस्तियों में घुमाया करते हैं.
देवालय इनकी केंद्र होते हैं, जहाँ यह अपने देवों को सजाए
गाहकों का इंतज़ार किया करते हैं.
दुन्या में, खास कर उपमहाद्वीप में धर्म व मज़हब इर्तेका (रचना-काल) के पैरों में बेड़ियाँ डाले हुए हैं. पश्चिम कहाँ से कहाँ पहुँच गया है,
हम अजानों और घंटा घडियालों से लोगों की नीदें हराम किए हुए हैं.
.
हम भारतीय हैं या हिंदू?
स्वामी मैत्रेय श्री श्री > आओ तर्क करें
जापान में रहने वाला जापानी है!
अमेरिका में रहने वाला अमेरिकन है!
कनाडा में रहने वाला कनाडाई है.
यहाँ तक की कथित हिंदू राष्ट्र में रहने वाला भी नेपाली है
पर भारत में रहने वाला हिंदू क्यों है? ?
बुधवार, 19 जुलाई 2017
देवताओं के प्रकार
कोई बताएंगे?..
भगवानों के प्रकार
देवी देवताओं के प्रकार
देवियों के प्रकार
देवताओं के प्रकार
राक्षसों के प्रकार
मनुष्यों के प्रकार
गाय के प्रकार
बैल के प्रकार
........
..... ....
पाप धोने के सहज सरल उपाय
भ्रष्टाचार पाप धोने के सहज सरल उपाय हैं हमारे धर्म में| चिंता की कोई बात नहीं|
मंगलवार, 18 जुलाई 2017
नवजात शिशु
नवजात शिशु का दिमाग एक रिक्त स्थान होता है । पैदा होने के बाद वह स्वयं उसमें कुछ नहीं भर सकता । लेकिन जिस धर्म या मजहब वाले के यहां वह पैदा होता है , वही धर्म उसके मासूम दिमाग में भर दिया जाता है ।
मैं भगवान और खुदा को तब मानूं जब मुसलमान का बच्चा पैदा होते ही "अल्लाह हू अकबर " बोले ,और हिंदू का बच्चा "जय श्री राम"
शुभ/अशुभ
मैं समझता हूँ भारतीय इन्हीं के कारण पीछे रह गए की जब सारा दिमाग इसी में खर्च हो जाएगा की गुरुवार को नाख़ून नहीं काटने, अमावस्या को चावल नहीं बनाने, रविवार को तुलसी में पानी नहीं डालना, शनिवार को मूर्ति पर तेल चढ़ाना है, सोमवार को बेलपत्र तोड़ने हैं, मंगल को व्रत रखना है, बुध को घास गणेशजी को चढ़ानी है, बिल्ली रास्ता काटे तो अशुभ मानना है, छींक आए तो 5 मिनट रुकना है, 12 बजे घर से बाहर नहीं निकलना है।
तो घण्टा कोई ज्ञान हासिल करने या नया अविष्कार करने में अपना दिमाग लगा पाएगा। यह सब मनुष्य की उन्नति में बाधक है
Saurabh Varshney
सोमवार, 17 जुलाई 2017
प्रेम
Sonu Meena Mandawar
कितनी अजीब बात है , जब भागवत में बैठकर पंडा कहता है-
" प्रभु प्रेम के भूखे थे , हैं , पर्भु ने प्रेम किया. Etc...."
तब तो भक्त वाह वाह करते हैं...!!
और हम इसकी चर्चा भी करते हैं , तो लोग हमारी मानसिकता पर भी सवाल उठाते हैं..
इस शब्द को निंदा के साथ देखा जा रहा है..!
जबकि ये तो सोशल मिडिया के बुद्दिजीवियों का नमूना है,,
जब आप सोशल मिडिया पर इस विषय पर चर्चा नही कर सकते हैं , तो अपने बच्चों और युवाओ को इस विषय में कैसे गाइड करोगे ,, वो इसे बेहद गन्दा विषय समझेंगे...!!
- फिर वे इस विषय पर आपसे हमसे खुलकर बात क्यों करेंगे..??
जैसे ही वे मुँह खोलेंगे तुम उन पर टूट पड़ोगे....!!
फिर वे आपसे सलाह मशवरा क्यों करेंगे..??
- सीधा अवैध सम्बन्ध जोड़ेंगे और लास्ट में ट्रेन के निचे...!!
- युवाओ को बदलने से पहले बुद्दिजीवियों को अपनी स्वयँ की इस विषय में सोच बदलने की जरूरत हैं....!!
रविवार, 16 जुलाई 2017
नफरत के बीज
ईश्वर अल्लाह
मेरे किसी भी पोस्ट पर -
जहाँ मैं 'ईश्वर' शब्द लिखूँ उसे मुस्लिम लोग 'अल्लाह' पढ़े।
जहाँ मैं 'अल्लाह' लिखूँ उसे हिन्दू लोग 'ईश्वर यानि भगवान' पढ़ें।
जहाँ भी मैं मंदिर लिखूँ, मुस्लिम लोग उसे मस्जिद पढ़ें।
और जहाँ भी मैं मस्जिद लिखूँ उसे हिन्दू लोग मंदिर पढ़ें।
जहाँ भी मैं मौलवी लिखूँ उसे हिन्दू होग पुरोहित पढ़ें।
और जहाँ भी मैं पुरोहित लिखूँ उसे मुस्लिम भाई मौलवी पढ़ें।
इसी तरह अन्य सभी धर्म मे लोग मेरे लिखे पोस्ट को अपने ही धर्म से जोड़ कर पढ़ें। उसे दूसरे धर्म की आलोचना न समझें।
इस मूर्खता मे लिय आप से माफी मांगता हूँ ।
भीड़ के सहारे वतन साथियो
#थप्पड़_इमाम_को_नहीं_देश_के_प्रधानमंत्री_के_मुंह_पर_मारा_गया_है’
👇
इस देश में मस्जिद के बाहर उस मस्जिद के आसपास रहने वाले जाने पहचाने चेहरे जमा होते हैं। नारा लगता है। भारत माता की जय। वंदे मातरम। मस्जिद के अंदर अफरातफरी मचती है। इमाम गेट पर आते हैं। नारा लगाने वाला समूह उन्हें गेट की चौखट से नीचे खींच लेता है। इमाम झुंड के घेरे में हैं। झुंड उनसे कह रही है,’बोल भारत माता की जय’ बोल जल्दी ‘वंदे मातरम’ ‘गद्दार’ ‘मार साले को।’ इमाम के चेहरे पर भय पसर जाता है। वह दोनों हाथों से झुंड को समझाने का प्रयास करते हैं, कुछ कहने को होते हैं तभी एक थप्पड़ उनके चेहरे पर पड़ता है। सब कुछ दस- बारह सेकंड में हो गया।
इमाम पीट दिए जाते हैं। इमाम का अर्थ होता है नेतृत्वकर्ता। नमाज़ पढ़ाने वाला। इमाम के मुंह से वंदेमातरम निकलवाना होता तो भीड़ थोड़ा इंतज़ार करती। दस सेकंड से भी कम टाइम में थप्पड़ मार देना बताता है कि वे लोग उन्हें पीटने आए थे। मीडिया थी वहां। कैमरे चमक रहे थे। वीडियो बन गया। मन तृप्त हुआ। आत्मा की तृष्णा शांत हुई। नफरत के वटवृक्ष की शाखें पहले से कहीं अधिक बलवान हो गईं। हरियाणा के हिसार से वीडियो चला और देश भर में फैल गया। लोग कहने लगे बहुत अच्छा। गद्दारों का यही हश्र होना चाहिए।
मुझे भी दिखा। साथ मे मेरे दोस्त थे Uday Raj, Arun Tiwari,Rajeev Naithani,anjodh Ranjodh Singh Pandher, Rohit Singh , Gopal Kant मैंने उनसे से कहा कि तुम लोगो ने देखा ? उन्होनो बताया कि रात में ही देख लिया था। वो हिल गये थे भीतर तक। जबकी बो हिंदू है। मैंने सोचा आखिर ये लोग क्यों डर गया। इमाम को मारने वाले तो हिंदू थे न। ये लोग भी हिंदू है। इस हिसाब से तो इनको को खुश होना चाहिए कि उसके ही मज़हब वाले एक मुसलमान को पीट रहे हैं। फिर इनको हिंदुओं के हाथों इमाम के पीटे जाने से दुख क्यों हुआ।
फिर हिसाब लगाने लगा कि अमरनाथ जत्थे पर हमले के बाद देश का ऐसा कौन सा मुसलमान है जिसे खुशी हो रही। मेरे जानने में ऐसा कोई नहीं दिखा। मैंने Kafeel Ahmad WaQar, Mannan Rayeen Chishti, tovseef Touseef Pasha, Mohd Arif Shaikh,Mohammed Fazal, Golden N को फोन किया और पूछा कि तुम्हारे मज़हब के मानने वालों ने अमरनाथ जा रहे हिंदुओं पर गोलियां बरसाईं और क़त्ल कर दिया, मन को शांति मिल गई ? उन सबने कहा कि सरफराज आप पागल हो गए हैं क्या? ये कैसा बेहुदा सवाल है।
अब मैं और परेशान हो गया कि मेरे हिन्दु दोस्तो को इमाम की पिटाई से गहरा धक्का लगा है तो दूसरी तरफ मेरे मुसलमान दोस्तों को अमरनाथ जत्थे पर हुए हमले का अफसोस है। फिर हरियाणा के बजरंग दल के नेता और उसके पीछे वाली भीड़ ने मस्जिद से इमाम को निकाल कर सिर्फ इसलिए क्यों पीटा कि हमला करने वाले पाकिस्तानी मुसलमान हैं और इमाम भी मुसलमान हैं। क्या हरियाणा के मुसलमान कश्मीर गए थे हमला करने? मनोहर लाल खट्टर जी, क्या आपके राज्य में रहने वाले हिसार के मस्जिद के इमाम हमले में शामिल थे? नहीं। फिर क्यों थप्पड़ मार दिया।
प्रधानमंत्री जी आपने कहा था कि देश का मुसलमान मुझसे आधी रात में भी संपर्क कर सकता है। मैं आधी रात को भी मुसलमानों की सेवा में हाजिर रहूंगा। सेवन आरसीआर के दरवाज़े हमेशा खुले हैं। हिसार में इमाम के मुंह पर थप्पड़ नहीं मारा गया बल्कि देश के प्रधानमंत्री की अंतरात्मा पर बजरंगियों ने थूका है। बजरंगियों ने बता दिया कि नरेंद्र मोदी से हम नहीं डरते। देश के कानून, नीति निर्माताओं की बातों का हमपे कुछ फर्क़ नहीं पड़ता।
बजरंगियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुसलमानों की सेवा-सुरक्षा पर दिए गए बयान का न सिर्फ मज़ाक बनाया है बल्कि उन्होंने यह भी बता दिया है कि देश में बजरंग दल के झुंड से बढ़ कर कुछ नहीं। इमाम का तो सिर्फ चेहरा था, जिस पर चोट पहुंची है इधर तो पूरा का पूरा जमीर है जो पल भर में नेस्तानाबूत कर दिया गया। अब कभी किसी प्रधानमंत्री की औकात नहीं होगी कि वह इस तरह के झुंड के विरूद्ध जा सके।
अब देश में क्या होगा वह ऐसी ही भीड़ तय करेगी क्योंकि जो इस भीड़ से अलग हैं और बड़ी तादाद में हैं उन्होंने चुप्पी साधी हुई है। क्योंकि जिनके हाथ में कानूनी बेंत है वे इसे होने दे रहे हैं। क्योंकि जिनके हाथ में धर्म की बागडोर हैं वे अपनी गद्दियों पर आराम फरमा रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी कहीं किसी कोने में बैठे बैठे यह गा रहे होंगे, ऐसा मुझे लगता है।
कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों,
अब इस भीड़ के हवाले वतन साथियों।

