Manish Chouhan
आस्था की दुकानदारी:-
नमस्कार दोस्तो,भरे मन से ही सही आपके लिए आज का दिन शुभ होने की दुआ करता हूं।
रेप जैसे संगीन गुनाह पर एक ढोंगी बाबा को दोषी करार दिया जाता है और पूरे पश्चिमोत्तर भारत में उसके गुंडों का तांडव शुरू हो जाता है। इधर प्रधानमंत्री घोषणा करते हैं कि आस्था के नाम पर किसी की भी गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी (यह जानते हुए भी कि उनकी तो पार्टी ही इसी आस्था नाम की बुनियाद पर टिकी है) तो दूसरी ओर उन्हीं की पार्टी का मुख्यमंत्री हालात को बेकाबू होने देता है। पार्टी का एक भी नेता इस ढोंगी बाबा की निंदा नहीं करता, बल्कि उसके एक सांसद साक्षी महराज उसके बचाव में यह कहते हुए खड़े हो जाते हैं कि उस पर केवल एक महिला ने आरोप लगाए हैं जबकि लाखों-करोड़ों लोग 'उनके' साथ खड़े हैं। यह वही सोच है, वही संख्या- बल है जिसके सहारे पार्टी निरंतर जनता की समस्याओं के प्रति असंवेदनशील बनी रहती है।
न्यायालय में बहस पूरी हो जाने के बाद फैसले की तारीख भी तय हो जाती है फिर भी हरियाणा सरकार के दो मंत्री अनिल विज और राम विलास शर्मा 10 अगस्त को सिरसा के डेरे में (या यों कहें कि अड्डे पर) मनाए जा रहे ढोंगी बाबा के जन्मदिन समारोह में भाग लेने जाते हैं और 51 लाख का गिफ्ट चैक दे कर चले आते हैं। आत्मा पर लेषमात्र भी कोई बोझ नहीं। कोर्ट बार बार निर्देश देता है कि भीड़ को इकट्ठा मत होने दें, लेकिन प्रशासन है कि धारा 144 तक नहीं लगाता और कोर्ट में इसे क्लैरीकल भूल बताता है। तारीख, समय और तबाही मचाने वाले लोगों का पता होने के बावजूद हरियाणा सरकार नागरिकों के जान-माल की रक्षा नहीं कर पाती। इसे प्रशासन की काहिली और नाकामी कहें या अनावश्यक दबाव बनाने की सियासी चाल ! फैसला तो आपको करना है ।
बात केवल एक राजनीतिक पार्टी की हो ऐसा भी नहीं है। लगभग सभी पार्टियां इसी सिंड्रोम से ग्रस्त हैं। इस मामले में कांग्रेस,भाजपा और अकाली दल कोई भी अछूता नहीं है। आखिरकार सवाल तो एक करोड़ वोटों के एक साथ झोली आ गिरने की बात है भाई ! कैसे उस व्यक्ति के पांव न छुए जाएं? हमारे प्रधानमंत्री ने भी अगर छू लिए तो कौन सा आसमान टूट पड़ा !
लेकिन इस सब का दुखद पहलू यह है कि मीडिया या किसी भी नेता ने रेप की शिकार दोनों साध्वियों के प्रति सांत्वना का एक शब्द भी कहना मुनासिब नहीं समझा;
मामले को अंजाम तक पहुंचाने वाले सीबीआई जांबाज अफसर डीएसपी डागर की प्रशंसा में दो बोल नहीं बोले और न ही ढोंगी बाबा का पर्दाफाश करने वाले बहादुर पत्रकार राम चंद्र छत्रसाल के साहस और ईमानदारी को याद किया। याद रहे इस पत्रकार को इसकी कीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी है। उसे काफी समय तक धमकियां दी गई, फिर भी नहीं माना तो गोली मार कर हत्या कर दी गई । गोली लगने के बावजूद पीजीआई, चंडीगढ़ में ईलाज के लिए दाखिल वह व्यक्ति बीस दिन तक जीवित रहता है और बयान देना चाहता है लेकिन हरियाणा पुलिस उसका बयान तक नहीं लेती।
एक हो तो बात भी की जाए। पूरे देश में कुकरमुत्तों की तरह उग आए और मौजूद ऐसे ही ढोंगियों के आश्रम निरीह जनता की आस्था का ही कारोबार करते हैं। भूल जाइए कि कोई भी आपको इनके मोहपाश से कभी आजाद कर सकता है। नेता लोग तो इन्हें बढ़ावा देकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहेंगे ; अपनी मदद तो आपको स्वयं ही करनी होगी।
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
रविवार, 27 अगस्त 2017
आस्था की दुकानदारी
बाबा राम रहीम क्या देश भक्त हैं
कोई बताएंगे ये बाबा राम रहीम और उनके भक्त भारत माता की जय बोलते थे या नहीं?
शुक्रवार, 25 अगस्त 2017
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
उन्हें पता नहीं मजहब क्या है
Neha Thakur > Friends are Friend
शुक्र है परिंदों को नहीं पता
उनका मजहब क्या है �
वरना आसमाँ से भी खून की बारिश ☔ � होती
#नेहाठाकुर��
धर्म कर्म
Suresh Soni
मेरा एक मित्र -
धर्म कर्म में भी तो पैसा लगाया करो , दान दिया करो | मंदिर निर्माण पट्टिका में बहुत लोगों के नाम हैं पर आपका नाम नही है |
मेरा जवाब -
धर्म कर्म में पैसा खर्च करता तो हूं | किसी गरीब बच्चे की फीस भरना , कापी किताब खरीद कर देना , आपके लिए धर्म भले न होगा पर मेरे लिए यही धर्म है |
मंदिर के लिए दान देने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे पर गरीबों की समस्या को कौन देखता है ?
अंतर्विरोध
Dinesh Sharma _
यदि कोई पौराणिक गाथा होती तो इसे रचनाकार की कल्पना मान सकते थे या किसी चीज़ का सांकेतिक वर्णन समझ कर छोड़ा जा सकता था। आखिर किसी स्त्री की पवित्रता का मापदंड उसके ‘अग्निरोधी’ होने में कैसे हो सकता है? यदि ऐसा ही है तो सभी
पवित्र स्त्रियों को ‘अग्निरोधी’ होना चाहिए। पर ऐसा संभव नहीं है क्योंकि पवित्रता आप के शरीर पर कोई ‘अग्निरोधी कवच’ नहीं चढ़ा देती।
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Dinesh Sharma
Dinesh Sharma ऐसा कर के कौन सा आदर्श स्थापित होता है – यह भी स्पष्ट नहीं है। बल्कि इस से सैंकड़ों पीढ़ियों तक स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार की छूट दे दी गयी। किसी स्त्री के सतीत्व के परीक्षण की ऐसी अवधारणा वेदों और मनुस्मृति के बिलकुल ख़िलाफ़ है।
संकीर्ण नहीं
Ravi Kumar
फ़िल्मी दुनिआं के लोग संकीर्ण मानसिकता से बहुत ऊपर उठ चुके हैं आज न वो हिन्दू हैं और न मुसलमान वो लोग सिर्फ इंसान हैं. एक ही परिवार में हिन्दू नाम और मुस्लिम नाम मिल जायेंगे. वो मंदिर भी जाते हैं और मस्जिद भी . वो लोग ईद भी मानते हैं और दिवाली भी, और हम अभी भी भ्रमित हैं की शाहरुख़ खान मुसलमान हैं और ऋतिक रोशन हिन्दू .
हम इंसान इंसानी दुनियां के लिए नियम बनाएंगे
Nikhilesh Mishra
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारतीय गणराज्य का नागरिक होने के नाते ख़ुशी से ज्यादा मुझे दुःख है कि 5 में से मात्र 2 न्यायाधीश ये कहने का साहस जुटा पाये कि तीन तलाक संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। मुझे हैरत है उन दो माननीयो की सोच पर, जिनके अनुसार तीन तलाक सिर्फ इसलिए जायज है क्योंकि ये हजार साल से चली आ रही प्रथा है?
हजार लानत है उस तीसरे न्यायधीश पर, जिनके अनुसार तीन तलाक सिर्फ इसलिए नाजायज है क्योंकि ये कुरान का हिस्सा नही है? ये संविधान की आत्मा के लिए शर्मनाक पल है कि इतनी जद्दोजहद के बावजूद इस देश के माननीय अभी तक हलाला और बहुविवाह जैसी अमानवीय प्रथाओ की सुनवाई करने का आत्मबल नही दिखा पाये और इस मुद्दे को भविष्य की सुनवाई के लिए टाल दिया गया है?
देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में धर्मसत्ता के विरुद्ध खड़े होने के साहस का अभाव क्यों है?
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प्राचीन इस्लाम का हिस्सा मात्र होने के कारण अगर सब कुछ जायज है तो क्या इस्लाम छोड़ने पर व्यक्ति के क़त्ल के फरमान पे माननीय ठप्पा लगायेगे?
अगर हजारो साल की परम्परा मात्र किसी अमानवीय प्रवत्ति को क़ानूनी जामा पहनाने के लिए पर्याप्त है तो क्या माननीय हिन्दुओ की प्राचीन प्रथाए जैसे सती प्रथा, बाल विवाह आदि को क़ानूनी संरक्षण प्रदान करेगे?
आखिर इस्लाम के नाम पे ही माननीयो के मुह में दही क्यों जम जाता है?
सौहार्द बिगड़ने का डर है अथवा इस्लाम के चरमपंथ से जीवन का भय?
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ये बात इस देश के हर नागरिक को समझ लेनी होगी की ये देश हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाइयो के ईश्वर के बनाये कानून से नही चलेगा।
संवैधानिक संस्थाये चलती है.. शक्ति के जोर से !!!
Power To Enforce !!!!
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देश के संविधान ने नागरिको को अपने धार्मिक मान्यताओ में विश्वास रखने की आजादी मात्र दी है लेकिन समानता और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जहां आपके विश्वास संविधान से टकराएंगे.. वहा नागरिको की नियति का फैसला आपका अल्लाह अथवा भगवान नही बल्कि.. कानून का डंडा करेगा !!!
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मैं सही मायने में भारत का पुनर्जागरण तभी मानुगा जब भारत की सर्वोच्च संस्थाये बिना लिंग,जाति, मजहब के भेदभाव के अपनी अंतिम नागरिक के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा के लिए खड़े हो कर सबके लिए समान कानून यानी समान नागरिक संहिता लागू कर पाने का साहस दिखा पाएगी।
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प्रधान सेवक जी। गेंद अब आपके पाले में है। आसमानी खुदा की सल्तनत के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाइए। तभी सही मायने में मानवता के नायक कहलायेगे
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हम इंसानो ने ये खूबसूरत दुनिया, चमकते चाँद सितारे, ब्लैकहोल्स, न्युट्रान, प्रोट्रान आदि नही बनाये हैं।
लेकिन.. इस दुनिया की बेहतरी के लिये फैसले.. हम लेते हैं !!!
पृथ्वी पर खुदाओं, ईश्वरो, आसमानी फरिश्तों की जरुरत नही है।
इंसानो की दुनिया के नियम हम इंसान स्वयं बनायेगे
Our Decision !!!
...........विजय सिंह ठकुराय
सोच बदलो
DC Yadav
*कटु सत्य*
◆ जिन देशों में गाय की पूजा नहीं होती, वहां की गायें ज्यादा दूध देती हैं और प्लास्टिक व सड़कों का कचरा भी नहीं खाती।
◆जिन देशों में किसी नदी में स्नान करने से पाप धुलने की बात नहीं कही जाती है, वहां की नदियां अधिक साफ व शुद्ध पायी जाती हैं।
◆ जिन देशों में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहां की स्त्रियाँ से कम बलात्कार होते हैं और वे अधिक स्वतंत्र होती हैं।
◆ जिन देशों में धर्म व्यक्तिगत विषय की चीज़ है, वो देश ज्यादा विकसित और ताकतवर हैं और वहां कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं होते।
◆ जिन देशों में लोग धर्म और जाति में बंटे नहीं होते और कोई भी समस्या सबकी सामूहिक जिम्मेदारी होती है, वहां सारे काम मिलकर किये जाते हैं।
● जिस देश में साधू व मौलवी अधिक नहीं होते उस देश में वैज्ञानिक अधिक होते हैं।
● केवल बातें करने से बदलाव नहीं आने वाला, जरुरत सोच बदलने की है, कमी हमारी मानसिकता में भी है।
कोई धर्म अंतिम सत्य नहीं
Tufail Chaturvedi with Abhay Ranjan and 44 others.
22 अगस्त की सुब्ह बहुत अच्छी है। सुप्रीम कोर्ट जिसके 5 जजों की बैंच, विभिन्न धर्मों के जजों से बनाई गई थी, ने तीन तलाक़ को बहुमत से अवैध ठहवराया है। इसके परिणामस्वरूप भारत में लगभग 9 करोड़ मुस्लिम औरतों के सर से 24 घंटे झूल रही अस्थिरता की तलवार हट गई। जब तक चाहा रक्खा, भोगा और जब दिल से उतर गई, तीन तलाक़ कह कर चुटिया पकड़ कर घर से निकाल बाहर किया।
थीं अल्लाही खेतियाँ मियाँ रहे थे जोत
टाँग अड़ाई कोर्ट ने मुँह पर स्याही पोत
जनार्दन पांडे प्रचण्ड
ज़ाहिर है यह क्षण किसी भी सभ्य व्यक्ति से प्रसन्न होने का है। आख़िर हर मुसलमान पुरुष पति होने के साथ-साथ किसी मुस्लिम महिला का बेटा, किसी मुस्लिम महिला का भाई, किसी मुस्लिम महिला का पिता भी तो है। इस निर्णय से अगर उसकी पति के नाते असीमित दुष्टता पर रोक लगी है तो बेटे, भाई, पिता के नाते जीवन में सुखदता भी तो बढ़ी है।
उर्दू की निर्विवाद सबसे बड़ी लेखिका इस्मत चुग़ताई के शब्दों में कहूँ तो मुँहझौंसे दाढ़ीज़ार मुल्ला ऐसे बिलबिला रहे हैं जैसे ततैयों का छत्ता ही पीछे पड़ गया हो। इसका कारण समझने जैसा है।
मुहम्मद का क़ुरआन के संदर्भ में आख़िरी सम्बोधन है। यह सूरा मायदा आयत 3 में आता है। "ऐ मुसलमानों आज तुम पर तुम्हारा दीन मुकम्मल हुआ।" इस्लाम अपने दावे के अनुसार संसार के अंतिम क्षण तक मनुष्यों के लिये सम्पूर्ण, उपयुक्ततम जीवन शैली है। इस फ़ैसले ने उसके मुकम्मल होने के दावे की दीवार से ईंटें खिसका दीं। यह जिहालत के किले की दीवार गिर जाने के बराबर है।
अभी टी वी पर एक मुल्ला बहस में कह रहे थे। इस्लाम अल्लाह का दीन है। इस्लाम किसी के ताबे नहीं रहता। आपको मुसलमान रहना है तो इस्लाम के ताबे रहना होगा। यह क़दम किसी स्त्री-पुरुष के इस्लाम के ताबे रहने की जगह मनुष्यता के ताबे रहने की ओर छोटा सा क़दम है। मनुष्यता अर्थात जिस समाज में हर व्यक्ति के अधिकार क़ानूनी रूप से समान हैं। हर स्त्री पुरुष क़ानूनी रूप से बराबर हैं। जहाँ जीवन की तार्किक स्वतंत्रता होती है। ये उस बर्बर और असभ्य सोच को त्यागना है जहाँ ससुर बहू का रेप कर दे तो मुल्ला पार्टी बहू को ससुर के हवाले करने का फ़तवा दे देती है। ( प्रसंग मुज़फ़्फ़रनगर का इमराना कांड स्मरण करें )
यह एक छोटा सा फ़ैसला सही मगर इससे न जाने कितनी गंदगी को नष्ट करने के रास्ते खुलेंगे। आइये चलते-चलते आपको मुकम्मल दीन होने के दावे के प्रामाणिक उल्लेख दिखाता चलूं।
जाफ़र अल सादिक़ शिया लोगों के 12 इमामों में से 6वें इमाम हैं और मुहम्मद के परपोते, सड़पोते कुछ हैं, ने तथा कई अन्य इस्लामी न्याय व्यवस्था देने वाले लोगों ने महरम यानी माँ, बहन, बेटी, फूफी, ख़ाला इत्यादि के साथ लिंग पर रेशम लपेट कर कुछ शर्तों के साथ निकाह/सैक्स की व्यवस्था दी है।
सन्दर्भ अल मुग़नी बानी इमाम इब्ने-क़दामा वॉल्यूम 7 पेज नम्बर 485
जवादे-मुग़निया बानी इमाम जाफ़र अल सादिक़ वॉल्यूम 5 पेज नम्बर 222
फ़िक़हे-इस्लामी बानी मुहम्मद तक़ी अल मुदर्रिसी वॉल्यूम 2 पेज नम्बर 383
जब तक आम मुसलमान के दिमाग़ में इस्लाम के अंतिम सत्य होने के दावे पर संदेह नहीं उपजेगा। उसके सृष्टि के अंतिम क्षण तक की उपयुक्ततम जीवन शैली होने के दावे की जगह कालबाह्य व्यवस्था होने का विश्वास नहीं उभरेगा, आतंकवाद की समस्या का समाधान नहीं होगा। यह फ़ैसला आतंकवाद के ख़ात्मे की ओर बड़ा क़दम भी है।
तुफ़ैल चतुर्वेदी
पुनर्जन्म?
Rattan Lal Gottra
🔴🔴🔴🔴
अगर पुनर्जन्म सही है तो श्राद्ध-पक्ष कैसा?
धर्म के “धंधे” का सबसे हास्यास्पद और विकृत रूप देखना है तो पितृ पक्ष श्राद्ध और इसके कर्मकांडों को देखिये. इससे बढ़िया केस स्टडी दुनिया के किसी कोने में आपको नही मिलेगी. एसी भयानक रूप से मूर्खतापूर्ण और विरोधाभासी चीज सिर्फ विश्वगुरु के पास ही मिल सकती है. एक तरफ तो ये माना जाता है कि पुनर्जन्म होता है, मतलब कि घर के बुजुर्ग मरने के बाद अगले जन्म में कहीं पैदा हो गए होंगे. दूसरी तरफ ये भी मानेंगे कि वे अंतरिक्ष में लटक रहे हैं और खीर पूड़ी के लिए तडप रहे हैं.
अब सोचिये पुनर्जन्म अगर होता है तो अंतरिक्ष में लटकने के लिए वे उपलब्ध ही नहीं हैं. किसी स्कूल में नर्सरी में पढ़ रहे होंगे. *अगर अन्तरिक्ष में लटकना सत्य है तो पुनर्जन्म गलत हुआ*. *लेकिन हमारे पोंगा पंडित दोनों हाथ में लड्डू चाहते हैं इसलिए मरने के पहले अगले जन्म को सुधारने के नाम पर भी उस व्यक्ति से कर्मकांड करवाएंगे और मरने के बाद उसके बच्चों को पितरों का डर दिखाकर उनसे भी खीर पूड़ी का इन्तेजाम जारी रखेंगे.*
अब मजा ये कि कोई कहने पूछने वाला भी नहीं कि महाराज इन दोनों बातों में कोई एक ही सत्य हो सकती है ... उसपर दावा ये कि ऐसा करने से सुख समृद्धि आयेगी. लेकिन इतिहास गवाह है कि ये सब हजारों साल तक करने के बावजूद यह देश गरीब और गुलाम बना रहा है ..... बावजूद इसके हर घर में हर परिवार में श्राद्ध का ढोंग बहुत गंभीरता से निभाया जाता है .... और वो भी पढ़े लिखे और शिक्षित परिवारों में .... ये सच में एक चमत्कार है.👁🙏🏼👁
- ओशो
♣♣♣♣
खुद को जगाओ
Rattan Lal Gottra
जगाना खुद को है
और पत्थरों को
घंटा बजाकर जगाते हो।
अंधेरा मन में है,
और दीये
मंदिरों मे जलाते हो
सपने आपके हैं और उम्मीद
पंडे पुजारियों से लगाते हो
रविवार, 20 अगस्त 2017
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
हमारी दिमागी गुलामी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसा वाली रानी थी
नास्तिकता की जरुरत क्यों?
विश्व शांति यज्ञ -
संजय कुमार > भारतीय चिंतन
विश्व शांति यज्ञ - जनता को ठगने का नया तरीका
मित्रो,आपने ऐसे बहुत से पाखंडी या धोखेबाज देखे होंगे जो लोगो को धर्म के नाम पर मुर्ख बना के उनको ठगते हैं जैसे फलित ज्योतिष, गंडे -ताबीज वाले, भूतप्रेत बाधा दूर करने वाले, शनि महाराज, आदि।
पर कई सालो से एक प्रचालन और बढ़ गया है जिसपर लोगो का ध्यान कम गया है वह है ' विश्व शांति यज्ञ'करना। विश्व की शांति के नाम पर बड़े बड़े पंडाल लगते हैं जिसमे बड़े बड़े धर्म गुरु विश्व शांति के नाम पर यज्ञ हवन करते हैं, इसमें भाग लेने वाले अधिकतर संपन्न घर के ही होते हैं। लाखो रूपये की सामग्री के साथ साथ करोडो रूपये दान दक्षिणा में चढ़ा दिए जाते है ।
विश्व शांति के नाम पर बड़े बड़े टन्ट घंट किये जाते हैं ऐसे कार्यकर्मो में ,पर वास्तव में क्या इनसे विश्व में शांति आती है? विश्व तो छोडिये क्या जिस राज्य में यह यज्ञ किये जाते हैं उस राज्य के सिर्फ उस क्षेत्र में शांति आ पाती है?
क्या उस क्षेत्र में अपराध रुक जाते हैं? क्या उस क्षेत्र में शांति आ जाती है? यदि ऐसा होता है तो राज्यों और मोहल्लो में थाने बनाने और पुलिस रखने की क्या जरुरत ?सिर्फ महीने दो महीने में एक यज्ञ करवा दो सब शांत रहेगा।
इन यज्ञो से लेश मात्र का भी फर्क नहीं पड़ता ,यदि यज्ञो या हवनो से विश्व शांति आती तो हवन यज्ञ करने वाले यज्ञ करके सीरिया, गाजा इजराइल, ईराक आदि देशो में शांति कर के दिखाए?
यज्ञ से पाकिस्तान में शांति कर के दिखाए. चलो यह भी नहीं तो केवल भारत में ही शांति कर के दिखाए।
दरअसल , इन कर्मकांड और पाखंडो से यदि किसी को शांति मिलती है तो वह सिर्फ पुरोहित को मिलती है जो दक्षिणा में यजमानो को मुर्ख बना के हजारो लाखो ठग लेता है।
बाकी किसी और को या किसी स्थान , देश में इन पाखंडो से रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता।
जरुरत है ऐसे पाखंडो से जनता का धन और समय दोनों बचाने के लिए जागरूक करने की।
ऐसे विश्व शांति के यज्ञ पुरे साल कंही न कंही चलते ही रहते हैं और पुरोहितो के घर ' शांति' बनी रहती है ।
विनोबा, दुर्गा, इंदिरा के संग मेरे जीवन के अनमोल पल -
मेरे जीवन के अनमोल पल -
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1-
1970 में आजादी की लड़ाई में गांधी जी के सहयोगी, भूदान यज्ञ आंदोलन के संस्थापक विनोबा भावे जी के पचहत्तरवीं जन्म दिवस के अवसर पर हम लोइंग गांव के पंद्रह लोग
{श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता, उनकी पत्नी दुर्गावती गुप्ता , जनार्दन गुप्ता (प्रधान पाठक/चुंटी मास्टर /सरोज गुप्ता के पिता जी, उनकी पत्नी शशि गुप्ता, धर्नीधर प्रधान (मेरे ताऊ जी/ चतुर्भुज गुप्ता के पिता जी ), रुक्मिणी विश्वाल ( किशोर श्रवण के पिता जी ), हुई बाई ( चंद्रभूषण गगुप्ता की नानी), पदुम गुप्ता (सुबोध प्रधान के पिताजी ), दामोदर प्रधान (देवेश प्रधान के पिताजी ),मेरे चचेरे भाई/ मित्र जयप्रकाश गुप्ता (प्रवीण अरविंद के पिता जी ), मैं स्वयं...}
हमारे दादा जी सर्वोदयी नेता श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता जी के साथ गांधी आश्रम वर्धा गए थे।
गांधी आश्रम में में पांच दिन ठहरे थे। आश्रम, पुस्तकालय, गांधी जी के जीवन वृत फिल्म देखकर गांधी को जानने का समझने का अच्छा अवसर मुझे मिला ।
गांधी आश्रम परिसर में विनोबा जी के जन्म दिन पर उन्हें हमारे देश के सभी राज्यों के राज्यपाल /मुख्य मंत्री अपने अपने राज्य से एकत्रित राशि की थैली भूद यज्ञ
के लिए भेंट किए । दोपहर में उनके साथ जमीन पर बैठ कर भोजन करने का सौभाग्य मिला । हमारे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण और केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण के पास ही मैं बैठा था। सभी लोग राज्यपाल, मुख्य मंत्री, मंत्री भी भोजन पश्चात अपना दोना पत्तल उठाकर बाहर फेंके
दूसरे दिन हम लोग बस से विनोबा आश्रम पनवार गए। विनोबा जी धोती पहने, सर पर हरे रंग का एक कपड़ा बांधे घासपात से बने छत के नीचे चबुतरे पर बैठे थे। गर्मी के कारण एक तसले के पानी में भीगा भीगा कर अपना बदन पोंछ रहे थे। बहुत लोग लाइन में खड़े थे ।
वर्धा के लिए आखिरी बस का समय हो रहा था। लोग जल्दी जल्दी एक एक कर विनोबा जी का चरण स्पर्श कर बाहर जा रहे थे। विनोबा जी आशीष दे रहे थे। मुझे यह अच्छा नहीं लगा.. चरण स्पर्श कर चलते बनो? मैं कुछ देर उनसे बात करना चाहता था। मैं चुपचाप लाइन से हट गया। हमारे गांव के सभी चरण स्पर्श कर चबुतरा के पास मुझे खोजे । मैं उन्हें देख रहा था। पास ही था चबुतरा के एक खंभा के पीछे था। श्री जनार्दन गुप्ता जी बोले - ଈତକେ ଥାଇ ଦିୟା ବୋ , ଇ ନତଠୁ ସଲା ଏନତିଚ୍ କରସୀ , ଆସୀ ଯିବା ହୁଶିୟାର୍ ଆୟ इसको छोड़ो रहने दो ये नत्थू साला ऐसा ही करता है । चलो सब, वह आ जाएगा किसी तरह, होशियार लड़का है। वे चले गए । और कुछ लाइन में थे सब चले गए
मैं विनोबा जी का चरण स्पर्श किया । मैंने कहा कि मैं आपके सर्वोदय आंदोलन में शामिल होना चाहता हूं। उन्होंने मेरा परिचय जानने के बाद कहा - तुम शिक्षक हो। अपना काम अच्छे से करो। ड्युटी के अलावा भी विद्यार्थियों के लिए, समाज के लिए कुछ कर सकते हो। और भी कुछ बात हुई । मैंने अंत में पूछा - ये सर में हरी पट्टी क्यों बांधते हैं? उन्होंने चारों तरफ हाथ से दिखाकर कहा - कुछ नहीं, ये हरा भरा.. ये हरियाली । मैं फिर से चरण स्पर्श कर चला गया। बस लेट थी इसलिए मुझे मिल गई ।
मेरे जीवन को दिशा देने के उनके शब्द मेरे धरोहर हैं ।
सन् 1970- 75 में प्रधान मंत्री इंदिरा जी बिलासपुर आई थीं। मेरे चाचा तथा मित्र श्री सुभाष चंद्र गुप्ता शिक्षक तब बिलासपुर में बी एड कर रहे थे। मै और मेरे मित्र /चचेरा भाई जयप्रकाश गुप्ता इंदिरा जी को देखने बिलासपुर गए । प्रधान मंत्री जी का रघुराज स्टेडियम में कार्यक्रम था। मैं और सुभाष चाचा इंदिरा जी को जल्दी देखने के लिए बहुत उतावले हो रहे थे। हम दोंनो स्टेडियम से पैदल एयरपोर्ट की ओर तेज तेज चलने लगे । लगभग तीन किलोमीटर बाद इंदिरा जी की कार दिखाई दी । हम बहुत उत्साहित थे। इंदिरा गांधी की जय का नारा लगाने लगे जोर जोर से। सुभाष चाचा उछल उछल कर नारा लगा रहे थे। कार नजदीक आते ही हम दोंनो कार के किनारे पकड़कर चलने लगे नारा लगाते हुए । चाचा जी उछल रहे थे । पोलिस वाले बीच बीच में हमें कार से दूर हटने के लिए कहते लेकिन इंदिरा जी उन्हें संकेत से मना कर देती । हम उनकी कार को पकड़े पकड़े नारा लगाते स्टेडियम के गेट तक आए। यादगार के वे पल अविस्मरणीय हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाली दुर्गा भाभी श्रीमती दुर्गावती बोहरा ( भगत सिंह के साथी शहीद श्री भगवती चरण बोहरा जिनकी बम का परीक्षण करते मृत्यु हो गई थी, की पत्नी) से मेरा पत्र व्यवहार था। दुःख है कि उनके सभी पत्र नष्ट हो गए।
1981-82 में मैं और मेरी बहन स्वरुपा (वर्तमान श्रीमती स्वरुपा साहू अध्यापिका सरस्वती शिशु मंदिर गेरवानी) आरोग्य मंदिर गोरखपुर से परीक्षा देकर लौटते हुए लखनऊ में दुर्गा भाभी के दर्शन के लिए रूके । उनके घर में
चरण स्पर्श कर उनके संस्मरण सुनते रहे दिन भर। वर्तमान स्थिति पर उनसे पूछा ।उन्होंने कहा - मेरा वश चले तो कुछ नेताओं को लाइन में खड़ा कर गोली मार देती।
बीच बीच में वे हमें चाय नास्ता खुद बनाकर खिलाई। दुर्गा जी के साथ मेरी बहन की एक फोटो लिया । कुछ ख़राब हो गया है फिर भी यह फोटो मेरे लिए एक अमूल्य धरोहर है। (फोटो निचे है)
शाम को हम उनके चरण स्पर्श कर विदा लिए । वे सुनहरे पल थे मेरे जीवन के ।
मेरे नाम यशपाल जैन की पहली चिट्ठी
देश की आजादी के बाद उन्होंने "सस्ता साहित्य मंडल " की स्थापना कर हिंदी साहित्य की पुस्तकें कम कीमत पर उपलब्ध कराने का बीड़ा उठाया था। वे आजादी की लड़ाई के अपने संस्मरण लिखे हैं । एक जगह उन्होंने लिखा है - "हम सोचते थे कि आजादी के बाद हमें कम से कम पोलिस की कोई नौकरी तो मिल जाएगी लेकिन मिली नहीं ।"
सांस्कृतिक परिवर्तन कोई खतरा नहीं जरूरत है।
Swami Balendu
पच्चीस साल पहले कितने प्रेमविवाह होते थे और अब कितने होते हैं? उसी तरह पच्चीस साल पहले कितना छुआछुत और घूँघट पर्दा था और अब कितना है? ये सब सांस्कृतिक बदलाव हैं या नहीं! जोकि पहनावे से लेकर खानेपीने तक और रहनसहन तथा व्यवहार सभी में दिखाई देता है. हमारे सोचने का ढंग बदला या नहीं! क्या हम आज भी पांच सौ साल पुरानी संस्कृति में जी रहे हैं जबकि विधवा को सती होते के लिए फ़ोर्स किया जाता था? संस्कृति वही होती है जो देश काल परिस्तिथी के अनुसार हर समय बदलती है. फिर क्यों प्राचीन संस्कृति के नाम का रोना रो रहे हो और पब्लिक को खाली फ़ोकट में ‘संस्कृति खतरे में पड़ गई’ कहकर झूठा डर दिखा रहे हो.
शनिवार, 19 अगस्त 2017
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
ज़रा सोचिए ..!
आखिर तुम्हें कब मिलेगी आजादी ?
……………………..
दुनियां चाँद पे चली गई !
मंगल की छाती पर
नासा ने रोबोट उतार दिया!
शनि मंगल
सूर्यग्रहण- चन्द्रग्रहण के
हर रहस्य से पर्दा उठ गया !
मगर फिर भी तुम
ग्रह नक्षत्रों को
शनि मंगल को
जन्मकुंडली में देख -देख कर
काँप रहे हो !
अपना भविष्य सुधारने के लिए
बाबा बाबियों का रास्ता
नाप रहे हो!!
क्या इसी दिन के लिए तुमने
बीएससी एमएससी पीएचडी
की थी !
कि तुम पढ़ेलिखे जाहिलों की
फौज में शामिल हो जाना !
क्या इसी दिन के लिए तुम
डॉक्टर इंजीनियर वकील
मजिस्ट्रेट या प्रोफेसर बने थे ?
कि बंगले पर
काली हांडी टांगना !
निम्बू मिर्ची टांगना !
और अपने उज्ज्वल भविष्य की भीख
किसी बाबा बाबी के दरबार में
नाक रगड़ कर माँगना !!
देश आजाद हो गया !
दुनिया आजाद हो गई !
आखिर
कब मिलेगी तुम्हें आजादी!
मानसिक गुलामी से ???
बंद कमरे में तुम्हारी चोंटी
कट जाती !
अँधेरे में अकेले में
तुम्हें भूत -पलीत सताते हैं !
तुम्हें ही सारी दुनिया की
नजर लगती है !
डायन तो तुम्हारे
हर घर में
मौजूद है !!
तुम्हारे तंत्र मंत्र यंत्र
काम क्यों नहीं करते हैं !
रक्षा सूत्र तुम्हारी चोंटी
क्यों नहीं बचाता है !
आखिर कब तक
तुम मानसिक गुलाम रहोगे !
क्या भारत
पुनः विश्व गुरु
तुम्हारे जैसे मनोरोगियों की
वजह से
कभी बन पाएगा ?
दुनिया रोज नए- नए आविष्कार कर रही है !
तुम हजारों साल पुरानी भाषा संस्कृति रीति रिवाजो की
वैज्ञानिक व्याख्या करने में
लगे हो !
कब तक शब्दों के साथ
बलात्कार करोगे ?
कब तक धोखे में रखोगे !
भारत की भोली भाली जनता को
हर सिद्धान्त हर आविष्कार को
शास्त्रों ऋषि मुनियों के
माथे मड़ोगे !!
तुम्हारी समस्याएं लौकिक हैं
मगर तुम्हें हर समस्या का हल
परलोक में नजर आता है !
संसार तुम्हारे लिए स्वप्नवत् है
माया है !
भगवान की लीला है
नाटक है ! भ्रम है !
आखिर तुम्हें इस सपने से कौन जगाए ?
जो जगाए वही
जातिद्रोही,धर्मद्रोही,देशद्रोही
या नास्तिक है ?
पहले भी कईयों ने
खूब प्रयास किए
मगर फिर भी तुम्हारा
विवेक नहीं जागा !
क्योंकि तुम विश्वगुरु के
अहंकार की
दारू पीकर
गरीबी अनपढ़ता
लिंगभेद जातिभेद
भाषाभेद क्षेत्रभेद
साम्प्रदायिकता
की नाली में पड़े हो !
आखिर तुम्हें कब मिलेगी
आजादी ?
मानसिक गुलामी से ????
अब
अंधविश्वास मुक्त
वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त
परम्परागत धर्म विहीन




