शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

पृथ्वी

Shayad kokas Durg_

🔷तो आखिर हमारी पृथ्वी कैसे बनी ?🔷

▪आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे  होने  पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये  जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । इस तरह हमारी पृथ्वी और अन्य ग्रहों का जन्म हुआ ।

▪यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह ग्रह  आकर्षण के कारण एक दूसरे के करीब आने के बावज़ूद टकराते क्यों नहीं ? इसका उत्तर यह है कि गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में रहकर सूर्य का चक्कर लगाते हैं । हर ग्रह की वक्रता की एक निर्धारित गति होती है जो उसके जन्म सें निर्धारित हो चुकी होती है और वही बनी रहती है । सब ग्रहों की वक्रता की गति अलग-अलग होती है लेकिन सब एक ही तल पर होते हैं इसलिए एक दूसरे से नहीं टकराते और अपनी अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं ।

▪वक्रता की गति से प्राप्त बल उन्हें सूर्य से दूर करता है जबकि गुरुत्वाकर्षण ग्रहों को सूर्य की ओर खींचता है।
इन दोनों के बीच संतुलन की वजह से ही ग्रह सूर्य से टकराकर नष्ट नहीं होते बल्कि चारों ओर घूमते रहते हैं ।
यही हाल उन उपग्रहों का भी है वे भी अपने जनक गृह का ऐसे ही चक्कर लगाते हैं और कम अधिक गुरुत्वाकर्षण के बावजूद एक सन्तुलन बनाकर घूमते रहते हैं । चन्द्रमा पृथ्वी के इर्दगिर्द घूमता है और पृथ्वी सूर्य के इर्द गिर्द घुमती है ।
अब घूम फिर कर फिर वही बात सामने आ जाती है कि इन शक्तियों के पीछे कौन हैं ? सीधी सी बात है , इन शक्तियों के पीछे इनकी अपनी सत्ता है और किसी ईश्वरीय सत्य की कल्पना सिर्फ मनुष्य के मानस की उपज है ।

▪तात्पर्य यह कि हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव हम पर होता है लेकिन इसका हमारी कुंडली में इस ग्रह  का कोई स्थान नहीं है । भूकंप आने पर पृथ्वी हिलती है हमारा सब कुछ बरबाद हो जाता है लेकिन प्रभाव उस शनि का बताया जाता है जो हमसे लाखों किलोमीटर दूर है । हम यह भूल जाते हैं कि ज्योतिषियों द्वारा प्रदत्त यह ज्ञान उस ज़माने का है जब विज्ञान ऐसी गणनाएं करने में असमर्थ था । आज हमारे पास सिर्फ कल्पनाएँ नहीं हैं बल्कि प्रयोगों के आधार पर स्थापित विज्ञान के ठोस सिद्धांत हैं । बहरहाल इतनी कल्पना तो हम कर ही सकते हैं कि वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई , हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।

▪इस प्रकार यह पृथ्वी जन्म लेने के पश्चात प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार की गैस से मिलकर बना एक विशालकाय पिंड थी जो अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही थी । ताप के विकीरण के फलस्वरूप यह पिंड ठंडा हुआ ,द्रव्य व गैसों का शीतलीकरण हुआ तथा तरलीय व अर्धसान्द्रीय अवस्थाओं से होता हुआ वर्तमान अवस्था तक पहुंचा। बाहरी तल से घनीकरण प्रारम्भ हुआ,उपरी सतह पर पपड़ी जमी जो भीतर की ओर मोटी होती गई।  गर्भ भाग में सिकुड़ना प्रारंभ हुआ, पपड़ी में झुर्रियाँ व दरारें पड़ीं फलस्वरूप हिमालय जैसे पर्वत और नदियाँ बनीं । यह सब घटित होने में कई करोड़ साल लगे । 

▪दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाइये चलिए अपने घर में ठंडे होते हुए दूध पर मलाई जमते हुए देखिए और इस पर विचार कीजिए । ठंडी होती हुई पृथ्वी पर समुद्र , पहाड़ , नदियाँ , झीलें , चट्टानें ऐसे ही बनी होंगी ।

▪और किराये की बात भी भूल जाईये यह तो एक बहुत बड़ा बाड़ा है जो जितना पुराना किरायेदार उसका उतना हक़ । वही किरायेदार वही मकान मालिक, जैसे अफ्रिका जैसे बड़े देश और हमारे जैसे छोटे , या फिर अमेरिका जैसे नए किरायेदार जिन्होंने अपनी चालाकी से मकान पर ही कब्ज़ा कर लिया । फिर हर देश में  भी कुछ बड़े बड़े धन्ना सेठ और ढेरों हमारे जैसे फुटपाथिये । इस धरती पर रहने की कीमत न वो देते है न हम । अपने बड़े बड़े उद्योगों से प्रदूषण फैलाकर पृथ्वी का सबसे ज्यादा नुकसान वे करते हैं और इलज़ाम हमारे सर पर कि हम   प्रदूषण फैलाते हैं ,जंगल काटते हैं, ज़मीन से पानी चूस लेते हैं और नुकसान करते हैं इस पृथ्वी का ।

▪मुम्बई की चालें देखी हैं ना , जब तक धराशायी नहीं होती लोग खाली ही नहीं करते ,फिर कई लोग दब कर मर भी जाते हैं  । हालाँकि उनके रहने के लिए और कहीं ठिकाना भी तो नहीं होता सो जाएँ तो जाएँ कहाँ  । पीढियां बीत जाती हैं उनकी फुटपाथों पर । यह लोग भी  धीरे धीरे पृथ्वी को उसी विनाश की ओर ले जा रहे हैं जहाँ न ये पृथ्वी रहेगी न हम । आप कहेंगे हमें क्या ? हमारी आनेवाली पीढ़ीयाँ जानें । हम तो चैन से रह ही लेंगे अपने जीते जी ।

▪लेकिन ऐसा नहीं है भाई.. आधी रात को जब यह पृथ्वी हिलती है तब समझ में आता है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो है , या फिर बाढ़ का पानी जब देहरी छूने लगता है और खेतों में फसलों को बर्बाद कर देता है तब लगता है कि  ऐसा सोचना सही नहीं है । या फिर भोपाल गैस कांड की तरह आधी रात को उठकर भागना पड़ता है तो  पता चलता है कि मल्टी नॅशनल्स की गलतियों का खामियाज़ा हमें भुगतना पड़  रहा है ।

▪हालाँकि यह इतना आसान नहीं है , इसके पीछे एक षडयंत्र भी है जो विकास के नाम पर विश्व की पूंजीपति सरकारें कर रही हैं , बांधों की जरुरत से ज्यादा ऊंचाई , जंगल और जमीन पर मल्टी नेशनल कंपनियों को कारखाने के लिए लाइसेंस , नदियों का जल बेचने की अनुमति , ज़मीन से जल का दोहन  विकास के नाम पर आपके खेतों का अधिग्रहण ।

▪यह पृथ्वी न उनकी है न हमारी लेकिन इसके नष्ट होते जाने का दोष सिर्फ हम पर क्यों ? सोचा है कभी ?

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