शनिवार, 19 अगस्त 2017

आस्तिकता से अधार्मिक

Dinesh Aastik -
संसार का सबसे बड़ा अधर्म तो धर्म है। पहले खूब चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, शोषण, कुकर्म करो फिर आस्तिक बनकर गंगा में नहाकर या खुदा से तौबा करके अधर्म के पाप से मुक्त हो जाओ। पापियों ने धर्म का निर्माण अपनी सुरक्षा के लिेय किया होगा। यानि आस्तिकता मनुष्य को अधार्मिक बनाती है।

मंदिर मस्जिद के बदले साइंस म्युजियम

Dr Vijay Mehta
हिंदू और मुसलमानों को कोई काम करने का मौका मिले तो उन्हे मंदिर /मस्जिद बनाने का ख़याल ही क्यों आता है ??सार्वजानिक प्लॉट ,सरकारी ज़मीन ,सड़क ...कहीँ भी धर्मस्थल ही बनाने को उत्सुक. ...लॉग पैसे देने को भी तैयार .
देष में स्कूलों से ज्यादा मंदिर है .अब और ज़रूर नहीँ .(कम करने है )मंदिर के घंट से ज्यादा स्कूल का घंट समाज को ज्यादा उपयोगी साबित हुआ है .
कोई गाँव ,शहर में कितने पुस्तकालय है उससे उस शहर का CI- culture index नापा जा सकता है .
मुजे खुशी होती अगर UAE मे मंदिर के बदले science museum के लिये जगह मिलती .

अंधविश्वास छोड़़ो हकीकत पहचानो

Shrawan Bishnoi -

भावनाएं आहत

Mithilesh K Sinha 
नास्तिक कहते हैं कि ऊपरवाला नहीं है तो आस्तिकों की भावनाएं आहत हो जाती हैं, लेकिन जब आस्तिक कहते हैं कि उपरवाला है तो क्या नास्तिको की भावनाएं आहत नही होती ?
- Ricky Gervais

रास्ते अलग , लक्ष्य एक

गांधी जी आज़ादी चाहते थे
गांधी जी अहिंसा वादी थे, आदर्शवादी थे... वो शांतिमय तरीके से आज़ादी चाहते थे
(जैसा कि एक पक्ष कहता है)
तो
भगत सिंह भी आज़ादी चाहते थे...
भगत सिंह आक्रामक थे, उन्होंने ज़ुर्म के खिलाफ हिंसक तरीके से आवाज़ उठाई, अंग्रेजों को मारकर भगाया।
(जैसा कि दूसरा पक्ष कहता है)
लेकिन गांधीवादियों की नज़र में भगत सिंह एक हिंसक व्यक्ति थे
और
भगत सिंह के मानने वालों की नज़र में गांधीजी दोगले थे ।
इसमें शहीद भगत सिंह या गांधी जी की गलती नहीं;
गलती है आप लोगों की सोच की...
क्योंकि आप उनकी नीयत न देखकर तरीका देखने चले...
मेरी नज़र में हिंसा गलत है तो दूसरे की नज़र में ज़ुर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना सही है... हिंसक होना सही है लेकिन सिर्फ अपनी इन वजहों के कारण हम दूसरे शहीदों या महापुरुषों के चरित्र पर लांछन नहीं लगा सकते।

एक मंदिर जहाँ कोई प्रतिमा नहीं

एक मंदिर जहां देवी देवताओं की कोई प्रतिमा नही है। यहां साक्षात देवी देवता शिक्षार्थियों को शिक्षा देते हैं।.          द्वार पर देवों के देव महादेव श्री शशिधर पंडा (संस्थापक बटमूल आश्रम महाविद्यालय महापल्ली जिला रायगढ़ छत्तीसगढ़ )
के साथ उनके गण विचार विमर्श में तल्लीन हैं |                  यह महाविद्यालय दान से चलता है। न्यूनतम शुल्क,  अच्छी पढ़ाई, बेहतर परीक्षा परिणाम इसकी विशेषताएं हैं। प्राचार्य तथा प्राध्यपक गण बहुत कम वेतन लेकर गुणवत्तायुक्त अध्यापन करते हैं।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

तर्क से नास्तिक

धार्मिक पुस्तकों को समझने के लिये बुद्धि और तर्क की जरूरत नहीं है, बल्कि अज्ञान और अन्धविश्वास की आवश्यकता होती है। यदि आपके पास तार्किक बुद्धि है तो इन्हें पढ़ने के बाद आपका इनकी सच्चाई से विश्वास उठ जायेगा। आपके मन में जो सवाल उठेंगे, उनका उत्तर न मिलने के कारण आप आस्तिक से नास्तिक बन जायेगे। कहने का अर्थ है कि धार्मिक पुस्तकें तार्किक बुद्दि के कारण मनुष्य को नास्तिक बनाती हैं।

मस्जिद में औरतों से खतरा?

Meraj Anwar
क्या मस्जिद (खुदा के घर) में भी औरतों को, मर्दों से खतरा है?? क्या तुम लोगों का वहां भी पुरुषत्व जाग जाएगा??? तो फिर औरतों को मस्जिद जाने से मनाही क्यों???
मेरी भोली-भली आधी आबादी, आप समझती क्यों नहीं कि आपको धर्म कभी आज़ाद कर ही नहीं सकता, आप गुलाम बनके क्यों रहना चाहती हैं??? आप बगावत क्यों नहीं करती???

धार्मिक ग्रंथ नारी लिखी होती तो

Dinesh Aastik
यदि धार्मिक पुस्तकें नारी ने लिखी होतीं???
इसे केवल सवाल न समझे, यही सच्चाई होती।
यदि सभी धर्मों की किताबें नारी ने रचाई होती।
हम पुरुष किसी भगवानी का व्रत रख रहे होते,
कई पति रखने वाली से हमारी सगाई होती।।

मतिर्भिन्ना

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना । ऐसा ही होना चाहिए । अगर brain wash कर कोई विचारधारा भर दिया जाय तो एक ही तरह के विचार वाले हो सकते हैं जो कदापि उचित नहीं है। रोबोट एक ही विचार धारा के हो सकते हैं।
मेरे विचार या मेरे द्वारा शेयर किए गए दूसरों के विचारों, जानकारियों से सहमत होना जरुरी नहीं है

सोमवार, 14 अगस्त 2017

कृपया अवश्य पढ़ें । हृदयाघात

Dr Bharti _
.
~आवश्यक सूचना~
जरा सोचिये कि शाम के 7:25 बजे है और आप घर जा रहे है वो भी एकदम अकेले ।
ऐसे में अचानक से आपके सीने में तेज दर्द होता है जो आपके हाथों से होता हुआ आपके जबड़ो तक पहुँच जाता है ।
आप अपने घर से सबसे नजदीक अस्पताल से 5 मील दूर हैं और दुर्भाग्यवश आपको ये नहीं समझ मे आ रहा कि आप वहां तक पहुँच पाएंगे कि नहीं ।
आप सी पी आर में प्रशिक्षित हैं मगर वहां भी आपको ये नहीं सिखाया गया कि इसको खुद पर प्रयोग कैसे करें ।
ऐसे में दिल के दौरे से बचने के लिए ये उपाय आजमाए :-
चूँकि ज्यादातर लोग दिल के दौरे के वक्त अकेले होते हैं l
बिना किसी की मदद के उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है ।
वे बेहोश होने लगते हैं और उनके पास सिर्फ 10 सेकण्ड्स होते है ।
ऐसे हालत में पीड़ित जोर जोर से खांस कर खुद को सामान्य रख सकता है ।
एक जोर की सांस लेनी चाहिए हर खांसी से पहले और खांसी इतनी तेज हो कि छाती से थूक निकले ।
जब तक मदद न आये ये प्रक्रिया दो सेकंड से दोहराई जाए ताकि धड्कन सामान्य हो जाए ।
जोर की साँसे फेफड़ो में ऑक्सीजन पैदा करती हैं और जोर की खांसी की वजह से दिल सिकुड़ता है जिससे रक्त संचालन नियमित रूप से चलता है ।
जहाँ तक हो सके इस सन्देश को हर एक तक पहुंचाए ।
एक ह्रदय के डॉक्टर ने तो यहाँ तक कहा कि अगर हर व्यक्ति यह सन्देश 10 लोगो को भेजे तो एक जान बचायी जा सकती है ।
आप सबसे निवेदन है कि चुटकले भेजने के बजाय यह सन्देश सबको भेजे ताकि लोगों की जान बच सके ।
अगर आपको यह सन्देश बार बार मिले तो परेशान होने के बजाय आपको खुश होना चाहिए कि आपको यह बताने वाले बहुत जन है कि दिल के दौरे से कैसे बचा जाये ।
धन्यवाद !!
कृपया अपने सभी मित्रों से शेयर करना न भूलें।

धर्म और धम्म

Rattan Lal Gottra
*बुध्द कहते हैं- ईश्वर कहीं भी नही हैं उसे ढूढ़ने में अपना वक़्त और ऊर्जा बर्बाद मत करों ।*
*धर्म और धम्म मेँ अंतर-*
👉 *धर्म में आप ईश्वर के खिलाफ नहीँ बोल सकते, धर्म ग्रंथो की अवेहलना नहीँ कर सकते, अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीँ कर सकते।*
*जबकि धम्म मेँ तो स्वयं को जाँचने परखने और अपनी बुद्धि का प्रयोग करने की शिक्षा हैँ।*
👉 *धर्म कहता हैँ कि तेरा भला करने तथाकथित ईश्वर जैसी कोई ताकत आयेगी।*
*जबकि धम्म कहता हैँ- अत्त दीप भवः अर्थात अपन दीपक स्वयं बनो।*
👉 *बुध्द भी कहते हैँ: "ना मैँ मुक्तिदाता हुँ, ना मैँ मोक्षदाता हुँ। मैँ सिर्फ मार्ग दिखाने वाला हूँ। धम्म अर्थात जीवन जीने का सर्वोतम मानवतावादी आधार ।*
👉 *बहुत से लोग मानते होँगे कि धर्म और धम्म एक ही हैँ। उनको विश्लेषण करने की जरुरत हैँ। धर्म मेँ जन्म लेना पङता हैँ, जबकि धम्म में (शिक्षा) प्राप्त करनी पङती हैँ। जिसे कोई भी प्राप्त कर सकता हैँ।*
👉 *बुद्ध ने अपने अनुयाइयोँ से कहा था कि धर्म में अतार्किक बातेँ हैँ। जैसे आत्मा, परमात्मा,भूत, ईश्वर, देवी-देवता आदि। जबकि धम्म वैज्ञानिक द्रष्टिकोण पर आधारित हैँ। धम्म तर्क और बुद्धि को प्राथमिकता देता है। इसलिये ईश्वर को नकारता हैँ।*

👉 *धर्म मेँ असामनता है, भेदभाव है, ऊँच-नीच है। जबकि धम्म मेँ सब एक है। सब बराबर हैँ। कोई भेदभाव नही है। धम्म एक शिक्षा है, एक ज्ञान है, जो सबके लिये है। धर्म मेँ विभाजन है। अधिकार वर्गोँ मेँ विभाजित है। जबकि धम्म मेँ वर्गहीनता है। अधिकार और ज्ञान सभी के लिये है।*
👉 *धर्म मेँ कोई ब्रम्हा को सृष्टि का रचयिता बताता है, तो कोई स्वयं को ईश्वर का दूत कहता है। जबकि धम्म की शिक्षा देने वाले ने खुद को ईश्वर का दूत ना बताकर खुद को एक सच्चा मार्ग दिखाने वाला मनुष्य बताया।*
👉 *तथागत गौतम बुध्द, ’बुध्द’ का अर्थ बताते हुए कहते हैँ: "बुध्द" एक’अवस्था अथवा स्थिति का नाम हैँ। एक ऐसी स्थिति जो मानवीय ज्ञान की चरम अवस्था है। जब मनुष्य अपने तर्क और ज्ञान से एक दुर्लभ अवस्था (बोधिसत्व) को प्राप्त कर लेता है वो ‘बुध्द’ कहलाता है।*
👉 *बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर को भी बोधिसत्व का दर्जा दिया गया हैँ, जो कार्य तथागत गौतम बुध्द ने अपने ज्ञान की बदौलत किया, वैसा ही कार्य डॉ. आम्बेडकर ने अपने ज्ञान की बदौलत किया। अतः वो भी ‘बोधिसत्व’ हुए।*
👉 *धर्मोँ मेँ कानून की कठोरता है। जबकि धम्म को मानने या ना मानने मेँ आप पूर्णतया स्वतंन्त्र है।*
👉 *धम्म आप पर कोई कानून नहीँ थोपता। धर्म मेँ सब कुछ फिक्स होता है। जैसे: जो धर्म ग्रंथों मेँ लिखा है, वही सत्य है। उसका पालन किसी भी कीमत पर आवश्यक है। जबकि धम्म परिस्थितियों के आधार पर मानव हित के लिये परिवर्तन को मानता है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता हैँ।*
👉 *धम्म ‘ज्ञान’ है। इसलिये इससे तर्क-वितर्क और शिक्षा मे बढोतरी हो सकती है।* *जबकि धर्म मानव निर्मित ‘कानून’ है। ये जो भी नीला -पीला हैँ वही धर्म है।*
*वैज्ञानिक तर्क वितर्क ही सफल जीवन का मूल आधार हैं !*

धर्म का अपडेट कब?

आप लंगोट से जौकी पर आ गये। पायजामे से पतलून पर आ गये। नाड़े से बेल्ट पर आ गये। खड़ाऊँ से बूट पर आ गये। कलम से कीबोर्ड पर आ गये। पगडंडियों से एक्सप्रेस वे पर आ गये। चूल्हे से इंडक्शन कुकर पर आ गये। जंगलो से अपार्टमेंट तक आ गये। हल से ट्रैक्टर पर आ गये। पैदल से लक्ज़री जहाज़ों पर आ गये। दीये-मशाल से एलईडी पर आ गये। तीर-कमान और गदा से ऑटोमैटिक बंदूकों और मिसाइलों पर आ गये। आप पाँच हज़ार ईसापूर्व और पाँचवी-छठवीं शताब्दी से इक्कीसवी शताब्दी में आ गये।
आप लगातार अपडेट होते रहे हैं।
.
.
आपका धर्म कब अपडेट होगा?
आपकी आस्था कब अपडेट होगी?
आपका ईश्वर कब अपडेट होगा?
आपकी सोच कब अपडेट होगी?
आपके धर्म की किताबें कब अपडेट होंगी॥
ज्ञान का दीपक जलाओ ॥
अंधभक्ति मिटाओ ॥ 🙏🏽

हम इंसान गवां बैठे

Dharmaraj Mahapatra
मस्ज़िद तो हासिल हमको , खाली इमान गवा बैठे.....
मंदिर को बचाया लड़-भीड़ कर, खाली भगवान गवा बैठे.....
धरती को हमने नाप लिया, हम चाँद सितारों तक पहुचे....
पूरी कायनात को जीत लिया, हम खाली इंसान गवा बैठे.....
मजहब के ठेकेदारों ने फिर आज, हमे यू भड़काया....
काजी और पंडित जिन्दा थे, हम अपनी जान गवा बैठे

कृपया अवश्य पढ़ें

Dr Bharti _
.
~आवश्यक सूचना~
जरा सोचिये कि शाम के 7:25 बजे है और आप घर जा रहे है वो भी एकदम अकेले ।
ऐसे में अचानक से आपके सीने में तेज दर्द होता है जो आपके हाथों से होता हुआ आपके जबड़ो तक पहुँच जाता है ।
आप अपने घर से सबसे नजदीक अस्पताल से 5 मील दूर हैं और दुर्भाग्यवश आपको ये नहीं समझ मे आ रहा कि आप वहां तक पहुँच पाएंगे कि नहीं ।
आप सी पी आर में प्रशिक्षित हैं मगर वहां भी आपको ये नहीं सिखाया गया कि इसको खुद पर प्रयोग कैसे करें ।
ऐसे में दिल के दौरे से बचने के लिए ये उपाय आजमाए :-
चूँकि ज्यादातर लोग दिल के दौरे के वक्त अकेले होते हैं l
बिना किसी की मदद के उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है ।
वे बेहोश होने लगते हैं और उनके पास सिर्फ 10 सेकण्ड्स होते है ।
ऐसे हालत में पीड़ित जोर जोर से खांस कर खुद को सामान्य रख सकता है ।
एक जोर की सांस लेनी चाहिए हर खांसी से पहले और खांसी इतनी तेज हो कि छाती से थूक निकले ।
जब तक मदद न आये ये प्रक्रिया दो सेकंड से दोहराई जाए ताकि धड्कन सामान्य हो जाए ।
जोर की साँसे फेफड़ो में ऑक्सीजन पैदा करती हैं और जोर की खांसी की वजह से दिल सिकुड़ता है जिससे रक्त संचालन नियमित रूप से चलता है ।
जहाँ तक हो सके इस सन्देश को हर एक तक पहुंचाए ।
एक ह्रदय के डॉक्टर ने तो यहाँ तक कहा कि अगर हर व्यक्ति यह सन्देश 10 लोगो को भेजे तो एक जान बचायी जा सकती है ।
आप सबसे निवेदन है कि चुटकले भेजने के बजाय यह सन्देश सबको भेजे ताकि लोगों की जान बच सके ।
अगर आपको यह सन्देश बार बार मिले तो परेशान होने के बजाय आपको खुश होना चाहिए कि आपको यह बताने वाले बहुत जन है कि दिल के दौरे से कैसे बचा जाये ।
धन्यवाद !!
कृपया अपने सभी मित्रों से शेयर करना न भूलें।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

जाति धर्म के नाम पर वोट

Yash Baghel
जितने जाति और धर्म के नाम पर वोट देने वाले हैं
सब के सब अपराधी हो
हिन्दू हो या मुसलमान

ईश्वर देवी देवता भूत प्रेत डायन अलग अलग खानदान के हैं?

Balendu Swami
यदि आप ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं तो उन्हीं कारणों से भूत प्रेत, पिशाच, जिन्न और डायनों पर भी विश्वास करेंगे. और फिर जैसे कुछ लोगों का समूह श्रद्धा और आस्था के चलते किसी को भगवान बनाकर पूजा कर सकता है वैसे ही कुछ लोग किसी को डायन बताकर उसकी हत्या भी कर सकते हैं! बल्कि मैंने तो ऐसे भी बहुत से आस्तिक देखे हैं जिन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर भले ही संदेह हो परन्तु भूत प्रेत, डायन इत्यादि के अस्तित्व पर पूरा भरोसा होता है! हालाँकि दोनों के अस्तित्व पर विश्वास करने के कारण, आधार और कुतर्क एक जैसे ही हैं!

पाखंड मिटाओ भारत बचाओ

हिंदू या मुस्लिम होकर मर जाते हैं

Avdhesh Nigam
मनुष्य होने की कोशिश में
हम धर्म से लिपट जाते हैं और
मनुष्यता से बहुत दूर चले जाते है
हिन्दू या मुसलमान बनकर मर जाते हैं |

लिखना शौक नहीं जिम्मेदारी

Suresh Soni
लिखना कोई शौक नहीं है , एक जिम्मेदारी है , मानवता के प्रति , समाज के प्रति , नैतिकता के प्रति।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

शरद कोरस की कविता

✝☪🕉☸☮

*शरद कोकास की एक कविता*
-----------

🛎 *ईश्वर नहीं आया* 🛎

*ईश्वर को याद किया उसने*
*सुख के दिनों में*
*आरती उतारी*
*प्रसाद बाँटा*
*व्रत रखे*
*कीर्तन करवाये*
*ताकि सनद रहे*
*वक़्त पर काम आये*

*आश्चर्य की बात है*
*वक़्त पड़ा तो ईश्वर नहीं आया*
*पाँच वक़्त के नमाज़ी थे*
*पड़ोस के रहमान चाचा*
*भोपाल गए थे*
*गैसकांड में गुज़र गए*
*हफ़्ते में सात व्रत रखते थे बाबा*
*सूखा पड़ा*
*तो भूख से मर गए*
*रोज़ जल चढ़ाती थी अम्मा*
*पिछली बाढ़ में बह गई*
*पूजा-प्रार्थना,घंटी-पोथी*
*धरी की धरी रह गई*

*वह जीवित रहा*
*भोगता रहा दुख*
*भोग लगाता रहा ईश्वर को*
*अपना पेट काटकर*
*ईश्वर के लिये*
*बिछौने का इंतज़ाम कर*
*खुद सोता रहा टाट पर*
*करता रहा जीवन भर*
*ईश्वर की प्रतीक्षा*

*ईश्वर होता तो आता*
*नहीं था सो नहीं आया ।*

🔲 *शरद कोकास* 🔲

😟😕🙁☹😙🤓

राहुल सांस्कृत्यायन के विचार _ कुमार संदीप


राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893) का जन्म गाय पट्टी (काउ बेल्ट) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वह वेदांती, आर्य समाजी होते हुए बौद्ध मतावलंबी बने. विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृति ने उन्हें पूरी तरह से ब्राह्मणवादी जातिवादी हिन्दू संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया. फुले और अम्बेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिन्दुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी. राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिन्दुओं को सीधे ललकारते थे. उनकी पतनशीलता और गलाजत को उजागर करते थे. उन्होंने अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिन्दुओं के समाज, धर्म, भगवान, सदाचार और जात-पांत की क्षय में हिंदुओं के अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है.

‘तुम्हारी जात- पांत की क्षय’ में वह लिखते है कि हमारे देश को जिन बातों पर अभिमान है, उनमें जात- पात भी एक है. …पिछले हजार बरस के अपने राजनीतिक इतिहास को यदि हम लें तो मालूम होता है कि भारतीय लोग विदेशियों से जो पददलित हुए, उसका प्रधान कारण जाति-भेद था. जाति-भेद न केवल लोगों को टुकड़ों- टुकड़ों में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन में ऊंच- नीच का भाव पैदा करता है. ब्राह्मण समझता है कि हम बड़े हैं; राजपूत छोटे हैं. राजपूत समझता है कि हम बड़े हैं; कहार छोटे हैं. कहार समझता है कि हम बड़े हैं; चमार छोटे हैं. चमार किसी और को छोटा समझता है और फिर वह ‘छोटा व्यक्ति’ भी किसी और को छोटा कह ही लेता है.’

राहुल सांकृत्यायन आधुनिकता की परियोजना के सभी तत्वों को अपने में समेटे हुए हैं. वे हिन्दू संस्कृति के मनुष्य विरोधी मूल्यों पर निर्णायक हमला तो करते ही हैं, वह यह भी मानते हैं कि मनुष्य को धर्म की कोई आवश्यकता नहीं हैं. इंसान वैज्ञानिक विचारों के आधार पर खूबसूरत समाज का निर्माण कर सकता है, एक बेहतर जिंदगी जी सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि वह उत्पादन संपत्ति संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन के हिमायती हैं. वह इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि भौतिक आधारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए बिना राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाया नहीं जा सकता है और जो परिवर्तन लाया जायेगा, उसे टिकाए रखना मुश्किल होगा.

जाति के संबंध में भी उनकी यही धारणा थी. वे इस यांत्रिक और जड़सूत्रवादी सोच के विरोधी थे कि आधार में परिवर्तन से अपने आप जाति व्यवस्था टूट जाएगी. इसके साथ ही हिन्दी क्षेत्र में वो अकेले व्यक्ति थे जो ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म-संस्कृति पर करारी चोट करते थे और भारत में सामंतवाद की विशिष्ट संरचना जाति को समझते थे और आधार और अधिरचना (जाति) दोनों के खिलाफ एक साथ निर्णायक संघर्ष के हिमायती थे. इस समझ को कायम करने में ब्राह्मण विरोधी बौद्ध धर्म के उनके गहन अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनकी तीन किताबें ‘बौद्ध दर्शन’,  ‘दर्शन- दिग्दर्शन’ और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं.

बुधवार, 9 अगस्त 2017

आओ तर्कशील बनें हम

Rohit Singh > ‎आओ तर्क करें
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है????
1. सड़क का उद्दघाटन नारियल फोड़
कर ही क्यों होता है, नमाज़ पढ़ कर
या दुसरे धर्मों की विधि के अनुसार
क्यों नहीं??
2. थाने में मंदिर ही क्यों है, मस्जिद या दुसरे धर्मों के पूजा स्थल
क्यों नहीं??
3. सरकारी भवन निर्माण से पहले
भूमि पूजन ही क्यों होता है, दुसरे
धर्मों के अनुसार प्रार्थना क्यों नहीं ??
4. सरकरी कार्यालयों में गणेश की मूर्ति क्यों लगी रहती है,
दुसरे
धर्मों के प्रतीक क्यों नहीं ??
5. सरकारी स्कूलों में
सरस्वती पूजा ही क्यों होती है, दुसरे
धर्म के पर्व क्यों नहीं ??
6. सेना में राजपूत बटालियन है, शिख बटालियन है, मुस्लिम/
इसाई
बटालियन क्यों नहीं ???
7. न्यायलय में इंसाफ
की देवी होती दुसरे धर्मों के इंसाफ के
प्रतीक क्यों नहीं?? ये मेरे निजी सवाल है प्लीज इसे धर्म
से जोड़कर न देखा जाए ॥

जरा सोचें

Ahmed Kaleem
जिस देश में राजनीती, चुनाव मज़हब के आधार पर हो, क्या वो देश कभी विकास कर सकता है?

मानवता

मानवता ही सच्चा और सर्वोच्च धर्म है
गरमी का मौसम था, मैने सोचा काम पे जाने से पहले गन्ने का रस पीकर काम पर जाता हूँ।
एक छोटे से गन्ने की रस की दुकान पर गया। वह काफी भीड-भाड का इलाका था, वहीं पर काफी छोटी-छोटी फूलो की, पूजा की सामग्री ऐसी और कुछ दुकानें थीं। और सामने ही एक बडा मंदिर भी था , इसलिए उस इलाके में हमेशा भीड रहती है।
मैंने रस का आर्डर दिया , मेरी नजर पास में ही फूलों की दुकान पे गयी , वहीं पर एक सज्जन व्यक्ति ने 500 रूपयों वाले फूलों के हार बनाने का आर्डर दिया , तभी उस व्यक्ति के पिछे से एक 10 वर्षीय गरीब बालक ने आकर हाथ लगाकर उसे रस की पिलाने की गुजारिश की । पहले उस व्यक्ति का बच्चे के तरफ ध्यान नहीं था , जब देखा....
तब उस व्यक्ति ने उसे अपने से दूर किया और अपना हाथ रूमाल से साफ करते हुए
" चल हट ...."
कहते हुए भगाने की कोशिश की।
उस बच्चे ने भूख और प्यास का वास्ता दिया। वो भीख नहीं मांग रहा था , लेकिन उस व्यक्ति के दिल में दया नहीं आयी।
बच्चे की आँखें कुछ भरी और सहमी हुई थी, भूख और प्यास से लाचार दिख रहा था।
इतने में मेरा आर्डर दिया हुआ रस आ गया।
मैंने और एक रस का आर्डर दिया उस बच्चे को पास बुलाकर उसे भी रस पीलाया।
बच्चे ने रस पीया और मेरी तरफ बडे प्यार से देखा और मुस्कुराकर चला गया। उस की मुस्कान में मुझे भी खुशी और संतोष हुआ.......
लेकिन. ....वह व्यक्ति मेरी तरफ देख रहा था, जैसे कि उसके अहम को चोट लगी हो।
फिर मेरे करीब आकर कहा
" आप जैसे लोग ही इन भिखारियों को सिर चढाते है "
मैंने मुस्कराते हुए कहा
" आपको मंदिर के अंदर इंसान के व्दारा बनाई पत्थर की मूर्ति में ईश्वर नजर आता है, लेकिन ईश्वर द्वारा बनाए इंसान के अंदर ईश्वर नजर नहीं आता है..........
मुझे नहीं पता आपके 500 रूपये के हार से आपका मंदिर का भगवान मुस्करायेगा या नहीं, लेकिन मेरे 10 रूपये के चढावे से मैंने भगवान को मुस्कराते हुए देखा और मुझे संतुष्टी भी देकर गया है "

भगवान की पूजा किसी खास पदार्थो के चढावे से नहीं होती।सच्चे मन और प्रेम से की गई प्रार्थना से होती है।

हमे धार्मिक स्थानो पर दान करने से अच्छा यह है कि हम किसी गरीब या जरूरतमंद लोगों की मदत करना चाहिए।
यही सच्ची पुजा है।

दोस्तों अगर आप मेरे विचार से सहमत हैं तो जरूर यह पोस्ट आगे शेयर करे।

तुम एक तत्व वाले पत्थर की मूर्तियों को,पवित्र और दिव्य मान कर पूजते हो।परन्तु पांच तत्वों वाले को नीची जाती का कहकर,कई मनुष्यों को अपवित्र और नीच गिनते हो, और नफरत करते हो।क्या ऐसे जीव को इंसान कहना उचित होगा ? —