मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

हम ओ बी सी राक्षस कुल के हैं

हम भारत के ओ बी सी (अन्य पीछड़ी जाति ) राक्षस कुल के हें । (हम खुद को क्षत्रिय या वैश्य मान लें तो वह सही नहीं हो जाता। अपने पुरोहित से पूछ लें हमारा कुल क्या है? ) । हम विदेशी आर्य नहीं हैं।  आर्यों के चारों वर्णों में से किसी में भी नहीं|
अपनों से क्षमा याचना के साथ।
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हमारे देश के मूल निवासी हैं जंगलों में रहने वाले वानर, भील, बिरहोर, कोरवा, उरांव  ..... आदिवासी और मैदानी इलाके में रहने वाले राज करने वाले राक्षस । बाद में बाहर से आर्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) आए। सेवा के लिए कुछ दास साथ में लेकर लेकर आए थे जिन्हें वे शुद्र कहते थे।
 आदिवासी और राक्षस बलशाली थे लेकिन चालाक नहीं थे। आदिवासी भोले थे। राक्षस उनसे ज्यादा बुद्धिमान थे।  आर्य बुद्धिमान और चालाक थे । आर्यों के पास उन्नत अश्त्र शस्त्र थे।
   क्षत्रिय ब्राह्मणों के दिमाग के सहयोग से इस देश के राक्षस राजाओं को येन केन प्रकारेण, साम दाम दंड भेद से जीतकर कर राजा बन गए। राज्य का नाम रखा आर्यावर्त ।
शिव शंकर, रावण सभी राक्षस कुल के थे जिनकी संस्कृति "वयं रक्षामः" थी| रक्ष संस्कृति । याने सबकी रक्षा करेंगे, अपने राक्षस कुल के अलावा जंगलों में रहने वाले मनुष्य और प्राणियों की भी।| यः रक्षति सः राक्षसः| 
शंकर जी को हराना उनके लिए संभव नहीं था इसलिए उन्हें देवों के देव महादेव का सम्मान देकर (मस्का लगाकर) खुश कर लिए| शंकर जी भोले थे। उनकी चालाकी नहीं समझ सके । वे अब आर्यों के मित्र हो गए।
आर्य स्वयं को देवता, सुर कहते थे। राक्षसों को दानव और असुर कहते थे। सुरा पान करने वाले सुर (आर्य) सूरा पान नहीं करने वाले राक्षसों को असुर कहते थे। आर्य यज्ञ हवन में प्राणियों की बलि देते थे जिसका वयं रक्षामः अर्थात रक्ष संस्कृति वाले राक्षस विरोध करते थे। आर्य शुद्रों आदिवासी,  राक्षसों का तिरस्कार करते थे। उन्हें हीन मानते थे। 
बुद्धि के धनी ब्राह्मण सिर्फ क्षत्रिय तथा वैश्य के घर में पूजा पाठ यज्ञ हवन कर कमाई करते थे। वे अछूत शुद्रों के घर नहीं जाते थे। बाद में चालाक ब्राह्मण अधिक कमाई के लिए बहुजन राक्षसों के घर भी जाने लगे। उनके घर में भी पूजा पाठ यज्ञ हवन करने लगे ।
आर्य शुद्रों को अछूत मानते थे। उन्हें हीन नीच मानते थे| अब राक्षस कुल के लोग भी जंगल में रहने वाले आदिवासियों और शुद्रों को नीच हीन मानकर उनका तिरष्कार करते हैं  स्वयं को आर्यों की भांति श्रेष्ठ मानते हैं| याने हम महान ||.

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