Ajaibjalalanela _
यदि आप योग करना चहते हैं तो कीजिये, लेकिन बहुत ही हल्का-फुल्का योग कीजिये. यदि मुश्किल योग क्रियाएं करेंगे तो बहुत चान्सस हैं कि आप अपनी बॉडी के nerves व muscles को डेमेज कर लेंगे.
पिछले कुछ वर्षों में योग एक बहुत बड़ा बिज़्नेस बन गया है. योग के बारे में बहुत बढ़-चढ़ कर दावे किये गये हैं, जो कि एकदम गलत हैं. उन दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मकसद योग को बेचकर मुनाफा कमाना है. मेडिकल साईंस के हिसाब से योग में किसी बीमारी का कोई इलाज नहीं है. इसलिये इन दावों के झांसे में ना आयें. जब भी कोई बीमारी हो तो तुरंत किसी क्वालिफाईड डॉक्टर को ही दिखाये.
योग भी बस एक एक्सर्साइज़ है जैसे और बहुत सी एक्सर्साइज़ हैं. मैं योग से बेहतर एक्सर्साइज़ वॉक, जोग्गिँग, स्विम्मिंग या कोई हल्के गेम खेलने को मानता हूं. मैंने कभी योग नहीं किया. लेकिन एक्सर्साइज़ ज़रूर करता हूं. 59 साल की उम्र हो चुकी है. अभी तक मेरा शरीर बीमारियों से बचा हुआ है.
बी एल यादव
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
बुधवार, 21 जून 2017
योग से इलाज
बच्चों को तर्कशील बनाएं
*जैसे सोचोगे*
*वैसे बनोगे*
पापा पापा धरती किसने बनाई ?
बेटा भगवान ने बनाई।
आसमान किसने बनाया ?
भगवान ने।
सितारे किसने बनाए ?
भगवान ने।
हमें किसने बनाया ?
भगवान ने।
पेड़-पौधे कैसे उगते है ?
भगवान की मर्जी से।
लोग कैसे मरते है ?
भगवान की मर्जी से।
लोग पैदा कैसे होते है ?
भगवान की मर्जी से।
रोशनी कैसे मिलती है ?
भगवान की कृपा से।
अँधेरा कैसे हो जाता है ?
भगवान की इच्छा से।
बेटा इतने सवाल मत पूछो, इस धरती पर, ब्रह्माण्ड में जो भी कुछ होता है सब भगवान की मर्जी से होता है।
एक दिन बच्चे के विज्ञान टीचर बच्चे के घर आते है। देखिये वर्मा जी, आपका बच्चा पढने में बहोत कमजोर है, पढ़ाई-लिखाई में ध्यान ही नहीं देता है।
टेस्ट में सवाल पूछा गया,
बल्ब रौशनी कैसे देता है ?
जवाब में लिखा, भगवान की मर्जी से।
टेलीफोन किसने बनाया ?
भगवान ने बनाया।
धरती पर दिन और रात कैसे होते है ?
भगवान की मर्जी से।
माफ़ कीजिये बताते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन आपका लड़का फेल हो गया है।
वर्मा जी ने गुस्से से कांपते हुए लड़के को बुलाया, डांटते हुए, क्यों बे ? हमारे लाड-प्यार का नाजायज फायदा उठाता है, पढ़ाई-लिखाई में दिमाग क्यों
नहीं लगाता है ? और दो तमाचे रसीद करते हुए बोले, कमबख्त फेल हो जाएगा तो जिन्दगी में क्या करेगा ? और बेचारा बच्चा समझ ही नहीं पाया कि उससे
गलती कहाँ हुई ?
काश! वर्मा जी ये समझ पाते कि बच्चे की जिज्ञासा को अगर वो भगवान से तुष्ट न करते, तो बच्चा उन सवालों के जवाब विज्ञान में ढूंढता।
उस बच्चे की सारी कल्पनाएं, जिज्ञासाएं, खोजी प्रवृत्ति तो एक भगवान पर आकर ही खत्म हो
गयीं, भला इसमें उस बच्चे की क्या गलती है जो उसे विज्ञान की समझ न आई ?
क्या आप भी चाहते है कि आपके बच्चे फ़ैल हो ? ....नहीं ना ? ...तो फिर आपके बच्चों को विज्ञान की कहानियां सुनाओ... देवी-देवता और भगवान की नहीं ! उन्हें विज्ञान का रहस्य समझाओ, जूठी-मुठी कहानिया नहीं... उन्हें तर्क करना सिखाओ...
विज्ञान को धर्म बनाओ... आपका बच्चा अवश्य तरक्की करेगा।
अपना विकास स्वयं करो, आपका उद्धार आपको खुद ही करना होगा। कोई भगवान,अल्लाह ,गॉड आपका उद्धार करने नहीं आनेवाले।
*जागो और जगाओ*
*तर्क करना सिखाओ*
4 घंटे · सार्वजनिक
योगासन से इलाज
योगासन करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बहुत अच्छा है,, लेकिन इससे रोगों का इलाज न करें, न कराएं!
कांग्रेस ने क्या किया
तुम क्या जानेगे नेहरू और कांग्रेस ने देश के लिए क्या किया? जिस साधन से आज तुम नेहरू जी को, कांग्रेस पार्टी को स्वार्थी कह रहे हो वह सब साधन भाजपा के कारण देश में नहीं आया है| भाजपा नई तकनिक का विरोध करती रही है. कम्प्युटर का विरोध इन्होंने ही किया था| तुम अपने दादा दादी से पूछो पहले देश की क्या हालत थी और देखो आज की हालत | यह सच है कि कांग्रेस काल में भ्रष्टाचार खूब हुआ है लेकिन विकास भी खूब हुआ है| याद रखो हम सब भ्रष्टाचारी हैं इसलिए हर पार्टी में भ्रष्टाचार व्याप्त है| अपने आसपास ठीक से देखो समझो| होशियार हो तो सब साफ साफ दिखाई देगा|
हर कोई डॉक्टर
हमारे समाज में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग बहुधा होता है . आप अपने दो चार , दोस्तों , रिश्तेदारों या परिचितों के बीच , अपनी शरीर की कोई तकलीफ का जिक्र क्या कर दे , उनमे से कोई शर्तिया , आपको कोई एक देशी इलाज बता देगा और उसका जादुई प्रभाव भी .
इस तरह योग और आयुर्वेद की अपनी सीमाए है . इसे वैकल्पिक तौर पर ही अजमाए . यह डाक्टर सात साल से दस साल , यू ही अपना सिर नही खपाते . रही बात रामदेव बाबा की और आयुष जैसे सरकारी विभाग की , दोनों ने अपनी ' दूकान ' चलानी है.
मंगलवार, 20 जून 2017
कर्म फल
चंदू लाल-" तो! तुम ईश्वर को नहीं मानते हो ? फिर तो भगवान कृष्ण के कहे कर्मफल को भी नहीं मानते होंगे जो गीता में उन्होंने कहा है की इस जन्म के कर्मो का फल अगले जन्म में जरूर मिलता है ?
मैं- " जी.....कर्मफल और पुनर्जन्म जैसा कुछ नहीं"
चन्दूलाल को मेरी बात पर गुस्सा आ गया और नथुने फुलाते हुए बोलें-
" कैसी मूर्खता वाली बात करते हो? कर्मफल होता है
इंसान को आपने कर्मो की सजा जरूर मिलती है ,इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में .... "
मैं और चन्दूलाल बाते करते हुए अभी कुछ दूर आगे बढ़े ही थे की मोड़ पर एक 15-16 साल का लड़का तेजी से मोटर साईकिल चलाते हुआ सामने आ गया। हमें सामने देख घबराहट में उसने तेज ब्रेक लगाएं ,किन्तु अचानक ब्रेक लगाने से बाइक अनियंत्रित हो गई । हम दोनों उछल के एक तरफ हो गएँ किन्तु फिर भी मोटरसाइकिल चन्दूलाल से टकरा ही गई। चन्दूलाल के पैर पर मोटरसाइकिल का पहिया टकराया और वह झटके से सड़क पर गिर गया । टांग में चोट आई गई , मैंने उसे सहारा देके खड़ा कर दिया।
खड़े होते ही चन्दूलाल का चेहरा दर्द और गुस्से से लाल हो गया ,वह माँ बहन की गलियां देते हुए लड़के को मारने दौड़ा। मैंने चंदू लाल को रोकते हुए कहा-
" चन्दूलाल भाई! इसमें लड़के की कोई गलती नहीं है,गलती तुम्हरी थी ... कर्मफल के अनुसार तुम्हे अपने पिछले जन्म के कर्मो की सजा मिली है ....."
अब चन्दूलाल लड़के को छोड़ मुझे गालियां देने लगा .....मैंने कुछ गलत कह दिया था क्या?
😛
-संजय
सूर्य को प्रणाम क्यों?
धार्मिक लोग कहते हैं कि सूर्य हमें प्रकाश देता है अतः हमें उसे नमस्कार करके उसका धन्यवाद देना चाहिये। अरे भाई सूर्य जड़ पदार्थ है। वह हमारा नमस्कार कैसे ग्रहण करेगा? क्या आप मोबाइल से बात करने के बाद अपने मोबाइल को धन्यवाद या नमस्कार करते हैं? क्या आप अपने कम्प्यूटर से कई तरह के काम करने के बाद उसे धन्यवाद देते हैं या नमस्कार करते हैं? नहीं करते न! क्योंकि आप जानते हैं कि मोबाइल जड़ पदार्थ है और जड़ पदार्थ को धन्यवाद देना या उसे नमस्कार करना हमारी मूर्खता है। क्योंकि न तो वह हमारा धन्यवाद ही ग्रहण करने में सामर्थ है और न ही नमस्कार। अतः सूर्य आदि ग्रहों को नमस्कार करना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
सब उपर वाले की मर्जी
दिनेश आस्तिक_
मित्रों संसार में अशुभ भी ईश्वर की ही देन है। समानता में भी कहीं न कहीं उसका हाथ है। जब कहा जाता कि उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर संसार में जो भी गलत होता है उसमें उसकी सहमति निश्चित है।
रविवार, 18 जून 2017
अम्बेडकर वादी
अम्बेडकर जी हिंदू धर्म की संकीर्णता से परेशान होकर बौद्ध धर्म अपनाए| लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि बौद्ध धर्म केवल अम्बेडकरवादियों का है|
""""""
ये अम्बेडकर वादी तो अम्बेडकर जी को केवल दलितों के नेता प्रचारित कर उनकी महानता को कम कर रहे हैं| यह सोच उनकी संकीर्णता है|
हिंदू मुसलमान
एक आम आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है,
बाहर आ कर साबुन से हाथ धोता है,
दाँत ब्रश करता है,
नहाता है,
कपड़े पहनकर तैयार होता है,
अखबार पढता है,
नाश्ता करता है,
घर से काम के लिए निकल जाता है,
बाहर निकल कर रिक्शा करता है,
फिर लोकल बस या ट्रेन में या अपनी सवारी से ऑफिस पहुँचता है,
वहाँ पूरा दिन काम करता है,
साथियों के साथ चाय पीता है,
शाम को वापिस घर के लिए निकलता है,
घर के रास्ते में एक सिगरेट फूँकता है,
बच्चों के लिए टॉफी,
बीवी के लिए मिठाई वगैरह लेता है,
मोबाइल में रिचार्ज करवाता है,
और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है,
अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई
"हिन्दू" या "मुसलमान" मिला ?
क्या उसने दिन भर में किसी "हिन्दू" या "मुसलमान" पर कोई अत्याचार किया ?
उसको जो दिन भर में मिले वो थे..
अख़बार वाले भैया,
दूध वाले भैया,
रिक्शा वाले भैया,
बस कंडक्टर,
ऑफिस के मित्र,
आंगतुक,
पान वाले भैया,
चाय वाले भैया,
टॉफी की दुकान वाले भैया,
मिठाई की दूकान वाले भैया..
जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो
इनमें "हिन्दू" या "मुसलमान" कहाँ है ?
"क्या दिन भर मेंउसने किसी से पूछा कि भाई, तू "हिन्दू" है या "मुसलमान" ?
अगर तू "हिन्दू" या "मुसलमान" है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा,
तुझसे सिगरेट नहीं खरीदूंगा,
तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा,
तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा,
क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, मिठाई खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले "हिन्दू" हैं या "मुसलमान" ?
"जब हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मिलने वाले लोग "हिन्दू" या "मुसलमान" नहीं होते तो फिर क्या वजह है कि "चुनाव" आते ही हम "हिन्दू" या "मुसलमान" हो जाते हैं ?
समाज के तीन जहर
टीवी की बेमतलब की बहस
राजनेताओ के जहरीले बोल
और कुछ कम्बख्त लोगो के सोशल मीडिया के भड़काऊ मैसेज
इनसे दूर रहे तो शायद बहुत हद तक समस्या तो हल हो ही जायेगी.
_______हिंदुस्तान जिंदाबाद ____
लाउड स्पीकर का प्रयोग
क्यों न बंद हो धर्मिक/मजहबी कामो में लाउडस्पीकर का प्रयोग ?
आज किसी भी धर्मिक या मजहबी स्थल की सबसे ज्यादा जरुरी चीज बन गई है तो वह है लाउडस्पीकर ।
पूजा प्रार्थना करनी हो या नमाज पढ़ना हो लाउडस्पीकर की तेज आवाज चाहिए सभी को,बिना लाउडस्पीकर के फुल वॉल्यूम किये धार्मिकों को लगता ही नहीं की उनकी आवाज खुदा या भगवान् तक जायेगी ही ।
धर्मिक मजहबी लोग जैसे अपने खुदा या भगवान् को नहीं बल्कि चीख चीख दूसरे लोगो को बताना चाहते हैं की देखो हम अल्लाह ईश्वर की पूजा प्रार्थना कर रहे हैं ।
अरे भाई!जैसा की आप लोग मानते हैं की ईश्वर सातवे आसमान में विराजमान है या ब्रह्माण्ड में कंही तो वैसे भी आपके लाउडस्पीकर की आवाज ब्रह्माण्ड या सातवे आसमान तक नहीं पहुचने वाली ।
तब काहे को आस पास के लोगो के कान बहरे कर देते हो ?
अगर आप कहते हो की आप लाउडस्पीकर में अपने जैसे धर्मिक मजहबी लोगो को आगाह करते हैं या सूचना देते है अपने धार्मिक क्रियाकलापो की ।
तो , साहब घर जाके बताइये न उन्हें ... क्या जिसको बताने का आप दावा कर रहे है लाउडस्पीकर में चिल्ला के उसे धर्म की नियमावली नहीं पता ?उसे टाइमटेबल नहीं पता?
यदि वह आपके बताने पर भी भूल जाता है और आपको उसको लाउडस्पीकर में चिल्ला के बताना पड़ रहा है तो इसका मतलब वह जिसे आप समझाने गए थे उसे आपके धर्म मजहब में कोई इंट्रेस्ट नहीं है.....आप पीछा छोड़िये उसका .... चिल्लाना बंद किजिये।
जिसे इंट्रेस्ट होगा वह खुद आएगा आपके पास ।
इस प्रकार लाउडस्पीकर में चिल्लाना ईश्वर अल्लाह की पूजा इबादत नहीं बल्कि अपना अपना संख्याबल दिखाना भर है और दूसरे लोगो को परेशान करना भर है।
तरह तरह के प्रदूषण से तो वैसे ही इंसान की जान निकल रही है , आप लोग क्यों रात दिन चिल्ला चिल्ला के ध्वनि प्रदूषण और बढ़ा के लोगो का जीना दूभर कर रहे हैं ।
मैं चाहता हूँ की सरकार धर्मिक /मजहबी स्थलो में लाउडस्पीकर का प्रयोग बंद करवा दे ताकि गैर धर्मिक लोगो को परेशनी न हो ।
पूजा पाठ नमाज पढ़नी हो तो बिना लाउडस्पीकर के प्रयोग के की जाए ताकि दूसरे लोग जो आपके पूजा पाठ या नमाज में इंट्रेस्ट नहीं रखते वे चैन से जी सके ।
- केशव ( संजय)
शनिवार, 17 जून 2017
धर्म और विज्ञान
विज्ञान और धर्म के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि जहाँ विज्ञान अग्रमुखी है यानी आगे की ओर देखता है, वहीं धर्म पश्चमुखी है यानी पीछे की ओर देखता है। उदाहरण के लिए विज्ञान के अनुयायियों के लिए विज्ञान के प्रकाशन जितने आधुनिक होंगे, अद्यतन(अपडेट) होंगे, उतने ही बेहतर माने जाएँगे। जबकि धर्म के अनुयायी जिन शास्त्रों पर निर्भर होते हैं, वे आमतौर पर प्राचीन होते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में वर्तमान वैज्ञानिकों का सबसे अधिक महत्व होता है जबकि धर्मक्षेत्र, धर्म के वे संस्थापक सबसे सम्मानित माने जाते हैं जो सुदूर अतीत में कार्यरत रहे हों। विज्ञान के समर्थकों के लिए जो घटनाएँ आज घट रही हैं और जो कल घट सकती हैं, उनका सबसे अधिक महत्व है, जबकि धर्म के अनुयायियों के लिए जो अतीत में घटा वही सर्वोपरि है। समय बीतने के साथ विज्ञान की तकनीकों में सुधार और निखार आता जाता है और इस सुधार की प्रेरणा विज्ञान की विधि के बुनियादी ढांचे में ही गुँथी हुई है। दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांड में समयानुसार बुनियादी तौर पर कोई खास सुधार नज़र नहीं आता। अगर कुछ परिवर्तन धर्म में होते भी हैं तो धर्म से बाहर के दबाव से होते हैं, जैसे कि स्वयं विज्ञान के दबाव से।
विज्ञान का एक आंतरिक गुण है, प्रश्न पूछने का अधिकार। लोग प्रश्न पूछने के अधिकार का उपयोग करते हैं, उसी से ज्ञान का विस्तार होता है और विज्ञान प्रगति करता है। दूसरी ओर धर्म अपने सिद्धांतों और रूढ़िवादी मान्यताओं के बारे में चाहता है कि उन पर कोई सवाल उठाए बिना सब लोग उन्हें स्वीकार कर लें। अगर धर्म पर सवाल उठाया जाए तो केवल किसी बात को समझने के लिए उठाया जा सकता है, शंका या संदेह प्रकट करने के लिए नहीं।
वैज्ञानिक तो किसी अपराध-बोध या संकोच के बिना यह स्वीकार कर सकता है कि 'मैं नहीं जानता'। लेकिन कोई धर्मगुरु ऐसा कहे तो उस पर तो पहाड़ ही टूट पड़ेगा। वह तो होता ही है सर्वज्ञ। प्रत्येक धर्म के संस्थापक अतीत कल से ही, ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर देते रहते हैं, जो कि पूछे जा सकते हैं। विज्ञान में तो ऐसा दावा करना आडंबर और विडम्बना माना जाएगा। ऐसा पाखंड धर्म ही दिखा सकता है।
Promeethews Pratap Singh Thakur की वाल से
शुक्रवार, 16 जून 2017
ईश्वर/अल्लाह पर भरोसा
यदि आपको ईश्वर / अल्लाह पर विश्वास है तो जीवन बीमा मत करवाइये। जीवन बीमा दरसल ईश्वर के प्रति अविश्वास है ,आप जीवन बीमा इस लिए करवाते हैं कि यदि आप मर गएँ तो आपके परिवार का क्या होगा? अपने मरने के बाद अपने परिवार वालो के जीवनयापन की फ़िक्र भौतिकतावाद है । जीवन बीमा करवाके आप ईश्वर के प्रति शुद्ध रूप से अविश्वास प्रकट कर देते हैं और स्वयं नियति के निर्माता बन जाते हैं।
आशा है प्रतेक ईश्वरवादी/ अल्लाहवादी जीवन बीमा नहीं करवायेगा या जिसने करवा लिए है वह कैंसिल करवा देगा ।
' होइये सोई जो राम रची राखा।
जीवन बीमा ईश्वर /अल्लाह की सर्वोच्चता को चुनौती है ।
कर्मेण्येव... फल में अधिकार नहीं
उपदेशक, शिक्षक ज्ञानी जन कहते हैं_
भगवद् गीता के अनुसार कर्म करना चाहिए किंतु फल की आशा नहीं करनी चाहिए|
गीता में ऐसा नहीं कहा गया है|
""""""'
गीता के "कर्मेण्येव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" में परिणाम की आशा नहीं करने के लिए नहीं कहा गया है| कर्म में हमारा अधिकार है चाहे हम करें न करें जैसा करें| कर्म करने के बाद हमारे कर्म के परिणाम में हमारा कोई अधिकार नहीं होता| हर विद्यार्थी परीक्षा में सफलता के लिए मेहनत करता है किंतु उसके परिणाम में उसका अधिकार नहीं होता| किसान फसल लगाता है.... व्यापार, खेल, युद्ध, ...
वांछित परिणाम की आशा से ही कर्म करते हैं| फल की आशा करें किंतु फल के प्रति आसक्त न हों| आसक्ति होने से इच्छानुसार परिणाम प्राप्त करने के लिए गलत तरीके अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं | परिणाम के प्रति आसक्ति न हो तो इच्छानुसार परिणाम नहीं मिलने से कर्ता दुःखी नहीं होता हताश नहीं होता, कोई गलत कदम नहीं उठाता आत्म हत्या नहीं करता| पुनः पुनः श्रम करता है |
गुरुवार, 15 जून 2017
विज्ञान बनाम धर्म
विज्ञान सवाल करने वालों को प्रोत्साहित करता है जबकि धर्म दुत्कारता है , क्योंकि यहां सवाल करना निषेधित है
नास्तिकता
*नास्तिक* न तो बना जा सकता है और न तो बनाया जा सकता है बल्कि यह एक स्थिति है जब व्यक्ति शैक्षिक,बौद्धिक,तर्क व विचारशील हो जाता है तो उसके अंदर से अंधविश्वास व पाखण्ड समाप्त हो जाता है इसके बाद जो स्थिति बचती है वह है नास्तिकता!
जय विज्ञान
दूसरों के भगवान
-- Stephen F. Roberts
हिन्दी अनुवाद :
"जब आप इस बात को समझ जाओगे कि आप दूसरों के भगवान (Gods ) को क्यों नहीं मानते, तब आपको यह भी समझ आ जायेगा कि हम आपके भगवान को क्यों नहीं मानते."
सीधी सी बात है ....
जिन कारणों से आप दूसरों के भगवान को काल्पनिक मानते हो, ठीक उन्हीं कारणों के आधार पर हम आपके भगवान को काल्पनिक मानते हैं.
धर्म एक पाखंड
धर्म एक पाखण्ड है और ईश्वर झूठ
चलो एक बार मान लेते कि हैं सबको तथा सबकुछ अल्लाह ने बनाया है। लेकिन भाई हिन्दुओं, ईसाईयोें, यहूदियों, सिक्खों, नास्तिकों, काफिरों और विधर्मियों को क्यों बनाया है?
चलो एक बार मान लेते हैं कि सबको तथा सब कुछ ब्रम्हा ने बनाया है लेकिन भाई मुस्लिमों, ईसाईयों, यहूदियों सिक्खों, जैनियों नास्तिकों, काफिरों और विधर्मियों को क्यों बनाया है?
नहीं जानता
"मैं नहीं जानता!"
**************
मैं किसी परमसत्ता के बारे में
कुछ भी नहीं जानता!
लोग अक्सर ईश्वर;खुदा या पैगंबर की
चर्चा करते रहते हैं
मैं सुन लेता हूँ;सुनता रहता हूं
मगर ऐसे किसी को भी नहीं मानता।
बचपन से लेकर आज तलक
मेरा किसी ईश्वर से सामना नहीं हुआ
मैंने तो सिर्फ लोगों को
मंदिरों के सामने कीर्तन भजन गाते
मंदिरों के भीतर गिडगिडाते देखा है
मैंने कभी भी नहीं देखा
कि ईश्वर किसी पर पसीजा हो
मैंने देखा है कई बार
लोग उपवास व्रत लेकर
कई कई दिनों तक
भूखे ही दिन गुजार देते हैं
मैं साक्षी हूँ उन भक्तों का
जो भगवान को पाने के प्रयास में
प्राण त्याग देते हैं।
मुझे ज्ञात है किस तरह एक माँ
अपने नवजात शिशु की लाश पर
आँसू बहाती है
एक नव विवाहिता वधू
पति की मृत्यु पर गश खाती है
सारे अरमान टूट बिखर जाते हैं
दुनिया फिर तमाशा बनाती है।
मैं ऐसे किसी भगवान को नहीं जानता
जो किसी दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति को
बचाने के लिए सामने आया हो
बाढ़ में डूबता कोई आदमी
भगवान का नाम लेकर बच पाया हो
किताबों में पढ़ते हैं
बुजुर्गों से सुनते हैं
कभी आँखों के सामने से
ऐसा कुछ भी नहीं गुजरा
जो हमें भगवान के होने का यकीन दिला सके!
पद्ममुख पंडा; महापल्ली
बुधवार, 14 जून 2017
मंगलवार, 13 जून 2017
कांग्रेस पार्टी
आजादी के बाद गांधी जी ने कांग्रेस पार्टी को भंग करने की सलाह दी थी क्योंकि कांग्रेस के गठन का मकसद पूरा हो चुका था| लेकिन पार्टी को भंग नहीं किया गया| किसी सलाह को मानने की बाध्यता नहीं होती|
अगर आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर पुनः "कांग्रेस" नाम से ही एक पार्टी का गठन कर लेते| उसमें वही पूर्व कांग्रेसी सदस्य होते| तो क्या नए कांग्रेस दल को बहुमत नहीं मिलता? किसे बहुमत मिला होता| भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा या आर एस एस को?
रविवार, 11 जून 2017
हमारा धर्म महान
हमारा हिंदू धर्म महान है| हम विधर्मियों को क्यों शामिल करें?
इतिहास साक्षी है कि हिन्दु धर्म से लोग ईसाई बने, यहूदी बने, सिख बने, जैन बने,बौद्ध बने और इस्लाम धर्म भी ग्रहण किया ।
किन्तु क्या कोई ऐसा एक भी उदाहरण है कि इन धर्मो के लोगो ने अपना धर्म त्याग कर कभी हिन्दु धर्म ग्रहण किया हो?
या वर्तमान मे कर रहे हो?
कोई तो विशेष कारण होगा, कि हिन्दू धर्म को ही त्यागकर नया धर्म बनाने और ग्रहण करने के अनगिनत उदाहरण है।
कोई तो कमी जरूर होगी?
महान संस्कृति व उच्च सभ्यता, धर्म और सास्वत सत्य का प्रतीक??
हिन्दू धर्म??
यानि अपने ही मुँह मियां मिट्ठू बनने की कहावत को चरितार्थ करता हिन्दू धर्म
😊
😊
