रविवार, 1 अक्टूबर 2017

राष्ट्र पिता

सरकारी आदेश से गांधी जी को राष्ट्र पिता नहीं कहा जाता । अपनी मर्जी से लोग कहते हैं । जो कहना नहीं चाहते वे न कहें । नेता जी,  महात्मा,  लौह पुरुष, कोकिला,  गुरू,  चाचा,  वीर,  ... कहने के लिए भी कोई नियम कानून नहीं बनाए गए हैं।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास

Ram Kumar
राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ का इतिहास
हस करते रहते हैं और संघ के काले को सफेद करते रहते हैं ।
कुछ दिन से हर टीवी डिबेट में यह बता रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक कोई आज का पैदा नहीं है बल्कि 1925 का जन्म लिया अनुभवी संगठन है । सोचा संघ के 90 वर्ष के जीवन का पोस्टमार्टम किया जाए ।
1925 कहने का तात्पर्य सिन्हा जी या अन्य संघ के विद्वानों का इसलिए है कि उसी समय इनके एक योद्धा "सावरकर" ने एक संगठन बनाया था जिसका संघ से कोई लेना देना नहीं था सिवाय इसके कि संघ को सावरकर से जहर फैलाने का सूत्र मिला । सावरकर पहले कांग्रेस में थे परन्तु आजादी की लड़ाई में अंग्रेज़ो ने पकड़ कर इनको "आजीवन कैद" की सज़ा दी और इनको "कालापानी" भेजा गया जो आज पोर्ट ब्लेयर( काला पानी) के नाम से जाना जाता है ।संघ के लोगों से अब "वीर" का खिताब पाए सावरकर कुछ वर्षों में ही अंग्रेज़ों के सामने गिड़गिड़ाने लगे और अंग्रेजों से माफी मांग कर अंग्रेजों की इस शर्त पर रिहा हुए कि स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहेंगे और अग्रेजी हुकूमत की वफादारी अदा करते उन्होंने कहा कि " हिन्दुओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की बजाए अपनी शक्ति देश के अंदर मुसलमानों और इसाईयों से लड़ने के लिए लगानी चाहिए" ध्यान दीजिये कि तब पूरे देश का हिन्दू मुस्लिम सिख एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के लिए मर रहा था शहीद हो रहा था और तब ना कोई यह सोच रहा था कि हिन्दू मुस्लिम अलग भी हो सकते हैं , तब यह "वीर" देश में आग लगाने की बीज बो रहे थे , जेल से सशर्त रिहा हुए यह वीर देश की आपसी एकता के विरूद्ध तमाम किताबों को लिख कर सावरकर ने अंग्रेजों को दिये 6 माफीनामे की कीमत चुकाई देश के साथ गद्दारी की और आजाद भारत में नफरत फैलाने की बीज बोते रहे ।
1947 में देश आजाद हुआ और देश की स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का फैसला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लिया तो इसी विचार के लोग इसके विरोध में और अंग्रेजों को वफादारी दिखाते राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को जला रहे थे और पैरों से कुचल रहे थे और मौका मिलते ही देश के विभाजन के समय हिन्दू - मुस्लिम दंगों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और मौका मिलते ही देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी क्युँकि सावरकर हेडगेवार की यह सोच थी कि इस देश में "गाँधी" के रहते उनके उद्देश्य पूरे नहीं होंगे। संघ के जन्मदाता हेडगेवार और गोवलकर ने गाँधी जी की हत्या करने के बाद (सरदार पटेल ने स्वीकार किया ) अपने विष फैलाने की योजना में लग गये , तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र के निर्माण में लग गये और संघ के लोग भविष्य के भारत को ज़हर से भरने के औज़ार बनाने लगे , नेहरू पटेल को उदारवादी कहिए या उनकी मूक सहमति , संघ को पैदा होते ही उसके देश विरोधी क्रिया
कलाप देख कर भी आंखें मूंदे रहे ।इस बीच संघ ने देश की एकता को तोड़ने के सारे वह साहित्यिक हथियार पुस्तकों के रूप में बना लिए जिससे हिन्दू भाईयों की धार्मिक भावना भड़के जिसका मुख्य आधार मुसलमानों से कटुता और मुगलों के झूठे आत्याचार थे , न्यायिक प्रक्रिया में दंड पाए लोगों को भी हिन्दू के उपर किया अत्याचार किया दिखाया गया , शासकीय आदेशों को तोड़ मरोड़कर हिन्दू भाईयों पर हुए अत्याचार की तरह दिखाया गया तथा इतिहास को तोड़ मरोड़कर मुगल शासकों को अत्याचारी बताया कि हिन्दुओं पर ऐसे ऐसे अत्याचार हुआ और औरंगज़ेब को उस अत्याचार का प्रतीक बनाया गया , एक से एक भड़काने वाली कहानियाँ गढ़ी गईं और इसी आधार पर संघी साहित्य लिखा गया पर जिस झूठ को सबसे अधिक फैलाया गया वो था कि " औरंगज़ेब जब तक 1•5 मन जनेऊ रोज तौल नहीं लेता था भोजन नहीं करता था" अब सोचिएगा जरा कि एक ग्राम का जनेऊ 1•5 मन (60 किलो) कितने लोगों को मारकर आएगा ? 60 हजार हिन्दू प्रतिदिन , दो करोड़ 19 लाख हिन्दू प्रति वर्ष और औरंगज़ेब ने 50 वर्ष देश पर शासन किया तो उस हिसाब से 120 करोड़ हिन्दुओं को मारा बताया गया जो आज भारत की कुल आबादी है और तब की आबादी से 100 गुणा अधिक है ।पर ज़हर सोचने समझने की शक्ति समाप्त कर देती है तो भोले भाले हिन्दू भाई विश्वास करते चले गए ।इन सब हथियारों को तैयार करके संघ अपनी शाखाओं का विस्तार करता रहा और हेडगेवार और गोवलकर एक से एक ब्राह्मणवादी ज़हरीली किताबें लिखते रहे प्रचारित प्रसारित करते रहे जिनका आधार "मनुस्मृति" थी और गोवलकर की पुस्तक "बंच आफ थाट" संघ के लिए गीता बाईबल और कुरान के समकक्ष थी और आज भी है।नेहरू के काल में ही अयोध्या के एक मस्जिद में चोरी से रामलला की मुर्ति रखवा दी गई और उसे बाबर से जोड़ दिया गया जबकि बाबर कभी अयोध्या गये ही नहीं बल्कि वह मस्जिद अयोध्या की आबादी से कई किलोमीटर दूर बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाई थी , ध्यान रहे कि उसके पहले बाबरी मस्जिद कभी विवादित नहीं रही परन्तु नेहरू आंख बंद किये रहे ।नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का समयकाल प्रारंभ हुआ और सख्त मिजाज इंदिरा गांधी के सामने यह अपने फन को छुपाकर लुक छिप कर अपने मिशन में लगे रहे और कुछ और झूठी कहानियाँ गढ़ी और अपना लक्ष्य निर्धारित किया जो "गोमांस , धारा 370 , समान आचार संहिता , श्रीराम , श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर , स्वदेशीकरण थे । इंदिरा गांधी ने आपातकाल में जब सभी को जेल में ठूस दिया तो संघ के प्रमुख बाला साहब देवरस , इंदिरा गांधी से माफी मांग कर छूटे और सभी कार्यक्रम छुपकर करते रहे पर इनको फन फैलाने का अवसर मिला इंदिरा गांधी की हत्या के बाद , तमाम साक्ष्य उपलब्ध हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में संघ के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था ।राजीव गांधी बेहद सरल और कोमल स्वभाव के थे और उतने ही विनम्र , जिसे भाँप कर संघियों ने अपना फन निकालना प्रारंभ किया और हिन्दू भाईयों की भावनाओं का प्रयोग करके श्रीराम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद को हवा दे दी और आंदोलन चला दिया , पर पहले नरम अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटे के रूप में आगे किया जिसकी स्विकरोक्ती गोविंदाचार्य ने भी अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटा कह कर की , संघ का दोगलापन उजागर करने की कीमत उनको संघ से बाहर करके की गई और वह आजतक बाहर ही हैं । दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी तमाम तैयार हथियारों के सहारे हिन्दू भाईयों को उत्तेजित करते रहे जैसे आज योगी साध्वी और तोगड़िया करते हैं ।राजीव गांधी के पास संसद में इतनी शक्ति थी कि संघ को कुचल देते तो यह देश के लिए सदैव समाप्त हो जाते परन्तु सीधे साधे राजीव गांधी कुटिल दोस्तों की बातों को मानकर गलत ढुलमुल फैसलों से संघ को खाद पानी देते रहे , कारसेवा और शिलान्यास के नाम पर राजीव गांधी का इस तरह प्रयोग किया गया कि संघ को फायदा हो और संघ की रखैल भाजपा ने उसका खूब फायदा उठाया और दो सीट से 88 सीट जीत गई ।फिर वीपी सिंह की सरकार बनी भाजपा और वाम मोर्चा के समर्थन से तथा संघी जगमोहन को भेजकर काश्मीर में आग लगा दिया गया ।
अब सब हथियार और ज़मीन तैयार हो चुकी थी और प्रधानमंत्री नरसिंह राव का समय काल प्रारंभ हुआ जो खुद संघ के प्रति उदार थे , उड़ीसा में पादरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जलाकर मारने के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद संघ ने इसाईयों के प्रति नफरत फैलाने की नीति छोड़कर सारी शक्तियों को देश के मुसलमानों से नफरत फैलाने में लगा दिया , संघ ने प्रधानमंत्री राव की चुप्पी का फायदा उठाया अपने बनाए झूठे हथियारों से हिन्दू भाईयों के एक वर्ग की भावनाएँ भड़काई और अपने साथ जोड़ लिया । साजिश की संसद और उच्चतम न्यायालय को धोखा दिया और अपने लम्पटों के माध्यम से बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर को गिरा दी ।
इसके बाद अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो सारे जन्म स्थान के मंदिर 370 स्वदेशीकरण सब दफन कर दिया गया और हर छोटे बड़े दंगों में शामिल रहा संघ ने साजिश करके गुजरात में इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार कराया और अपने चरित्र के अनुसार एक नायक बनाया। फिर अपने असली रूप चरित्र और सिद्धांतों के अनुसार उसी असली नायक नरेंद्र मोदी को आगे किया और झूठ और फेकमफाक के आधार पर और आज सत्ता पर कब्जा किया।
संघ की यह सब राजनीति उत्तर भारत के प्रदेशों के लिए थी क्युँकि मुगलों का शासन अधिकतर उत्तर भारत में ही था। दक्षिण के राज्य इस जहर से अछूते थे इसलिए अब वहाँ भी एक मुसलमान शासक को ढूढ लिया गया और देश की आजादी से आजतक 67 वर्षों तक निर्विवाद रूप से सभी भारतीयों के हृदय में सम्मान पा रहे महान देशभक्त टीपू सुल्तान आज उसी प्रकिया से गुजर रहे हैं जिससे पिछले सभी मुगल बादशाह गुजर चुके हैं , मतलब हिन्दुओं के नरसंहारक बनाने की प्रक्रिया।और आज उनकी जयंती पर हुए विरोध में एक यूवक की हत्या भी कर दी गई।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो जुल्मों और लूट का जो इतिहास प्रमाणित रूप से दुनिया के सामने हैं यह उसकी निंदा भी नहीं करते , इस देश को सबसे अधिक लूटने वाले अंग्रेजों की ये कभी आलोचना नहीं करते जो देश की शान "कोहिनूर" तक लूट ले गये , जनरल डायर की आलोचना और जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए इनके आँसू कभी नहीं गिरते , आज संघ के पास शस्त्र सहित कार्यकर्ताओं की फौज है जो शहरों में दहशत फैलाने के लिए सेना की तरह फ्लैगमार्च करते हैं , संविधान की किस धारा के अनुसार उन्हे यह अधिकार है यह पता नहीं । भारतीय इतिहास में जुल्म जो हुआ वह अंग्रेज़ों ने किया और उससे भी अधिक सदियों से सवर्णों ने किया दलितों और पिछड़ों पर , जब चाहा जिसे चाहा सरेआम नंगा कर दिया जो इन्हे दिखाई नहीं देता क्योंकि इनको जुल्मों से मतलब नहीं आपस में लड़ाकर देश मे जहर फैलाकर सत्ता पाने से है और उसके लिए देश टूट भी जाए तो इनसे मतलब नहीं।
इसी लिये कहता हूँ साजिशें करने मे माहिर संघ को "संघमुक्त भारत" करके ही इस देश का भला हो सकता है और यह समय इस अभियान के लिए सबसे उपयुक्त है। jai bhim jai bharat ramkumar Singh.

मृत्यु का जश्न

कहते हैं की रावण और महिषासुर अनार्य थे याने दानव/ राक्षस/ असुर/ थे.
आश्चर्य है उनकी मृत्यु का जश्न मना रहे हैं अनार्य याने शुद्र और राक्षस कुल के लोग भी.
शायद उन्हें पता नहीं है वे किस कुल के हैं? जानने के लिए अपने अपने पुरोहित से पूछना चाहिए. उनके परिवार के किसी शादी क समय मंत्रोच्चार करते हैं तब बताते हैं - "दास कुलस्य/ राक्षस कुलस्य"
ज्ञातव्य है कि ब्राह्मण, क्षत्रीय, और वैश्य के अलावा सभी अनार्य हैं याने शुद्र और राक्षस. इनमें भारत के मूल निवासी भी हैं.मनु स्मृति अनुसार ब्राह्मणों को शर्मा, क्षत्रिय को सिंह , वैश्य को गुप्त और शुद्र को दास लिखना चाहिए.


शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

मोक्ष या जन्नत नहीं मिलने वाला


किसी भी धार्मिक ग्रन्थ को पढ़ कर सोच विचार करना चाहिए। जन्नत या मोक्ष पाने के लिए पढने से कुछ नहीं मिलेगा।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ऊपर वाले की_मर्जी

सभी धर्म चीख चीख कर रहे हैं कि जो भी होता है वह ईश्वर, अल्लाह या गॉड की मर्जी से होता है। सब कुछ खुदा, भगवान या गॉड द्वारा पूर्व निर्धारित होता है। इसे भविष्य का सब कुछ ज्ञात है। उसकी मर्जी बिना पत्ते के भी हिलने की औकात नहीं।
लेकिन फिर भी विभिन्न धार्मिक स्थलों, धार्मिक आयोजनों एवं धार्मिक लोगों की रक्षा करने में वह अपने आपको असहाय महसूस करता। इन सब पर वह अपनी शैतानित क्यों करता है? कोई भी धर्म इसका सही सही जवाब नहीं दे पाता। इसकी इस तरह की हरकतों से तो यही लगता है कि शैतान ही खुदा है। देखिये उसकी शैतानियतः-
जो ईसा मसीह उसके संदेश को जन जन तक पहुँचा रहा था उसीको लोगों ने (उसकी मर्जी से) सूली में चढ़ा दिया और वह (काल्पनिक खुदा, भगवान या गॉड) खामोशी से तमाशा देखता रहा। जो होता है उसकी मर्जी से होता है
प्रसिद्ध फिल्म डायरेक्टर एवं प्रसिद्ध म्यूजिक कम्पनी के मालिक ‘गुलशन कुमार’ जिनका सारा जीवन दुर्गा मां को समर्पित था। मन्दिर से पूजा करने के पश्चात बाहर आते समय दुष्टों की गोली का निशाना बन गये और मौत हो गयी। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
3 अगस्त 08 हाल ही में हिमाचल प्रदेश के विलासपुर जिले में नैना देवी मन्दिर की सीढ़ियों पर मौत का खेल देखा गया जिसमें 1150 व्यक्ति काल कलवित हो गये और अन्य सैकड़ों व्यक्ति घायल हो गये। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1854 प्रयाग में कुंभ मेले के दौरान मची भगदड़ में लगभग 800 श्रद्धालुओं की मौत हो गयी। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1983 नयना देवी-हिमाचल प्रदेश मन्दिर में भगदड़ से करीब 55 भक्तों की जीवन लीला समाप्त हो गयी। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1884 हरिद्वार के एक मंदिर में दर्शन के दौरान भगदड़ में 200 श्रद्धालुओं के जीवन का अन्त हो गया। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
1941 में बारिस और तूफान ने मक्का मस्जिद में मौजूद काबा को पानी में डुबो दिया। काबा पूरी तरह कीचड़ के गंदे पानी से भर गया। मुस्लिम मातम मना रहे थे। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
20 नवंबर 1979 इस्लामिक जेहाजिदों ने मक्का मस्जिद पर हमला कर दिया। जेहादी और वहाँ की सेना के बीच गोलीबारी में सैकड़ों हज यात्री मारे गये। काबा तवाह हो गया। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
सन् 1989 हरिद्वार के कुंभ मेले के दौरान भगदड़ ने 350 तीर्थयात्रियों की जान ले ली। सन् 2005 महाराष्ट्र के सतारा जिले में मंदरा देवी मंदिर पर धार्मिक मेले के समय शार्ट सर्किट के चलते भगदड़ में 300 से ज्यादा भक्त मौत का शिकार हुए और 200 से ज्यादा घायल हो गये। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
15,16 जून 2013 को उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित केदारनाथ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों में हुई जल प्रलय की विपदा सभी के जहन में याद ताजा है,जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु काल के गाल में समां गए और लाखों लोग इस विपदा से प्रभावित हुए. मन्दिर के अन्दर ही लाशों के ढेर लग गए थे,और मंदिर परिसर में मलबे का अम्बार लग गया था। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
स्पेशल इंतजाम के बावजूद बकरीद पर आयोजित मक्का में हज के दौरान अनेकों बार भगदड़ में सैकड़ों हज यात्रियों की मौत हो जाती है। यह भगदड़ अक्सर शैतान को पत्थर मारने की रस्म अदा करते वक्त होती है। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
इसी प्रकार ईसाई धर्म के आयोजनों में भी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। पादरियों की हत्याएँ होना भी कम दर्दनाक उदाहरण नहीं है। जो होता है उसकी मर्जी से होता है।
जिन धार्मिक स्थलों पर वह काल्पनिक खुदा, भगवान या गॉड रक्षा नहीं कर सकता वह बाकी संसार में आम साधारण इंसानों की क्या रक्षा करेगा? जबकि इन सारी मुसीबतों की जड़ तो वही है।

बुधवार, 13 सितंबर 2017

पितृ श्राद्ध

मान्यता है कि पितरों को पितृ पक्ष में यमराज श्राद्ध ग्रहण करने के लिए पृथ्वी पर भेजते हैं ।
कि पितृ रिण से मुक्ति के लिए पितृ पक्ष में पितृ श्राद्ध करना चाहिए ।
  ********
पितृ पक्ष होता है। मातृ पक्ष क्यों नहीं?
पितृ रिण से मुक्ति चाहिए?  मातृ रिण से नहीं?  क्यों?
यह कैसे पता चले कि पितर कब तक यमराज के चंगुल में रहेंगे? कब छूटकर पुनर्जीवित होंगे ?

सोमवार, 11 सितंबर 2017

सेवा निवृत्त शिक्षक पढ़ाएं

सेवा निवृत्त शिक्षकों को अपने गांव शहर के विद्यार्थियों को मार्गदर्शन करना चाहिए । इससे उनकी आयु में वृद्धि होती है । परीक्षित है।

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

इंसान से इंसान की दूरी

हम पत्थरों की पूजा करते करते खुद पत्थर हो रहे हैं | इंसान से इंसान की दूरी बढ़ती जा रही है|

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को नमन

शिक्षक दिवस के अवसर पर क्या द्रोणाचार्य जैसे रिश्वतखोर पक्षपाती शिक्षकों का भी सम्मान करना चाहिए? जो स्कूल का समय या पैसा खाते हैं वे सम्मान के पात्र हैं?
जो भी हो शिक्षक दिवस के अवसर पर योग्य अयोग्य,  इमानदार बेइमान, शराबी गंजेड़ी सभी शिक्षकों को नमन ।..

शिक्षक दिवस का औचित्य

शासन का आदेश है.   हर वर्ष 05 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाने के लिए छुट्टी रहेगी। तदनुसार स्कूलों में शिक्षक ही शिक्षक दिवस मनाते हैं। वे विद्यार्थियों को सिखाते हैं शिक्षकों का चरण स्पर्श कर फूल माला पहनाएं । फिर वही शिक्षक शिक्षकों का महत्व बताते हैं...  शिक्षक राष्ट्र निर्माता होते हैं। गुरू गोविंद दोऊ खड़े हैं...  याने शिक्षक भगवान के बराबर हैं उनका सम्मान करना चाहिए ।
डाॅ राधा कृष्णन जी को राष्ट्रपति पद का आफर मिलने से वे प्राध्यपक पद से स्तीफा दे दिए। कहते हैं कि उन्होंने शिक्षक पद की गरीमा बढ़ाई । मेरे विचार से यदि वे राष्ट्रपति पद स्वीकार न कर काॅलेज में ही अध्यापन करते तो निश्चित ही शिक्षक पद की गरीमा बढ़ी होती ।
उन्होंने कहा कि उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए । शिक्षकों की गरीमा बढ़ाने के बहाने खुद का जन्मदिन मनाने की इच्छा जाहिर करना भी आश्चर्य है ।
सभी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ऐसा कहें तो....
शिक्षक श्रमिक होता है जो पारिश्रमिक लेकर अध्यापन करता है। निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा करने की कोशिश करता है। हर साल शिक्षक दिवस मनाकर शिक्षकों के सम्मान करने का क्या औचित्य है? अन्नदाता कृषक जो खेतों में पसीना बहाकर हमारा जीवन रक्षा करता है,  बय ट्रेन जहाज का चालक जो हमें सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाता है,  पोलिस सेना जो जान पर खेलकर हमारी रक्षा करता हैं, स्कूल कार्यालय में जो सबकी सेवा कर कर्मियों अधिकारियों की कार्य क्षमता बढा़ते हैं भृत्य चपरासियों का हम कितना सम्मान करते हैं?  नहीं करते तो क्यों?

रविवार, 3 सितंबर 2017

देवी देवताओं से मांगना


निश्चित ही देवी देवता अपने जमाने के महान रहे होंगे । वे देश समाज के लिए अच्छा काम किए होंगें। इसी लिए वे अमर हैं।
मेरे विचार से आज उनसे कुछ मांगना निरर्थक है । बेहतर है उनसे प्रेरणा लें और
कुछ अच्छा काम करें । ईमानदार रहें ।

युवा जाग रहे हैं

मनुवादियों को नहीं चलेगी । अब युवा वर्ग जाग रहा है । वह लकीर के फकीर बनना नहीं चाहता ।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

नफरत बनाम मोहब्बत

Punjab kesari -

चमत्कार की आशा

Ajaib Jalalana
किसी चमत्कार की आस में इंसान अपनी पूरी जिंदगी को बर्बाद कर लेता है।वह भ्र्म पाल लेता है,शायद किसी चमत्कार से उसे स्वर्ग मिल जायेगा!! पूरी जिंदगी ही बदल जाएगी!! गुरबत(गरीबी)से छुटकारा तो पक्का मिल ही जाएगा!!परन्तु ये ख्वाब,ख्वाब ही बनकर रह जाते हैं।उधर अपनी कीमती जिंदगी किसी दांव पर लग गई होती है।
वैसे तो शताब्दियों से प्रत्येक धर्म के अगुवाओं को एक चमत्कारित रूप में पेश किया जाता रहा है।ताकि उनके भावी अनुयाइयों में आस्था के नाम पर अन्धविश्वासों को पक्का कायम किया जाये। और धार्मिक नेता को चमत्कारी घोषित करके अन्धविश्वासी लोगों की एक अच्छी खासी संख्या अपनी तरफ खींच ली जाये।
डेरा सिरसा से सबंधित पूर्व बाबा के अनेकों चमत्कारों को पुस्तकों में छपा हुआ देख सकते हैं;
एक बार की बात है,बाबा जी मौजगढ़ के पास भाखड़ा नहर के किनारे टहक रहे थे,वहां उन्होंने क्या देखा!नहर में एक बड़ी मछली छोटी मछलियों को शिकार बना करके उन्हें खा रही थी।ये देखकर बाबा जी का दिल पसीज गया!उन्होंने कहा ये तो अन्याय है! कलयुग है!घोर पाप!फिर क्या था,बाबा जी ने अपनी जेब में से कुछ बचा हुआ प्रसाद निकाला,और उस प्रसाद को पानी में डाल दिया।बड़ी मछली ने उस प्रसाद को चख लिया!उसके बाद एक ऐसा चमत्कार हुआ!!उस मासाहारी बड़ी मछली ने आगे से जीवों को खाना ही छोड़ दिया!!!
लो कर लो बात...भला कोई उनसे पूछे..पानी में रहने वाला जीव,प्रसाद के चमत्कार से अपने खाने का मीनू कैसे बदल सकता है??

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

पाश्चात्य सभ्यता घटिया है?

Sanjeev Mongia
हमे जब भी मौका मिलता है ,हम पाश्चात्य सभ्यता को खूब लताड़ते है . और अपनी संस्कृति पर जम कर गर्व करते है . क्या बुरा करते है गोरे ? eat , drink and be merry ,क्या खराबी है , इस कथन में ? कम से कम वो दोगले तो नही है . जम कर पांच दिन मेहनत करते है और दो दिन ऐश.
और हम हिन्दुस्तानी . खूब गीता का महिमागान करेगे . लेकिन असलियत यह है की हम कर्म में नही भाग्य में विश्वास करते दिखते है . हर दूसरा , तीसरा आदमी , जन्हा तन्हा कुंडलिया बनवा कर , अपनी अंगूठी तैयार करता नजर आता है . अब तो टेरो कार्ड, वास्तुशास्त्र जैसी नई बलाए भी आ गई है . हर आदमी सोचता है , वेष्णु देवी या तिरुपति जैसी जगह जाने पर उसको मनवांछित फल मिल जाएगा .
और सब प्रयासों के बावजूद जब फल नही मिलता तो शनि देवता के साडे साती का प्रकोप समझ कर कर शांत हो जाता है . इस तरह के सब विचार , आदमी को बिलकुल निष्क्रिय बना देते है
इन बाबायो का पैदा होना उनकी चतुराई नही , बल्कि हमारा ... निठल्लापंन है .

हमारी संस्कृति महान

हम हिंदुओं के सबसे अधिक भगवान और देवी देवता हैं इसीलिए तो हम हिंदू महान हैं। हमारी संस्कृति महान है| याद है हमारे भगवान देवी देवताओं के नाम? तैंतीस करोड़?

धर्म और ईमानदारी

क्या सभी धार्मिक लोगों का ईमानदार होते है?
नहीं, तो क्यों?

90% लोग भगवान को नहीं मानते

Yash Baghel
अगर धार्मिकों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो कम से कम 99% नास्तिक हैं। क्योंकि झूठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार में 99% लोग लिप्त हैं। यदि इनको ईश्वर पर आस्था होती तो यह काम बिलकुल भी नहीं करते! मगर यह जानते हैं कि ईश्वर नहीं है इसलिए यह सब करते हैं। और बाकी के नास्तिक हैं जो इन धार्मिक किताबों पर विश्वास नहीं करते तो वह गिने चुने ही है।

यज्ञ और मंत्र

Dinesh Aastik
भगवान कहाँ?
जो यज्ञ करते हैं वे जानते हैं कि यज्ञ से कोई देवता प्रसन्न नहीं होता । जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, वे अगर संस्कृत से हिंदी में कर दिए जायें तो प्राइमरी स्कूल की क़िताब के लायक हैं । पुजारी जानता है, भगवान् चाहे कहीं और हो मगर मंदिर में तो कतई नहीं है । मुसलमान जानता है कि ख़ुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है । मगर अपना धन्धा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलायें कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा । मंदिर और मस्जिद में की गयी पुकार भगवान् एकदम सुनता है । सीधी 'हॉट लाइन' है ।
~ दलितों को पीटने का यज्ञ
हरिशंकर परसाई

हमारी संस्कृति

Sanjeev Mongia
हमे जब भी मौका मिलता है ,हम पाश्चात्य सभ्यता को खूब लताड़ते है . और अपनी संस्कृति पर जम कर गर्व करते है . क्या बुरा करते है गोरे ? eat , drink and be merry ,क्या खराबी है , इस कथन में ? कम से कम वो दोगले तो नही है . जम कर पांच दिन मेहनत करते है और दो दिन ऐश.
और हम हिन्दुस्तानी . खूब गीता का महिमागान करेगे . लेकिन असलियत यह है की हम कर्म में नही भाग्य में विश्वास करते दिखते है . हर दूसरा , तीसरा आदमी , जन्हा तन्हा कुंडलिया बनवा कर , अपनी अंगूठी तैयार करता नजर आता है . अब तो टेरो कार्ड, वास्तुशास्त्र जैसी नई बलाए भी आ गई है . हर आदमी सोचता है , वेष्णु देवी या तिरुपति जैसी जगह जाने पर उसको मनवांछित फल मिल जाएगा .
और सब प्रयासों के बावजूद जब फल नही मिलता तो शनि देवता के साडे साती का प्रकोप समझ कर कर शांत हो जाता है . इस तरह के सब विचार , आदमी को बिलकुल निष्क्रिय बना देते है
इन बाबायो का पैदा होना उनकी चतुराई नही , बल्कि हमारा ... निठल्लापंन है .

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

ब्राह्मणवाद

कुछ चालाक और ऊंचे दिमाग वालों ने कम दिमाग वालों के शोषण का जरिया बनाया ही ब्राह्मणवाद है। जिसका विरोध कर लोगों को जगाने की कोशिश हो रही है । यह ब्राह्मणवाद का विरोध ब्राह्मणों का विरोध नहीं है। वैसे भी सभी ब्राह्मण ब्राह्मणवादी नहीं हैं, वे हर तरह का काम करते हैं। आम ब्राह्मणों के प्रति कोई आक्रोश नहीं देखा गया। अब तक ब्राह्मण हटाओ या ब्राह्मण भगाओ का कोई आंदोलन नहीं चला है और नहीं चलेगा कभी ।

राहुल सांकृत्यायन का लेख

महाविद्रोही राहुल सांकृत्यायन का लेख - तुम्हारे धर्म की क्षय
http://www.mazdoorbigul.net/archives/9141
राहुल सांकृत्‍यायन की ये (तुम्‍हारी क्षय) पूरी पुस्‍तक इस लिंक से पढ़ सकते हैं - http://www.mazdoorbigul.net/archives/9154
लेख का एक हिस्‍सा (तुम्‍हारे धर्म की क्षय) यहां दिया जा रहा है

वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक सिर पर कुछ बाल बढ़ाना चाहता है, तो दूसरा दाढ़ी। एक मूँछ कतरने के लिए कहता है, तो दूसरा मूँछ रखने के लिए। एक जानवर का गला रेतने के लिए कहता है, तो दूसरा एक हाथ से गर्दन साफ करने को। एक कुर्ते का गला दाहिनी तरफ रखता है, तो दूसरा बाईं तरफ। एक जूठ-मीठ का कोई विचार नहीं रखता, तो दूसरे के यहाँ जाति के भी बहुत-से चूल्हे हैं। एक खुदा के सिवा दूसरे का नाम भी दुनिया में रहने नहीं देना चाहता, तो दूसरे के देवताओं की संख्या नहीं। एक गाय की रक्षा के लिए जान देने को कहता है, तो दूसरा उसकी कुर्बानी से बड़ा सबाब समझता है।

इसी तरह दुनिया के सभी मजहबों में भारी मतभेद है। ये मतभेद सिर्फ विचारों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास बतला रहा है कि इन मतभेदों के कारण मजहबों ने एक-दूसरे के ऊपर जुल्म के कितने पहाड़ ढाये। यूनान और रोम के अमर कलाकारों की कृतियों का आज अभाव क्यों दीखता है? इसलिए कि वहाँ एक मजहब आया जो ऐसी मूर्तियों के अस्तित्व को अपने लिए खतरे की चीज समझता था। ईरान की जातीय कला, साहित्य और संस्कृति को नामशेष-सा क्यों हो जाना पड़ा? – क्योंकि, उसे एक ऐसे मजहब से पाला पड़ा जो इन्सानियत का नाम भी धरती से मिटा देने पर तुला हुआ था। मेक्सिको और पेरू, तुर्किस्तान और अफगानिस्तान, मिस्र और जावा – जहाँ भी देखिये, मजहबों ने अपने को कला, साहित्य, संस्कृति का दुश्मन साबित किया। और खून-खराबा? इसके लिए तो पूछिये मत। अपने-अपने खुदा और भगवान के नाम पर, अपनी-अपनी किताबों और पाखण्डों के नाम पर मनुष्य के खून को उन्होंने पानी से भी सस्ता कर दिखलाया। यदि पुराने यूनानी धर्म के नाम पर निरपराध ईसाई बच्चे बूढ़ों, स्त्री-पुरुषों को शेरों से फड़वाना, तलवार के घाट उतारना बड़े पुण्य का काम समझते थे, तो पीछे अधिकार हाथ आने पर ईसाई भी क्या उनसे पीछे रहे? ईसामसीह के नाम पर उन्होंने खुलकर तलवार का इस्तेमाल किया। जर्मनी में इन्सानियत के भीतर लोगों को लाने के लिए कत्लेआम-सा मचा दिया गया। पुराने जर्मन ओक वृक्ष की पूजा करते थे। कहीं ऐसा न हो कि ये ओक ही उन्हें फिर पथभ्रष्ट कर दें, इसके लिए बस्तियों के आसपास एक भी ओक को रहने न दिया गया। पोप और पेत्रयार्क, इंजील और ईसा के नाम पर प्रतिभाशाली व्यक्तियों के विचार-स्वातन्‍त्रय को आग और लोहे के जरिये से दबाते रहे। जरा से विचार-भेद के लिए कितनों को चर्खी से दबाया गया – कितनों को जीते जी आग में जलाया गया। हिन्दुस्तान की भूमि ऐसी धार्मिक मतान्धता का कम शिकार नहीं रही है। इस्लाम के आने से पहले भी क्या मजहब ने मन्त्र के बोलने और सुनने वालों के मुँह और कानों में पिघले राँगे और लाख को नहीं भरा? शंकराचार्य ऐसे आदमी – जो कि सारी शक्ति लगा गला फाड़-फाड़कर यही चिल्लाते रहे थे कि सभी ब्रह्म हैं, ब्रह्म से भिन्न सभी चीजें झूठी हैं तथा रामानुज और दूसरों के भी दर्शन जबानी जमा-खर्च से आगे नहीं बढ़े, बल्कि सारी शक्ति लगाकर शूद्रों और दलितों को नीचे दबा रखने में उन्होंने कोई कोर-कसर उठा नहीं रक्खी और इस्लाम के आने के बाद तो हिन्दू-धर्म और इस्लाम के खूँरेज झगड़े आज तक चल रहे हैं। उन्होंने तो हमारे देश को अब तक नरक बना रखा है। कहने के लिए इस्लाम शक्ति और विश्व-बन्धुत्व का धर्म कहलाता है; हिन्दू-धर्म ब्रह्मज्ञान और सहिष्णुता का धर्म बतलाया जाता है; किन्तु क्या इन दोनों धर्मों ने अपने इस दावे को कार्यरूप में परिणत करके दिखलाया? हिन्दू मुसलमानों पर दोष लगाते हैं कि ये बेगुनाहों का खून करते हैं; हमारे मन्दिरों और पवित्र तीर्थों को भ्रष्ट करते हैं; हमारी स्त्रियों को भगा ले जाते हैं। लेकिन, झगड़े में क्या हिन्दू बेगुनाहों का खून करने से बाज आते हैं। चाहे आप कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम झगड़े को ले लीजिये या बनारस के, इलाहाबाद के या आगरे के; सब जगह देखेंगे कि हिन्दुओं और मुसलमानों के छुरे और लाठियों के शिकार हुए हैं – निरपराध, अजनबी स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे। गाँव या दूसरे मुहल्ले का कोई अभागा आदमी अनजाने उस रास्ते आ गुजरा और कोई पीछे से छुरा भोंक कर चम्पत हो गया। सभी धर्म दया का दावा करते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के इस धार्मिक झगड़ों को देखिये, तो आपको मालूम होगा कि यहाँ मनुष्यता पनाह माँग रही है। निहत्थे बूढ़े और बूढ़ियाँ ही नहीं, छोटे-छोटे बच्चे तक मार डाले जाते हैं। अपने धर्म के दुश्मनों को जलती आग में फेंकने की बात अब भी देखी जाती है।

एक देश और एक खून मनुष्य को भाई-भाई बनाते हैं। खून का नाता तोड़ना अस्वाभाविक है, लेकिन हम हिन्दुस्तान में क्या देखते हैं? हिन्दुओं की सभी जातियों में, चाहे आरम्भ में कुछ भी क्यों न रहा हो अब तो एक ही खून दौड़ रहा है; क्या शकल देखकर किसी के बारे में आप बतला सकते हैं कि यह ब्राह्मण है और यह शूद्र। कोयले से भी काले ब्राह्मण आपको लाखों की तादात में मिलेंगे। और शूद्रों में भी गेहुएँ रंग वालों का अभाव नहीं है। पास-पास में रहने वाले स्त्री-पुरुषों के यौन-सम्बन्ध, जाति की ओर से हजार रुकावट होने पर भी, हम आये दिन देखते हैं। कितने ही धनी खानदानों, राजवंशों के बारे में तो लोग साफ कहते हैं कि दास का लड़का राजा और दासी का लड़का राजपुत्र। इतना होने पर भी हिन्दू-धर्म लोगों को हजारों जातियों में बाँटे हुए हैं। कितने ही हिन्दू, हिन्दू के नाम पर जातीय एकता स्थापित करना चाहते हैं। किन्तु, वह हिन्दू जातीयता है कहाँ? हिन्दू जाति तो एक काल्पनिक शब्द है। वस्तुतः वहाँ हैं ब्राह्मण – ब्राह्मण भी नहीं, शाकद्वीपी, सनाढ्य, जुझौतिया – राजपूत, खत्री, भूमिहार, कायस्थ, चमार आदि-आदि—। एक राजपूत का खाना-पीना, ब्याह-श्राद्ध अपनी जाति तक सीमित रहता है। उसकी सामाजिक दुनिया अपनी जाति तक महमूद है। इसीलिए जब एक राजपूत बड़े पद पर पहुँचता है, तो नौकरी दिलाने, सिफारिश करने या दूसरे तौर से सबसे पहले अपनी जाति के आदमी को फायदा पहुँचाना चाहता है। यह स्वाभाविक है। जब कि चौबीसों घण्टे मरने-जीने सबमें सम्बन्ध रखने वाले अपने बिरादरी के लोग हैं, तो किसी की दृष्टि दूर तक कैसे जायेगी?

कहने के लिए तो हिन्दुओं पर ताना कसते हुए इस्लाम कहता है कि हमने जात-पाँत के बन्धनों को तोड़ दिया। इस्लाम में आते ही सब भाई-भाई हो जाते हैं। लेकिन क्या यह बात सच है? यदि ऐसा होता तो आज मोमिन (जुलाहा), अप्सार (धुनिया), राइन (कुँजड़ा) आदि का सवाल न उठता। अर्जल और अशरफ का शब्द किसी के मुँह पर न आता। सैयद-शेख, मलिक-पठान, उसी तरह का खयाल अपने से छोटी जातियों से रखते हैं, जैसा कि हिन्दुओं के बड़ी जात वाले। खाने के बारे में छूतछात कम है और वह तो अब हिन्दुओं में भी कम होता जा रहा है। लेकिन सवाल तो है – सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र में इस्लाम की बड़ी जातों ने छोटी जातों को क्या आगे बढ़ने का कभी मौका दिया? धार्मिक नेता हों, तो बड़ी-बड़ी जातों से शाही दरबार और सरकारी नौकरियाँ सभी जगहें बड़ी जातों के लिए सुरक्षित रहीं। जमींदार, ताल्लुकेदार, नवाब सभी बड़ी जातों के हैं। हिन्दुस्तानियों में से चार-पाँच करोड़ आदमियों ने हिन्दुओं के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक अत्याचारों से त्रण पाने के लिए इस्लाम की शरण ली। लेकिन, इस्लाम की बड़ी जातों ने क्या उन्हें वहाँ पनपने दिया? सात सौ बरस बाद भी आज गाँव का मोमिन जमींदारों और बड़ी जातों के जुल्म का वैसा ही शिकार है, जैसा कि उसका पड़ोसी कानू-कुर्मी। हिन्दुओं से झगड़कर अंग्रेजों की खुशामद करके कौन्सिलों की सीटों, सरकारी नौकरियों में अपने लिए संख्या सुरक्षित करायी जाती है। लेकिन जब उस संख्या को अपने भीतर वितरण करने का अवसर आता है, तब उनमें से प्रायः सभी को बड़ी जाति वाले सैयद और शेख अपने हाथ में ले लेते हैं। साठ-साठ, सत्तर-सत्तर फीसदी संख्या रखने वाले मोमिन और अन्सार मुँह ताकते रह जाते हैं। बहाना किया जाता है कि उनमें उतनी शिक्षा नहीं। लेकिन सात सौ और हजार बरस बाद भी यदि वे शिक्षा में इतने पिछड़े हुए हैं, तो इसका दोष किसके ऊपर है? उन्हें कब शिक्षित होने का अवसर दिया गया? जब पढ़ाने का अवसर आया, छात्रवृत्ति देने का मौका आया, तब तो ध्यान अपने भाई-बन्धुओं की तरफ चला गया। मोमिन और अन्सार, बावर्ची और चपरासी, खिदमतगार और हुक्काबरदार के काम के लिए बने हैं। उनमें से कोई यदि शिक्षित हो भी जाता है, तो उसकी सिफारिश के लिए अपनी जाति में तो वैसा प्रभावशाली व्यक्ति है नहीं; और, बाहर वाले अपने भाई-बन्धु को छोड़कर उन पर तरजीह क्यों देने लगे? नौकरियों और पदों के लिए इतनी दौड़धूप, इतनी जद्दोजहद सिर्फ खिदमते-कौम और देश सेवा के लिए नहीं है, यह है रुपयों के लिए, इज्जत और आराम की जिन्दगी बसर करने के लिए।

हिन्दू और मुसलमान फरक-फरक धर्म रखने के कारण क्या उनकी अलग जाति हो सकती है? जिनकी नसों में उन्हीं पूर्वजों का खून बह रहा है जो इसी देश में पैदा हुए और पले, फिर दाढ़ी और चुटिया, पूरब और पश्चिम की नमाज क्या उन्हें अलग कौम साबित कर सकती है? क्या खून पानी से गाढ़ा नहीं होता? फिर हिन्दू और मुसलमान के फरक से बनी इन अलग-अलग जातियों को हिन्दुस्तान से बाहर कौन स्वीकार करता है? जापान में जाइये या जर्मनी, ईरान जाइये या तुर्की सभी जगह हमें हिन्दी और ‘इण्डियन’ कहकर पुकारा जाता है। जो धर्मभाई को बेगाना बनाता है, ऐसे धर्म को धिक्कार! जो मजहब अपने नाम पर भाई का खून करने के लिए प्रेरित करता है, उस मजहब पर लानत! जब आदमी चुटिया काट दाढ़ी बढ़ाने भर से मुसलमान और दाढ़ी मुड़ा चुटिया रखने मात्र से हिन्दू मालूम होने लगता है, तो इसका मतलब साफ है कि यह भेद सिर्फ बाहरी और बनावटी है। एक चीनी चाहे बौद्ध हो या मुसलमान, ईसाई हो या कनफूसी, लेकिन उसकी जाति चीनी रहती है; एक जापानी चाहे बौद्ध हो या शिन्तो-धर्मी, लेकिन उसकी जाति जापानी रहती है; एक ईरानी चाहे वह मुसलमान हो या जरतुस्त, किन्तु वह अपने लिए ईरानी छोड़ दूसरा नाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। तो हम-हिन्दियों के मजहब को टुकड़े-टुकड़े में बाँटने को क्यों तैयार हैं और इस नाजायज हरकतों को हम क्यों बर्दाश्त करें?

धर्मों की जड़ में कुल्हाड़ा लग गया है; और, इसलिए अब मजहबों के मेलमिलाप की बातें कभी-कभी सुनने में आती हैं। लेकिन, क्या यह सम्भव है? “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” – इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना अगर मज़हब बैर नहीं सिखाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिये, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गाँवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा है? कौन गाय खाने वालों को लड़ा रहा है। असल बात यह है – “मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना।” हिन्दुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर इलाज नहीं।

एक तरफ तो वे मजहब एक-दूसरे के इतने जबर्दस्त खून के प्यासे हैं। उनमें से हर एक एक-दूसरे के खिलाफ शिक्षा देता है। कपड़े-लत्ते, खाने-पीने, बोली-बानी, रीति-रिवाज में हर एक एक-दूसरे से उल्टा रास्ता लेता है। लेकिन, जहाँ गरीबों को चूसने और धनियों की स्वार्थ-रक्षा का प्रश्न आ जाता है; तो दोनों बोलते हैं। गदहा-गाँव के महाराज बेवकूफ बख्श सिंह सात पुश्त से पहले दर्जे के बेवकूफ चले आते हैं। आज उनके पास पचास लाख सालाना आमदनी की जमींदारी है जिसको प्राप्त करने में न उन्होंने एक धेला अकल खर्च की और न अपनी बुद्धि के बल पर उसे छै दिन चला ही सकते हैं। न वे अपनी मेहनत से धरती से एक छटाँक चावल पैदा कर सकते हैं, न एक कंकड़ी गुड़। महाराज बेवकूफ बख्श सिंह को यदि चावल, गेहूँ, घी, लकड़ी के ढेर के साथ एक जंगल में अकेले छोड़ दिया जाये, तो भी उनमें न इतनी बुद्धि है और न उन्हें काम का ढंग मालूम है कि अपना पेट भी पाल सकें; सात दिन में बिल्ला-बिल्ला कर जरूर वे वहीं मर जायेंगे। लेकिन आज गदहा गाँव में महाराज दस हजार रुपया महीना तो मोटर के तेल में फूँक डालते हैं। बीस-बीस हजार रुपये जोड़े कुत्ते उनके पास हैं। दो लाख रुपये लगाकर उनके लिए महल बना हुआ है। उन पर अलग डाक्टर और नौकर हैं। गर्मियों में उनके घरों में बरफ के टुकड़े और बिजली के पंखे लगते हैं। महाराज के भोजन-छाजन की तो बात ही क्या? उनके नौकरों के लिए नौकर भी घी-दूध में नहाते हैं, और जिस रुपये को इस प्रकार पानी की तरह बहाया जाता है, वह आता कहाँ से है? उसके पैदा करने वाले कैसी जिन्दगी बिताते हैं? – वे दाने-दाने को मुहताज हैं। उनके लड़कों को महाराज बेवकूफ बख्श के कुत्तों का जूठा भी यदि मिल जाये, तो वे अपने को धन्य समझें।

लेकिन, यदि किसी धर्मानुयायी से पूछा जाये, कि ऐसे बेवकूफ आदमी को बिना हाथ-पैर हिलाये दूसरे की कसाले की कमाई को पागल की तरह फेंकने का क्या अधिकार है तो पण्डित जी कहेंगे – “अरे वे तो पूर्व की कमाई खा रहे हैं। भगवान की ओर से वे बड़े बनाये गये हैं। शास्त्र-वेद कहते हैं कि बड़े-छोटे के बनाने वाले भगवान हैं। गरीब दाने-दाने को मारा-मारा फिरता है, यह भगवान की ओर से उसको दण्ड मिला है।” यदि किसी मौलवी या पादरी से पूछिये तो जवाब मिलेगा – “क्‍या तुम काफिर हो, नास्तिक तो नहीं हो? अमीर-गरीब दुनिया का कारबार चलाने के लिए खुदा ने बनाये हैं। राजी-ब-रजा खुदा की मर्जी में इन्सान का दखल देने का क्या हक? गरीबी को न्यामत समझो। उसकी बन्दगी और फरमाबरदारी बजा लाओ, कयामत में तुम्हें इसकी मजदूरी मिलेगी।” पूछा जाय – जब बिना मेहनत ही के महाराज बेवकूफ बख्श सिंह धरती पर ही स्वर्ग आनन्द भोग रहे हैं तो ऐसे ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा’ के दरबार में बन्दगी और फरमाबरदारी से कुछ होने-हवाने की क्या उम्मीद?

उल्लू शहर के नवाब नामाकूल खाँ भी बड़े पुराने रईस हैं। उनकी भी जमींदारी है और ऐशो-आराम में बेवकूफ बख्श सिंह से कम नहीं हैं। उनके पाखाने की दीवारों में अतर चुपड़ा जाता है और गुलाब-जल से उसे धोया जाता है। सुन्दरियों और हुस्न की परियों को फँसा लाने के लिए उनके सैंकड़ों आदमी देश-विदेशों में घूमा करते हैं। यह परियाँ एक ही दीदार में उनके लिए बासी हो जाती हैं। पचासों हकीम, डाक्टर और वैद्य उनके लिए जौहर, कुश्ता और रसायन तैयार करते रहते हैं। दो-दो साल की पुरानी शराबें पेरिस और लन्दन के तहखानों से बड़ी-बड़ी कीमत पर मँगाकर रक्खी जाती हैं। नवाब बहादुर का तलवा इतना लाल और मुलायम है जितनी इन्द्र की परियों की जीभ भी न होगी। इनकी पाशविक काम-वासना की तृप्ति में बाधा डालने के लिए कितने ही पति तलवार के घाट उतारे जाते हैं, कितने ही पिता झूठे मुकदमों में फँसा कर कैदखाने में सड़ाये जाते हैं। साठ लाख सालाना आमदनी भी उनके लिए काफी नहीं है। हर साल दस-पाँच लाख रुपया और कर्ज हो जाता है। आपको G.C.S.I., G.C.I.E., फर्जिन्द-खास फिरंग – आदि बड़ी-बड़ी उपाधियाँ सरकार की ओर से मिली हैं। वायसराय के दरबार में सबसे पहले कुर्सी इनकी होती है और उनके स्वागत में व्याख्यान देने और अभिनन्दन-पत्र पढ़ने का काम हमेशा उल्लू शहर के नवाब बहादुर और गदहा-गाँव के महाराजा बहादुर को मिलता है। छोटे और बड़े दोनों लाट इन दोनों रईसुल उमरा की बुद्धिमानी, प्रबन्ध की योग्यता और रियाया-परवरी की तारीफ करते नहीं अघाते।

नवाब बहादुर की अमीरी को खुदा की बरकत और कर्म का फल कहने में पण्डित और मौलवी, पुरोहित और पादरी सभी एक राय हैं। रात-दिन आपस में तथा अपने अनुयायियों में खून-खराबी का बाजार गर्म रखने वाले, अल्लाह और भगवान यहाँ बिलकुल एक मत रखते हैं। वेद और कुरान, इंजील और बायबिल की इस बारे में सिर्फ एक शिक्षा है। खून-चूसने वाली इन जोंकों के स्वार्थ की रक्षा ही मानो इन धर्मों का कर्तव्य हो। और मरने के बाद भी बहिश्त और स्वर्ग के सबसे अच्छे महल, सबसे सुन्दर बगीचे, सबसे बड़ी आँखों वाली हूरें और अप्सराएँ, सबसे अच्छी शराब और शहद की नहरें उल्लू शहर के नवाब बहादुर तथा गदहा-गाँव के महाराज और उनके भाई-बन्धुओं के लिए रिजर्व हैं, क्योंकि उन्होंने दो-चार मस्जिदें दो-चार शिवाले बना दिये हैं; कुछ साधु-फकीर और ब्राह्मण-मुजावर रोजाना उनके यहाँ हलवा-पूड़ी, कबाब-पुलाव उड़ाया करते हैं।

गरीबों की गरीबी और दरिद्रता के जीवन का कोई बदला नहीं। हाँ, यदि वे हर एकादशी के उपवास, हर रमजान के रोजे तथा सभी तीरथ-व्रत, हज और जियारत बिना नागा और बिना बेपरवाही से करते रहे, अपने पेट को काटकर यदि पण्डे-मुजावरों का पेट भरते रहे, तो उन्हें भी स्वर्ग और बहिश्त के किसी कोने की कोठरी तथा बची-खुची हूर-अप्सरा मिल जायेगी। गरीबों को बस इसी स्वर्ग की उम्मीद पर अपनी जिन्दगी काटनी है। किन्तु जिस सरग-बहिश्त की आशा पर जिन्दगी भर के दुःख के पहाड़ों को ढोना है, उस सरग-बहिश्त का अस्तित्व ही आज बीसवीं सदी के इस भूगोल में कहीं नहीं है। पहले जमीन चपटी थी। सरग इसके उत्तर के उन सात पहाड़ों और सात-समुद्रों के पार था। आज तो न उस चपटी जमीन का पता है और न उत्तर के उन सात पहाड़ों और सात समुद्रों का। जिस सुमेरु के ऊपर इन्द्र की अमरावती क्षीरसागर के भीतर शेषशायी भगवान थे, वह अब सिर्फ लड़कों के दिल बहलाने की कहानियाँ मात्र हैं। ईसाइयों और मुसलमानों के बहिश्त के लिए भी उसी समय के भूगोल में स्थान था। आजकल के भूगोल ने तो उनकी जड़ ही काट दी है। फिर उस आशा पर लोगों को भूखों रखना क्या भारी धोखा नहीं है।

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