लेकिन फिर भी विभिन्न धार्मिक स्थलों, धार्मिक आयोजनों एवं धार्मिक लोगों की रक्षा करने में वह अपने आपको असहाय महसूस करता। इन सब पर वह अपनी शैतानित क्यों करता है? कोई भी धर्म इसका सही सही जवाब नहीं दे पाता। इसकी इस तरह की हरकतों से तो यही लगता है कि शैतान ही खुदा है। देखिये उसकी शैतानियतः-
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017
हम ओ बी सी राक्षस कुल के हैं
सोमवार, 9 अक्टूबर 2017
प्यार
प्यार करने वालों को आर्थिक स्तर, ऊंचा खानदान, उच्च जाति का दंभ विलग कर देता है। विवाह करने से उन्हें से मना कर देता है। फलस्वरूप कुछ मन मारकर, नियति मानकर स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं। कुछ घर छोड़ कर भाग कर शादी कर लेते हैं। दुखद होता है जब परिवार, जाति समाज, खाप पंचायत द्वारा उन्हें बहिष्कार की सजा देते हैं ।
बहुत दुखद होता है जब आत्महत्या कर लेते हैं या मार दिए जाते हैं।
ऐसे दंभी और क्रूर लोगों को आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए ।
**********
अपना विचार दें बेझिझक ।
मन की बात प्रकट करें ।
यह न सोचें कि लोग क्या कहेंगे ।
तर्क आधार युक्त कामेंट करें ।
गाली गलौज वाले दूर रहें दूर्र..
शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017
ईश्वर के अस्तित्व पर आओ विचार करें
आओ विचार करें
***************
दोस्तों! हम ठंडे दिमाग से बिना किसी दुराग्रह के ईश्वर के अस्तित्व पर चर्चा करते हैं।
ईश्वर का नाम पूरे विश्व में है।प्रत्येक धर्म के लोग ईश्वर को अलग अलग रूप से मानते हैं। हमारे माता पिता तथा गुरूजनों ने हमें ईश्वर के बारे में जो कुछ बताया हमने उसे मान लिया। हम लोग माता पिता तथा गुरूजनों का सम्मान करते हैं। वे हमारे हितैषी व हमें प्यार करने वाले लोग हैं।
पर हम जब बड़े हो गए तो हमारे मन में ईश्वर को लेकर अनेकों सवाल उठने लगे।समय के साथ चलना हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है। सत्य को जानने का सबको अधिकार है।सत्य को जाने बिना जीवन निरर्थक है।
ईश्वर के अस्तित्व पर चर्चा होती रही है तथा ईश्वर के पक्ष में तमाम तरह की दलीलें दी जाती रही हैं। ईश्वर के होने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है तथा अप्रत्यक्ष रूप से भी ईश्वर न्याय नहीं करता है। पूरी दुनिया में सामाजिक आर्थिक धार्मिक तथा जातीय संघर्ष होता रहा है। विषमता तथा विसंगतियों में कोई कमी नहीं है।
धर्म के नाम पर ठगी का धंधा फलता फूलता रहा है। लोग सत्य प्रेम न्याय सहयोग दया को न मानकर ईश्वर का ही गुणगान करते रहते हैं। ईश्वर की आड़ में आतंक व अन्याय को बढ़ावा दिया करते हैं।
ईश्वर के स्थान पर यदि हम मानवोचित गुणों को स्वीकार कर लें तथा सभी को समान रूप से जीवन जीने का अधिकार दे दें तो संसार स्वर्ग बन जाएगा। सब सुखमय जीवन व्यतीत करेंगे तथा मृत्यु के समय भी संतोष के साथ देह त्याग करेंगे इसमें कोई शक नहीं है।
विचारक पद्ममुख पंडा. महापल्ली
बुधवार, 4 अक्टूबर 2017
विवेक
*और फिर यहीं से शुरू होती है मानसिक गुलामी और बाबाओं का खेल।*
*भारत में करोड़ो लोग इस समस्या से पीड़ित हैं
संविधान पढ़िए आगे बढ़िए
जय संविधान जय संविधान
मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017
हत्या की सच्चाई
तर्कसम्मत आधार सह अपनी राय दें । गाली गलौज वाले दूर रहें दूर्र... बकवास न करें ।

आपके सामने ला रहा हूं। अब तक आप
जो नही जान पाये वो आज जाने ----
"गांधी ह्त्या के पीछे ये मतान्ध
हिन्दुवादी तीन कारण बताते है
* पहला मिथ यह है
कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के
पक्षपाती थे।*दूसरा 'मिथ' यह है
कि गांधीजी की हत्या 55
करोड रुपयों के कारण की गयी *
तीसरा 'मिथ' यह है
गांधी की हत्या करनेवाले बहादुर,
देशभक्त और प्रामाणिक व्यक्ति थे। परन्तु सत्य यह है
कि ये तीनों 'मिथ' बिलकुल गलत हैं। आइये इन
तीनो कारणो की सच्चाई बताते है
नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे
कलेजे से
गांधीजी की हत्या की थी।
===============
'पन्नास कोटीचे बली' नाथूराम
का अदालत में दिया हुआ बचावनामा है, और
'गांधी आणि मी' गोपाल गोडसे
की, आजीवन कैद
की सजा होने के बाद
लिखी गयी पुस्तक है। ये दोनों पुस्तकें
पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे
धर्मजनूनी जरूर था, मगर पागल
नहीं था। हम जिसको सिरफिरा कहते हैं,
ऐसा तो वह हरगिज नहीं था।
मुसलमानों ने भारत का विभाजन करवाया, फिर
भी मुसलमानों, उनके संगठन मुस्लिम
लीग तथा नवनिर्मित पाकिस्तान के
प्रति गांधीजी ने नरम रुख अपनाया था,
ऐसी दलीलें उन पुस्तकों में
तथा अन्यत्र भी हिन्दुत्ववादी देते रहे
हैं। उनकी नजर में, तब तो हद
ही हो गयी, जब
गांधीजी ने पाकिस्तान को, उसके हिस्से
के, 55 करोड रुपये देने की जिद की,
और उपवास की धमकी तक दे
डाली। पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार
तथा कश्मीर पर हमला करनेवालों को 55 करोड
रुपये देने की बात से उनेजित होकर नाथूराम गोडसे ने
गांधीजी की हत्या की थी,
ऐसा उन पुस्तकों में कहा गया है। आम तौर पर
गांधीजी की हत्या के
सम्बन्ध में, आम
लोगों की भी धारणा ऐसी ही है।
अनेक इतिहासकार और पत्रकार
भी ऐसा ही मानते हैं। इतिहास
की पाठय़पुस्तकों में
भी हत्या का यही कारण
बताया जाता है।
गोडसे-बन्धुओं की पुस्तकों को पढने के बाद
हत्या का सही कारण जानने के लिए मैंने अन्य
अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। प्यारेलाल लिखित 'द लास्ट
फेज', गांधी हत्या का केस
जिनकी अदालत में चला था उन
न्यायमूर्ति खोसला की लिखी पुस्तक,
ग्वालियर के बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट
इनामदार के संस्मरण, और गोडसे- बन्धुओं का प्रतिवाद
करनेवाली कई दूसरी पुस्तकें पढने के
बाद मुझे यकीन
हो गया कि गांधीजी की हत्या 55
करोड रुपये के प्रकरण से उनेजित होकर
नहीं की गयी थी।
भारत का विभाजन और 55 करोड रुपये का प्रश्न खडा हुआ,
उसके बहुत पहले ही इस टोली ने
गांधीजी की हत्या करने
का निश्चय कर लिया था और कई बार
गांधीजी की हत्या करने के
प्रयास भी किये
गये थे।
============
पाकिस्तान को 55 करोड़ देने के प्रश्न पर
की हत्या ?? ये बात पूरी तरह झूठ
है
===================
55 करोड रुपये का प्रश्न तो 12 जनवरी, 1948
को यानी गांधीजी की हत्या के
18 दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले, चार बार
गांधीजी की- हत्या के
प्रयास हिन्दुत्ववादियों ने क्यों किये थे, इसका उनर
उनको देना चाहिए।
नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणील् नाम
की मराठी पत्रिका निकालता था।
गांधीजी की 125 वर्ष
जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद
'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर
जीने कौन देगा ?' यानी कि 125 वर्ष
आपको जीने ही कौन देगा ?
गांधीजी की हत्या से डेढ
वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह कथन साबित
करता है कि वे
गांधीजी की हत्या के लिए
बहुत पहले से प्रयासरत थे। 'अग्रणी' का यह
अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है।
फिर 55 करोड़ का सवाल कहा से आया ?
प्रथम बार हत्या का प्रयास :
===================
गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !
गांधीजी भारत आये उसके बाद
उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934
को किया गया। पूना में गांधीजी एक
सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब
उनकी मोटर पर बम फेंका गया था।
गांधीजी पीछे
वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये। हत्या का यह
प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले
के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र
पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है। 1934 में
तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज
पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल
ही कहा! से पैदा होता ?
==============
गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास
1944 में पंचगनी में किया गया।
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जुलाई 1944 में
गांधीजी बीमारी के
बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। तब
पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर
पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे गांधी-
विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे
को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया।
मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए
इन्कार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में
छुरा लेकर गांधीजी की तरफ
लपका। पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर
पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के
युवक ने नाथूराम को पकड लिया। पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम
नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित
तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-
हत्या की जा!च करने वाले कपूर-
कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम
इस घटना पर अपना बयान देते समय लिया था। भीलारे
गुरुजी अभी जिन्दा हैं। 1944 में
तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका खुद मुहम्मद
अली जिन्ना को भी भरोसा नहीं था।
ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि 1946 तक मुहम्मद
अली जिन्ना प्रस्तावित पाकिस्तान का उपयोग सना में
अधिक भागीदारी हासिल करने के लिए
ही करते रहे थे। जब पाकिस्तान का नामोनिशान
भी नहीं था, तब क्यों नाथूराम गोडसे ने
गांधीजी की हत्या का प्रयास
किया था ?
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गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास
==============
भी इसी वर्ष 1944 सितम्बर में,
वर्धा में, किया गया था।
गांधीजी मुहम्मद
अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए
बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी बम्बई न
जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहु!चा।
उसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था। उस गुट के थने के नाम के
व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ था। यह बात पुलिस-रिपोर्ट
में दर्ज है। यह
छुरा गांधीजी की मोटर के
टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था, ऐसा बयान थने ने
अपने बचाव में दिया था।
" यह बहुत ही उनेजित स्वभाववाला,
अविवेकी और अस्थिर मन
का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ
चिंता होती थी। गिरफ्तारी के
बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला।
(महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ
114)
===============
गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास
===============
29 जून, 1946 को किया गया था।
गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से
पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के
बीच में रेल पटरी पर बडा पत्थर
रखा गया था। उस रात को डांइवर की सूझ-बूझ के
कारण गांधीजी बच गये।
हिन्दुत्ववादियों की आँख में
गांधीजी किरकिरी की तरह
खटकते थे। 55 करोड रुपयों की तो बात
ही क्या, पाकिस्तान किसी के सपने में
नहीं था, तब से ये
गांधीजी की हत्या करने के
प्रयास में जुट गये थे। दुखद तथ्य यह है कि भारत में
गांधीजी की हत्या के
जो प्रयास हुए हैं, उनमें सबमें अधिक पूना के लोग
ही शामिल थे। इस प्रकार के तीन
प्रयासों में, और अन्त में हत्या में, खुद नाथूराम गोडसे शामिल
था। 55 करोड रुपये का प्रश्न तो 12 जनवरी,
1948
को यानी गांधीजी की हत्या के
18 दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले, चार बार
गांधीजी की- हत्या के
प्रयास हिन्दुत्ववादियों ने क्यों किये थे, इसका उनर
उनको देना चाहिए।
पाकिस्तान का निर्माण किसने किया ?
==========================
1937 में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद-अधिवेशन में खुद
सावरकर ने द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था।
मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए प्रस्ताव किया,
उससे तीन वर्ष पूर्व ही सावरकर ने
हिन्दू और मुसलमान, ये दो अलग-अलग
राष्टींयताए! हैं, यह प्रतिपादित किया था। जब
दो साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ काम करने
लगती हैं, तब दोनों एक ही लक्ष्य
की ओर अग्रसर होती हैं, और वह
होता है आत्मविनाश का। हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने ऐसा करके
अंग्रेजों और भारत-विभाजन चाहने वाले
मुसलमानों को फायदा ही पहु!चाया था।
मतान्ध हिन्दुत्व वादियो ने किया 1942
की आजादी के आन्दोलन का विरोध
==============================
==========
इन महान देशप्रेमियों ने 1942
की आजादी के आन्दोलन में तो भाग
नहीं ही लिया था, उल्टे ब्रिटिश सरकार
को पत्र लिखकर यह
जानकारी भी दी थी कि हम
आन्दोलन का समर्थन नहीं करते हैं।
गांधीजी आये, उसके पहले
राष्टींय राजनीति का नेतृत्व उनके पास
ही था। लेकिन तब भी उन्होंने उन
दिनों कोई बडा पराव्म नहीं किया था, यह हम
सबकी जानकारी में है ही।
गांधी के आने के बाद भी इन लोगों ने
राष्टंहित में कोई मामूली काम करने
की भी जहमत
नहीं उठाई।
गुरु गोलवलकर ने ऐडाल्फ हिटलर का अभिनन्दन किया, फिर
भी अंग्रेजों ने उनको गिरफ्तार
नहीं किया। रु गोलवलकर
की लिखी
"We, Our Nationhood Defined" शीर्षक
पुस्तक तो हिटलर
की भी तारीफ करने
वाली एक गन्दी पुस्तक है।
यद्यपि आर.एस.एस. ने इस पुस्तक का प्रकाशन अब बन्द
कर दिया है, लेकिन इस पुस्तक में व्यक्त विचारों में संघ
की आस्था अब
नहीं रही,
ऐसी घोषणा आर. स. स. ने आज तक
नहीं की है।
कारण यह कि अंग्रेज मानते थे कि ये दो कौडी के
निकम्मे लोग हैं। ये लोग तो तला पापड
भी नहीं तोड सकते ! अंग्रेजों का यह
आकलन था उनकी ताकत के बारे में।
भारत-विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग
तथा अंग्रेज हैं, उतने ही ये मतान्ध
हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं।
==========================
आजाद भारत में हिन्दू ही हुकूमत करेंगे, ऐसा शोर
मचाकर हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के
लिए एक ठोस आधार दे दिया था। ये विभाजनवादी लोग
मुहम्मद अली जिन्ना, सावरकर, हेडगेवार,
गोलवलकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि का भय
दिखाकर उनका चालाकीपूर्वक उपयोग करते थे।
हिन्दुत्ववादी अभी भी अपनी बेवकूफियों पर
गर्व का अनुभव करते हैं। अंग्रेजों को जिन्हें
कभी जेल में रखने की जरूरत
ही नहीं पडी, उन
गोलवलकर की अदृश्य ताकत का उपयोग अंग्रेज
गांधीजी के खिलाफ करते थे।
शहाबुद्दीन राठौड की भाषा में कहें
तो उस समय की राष्टींय
राजनीति में यो लोग जयचन्द थे। भारत का विभाजन
गांधी के कारण नहीं हुआ है, इन
लोगों के कारण हुआ है। गांधीजी ने
तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था।
गांधीजी ने अलग राष्ट्र
नही पाकिस्तान को स्टेट माना था।
====================
(देखें प्यारेलाल लिखित 'लास्ट फेज')
गांधीजी सर्वसमावेशक उदार
राष्टंवादी थे। इसीलिए उन्होंने सब
कौमों को अपनाया था, मात्र
मुसलमानों को ही नहीं। प्रत्येक
छोटी अस्मिता व्यापक राष्टींयता में मिल
जाय, यह चाहते थे गांधीजी। एक
राष्टींय नेता की यह
दूरदृष्टि थी।
विभाजन रोकने के लिए इन लोगों ने क्या किया ?
। गांधीजी को भारत-विभाजन
रोकना चाहिए था, यह मांग ये लोग किस मु!ह से करते हैं ?
गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए
उपवास करना चाहिए था, ऐसी अपेक्षा करने
का इनको क्या नैतिक-अधिकार है ? जिसको आप देश के लिए
कलंक समझते हैं, जिसका वध करना जरूरी मानते
हैं, उसी से आप ऐसी अपेक्षाए!
भी रखते हैं?
आपने क्यों नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ
किया ? सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के विरुद्ध
क्यों नहीं आमरण उपवास किया ?
क्यों नहीं इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक
आन्दोलन चलाया ? जिसको गालिया! देते हों, उसी से
देश बचाने की गुहार भी लगाते हो ?
और जब गांधीजी अकेले पड जाने के
कारण देश का विभाजन रोक नहीं पाये, तब आप
उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश
रचते हो ? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता ?
गोपाल गोडसे तथा अन्य दूसरे अनेक मतान्ध
हिन्दुत्ववादी विद्वानों के समक्ष ऐसे सवाल उठाये
गये हैं, लेकिन किसी के पास इसका कोई उत्तर
नहीं है। इन सबके बावजूद भी ये
अपनी डिंगे हांकने से बाज नहीं आते
हैं। सत्य को जानते हुए भी जो असत्य का प्रचार
करे, उसको धूर्त ही कहेंगे। ये मतान्ध
हिन्दुत्ववादी पहले दर्जे के धूर्त हैं।
भारत-विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार
नहीं थे। भारत-विभाजन के लिए कई ऐतिहासिक
तथा सामयिक तन्व एवं ताकतें जिम्मेदार थी। ब!
टवारा चाहने वाले मुसलमान जिम्मेदार थे, अंग्रेज जिम्मेदार थे
तथा उनके कारनामों के लिए अनुकूल राह बनाने-दिखाने वाले
मतान्ध हिन्दुत्ववादी जिम्मेदार थे।
ये मतान्ध हिन्दुत्ववादी लगातार जो तीन
झूठ बोल रहे हैं, उन झूठों की पोल इस लेख
को पढने के बाद खुल गई होगी ।
गांधी-हत्या की प्रेरक शक्तिया और
गोडसे जैसे हिन्दू राष्ट्रवादियों को पहचानें
============================
गांधी की हत्या के साथ 55 करोड
रुपयों का कोई सम्बन्ध नहीं हैं, इस बात
की स्पष्टता के बाद अब हिन्दुत्ववादियों
द्वारा प्रस्थापित तीसरे, 'मिथ'
की भी चर्चा कर लें। यह
तीसरा, 'मिथ' है
कि गांधीजी के हत्यारे प्रामाणिक
देशभक्त और बहादूर थे।
जैसा कि इनके द्वारा प्रचारित किया जाता है।
'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक में नाथूराम
की ऐसी ही छवि उभारने
की कोशिश की गयी है।
जो लोग असत्य तथा अर्धसत्य का सहारा लेते हैं
क्या उनको प्रामाणिक और बहादुर कहा जा सकता है ? जो लोग
सन्दर्भ को तोड-मरोड कर झूठ फैलाते हैं उनको बदमाश कहते
हैं या बहादूर ? इन लोगों ने
गांधीजी की हत्या का असली कारण
बताने का साहस किया होता तो जरूर उनको प्रामाणिक
कहा जा सकता था।
गांधीजी की हत्या के लिए
किये गये पिछले निष्फल
प्रयासों की जिम्मेदारी भी कबूल
की होती, तो भी कुछ भिन्न
बात होती। एक अहिंसानिष्ठ निःशस्त्र
व्यक्ति की हत्या करना कोई
मर्दानगी नहीं,
कोरी नपुंसकता है। जो लोग तार्किक
रीति से अपनी बात
दूसरों को समझा नहीं सकते, वे ही लोग
हिंसा का सहारा लेते हैं। हिंसा बुजदिलों का मार्ग है,
शूरवीरों का नहीं।
अपनी निष्फलता और हताशा में
ही हिन्दुत्ववादियों ने
गांधीजी की हत्या की थी।
जिस व्यक्ति के कारण अपने अस्तित्व पर संकट आता है,
वह व्यक्ति कांटे की तरह चुभने लगता है और
तब उस कांटे को निकलाने का प्रयत्न होता है।
हिन्दुत्ववादी समाचार-पत्रों में
गांधीजी की कटु आलोचनाए!
छपती थी।
गांधीजी को अभद्र गालिया! देने
वाली छोटीगछोटी पत्र-
पत्रिकाए!,प्रचारगपुस्तिकाए! तो इतनी छपवाते थे
कि यदि उनका संग्रह किया जाता तो एक
कमरा ही भर जाता। कुछ महान देशभक्त तो इतने
शूरवीर थे कि अपना नाम भी छापने
की उनकी हिम्मत
नहीं होती थी।
गांधी-द्वेष और मुस्लिम-द्वेष से ये हिन्दू
राष्टंवादी इतने पीडित थे कि राष्टंहित
किसमें है यह उनकी समझ में
ही नहीं आता था। उनके पेट में दर्द
तो इस बात का था कि गांधीजी के आने के
बाद नेतृत्व उनके हाथ से चला गया था।
इतना ही नहीं,
उनकी 'हिन्दूगब्राण्डराजनीति'
भी कालबाह्य
हो चुकी थी।
ब्रांणवादी राष्टंवाद की जगह ले
ली थी उदार
गांधीवादी राष्टंवाद ने। जाति-पा!ति, पंथ,
लिंग आदि भेदभावों को भूलकर
जनता गांधीजी के पीछे
चलने लगी थी।
राजनीति की बुनियाद से
साम्प्रदायिकता को हटाकर, गांधीजी ने
उसकी जगह अध्यात्म को प्रस्थापित कर दिया था।
अध्यात्म की बुनियाद पर
मानवतावादी राजनीति की इस
नयी धारा ने
गांधीजी को महात्मा बना दिया और
हिन्दुत्ववादी क्षीण होतेगहोते हासिये
पर चले गये थे। जो बहुत
महन्वाकांक्षी नहीं थे ऐसे कई
साम्प्रदायिक लोग राजनीति से अलग हो गये।
जनूनी और
महन्वाकांक्षी सम्प्रदायवादियों
की हालत पतली हो गयी।
वे गांधीजी के साथ
जा नहीं सकते थे और जनता उनके साथ आने के
लिए तैयार नहीं थी।
नाथूराम गोडसे का आर.एस.एस. से सम्बन्ध
नहीं रहा है, ऐसा घोषित करने
की भीख आर.एस.एस. के नेताओं ने
नाथूराम से ही मांगी थी।
हकीकत यह है कि गांधी-हत्या के
पाच वर्ष पहले तक नाथूराम आर.एस.एस. का प्रचारक था।
ये लोग योजनाबद्ध तरीके से सरदार पटेल
को हिन्दुत्ववादी साबित करने
की नीच हरकतें कर रहे थे।
===============
आर.एस.एस. पर से प्रतिबन्ध उठाया जा सके, इसके लिए सरदार
पटेल ने नाथूराम को ऐसा घोषित करने के लिए कहा था, यह
दावा गोपाल गोडसे करते हैं। इस प्रकार सरदार पटेल
हिन्दुत्ववादी थे, और आर.एस.एस. से मिले हुए
थे.
ऐसा गन्दा संकेत ये दो लोग बेशर्मी से करते हैं।
आरम्भ में गुरु गोलवलकर
की लिखी 'Our Nationhood
Defined" पुस्तक का उल्लेख किया गया है। इस पुस्तक
का प्रकाशन 1939 में हुआ था। इस पुस्तक के कारण जब
आर.एस.एस. के लिए कठिनाइया! बढने लगी, तब
तुरन्त उससे छुटकारा पाने के लिए गुरु गोलवलकर ने इस पुस्तक
के लेखक का नाम बदलकर बाबाराव सावरकर कर दिया। दूसरे के
नाम की पुस्तक अपने नाम पर प्रकाशित कराने
की बात हमने सुनी है। परन्तु इस
आदमी ने
तो अपनी चमडी बचाने के लिए
अपनी ही पुस्तक दूसरे के नाम कर
दी। ऐसे कायर और
कपटी आदमी को क्या प्रामाणिक,
बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ? गोपाल गोडसे ने
जेल से छूटने के लिए भारत सरकार को एकगदो बार
नहीं, 22 बार
अर्जी दी थी और ऐसे लोग
अपने को शूरवीर कहते हैं।
नाथूराम ने
गांधीजी की हत्या करने के
प्रयास अधिकतर प्रार्थना-सभाओंमें ही किये। जब
सब लोग प्रार्थना में लीन हों, उस वक्त ये 'नरबा!
कुरे'
गांधीजी की हत्या करना चाहते
थे। पूजा-प्रार्थना कर रहे आदमी पर
हमला नहीं करना चाहिए, ऐसा हिन्दुत्ववादियों के
प्रिय हिन्दू-युद्ध शास्त्र में कहा गया है। ये नामर्द
तो अपनी संस्कृति का भी अनुसरण
नहीं कर सकते।
हजारों लोगों की उपस्थिति वाली,
गांधीजी की प्रार्थना-सभा में
बम फेंकने में भी इन लोगों को शर्म
नहीं आयी। जिन लोगों के लिए निर्दोष
व्यक्तियों की जान की कोई
कीमत नहीं, उनको क्या प्रामाणिक,
बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ?????" -----
कमल राजपुरोहित
रविवार, 1 अक्टूबर 2017
राष्ट्र पिता
सरकारी आदेश से गांधी जी को राष्ट्र पिता नहीं कहा जाता । अपनी मर्जी से लोग कहते हैं । जो कहना नहीं चाहते वे न कहें । नेता जी, महात्मा, लौह पुरुष, कोकिला, गुरू, चाचा, वीर, ... कहने के लिए भी कोई नियम कानून नहीं बनाए गए हैं।
शनिवार, 30 सितंबर 2017
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास
कुछ दिन से हर टीवी डिबेट में यह बता रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक कोई आज का पैदा नहीं है बल्कि 1925 का जन्म लिया अनुभवी संगठन है । सोचा संघ के 90 वर्ष के जीवन का पोस्टमार्टम किया जाए ।
1925 कहने का तात्पर्य सिन्हा जी या अन्य संघ के विद्वानों का इसलिए है कि उसी समय इनके एक योद्धा "सावरकर" ने एक संगठन बनाया था जिसका संघ से कोई लेना देना नहीं था सिवाय इसके कि संघ को सावरकर से जहर फैलाने का सूत्र मिला । सावरकर पहले कांग्रेस में थे परन्तु आजादी की लड़ाई में अंग्रेज़ो ने पकड़ कर इनको "आजीवन कैद" की सज़ा दी और इनको "कालापानी" भेजा गया जो आज पोर्ट ब्लेयर( काला पानी) के नाम से जाना जाता है ।संघ के लोगों से अब "वीर" का खिताब पाए सावरकर कुछ वर्षों में ही अंग्रेज़ों के सामने गिड़गिड़ाने लगे और अंग्रेजों से माफी मांग कर अंग्रेजों की इस शर्त पर रिहा हुए कि स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहेंगे और अग्रेजी हुकूमत की वफादारी अदा करते उन्होंने कहा कि " हिन्दुओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की बजाए अपनी शक्ति देश के अंदर मुसलमानों और इसाईयों से लड़ने के लिए लगानी चाहिए" ध्यान दीजिये कि तब पूरे देश का हिन्दू मुस्लिम सिख एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के लिए मर रहा था शहीद हो रहा था और तब ना कोई यह सोच रहा था कि हिन्दू मुस्लिम अलग भी हो सकते हैं , तब यह "वीर" देश में आग लगाने की बीज बो रहे थे , जेल से सशर्त रिहा हुए यह वीर देश की आपसी एकता के विरूद्ध तमाम किताबों को लिख कर सावरकर ने अंग्रेजों को दिये 6 माफीनामे की कीमत चुकाई देश के साथ गद्दारी की और आजाद भारत में नफरत फैलाने की बीज बोते रहे ।
1947 में देश आजाद हुआ और देश की स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का फैसला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लिया तो इसी विचार के लोग इसके विरोध में और अंग्रेजों को वफादारी दिखाते राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को जला रहे थे और पैरों से कुचल रहे थे और मौका मिलते ही देश के विभाजन के समय हिन्दू - मुस्लिम दंगों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और मौका मिलते ही देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी क्युँकि सावरकर हेडगेवार की यह सोच थी कि इस देश में "गाँधी" के रहते उनके उद्देश्य पूरे नहीं होंगे। संघ के जन्मदाता हेडगेवार और गोवलकर ने गाँधी जी की हत्या करने के बाद (सरदार पटेल ने स्वीकार किया ) अपने विष फैलाने की योजना में लग गये , तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र के निर्माण में लग गये और संघ के लोग भविष्य के भारत को ज़हर से भरने के औज़ार बनाने लगे , नेहरू पटेल को उदारवादी कहिए या उनकी मूक सहमति , संघ को पैदा होते ही उसके देश विरोधी क्रिया
कलाप देख कर भी आंखें मूंदे रहे ।इस बीच संघ ने देश की एकता को तोड़ने के सारे वह साहित्यिक हथियार पुस्तकों के रूप में बना लिए जिससे हिन्दू भाईयों की धार्मिक भावना भड़के जिसका मुख्य आधार मुसलमानों से कटुता और मुगलों के झूठे आत्याचार थे , न्यायिक प्रक्रिया में दंड पाए लोगों को भी हिन्दू के उपर किया अत्याचार किया दिखाया गया , शासकीय आदेशों को तोड़ मरोड़कर हिन्दू भाईयों पर हुए अत्याचार की तरह दिखाया गया तथा इतिहास को तोड़ मरोड़कर मुगल शासकों को अत्याचारी बताया कि हिन्दुओं पर ऐसे ऐसे अत्याचार हुआ और औरंगज़ेब को उस अत्याचार का प्रतीक बनाया गया , एक से एक भड़काने वाली कहानियाँ गढ़ी गईं और इसी आधार पर संघी साहित्य लिखा गया पर जिस झूठ को सबसे अधिक फैलाया गया वो था कि " औरंगज़ेब जब तक 1•5 मन जनेऊ रोज तौल नहीं लेता था भोजन नहीं करता था" अब सोचिएगा जरा कि एक ग्राम का जनेऊ 1•5 मन (60 किलो) कितने लोगों को मारकर आएगा ? 60 हजार हिन्दू प्रतिदिन , दो करोड़ 19 लाख हिन्दू प्रति वर्ष और औरंगज़ेब ने 50 वर्ष देश पर शासन किया तो उस हिसाब से 120 करोड़ हिन्दुओं को मारा बताया गया जो आज भारत की कुल आबादी है और तब की आबादी से 100 गुणा अधिक है ।पर ज़हर सोचने समझने की शक्ति समाप्त कर देती है तो भोले भाले हिन्दू भाई विश्वास करते चले गए ।इन सब हथियारों को तैयार करके संघ अपनी शाखाओं का विस्तार करता रहा और हेडगेवार और गोवलकर एक से एक ब्राह्मणवादी ज़हरीली किताबें लिखते रहे प्रचारित प्रसारित करते रहे जिनका आधार "मनुस्मृति" थी और गोवलकर की पुस्तक "बंच आफ थाट" संघ के लिए गीता बाईबल और कुरान के समकक्ष थी और आज भी है।नेहरू के काल में ही अयोध्या के एक मस्जिद में चोरी से रामलला की मुर्ति रखवा दी गई और उसे बाबर से जोड़ दिया गया जबकि बाबर कभी अयोध्या गये ही नहीं बल्कि वह मस्जिद अयोध्या की आबादी से कई किलोमीटर दूर बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाई थी , ध्यान रहे कि उसके पहले बाबरी मस्जिद कभी विवादित नहीं रही परन्तु नेहरू आंख बंद किये रहे ।नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का समयकाल प्रारंभ हुआ और सख्त मिजाज इंदिरा गांधी के सामने यह अपने फन को छुपाकर लुक छिप कर अपने मिशन में लगे रहे और कुछ और झूठी कहानियाँ गढ़ी और अपना लक्ष्य निर्धारित किया जो "गोमांस , धारा 370 , समान आचार संहिता , श्रीराम , श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर , स्वदेशीकरण थे । इंदिरा गांधी ने आपातकाल में जब सभी को जेल में ठूस दिया तो संघ के प्रमुख बाला साहब देवरस , इंदिरा गांधी से माफी मांग कर छूटे और सभी कार्यक्रम छुपकर करते रहे पर इनको फन फैलाने का अवसर मिला इंदिरा गांधी की हत्या के बाद , तमाम साक्ष्य उपलब्ध हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में संघ के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था ।राजीव गांधी बेहद सरल और कोमल स्वभाव के थे और उतने ही विनम्र , जिसे भाँप कर संघियों ने अपना फन निकालना प्रारंभ किया और हिन्दू भाईयों की भावनाओं का प्रयोग करके श्रीराम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद को हवा दे दी और आंदोलन चला दिया , पर पहले नरम अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटे के रूप में आगे किया जिसकी स्विकरोक्ती गोविंदाचार्य ने भी अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटा कह कर की , संघ का दोगलापन उजागर करने की कीमत उनको संघ से बाहर करके की गई और वह आजतक बाहर ही हैं । दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी तमाम तैयार हथियारों के सहारे हिन्दू भाईयों को उत्तेजित करते रहे जैसे आज योगी साध्वी और तोगड़िया करते हैं ।राजीव गांधी के पास संसद में इतनी शक्ति थी कि संघ को कुचल देते तो यह देश के लिए सदैव समाप्त हो जाते परन्तु सीधे साधे राजीव गांधी कुटिल दोस्तों की बातों को मानकर गलत ढुलमुल फैसलों से संघ को खाद पानी देते रहे , कारसेवा और शिलान्यास के नाम पर राजीव गांधी का इस तरह प्रयोग किया गया कि संघ को फायदा हो और संघ की रखैल भाजपा ने उसका खूब फायदा उठाया और दो सीट से 88 सीट जीत गई ।फिर वीपी सिंह की सरकार बनी भाजपा और वाम मोर्चा के समर्थन से तथा संघी जगमोहन को भेजकर काश्मीर में आग लगा दिया गया ।
अब सब हथियार और ज़मीन तैयार हो चुकी थी और प्रधानमंत्री नरसिंह राव का समय काल प्रारंभ हुआ जो खुद संघ के प्रति उदार थे , उड़ीसा में पादरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जलाकर मारने के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद संघ ने इसाईयों के प्रति नफरत फैलाने की नीति छोड़कर सारी शक्तियों को देश के मुसलमानों से नफरत फैलाने में लगा दिया , संघ ने प्रधानमंत्री राव की चुप्पी का फायदा उठाया अपने बनाए झूठे हथियारों से हिन्दू भाईयों के एक वर्ग की भावनाएँ भड़काई और अपने साथ जोड़ लिया । साजिश की संसद और उच्चतम न्यायालय को धोखा दिया और अपने लम्पटों के माध्यम से बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर को गिरा दी ।
इसके बाद अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो सारे जन्म स्थान के मंदिर 370 स्वदेशीकरण सब दफन कर दिया गया और हर छोटे बड़े दंगों में शामिल रहा संघ ने साजिश करके गुजरात में इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार कराया और अपने चरित्र के अनुसार एक नायक बनाया। फिर अपने असली रूप चरित्र और सिद्धांतों के अनुसार उसी असली नायक नरेंद्र मोदी को आगे किया और झूठ और फेकमफाक के आधार पर और आज सत्ता पर कब्जा किया।
संघ की यह सब राजनीति उत्तर भारत के प्रदेशों के लिए थी क्युँकि मुगलों का शासन अधिकतर उत्तर भारत में ही था। दक्षिण के राज्य इस जहर से अछूते थे इसलिए अब वहाँ भी एक मुसलमान शासक को ढूढ लिया गया और देश की आजादी से आजतक 67 वर्षों तक निर्विवाद रूप से सभी भारतीयों के हृदय में सम्मान पा रहे महान देशभक्त टीपू सुल्तान आज उसी प्रकिया से गुजर रहे हैं जिससे पिछले सभी मुगल बादशाह गुजर चुके हैं , मतलब हिन्दुओं के नरसंहारक बनाने की प्रक्रिया।और आज उनकी जयंती पर हुए विरोध में एक यूवक की हत्या भी कर दी गई।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो जुल्मों और लूट का जो इतिहास प्रमाणित रूप से दुनिया के सामने हैं यह उसकी निंदा भी नहीं करते , इस देश को सबसे अधिक लूटने वाले अंग्रेजों की ये कभी आलोचना नहीं करते जो देश की शान "कोहिनूर" तक लूट ले गये , जनरल डायर की आलोचना और जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए इनके आँसू कभी नहीं गिरते , आज संघ के पास शस्त्र सहित कार्यकर्ताओं की फौज है जो शहरों में दहशत फैलाने के लिए सेना की तरह फ्लैगमार्च करते हैं , संविधान की किस धारा के अनुसार उन्हे यह अधिकार है यह पता नहीं । भारतीय इतिहास में जुल्म जो हुआ वह अंग्रेज़ों ने किया और उससे भी अधिक सदियों से सवर्णों ने किया दलितों और पिछड़ों पर , जब चाहा जिसे चाहा सरेआम नंगा कर दिया जो इन्हे दिखाई नहीं देता क्योंकि इनको जुल्मों से मतलब नहीं आपस में लड़ाकर देश मे जहर फैलाकर सत्ता पाने से है और उसके लिए देश टूट भी जाए तो इनसे मतलब नहीं।
इसी लिये कहता हूँ साजिशें करने मे माहिर संघ को "संघमुक्त भारत" करके ही इस देश का भला हो सकता है और यह समय इस अभियान के लिए सबसे उपयुक्त है। jai bhim jai bharat ramkumar Singh.
मृत्यु का जश्न
शुक्रवार, 29 सितंबर 2017
मोक्ष या जन्नत नहीं मिलने वाला
किसी भी धार्मिक ग्रन्थ को पढ़ कर सोच विचार करना चाहिए। जन्नत या मोक्ष पाने के लिए पढने से कुछ नहीं मिलेगा।
गुरुवार, 21 सितंबर 2017
ऊपर वाले की_मर्जी
लेकिन फिर भी विभिन्न धार्मिक स्थलों, धार्मिक आयोजनों एवं धार्मिक लोगों की रक्षा करने में वह अपने आपको असहाय महसूस करता। इन सब पर वह अपनी शैतानित क्यों करता है? कोई भी धर्म इसका सही सही जवाब नहीं दे पाता। इसकी इस तरह की हरकतों से तो यही लगता है कि शैतान ही खुदा है। देखिये उसकी शैतानियतः-
बुधवार, 13 सितंबर 2017
पितृ श्राद्ध
मान्यता है कि पितरों को पितृ पक्ष में यमराज श्राद्ध ग्रहण करने के लिए पृथ्वी पर भेजते हैं ।
कि पितृ रिण से मुक्ति के लिए पितृ पक्ष में पितृ श्राद्ध करना चाहिए ।
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पितृ पक्ष होता है। मातृ पक्ष क्यों नहीं?
पितृ रिण से मुक्ति चाहिए? मातृ रिण से नहीं? क्यों?
यह कैसे पता चले कि पितर कब तक यमराज के चंगुल में रहेंगे? कब छूटकर पुनर्जीवित होंगे ?
सोमवार, 11 सितंबर 2017
सेवा निवृत्त शिक्षक पढ़ाएं
सेवा निवृत्त शिक्षकों को अपने गांव शहर के विद्यार्थियों को मार्गदर्शन करना चाहिए । इससे उनकी आयु में वृद्धि होती है । परीक्षित है।
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
इंसान से इंसान की दूरी
मंगलवार, 5 सितंबर 2017
शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को नमन
शिक्षक दिवस के अवसर पर क्या द्रोणाचार्य जैसे रिश्वतखोर पक्षपाती शिक्षकों का भी सम्मान करना चाहिए? जो स्कूल का समय या पैसा खाते हैं वे सम्मान के पात्र हैं?
जो भी हो शिक्षक दिवस के अवसर पर योग्य अयोग्य, इमानदार बेइमान, शराबी गंजेड़ी सभी शिक्षकों को नमन ।..
शिक्षक दिवस का औचित्य
शासन का आदेश है. हर वर्ष 05 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाने के लिए छुट्टी रहेगी। तदनुसार स्कूलों में शिक्षक ही शिक्षक दिवस मनाते हैं। वे विद्यार्थियों को सिखाते हैं शिक्षकों का चरण स्पर्श कर फूल माला पहनाएं । फिर वही शिक्षक शिक्षकों का महत्व बताते हैं... शिक्षक राष्ट्र निर्माता होते हैं। गुरू गोविंद दोऊ खड़े हैं... याने शिक्षक भगवान के बराबर हैं उनका सम्मान करना चाहिए ।
डाॅ राधा कृष्णन जी को राष्ट्रपति पद का आफर मिलने से वे प्राध्यपक पद से स्तीफा दे दिए। कहते हैं कि उन्होंने शिक्षक पद की गरीमा बढ़ाई । मेरे विचार से यदि वे राष्ट्रपति पद स्वीकार न कर काॅलेज में ही अध्यापन करते तो निश्चित ही शिक्षक पद की गरीमा बढ़ी होती ।
उन्होंने कहा कि उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए । शिक्षकों की गरीमा बढ़ाने के बहाने खुद का जन्मदिन मनाने की इच्छा जाहिर करना भी आश्चर्य है ।
सभी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ऐसा कहें तो....
शिक्षक श्रमिक होता है जो पारिश्रमिक लेकर अध्यापन करता है। निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा करने की कोशिश करता है। हर साल शिक्षक दिवस मनाकर शिक्षकों के सम्मान करने का क्या औचित्य है? अन्नदाता कृषक जो खेतों में पसीना बहाकर हमारा जीवन रक्षा करता है, बय ट्रेन जहाज का चालक जो हमें सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाता है, पोलिस सेना जो जान पर खेलकर हमारी रक्षा करता हैं, स्कूल कार्यालय में जो सबकी सेवा कर कर्मियों अधिकारियों की कार्य क्षमता बढा़ते हैं भृत्य चपरासियों का हम कितना सम्मान करते हैं? नहीं करते तो क्यों?
रविवार, 3 सितंबर 2017
देवी देवताओं से मांगना
निश्चित ही देवी देवता अपने जमाने के महान रहे होंगे । वे देश समाज के लिए अच्छा काम किए होंगें। इसी लिए वे अमर हैं।
मेरे विचार से आज उनसे कुछ मांगना निरर्थक है । बेहतर है उनसे प्रेरणा लें और
कुछ अच्छा काम करें । ईमानदार रहें ।
युवा जाग रहे हैं
मनुवादियों को नहीं चलेगी । अब युवा वर्ग जाग रहा है । वह लकीर के फकीर बनना नहीं चाहता ।
शुक्रवार, 1 सितंबर 2017
चमत्कार की आशा
Ajaib Jalalana
किसी चमत्कार की आस में इंसान अपनी पूरी जिंदगी को बर्बाद कर लेता है।वह भ्र्म पाल लेता है,शायद किसी चमत्कार से उसे स्वर्ग मिल जायेगा!! पूरी जिंदगी ही बदल जाएगी!! गुरबत(गरीबी)से छुटकारा तो पक्का मिल ही जाएगा!!परन्तु ये ख्वाब,ख्वाब ही बनकर रह जाते हैं।उधर अपनी कीमती जिंदगी किसी दांव पर लग गई होती है।
वैसे तो शताब्दियों से प्रत्येक धर्म के अगुवाओं को एक चमत्कारित रूप में पेश किया जाता रहा है।ताकि उनके भावी अनुयाइयों में आस्था के नाम पर अन्धविश्वासों को पक्का कायम किया जाये। और धार्मिक नेता को चमत्कारी घोषित करके अन्धविश्वासी लोगों की एक अच्छी खासी संख्या अपनी तरफ खींच ली जाये।
डेरा सिरसा से सबंधित पूर्व बाबा के अनेकों चमत्कारों को पुस्तकों में छपा हुआ देख सकते हैं;
एक बार की बात है,बाबा जी मौजगढ़ के पास भाखड़ा नहर के किनारे टहक रहे थे,वहां उन्होंने क्या देखा!नहर में एक बड़ी मछली छोटी मछलियों को शिकार बना करके उन्हें खा रही थी।ये देखकर बाबा जी का दिल पसीज गया!उन्होंने कहा ये तो अन्याय है! कलयुग है!घोर पाप!फिर क्या था,बाबा जी ने अपनी जेब में से कुछ बचा हुआ प्रसाद निकाला,और उस प्रसाद को पानी में डाल दिया।बड़ी मछली ने उस प्रसाद को चख लिया!उसके बाद एक ऐसा चमत्कार हुआ!!उस मासाहारी बड़ी मछली ने आगे से जीवों को खाना ही छोड़ दिया!!!
लो कर लो बात...भला कोई उनसे पूछे..पानी में रहने वाला जीव,प्रसाद के चमत्कार से अपने खाने का मीनू कैसे बदल सकता है??
गुरुवार, 31 अगस्त 2017
पाश्चात्य सभ्यता घटिया है?
Sanjeev Mongia
हमे जब भी मौका मिलता है ,हम पाश्चात्य सभ्यता को खूब लताड़ते है . और अपनी संस्कृति पर जम कर गर्व करते है . क्या बुरा करते है गोरे ? eat , drink and be merry ,क्या खराबी है , इस कथन में ? कम से कम वो दोगले तो नही है . जम कर पांच दिन मेहनत करते है और दो दिन ऐश.
और हम हिन्दुस्तानी . खूब गीता का महिमागान करेगे . लेकिन असलियत यह है की हम कर्म में नही भाग्य में विश्वास करते दिखते है . हर दूसरा , तीसरा आदमी , जन्हा तन्हा कुंडलिया बनवा कर , अपनी अंगूठी तैयार करता नजर आता है . अब तो टेरो कार्ड, वास्तुशास्त्र जैसी नई बलाए भी आ गई है . हर आदमी सोचता है , वेष्णु देवी या तिरुपति जैसी जगह जाने पर उसको मनवांछित फल मिल जाएगा .
और सब प्रयासों के बावजूद जब फल नही मिलता तो शनि देवता के साडे साती का प्रकोप समझ कर कर शांत हो जाता है . इस तरह के सब विचार , आदमी को बिलकुल निष्क्रिय बना देते है
इन बाबायो का पैदा होना उनकी चतुराई नही , बल्कि हमारा ... निठल्लापंन है .
हमारी संस्कृति महान
हम हिंदुओं के सबसे अधिक भगवान और देवी देवता हैं इसीलिए तो हम हिंदू महान हैं। हमारी संस्कृति महान है| याद है हमारे भगवान देवी देवताओं के नाम? तैंतीस करोड़?

