गुरुवार, 25 मई 2017

मेरी मर्जी


Dinesh AastikMithilesh K Sinha और 11 अन्य लोगों के साथ.

मैं आस्तिक हूँ
क्योंकि मुझे त्यौहार मनना पसंद हैं, मुझे रँगोली पसंद है, मुझे पुराने मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे पसंद हैं। मुझे गीता, बाइबिल कुरान के अच्छे उपदेश भी पसंद हैं। मुझे धर्म का सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक पहलू भी पसंद है। मैं धर्म की अच्छाईयों की चोरी की है। धर्म के अनुसार चोरी करना पाप है। हाँ मैंने पाप किया है। ऐसा पाप करके मैं गौरान्वित अनुभव करता हूँ।

मैं नास्तिक हूँ
क्योंकि मैं किसी ईश्वर को नहीं मानता, किसी देवता या अलोकिक शक्ति को नहीं मानता, किसी फरिश्ते को नहीं मानता।

मैं धर्म के चमत्कारों को नहीं मानता, मैं धार्मिक पाखण्डों और आडम्बरों को नहीं मानता।

छद्म धार्मिकों से निवेदन
लेकिन तथाकथित छद्म धार्मिकों से मेरा कहना है कि हम अनीश्वरवादियों से बेहूदे सवाल न पूछे कि आपने अपना नाम फलां क्यों रखा? अपने धर्मिकों की तरह शादी क्यों की? आपने धार्मिको की तरह बच्चे पैदा क्यों किये? आप ईश्वर की बनाई हुई हवा क्यों लेते हैं? 
मुझे जो अच्छा लगेगा मैं वह करूँगा। आप कौन होते हो मुझे रोकने वाले? यदि आपका अपने ईश्वर पर पूरी तरह यकीन हो तो उससे पूछो कि इन नास्तिकों को क्यों पैदा किया। इन्हें नास्तिक क्यों बनाया?

क्या लिखें क्या नहीं


Ruba Ansari

बड़ी छोटी सी बात है अगर समझ में आ जाय तो ठीक ही है-
एक दर्जी से ये शिकायत करना की तुम सिर्फ कपडे ही क्यों सिलते हो, चप्पल क्यों नही? या एक कुम्हार से शिकायत करना की तुम सिर्फ बर्तन ही क्यों बनाते हो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण क्यों नही? फेसबुक पर शिकायत करने वालों का हाल भी कुछ ऐसा ही है हमें समझना होगा की ह्यूमन टेस्ट (taste) अलग अलग होते हैं, हर कोई अलग खाना, अलग पहनना पसंद करता है, हमारी हॉबीज और इंटरेस्ट अलग अलग होते हैं, हर कोई हर किसी मुद्दे से प्रभावित नही होता। अब आप दिलीप सी मंडल से शिकायत करने लगें की आप सिर्फ दलितों के मुद्दे पर ही क्यों लिखते हैं तो ये आपकी मूर्खता को दर्शायेगा। न्यूज़ रिपोर्ट्स भी अलग अलग बीट पर रिपोर्टिंग करते हैं कुछ स्पोर्ट्स, कुछ पॉलिटिक्स, कुछ क्राइम, तो क्या हमें उनसे शिकायत करनी चाहिए की तुम सिर्फ क्राइम के बारे में क्यों लिखते हैं मनोरंजन के बारे में क्यों नही? रही बात मेरी तो मैं उन्ही मुद्दों पर लिखूंगी जो मुझपर असर छोड़ते हों या जिनमे मैं सुधार या बदलाव की ज़रूरत महसूस करती हूँ, आप जो पढ़ना चाहते हैं मैं वो नही लिख सकती, इसलिए यहाँ शिकायत का नगाड़ा बजाने की ज़रूरत नही🙏

लड़की


Nikhilesh Mishra

देखो तो कैसे ज़ोर-ज़ोर से हँस
रही है लड़कों की तरह//
मर्दों की तरह सीना ताने चल
रही है! बेशर्म कहीं की//
इतनी उम्र हो गयी! न खाना बनाने
आता और न ही कढ़ाई-बुनाई, सिलाई// भाइयों को खा लेने दे,
उसके बाद खाना! चली आयी मुह
बाये// खड़ी-खड़ी मुह क्या देख
रही है? जा पानी ला दौड़ के! लड़कियों को बचपन से
ही ग़ुलामी की ट्रेनिंग मिलने
लगती है घर पे! ज़ोर-ज़ोर से हंसने
पे तो सिर्फ़ लड़कों का एकाधिकार
बना दिया जाता है! हंसी आये
भी तो लड़कियों को मुंह ढककर हंसने की सलाह दी जाती है!
सीना तान के चलना लड़कों के लिए
जहां बहादुरी और निडर होने
की निशानी मानी जाती है,
वहीं लडकियां ऐसे चलें तो शर्म
की बात! भाई को भले ही अपना पिछवाड़ा धुलना न
आता हो लेकिन बहन
को खाना बनाना, कढ़ाई-बुनाई, सिलाई
सब आना ही चाहिए
नहीं तो पढ़ना लिखना सब बेकार!
कितनी भी तेज़ भूख लगी हो लेकिन खाना भाइयों के
खा लेने के बाद
ही मिलेगा कि कहीं खाना घट न
जाए! भाइयों का पेट ज़रूर
भरना चाहिए वो भले ही भूखी रह
जाए! उम्र में लड़की भले ही अपने भाइयों से बड़ी हो लेकिन खाना,
पानी, अचार, रोटी दौड़-दौड़ के
लाना उसके आदर्श बहन और आगे
चलकर आदर्श पत्नी बनने के
लक्षण हैं! हमारे देश
को सीता या सती सावित्री की ज़रुरत
नहीं, फूलन देवी जैसी बहादुर
बग़ावती स्वभाव की महिलाओं
की ज़रुरत है!
..........तारा शंकर

बुधवार, 24 मई 2017

धरती में आदमी नहीं रहते

RaviPrakash Sinha

धरती में आदमी नहीं रहते
केवल हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई बौद्ध जैन नास्तिक आदि रहते हैं

मंगलवार, 23 मई 2017

बुर्का


संजय कुमार

दोपहर की चिलचिलाती धूप और लगभग 40 डिग्री गर्मी , ऐसे में महिला सर से पाँव तक सिंथेटिक के काले कपड़े के बने बुर्के में पूरी तरह ढंकी हुई ।

ऐसा देख के ही उसकी दयनीय स्थिति का अंदाजा हो जाता है कि बुर्के में कितनी गर्मी और घुटन का सामना करना पड़ रहा होगा उस महिला को।
जबकि साथ में बैठा उसका पति गर्मी से बचाव के लिए हाफ स्लीव की शर्ट , पैंट और सैंडिल पहने हुए था।

जिस प्रकार की भारतीय जलवायु है उसमें बुर्का पहनने की जरूरत नहीं होती है , किन्तु आस्था के नाम पर अरब की नकल की जाती है जिसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है ।

महिलाओं को इस जबरन थोपे है 'काली कैद' से भी आज़ादी की मांग करनी चाहिए , उन्हें ऐसे परिधान पहनने का हक़ मिलना चाहिए जो मौसम के अनुसार सही हों । अरब की नकल से उन्हें मुक्ति की मांग करनी चाहिये, उन्होंने अरब का धर्म अपनाया है परिधान नहीं ।

- संजय

सोमवार, 22 मई 2017

आत्मा


Padmamukh Panda

"जरा सोचिये!"
************
आत्मा तो हम सभी की एक जैसी ही होती होगी। भले ही शरीर किसी का भारी भरकम तो कोई दुबला पतला हो सकता है।
जब कोई चिंटी मर जाती है तो उसकी आत्मा और जब कभी कोई हाथी मर गया तो उसकी आत्मा दोनों आपस में मिलते होंगे तो क्या बात चीत होती होगी?
मनुष्य बेचारा कितना अधिक सोचता रहता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ मेरे पास अब अधिक समय नहीं है। मैं मर गया तो मेरे परिवार का क्या होगा?
मनुष्य को अपनी आत्मा के बारे में कुछ ज्यादा ही फिक्र रहती है। जीवन भर तो कमाने खाने के चक्कर में पिसता रहता है मरते समय भी चिंता उसका पीछा नहीं छोड़ती है।
दोस्तों! आज तक आत्मा के बारे में कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हुई है और भविष्य में भी दूर दूर तक इसकी जानकारी मिलने की कोई संभावना नहीं है।
जो सामने है;उस पर विश्वास करना ठीक है कि जो कल्पना पर आधारित है उस पर विश्वास करना चाहिए?
अब तक अनगिनत शरीरों ने प्राण त्याग दिए हैं और आने वाले समय में भी यही सब कुछ होने वाला है!
मन को मजबूत बनाकर जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर सुखी जीवन व्यतीत करें। परिवार तथा खुद को स्वस्थ रखने का प्रयास कर देश की दशा और दिशा बदलने में भागीदार बनें।
मरने के बाद क्या होगा? कैसे होगा?यह सब परेशान करने वाली बातों से खुद को दूर रखें।
आप यदि किसी का बुरा नहीं करते तो कोई भी ताकत आपका अनिष्ट नहीं कर सकती है।
अस्तु आमीन..!

विचारक. पद्ममुख पंडा
महापल्ली

शनिवार, 20 मई 2017

स्त्री

आर कृष्णन शर्मा

स्त्री:- जब कोई स्त्री
रास्ते से जा रही हो चाहे छोटे कपडे पहने
हो या अजीब सा वस्त्र पहने हो 
या वो कहीं स्नान कर रही हो 
या कपड़े बदल रही हो 
या किसी से एकांत में बात कर 
रही हो तो क्यों 
पुरुषों को उलझन होती है क्यों 
उनके भीतर बैचनी होने लगती है। 
वो तो अपनी सहजता से चल रही है 
स्नान कर रही है। तो पुरुषों को क्यों 
परेशानी होती है। 
ये कष्ट पुरुषों का है क्यों उनके भीतर बैचेनी हो रही है।
मुश्लिम में अपने भीतर के बेचैनी का 
ईलाज ना करके स्त्री को पर्दे में 
नकाब में डाल दिया तो क्या 
उनकी बेचैनी कम हो गयी है। 
नही वो और कामुक हो गये। 
""ईलाज किसका होना चाहिये था 
और किसका हो रहा है।"" 
इस अवस्था में पशु हमसे ठीक दिख रहे है
""जो सत्य पुरुष होगा वो 
अपने भीतर का ईलाज करेगा 
ना किसी दूसरों को छिपाएगा य 
पर्दे में रखेगा।""" 
मन का ईलाज होना 
चाहिए कि ये बेचैनी हममे 
कहाँ से जन्म ले रही है।..........
धन्यवाद ......ओशो

स्वर्ग में प्रवेश के लिए धोती कुरता| जन्नत के लिए दाढ़ी|

शुक्रवार, 19 मई 2017

इंसानियत


नीतीश के. एस.

अमेरिका में गोरे और काले का भेदभाव था। कालों से नफ़रत करते थे। आज उन्हीं कालों के साथ ख़ुशी ख़ुशी रह रहे हैं। नफ़रत और भेदभाव चाह कर भी संभाल नहीं पाए। 
इसी अमेरिका में रूस से नफ़रत करने वाले करोड़ों लोग हैं। लेकिन। इसी अमेरिका में हज़ारों रुसी बिना भेदभाव के समान अधिकार के साथ रह रहे हैं। रूस के साथ युद्ध और दुश्मनी चाह कर भी जारी नहीं रख पाए। 
जर्मनी में एक हिटलर ने एक पूरी नस्ल को ख़त्म करने का बीड़ा उठाया था। हिटलर खुद ख़त्म हो गया लेकिन वो काम नहीं हो पाया जो वो और उसके जैसे हज़ारों चाहते थे। जर्मनी आज सभी संप्रदायों को ख़ुशी से जगह देता है और इस पर गर्व कर सकता है।
भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था। भारत में आज भी मुसलमान बड़ी गिनती में रह रहे हैं और कमोबेश बराबरी से रह रहे हैं। समय समय पर नफ़रतें सर उठाती रहती हैं लेकिन खुद मिट जाती हैं और अमन बरक़रार रह जाता है। 
इजराइल फिलिस्तीन में कितने ही ऐसे हैं जिन्हें सरहद के दूसरी तरफ़ होना चाहिए था, लेकिन वो उस तरफ़ जी रहे हैं जहाँ उन्हें नहीं होना चाहिए था। वो जी रहे हैं और नफ़रतों के बावजूद अपनी जगह बनाये हुए हैं। सालों की नफ़रत भी उनकी इस मिलावट का ईलाज खोज नहीं पा रही।

असल में इंसान फितरतन अमन पसंद है। जहाँ सुकून से दो वक़्त गुज़ारने का मौका मिला, वहीँ का हो के रह जाता है। उसे सच में सरहदों से, नियमों से बहुत लगाव नहीं होता। उसे आगे बढ़ने का शौक होता है। जहाँ बेहतरी दिखी, वहीँ का हो के रह गया। खुद को ही देख लीजिए। हममें से नब्बे फ़ीसदी लोग गाँव छोड़ आए हैं। क्योंकि वहां ज़िन्दगी बसर करना शहर के मुक़ाबले मुश्किल है। बेवजह की चिकचिक नहीं चाहते। कोई नहीं चाहता।

दुनिया में जितनी भी दुश्मनी की कहानियां हैं, उनमें एक भी सफल नहीं हुई है। दायरे बांध कर शुद्धता अपनाने का अरमान रखने वालों ने हमेशा मुंह की खाई है। तो, बात ये है कि चाहे जो भी धर्म हो, चाहे जो भी रंग हो, चाहे जो भी संस्कृति हो, चाहे जो भी भाषा हो, उसे आप सिर्फ अपने लिए आरक्षित नहीं रख सकते। लाख कोशिश कर लीजिए, मिलावट तो हो ही जायेगी। वो मिलावट जिसे हम इंसानियत के नाम से जानते हैं, और आख़िर में यही इंसानियत ही बचती है। बहुत ज़िद्दी, बेशर्म और ढींठ होती है न। इसलिए, इंतज़ार कीजिये। वक़्त है, गुज़ार देना है। साथ गुजारेंगे तो मुहब्बत बढ़ेगी, अलग अलग गुजारेंगे तो अफ़सोस बढ़ेगा। नफ़रत तो एक रोज़ ख़त्म हो ही जानी है।

इक़बाल के लिखा तो किसी और बात पर था , लेकिन यहाँ बैठता सही है :
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा..

प्रार्थना


Rajesh Pippal

जिसे तुम प्रार्थना समझते हो, वो अज्ञान है

मैं बहुत चमत्कृत हो जाता हूं यह देखकर कि लोग जाकर मंदिरोंमें झुक जाते है, जो आकाश को तारों से भरा देखकर नहीं झुकते। इनका मंदिर में झुकना झूठा होगा, निश्चित झूठा होगा। इसमें हार्दिकता नहीं हो सकती। आदमी की बनाई हुई मूर्ति में इन्हें क्या दिखाई पड़ सकता है ? आदतवश झुक जाते होंगे। बचपन से झुकाए गए होंगे इसलिए झुक जाते होंगे मां - बाप ने कहा होगा, झुको, इसलिए झुक जाते होंगे, भय के कारण झुक जाते होंगे -- कि कहीं नरक न हो, कहीं दंड न मिले। या लोभ के कारण झुक जाते होंगे कि झुकने से स्वर्ग मिलेगा,पुरस्कार मिलेंगे।लोग अपने भय, कमजोरी, नपुंसकता के कारण झुक जाते हैं और समझ लेते हैं कि हम खुदा के सामने झुक रहे हैं।अज्ञान है; तुमने प्रार्थना समझी है उसे ? वहां प्रार्थना बिल्कुल नहीं है, प्रेम बिल्कुल नहीं है। सरासर झूठ है। क्यों ?
क्योंकि अगर आंखों में प्रेम होता तो इन पास खड़े वृक्षों के पास तुम्हारे झुकने का मन न होता ? कोयल कूकती और तुम न झुकते ? मोर नाचता और तुम न झुकते ? आकाश बादलों से भर जाता और तुम न झुकते ? चांदनी के फूल झर - झर झरते और तुम न झुकते ? कोई हंसताऔर तुम न झुकते ? मिट्टी में और हंसी ? किस चमत्कार की प्रतीक्षाकर रहे हो ? उसके चरण - कमल प्रत्येक पल हैं, प्रत्येक स्थल पर हैं। एक - एक रेत के दाने पर उसके हस्ताक्षर हैं, लेकिन संवेदनशीलता चाहिए।

~ ओशो ~
(नाम सुमिर मन बावरे, प्रवचन #9)

सत्य


भगवान कहां कहां रहते हैं

-भगवान मंदिरों में रहते हैं |
-अरे नहीं, वे मजदूर के पसीना में होते हैं | 
-नहीं, वे खलिहान में होते हैं|
- नहीं, वे मां के चरणों में होते हैं |
## सब बकवास, वे कण कण में होते हैं |
सुगंध में दुर्गंध में, कुत्ते बिल्ली में, विषाणु वेक्टेरिया में, चोर डाकू में, आसाराम में, नटवर लाल में, बाथ रुम में, तालाब में.. ....... ...

भ्रमजाल


Suresh Soni

धर्म के सही अर्थ से भटकाव के कारण धर्म ने मानव जाति का भला नहीं किया , उल्टे शोषण किया है . आज धर्म से मानवता गायब है | आज धर्म एक संगठन के रूप में काम कर रहा है और इस संगठन की कमान जिसके भी हाथ में है , जिसका ही वर्चस्व है उसने अपने ही हित में धर्म की व्याख्या की है जिसके कारण बस उसी का भला हो रहा है , बाकी आबादी उनके हाथ की कठपुतली है | यह प्रचारित किया गया कि धर्म की समीक्षा समय के अनुसार नही हो सकती | धर्म को भ्रमजाल बना दिया गया है |

भस्म कर दें

Guddu Bharati > ‎आओ तर्क करें

क्यों न हम पाकिस्तान को श्राप से ही भस्म कर दें

और रोज़ रोज़ की किच किच से फुरसत मिल जाये

#मासूम

काश कोई नजहब न होता

Ajay Kumar
शकील प्रेम जी की कविता धर्म के मर्म को बताती हुई व्हाट्सएप ग्रुप (TARKSH EEL-1) से ।
ना मस्जिद आजान देती, ना मंदिर के घंटे बजते
ना अल्ला का शोर होता, ना राम नाम भजते
ना हराम होती रातों की नींद अपनी
मुर्गा हमें जगाता, सुबह के पांच बजते
ना दीवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता....
…….काश कोई मजहब ना होता....
ना अर्ध देते , ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती , नदिओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती , नदिओं का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों
का नाटक होता,ना देशों की सीमा होती ,
ना दिलों का फाटक होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई, बेखबर ना होता
ना ही गीता होती , और ना कुरान होता
ना ही अल्ला होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.
ना मैं हिन्दू होता, ना तू मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।
...... काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....
शकील प्रेम ।
copied

गुरुवार, 18 मई 2017

ईश्वर के नाम पर शोषण


Kishor Rathor

चलिए मान लिया दुनिया इश्वर ने बनायी है... तो क्या उसने इसलिए बनायी की अरबों साल बाद इंसान होंगे जो उसकी चाटुकारी करेंगे, उसके नाम पर लड़ेंगे,खून खराबा करेंगे.. दुनिया में उसके नाम पर ठगी करेंगे, अपनी ही प्रजाती का शोषण करेंगे ???? इश्वर को मनाने वाले लोग ही, उसके नाम को डुबोये हैं, इश्वर को सबसे बड़ा खलनायक बनाए हुए हैं... न.रूका
किशोर राठोट हरदा

इतिहास


Padmamukh Panda

इतिहास
***
महाभारत युद्ध की समाप्ति पर
श्रीकृष्ण ने मौसी कुंती से कहा__
" यदि मैैं चाहता तो इस महायुद्ध को
निश्चित ही रोक सकता था
किन्तु युद्ध अनिवार्य था
इसे टाल देना स्वीकार्य नहीं था!
अचंभित कुंती हतप्रभ रह गई
अस्फुट स्वर में क्या कुछ कह गई
"जब युद्ध तुमसे रोका जा सकता था
फिर क्यों नहीं रोक लिया?
हजारों को अनाथ;विधवा
और पुत्र हीन हो जाने दिया?
यह कैसा तुम्हारा धर्म बासुदेव!
होकर समर्थ भी तुमने
यह निंदनीय कार्य किया?
इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा
तुम्हें भी चक्रधर!
अपनों से बिछडने का
दुःख क्या होता है
तुम्हें भी पता चल जाएगा
यह कुंती का अभिशाप ही था
यादव वंश निर्मूल हो गया
सब कुछ प्रतिकूल हो गया।
इतिहास गवाह है
महापुरुषों की ऐसी ही भूलों की सजा
हम भुगत रहे हैं
अपनों से ही नफरत करते
लड़ने को उद्यत रहे हैं!
महापुरुषों का अंधानुकरण
हम नहीं करेंगे
अपने ही लोगों के हाथ
अब नहीं मरेंगे
हमें उन तथ्यों से यही सीखना है
इतिहास खुद को दोहरा न सके
ऐसा नया इतिहास लिखना है!

पद्ममुख पंडा
महापल्ली

कश्मीर समस्या


ਧਰਮਿੰਦਰ ਗੂਗਲ

नबील अहमद की अहमियत:
***************************
जब हम कश्मीर के बारे में सोचते हैं, तो आतंकवाद के बारे में सोचते हैं, उन नौजवानों के बारे में सोचते हैं, जो हाथों में पत्थर लेकर उन्हें सुरक्षा बलों पर फेंकते हैं। लेकिन आतंकवाद और पत्थर फेंकते नौजवान कश्मीर का अधूरा सच हैं। कश्मीर का इससे बड़ा सच वह है, जो अक्सर खबरों की सनसनी के बीच अपने लिए जगह नहीं बना पाता। अचानक किसी घटना के बाद हम ऐसे सच से रूबरू हो पाते हैं और फिर जल्द ही उसे भूल भी जाते हैं। जैसे हम नबील अहमद वानी को लगभग भूल चुके थे। पिछले साल उनका नाम सुर्खियों में तब आया था, जब उन्होंने सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ़ में कमांडेंट पद के लिए हुई प्रवेश परीक्षा में टॉप किया था। हमने इसे एक छोटी सी खबर मानकर भुला दिया। नबील को मिलने वाला कवरेज आतंकवादी बुरहान वानी को मिलने वाले कवरेज का दसवाँ हिस्सा भी नहीं था, जबकि बुरहान वानी जहां नौजवानों से एक हाथ में पत्थर और दूसरे में हथियार लेने की बात कह रहा था, तो वहीं नबील वानी कह रहे थे कि नौजवानों को हाथ में कलम पकड़नी होगी, वे पढ़-लिख कर ही आगे बढ़ सकेंगे, पत्थर फेंक कर नहीं। हम उन गुमराह नौजवानों के बारे में खूब चर्चा करते रहे हैं, जो बुरहान वानी को अपना रोल मॉडल मानते हैं, लेकिन उन बहुसंख्य नौजवानों को भुला दिया गया, जिनके रोल मॉडल नबील अहमद वानी हैं।नबील अहमद वानी इन दिनों फिर से चर्चा में हैं। उन्होंने महिला कल्याण मंत्री मेनका गांधी को एक चिट्ठी लिखी है। यह चिट्ठी उनकी बहन के बारे में है, जो पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में पढ़ रही हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें महिला छात्रवास छोड़ने को कहा है। नबील ने अपनी चिट्ठी में यह भी लिखा है कि उन्हें अपने परिवार को लेकर हमेशा चिंता रहती है, क्योंकि आतंकवादी संगठन उनके खिलाफ हैं। नबील की इस तरह की चिंता जायज भी है। पिछले दिनों कश्मीर घाटी में जिस तरह आतंकवादियों ने लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की निर्मम हत्या की, वह बताता है कि आतंकी समूह उन सभी लोगों से नफरत करते हैं, जो भारतीय तंत्र में ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं और कश्मीरी नौजवानों के असली रोल मॉडल हैं। आतंकी संगठनों की दिक्कत यह है कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। कश्मीरी नौजवान सिविल सर्विसेज, पीसीएस, आईआईटी सभी प्रवेश परीक्षाओं में मेहनत करके अपने लिए जगह बना रहे हैं। यहां तक कि वे खेलों के क्षेत्र में भी तेजी से आगे आ रहे हैं। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि ये उस प्रदेश के नौजवान हैं, जहां कई दूसरे प्रदेशों जैसी बेहतर शिक्षा व्यवस्था नहीं है। और आए दिन आयोजित होने वाले बंद से उनकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होती है।ऐसे नौजवानों और उनके परिवार वालों को पूरी सुरक्षा देना देश का पहला दायित्व है। आज के कश्मीर की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि उसे ऐसे और रोल मॉडल मिलें। आतंकवाद और अलगाववाद आज के कश्मीर की एक हकीक़त है और हमें उससे हर कदम पर, हर तरह की लड़ाई लड़नी ही होगी। इसमें किसी तरह की कोई रियायत नहीं दी जा सकती, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी जरूरत यह भी है कि हम एक नए कश्मीर के निर्माण में जुट जाएं। यह काम कश्मीर को एक नई सोच वाली नई पीढ़ी देकर ही किया जा सकता है। एक ऐसी पीढ़ी, जो अपने वर्तमान और भविष्य को कश्मीर समस्या के अतीत से जोड़कर न देखती हो। कश्मीरी नौजवानों को अच्छी शिक्षा और रोज़गार देकर हम न सिर्फ उनके, बल्कि अपने सपनों को भी पूरा कर सकते हैं। यही पीढ़ी आगे चलकर कश्मीर को समाधान के रास्ते पर लेकर जाएगी।

~साभार - हिंदुस्तान

मर्दानगी


Nikhilesh Mishra

लड़की उम्र में बड़ी हो तो मर्दानगी को ठेस लग जाती है, लड़की लंबाई में बड़ी हो तो भी मर्दानगी को चोट लग जाती है, लड़की अधिक कमाती हो तो मर्दानगी हर्ट होती है, लड़की आर्ग्यूमेंटेटिव हो तो मर्दानगी को ठेस, राह चलते समय लड़की दो क़दम आगे चलने लगे तो मर्दानगी घायल हो जाती है, लड़की 'न' कह दे तब तो पक्का मर्दानगी छलनी हो जाती है, बिना पूछे या एक्सप्लेन किये पत्नी किसी पुरुष दोस्त से बात कर ले तो डाह के मारे मर्दानगी दांत पीसने लगती है, फेसबुक पे लड़की की फ़ोटो पे अधिक लाइक आने से भी अधिकांश मर्दों को कलेजा भभक उठता है....मतलब ये कि स्त्री पुरुषों से कमतर रहे, उनके नियंत्रण में रहे, उनपे निर्भर रहे और उनका एहसान मानती रहे तभी मर्दानगी साबित होती है!

मर्दानगी (मैस्क्युलिनिटी) एक कुंठित श्रेष्ठताबोध है! इसका शारीरिक बल से कोई लेना देना नहीं बल्कि ये मानसिक दुर्बलता है, रोग है!
Tara Shanker