रविवार, 25 जून 2017

सूर्य को अर्ध्य

Rattan Lal Gottra > ‎"अंध-भक्त मुक्त भारत" #ABMB

👍👍👉🙏एकबार पंडित लोग गंगा नदी मे खड़े हो कर सूर्य को पानी दे रहे थे। 
👉गुरुनानक जी ने ठीक उनके विपरीत पानी मे खड़े हो कर के पानी फेंकना शुरू कर दिया ।
👉तब पंडितों ने कहा के आप इधर पानी क्यों दे रहे हों? 
👉नानकजी ने सवाल पर सवाल कर दिया के आप लोग उधर पानी क्यों दे रहे हो? 
तब पंडितों ने जवाब दिया कि हम लोग तो सूर्य देवता को पानी दे रहे हैं । 
👉तब नानकजी ने कहा मै भी अपने खेतों को पानी दे रहा हूं जो करतारपुर (पंजाब) मे हैं ।
👉पंडितों ने कहा तूं मूरख लगता है, भला इतनी दूर से खेतों को पानी कैसे पहुंच सकता है?
👉गुरु नानक जी ने कहा जब आपका दिया हुआ पानी लाखों मील दूर सूर्य तक पहुंच सकता है, तो मेरे खेत तो यहां से सिर्फ 250मील ही दूर हैं ।
ये सुन कर पंडित लोग हर बार की तरह शरमिंदा हो गये । 
👉यह है गुरुनानक जी का पाखंड पर चोट करने का एक तरीका था 🙏🙏🙏🙏

सूर्य नमस्कार एक मूरख होने की निशानी है ।
गुरु जी के अनुसार, भारत उन मूरखों से भरा पड़ा है ।

रामसेतु

Veeru Ji

रामसेतु का सच

राम सेतु (Adams bridge) इसको अधिक पुराना होने के कारन आदम पुल भी कहाँ जाता है । राम सेतु (Adams bridge) पर नासा ने रिसर्च कर बताया कि यह पुल प्रकृति निर्मित है, मानव निर्मित नही । यह समुद्र में पाये जाने वाले मूँगा (CORAL) में पाये जाने वाले केल्शियम कार्बोनेट के छोड़े जाने से निर्मित श्रंखला है । जिसकी लंबाई 30Km. है । नासा ने इसके सैम्पल लेकर रेडियो कार्बन परिक्षण से बताया कि यह सेतु 17.5 लाख पुराना है । मूंगा(Coral) समुद्र के कम गहरे पानी में जमा होकर श्रंखला बनाते है । विश्व में मूँगा से निर्मित ऐसी 10 श्रृंखलाएँ है इनमे से सबसे बड़ी ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट पर है । इसकी लंबाई रामसेतु से भी कई गुणा अधिक 2500 Km है । विश्व की इन सभी दश मूँगा श्रंखलाओ को सेटेलाईट के द्वारा देखा जा चूका है ।
नासा के रिसर्च अनुसार राम सेतु जब 17.5 लाख पुराना है, तो इसे राम निर्मित कैसे कहाँ जा सकता है । जबकि मानव ने खेती करना /कपडे पहनना 8000 हजार वर्ष ईसा पूर्व सीखा है । मानव ने लोहा की खोज 1500 ईसा पूर्व की है ।मानव ने लिखना 1300 ईसा पूर्व सीखा है ।

मुझे चाहिए सब कुछ

Vinod Kumar

*-मैं भारत का नागरिक हूँ,*
*_मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये।*

*-बिजली मैं बचाऊँगा नहीं,*
*_बिल मुझे माफ़ चाहिये ।*

*-पेड़ मैं लगाऊँगा नहीं,*
*_मौसम मुझको साफ़ चाहिये।*

*-शिकायत मैं करूँगा नहीं,*
*_कार्रवाई तुरंत चाहिये ।*

*-बिना लिए कुछ काम न करूँ,*
*_पर भ्रष्टाचार का अंत चाहिये ।*

*-घर-बाहर कूड़ा फेकूं,*
*_शहर मुझे साफ चाहिये ।*

*-काम करूँ न धेले भर का,*
*_वेतन लल्लनटाॅप चाहिये ।*

*-एक नेता कुछ बोल गया सो*
*_मुफ्त में पंद्रह लाख चाहिये।*

*-लाचारों वाले लाभ उठायें,*
*_फिर भी ऊँची साख चाहिये।*

*-लोन मिले बिल्कुल सस्ता,*
*_बचत पर ब्याज बढ़ा चाहिये।*

*-धर्म के नाम रेवडियां खाएँ,* 
*_पर देश धर्मनिरपेक्ष चाहिये।*

*-जाती के नाम पर वोट दे,*
*_अपराध मुक्त राज्य चाहिए।*

*-टैक्स न मैं दूं धेलेभर का,*
*-विकास मे पूरी रफ्तार चाहिए ।*

*-मैं भारत का नागरिक हूँ ,*
*_मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिए।*

मजहब सिखाता आपस में बैर रखना

Hardeep Singh_
कहने को तो सभी धर्म इंसान को एक मानते हैं पर अगर ऐसा होता तो धर्मों की जरूरत ही क्या थी।
वास्तविकता यह है कि सभी धर्मावलम्बी दूसरे धर्म के प्रति नफरत के सिवा कुछ नहीं रखते।
फिर चाहे वो हिन्दू हों मुस्लिम, सिख या ईसाई हों, सब का एक जैसा नजरिया है।
मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना।

मजहब और धर्म

Ajay Kumar

अगर भगवान् के एक भक्त को और एक नास्तिक को किसी गहरी नदी में फेंक दिया जाय,

तो वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है,

अगर इन दोनों में से एक हिन्दू और एक मुसलमान हो तो भी वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है,

अल्लाह और ईश्वर अपने नियम को नहीं तोड़ता,

अल्लाह और ईश्वर का अपना कोई धर्म या मजहब नहीं है,

यानी वह ना हिन्दू है ना मुसलमान,

अगर कोई आपको ऐसा बता रहा है कि सिर्फ आपके अल्लाह या आपके ईश्वर में यकीन करने वाले को जन्नत या स्वर्ग मिलेगा तो आपको ऐसा बताने वाला आपको बेवकूफ बना रहा है,

मैं भी पहले पूजा पाठ करता था,

तब मैं काफी डरा हुआ और अपने दिमाग में अँधेरा महसूस करता था,

जब से मैंने साइंस और तर्क के आधार पर सोचना शुरू किया,

मन से ईश्वर का डर खत्म होने लगा, सभी सवालों के जवाब मिलने लगे, दिमाग के अँधेरे खत्म होने लगे,

अब मैं बहुत खुश और सुलझा हुआ महसूस करता हूँ,

अब मुझे ना किसी धर्म वाले से नफरत होती है ना किसी की जाति की वजह से उसे छोटा या बड़ा मानता हूँ,

विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचने की वजह से मुझे अब सभी इंसान एक जैसे लगने लगे हैं,

अब देशों की सीमाओं के भीतर कुढ़ते हुए, पड़ोसी देश से नफरतों से भरे हुए, दुसरे धर्म वालों को गालियाँ देते हुए, जातिवाद से भरे हुए लोगों को देख कर मुझे बहुत दया आती है,

मुझे महसूस होता है कि यह सब बेचारे बीमार लोग हैं,

अब मैं विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि पेड़, नदी, जानवर,पहाड़ और मैं सब एक ही हैं,

अब मैं आसपास की दुनिया और प्रकृति से ज्यादा प्यार महसूस करता हूँ,

सत्य जानना ही इंसान का धर्म है,

विज्ञान और तर्क ही सत्य को जानने का तरीका है,

जो लोग यह माने बैठे हैं कि जिस मजहब और धर्म में जन्म हो गया वही सबसे अच्छा और सच्चा है, वह सबसे नासमझ लोग हैं,

यकीन मानिए जब तक हम इन पुराने अंधे विश्वासों से आज़ाद नहीं होंगे ना युद्ध बंद होंगे, ना शांति आयेगी, ना नफरतें खत्म होंगी,

बुधवार, 21 जून 2017

कुंभ स्नान

Saurabh Varshney > ‎The Nastik World

आस्तिक बताते हैं कुम्भ नहाने से पाप धुल जाते हैं !
हम पूछतें हैं इतने पाप करते ही क्यों हो , की कुम्भ जाना पड़े ...!!

कथनी करनी

संजय कुमार

ऐसा क्यों है?-

ऐसा क्यों है की भारतीय जैसा कहते हैं वैसा अपने निजी जीवन मानते नहीं हैं?अर्थात कथनी करनी में इतना भारी अन्तर क्यों होता है? अक्सर जिन आदर्शो की बाते सार्वजानिक रूप से दुनिया के सामने करते हैं निजी जीवन में उन्ही आदर्शो के उलट काम करते हैं।

जैसे-

1- रोमेंटिक फिल्म यानि लड़का लड़की प्रेम आधारित फिल्मे भारत में खूब हिट होती हैं जिससे साफ़ जाहिर होता है की भारतीय लोग प्रेम / मुहब्बत को ज्यादा पसंद करते हैं ।पर जब इन्ही प्रेम पसंद लोगो के खुद के लड़का/ लड़की किसी दुसरे से प्रेम करने लग जाते हैं तो यही लोग इतने क्रोधित होते हैं की उनका क़त्ल तक कर देते हैं।

2- भारतीय हमेशा शौच ( साफ सफाई आदि स्वक्षता) की बाते करते हैं पर आदत यह है की कूड़ा घर के बाहर जंहा खाली जगह देखी डाल दिया। जंहा थोड़ी सुनसान दीवार देखी वंही हल्का हो लिए। गुटका पान खा के जंहा तहा धूकना तो जैसे जन्म जात हक़ हो भारतीयों का।

3- कहने को तो 'विश्व गुरु' कहते हैं पर बहुत बड़ी जनसँख्या अब भी निरक्षर है। संस्कृति की दुहाई देने वाले अपने बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाते हैं।

4- कहने को तो ' बसुधैव कुटुम्बकम' पर सड़क पर कितना ही दीन हीन व्यक्ति पड़ा रहे उससे बचकर ऐसे निकल जाते हैं जैसे वह कोई जीता जागता इन्सान न होक कोई कूड़े का ढेर पड़ा हो।

5- हर भारतीय स्वदेशी अपनाने का नारा लगाये रहता है ,पर खुद के घर में ऐसी विदेशी चीजे होंगी की अंग्रेज भी नहीं समझ पायेगा की वह अपने घर में है या भारतीयों के घर में। चड्डी से लेके सूट तक और संडास की सीट से लेके लक्स्जरी कार तक सब अंग्रेजी स्टाइल। विदेशी वस्तुओ का उपयोग करने में अंग्रेज को भी मात देते हुए भारतीय

7- भारतीय ' सत्य' की बाते करते नहीं थकते परन्तु यदि की निजी जीवन में देखेंगे तो हमारे निजी जीवन में सत्य कही नहीं है ।हम अपना काम ' साम-दंड- भेद' की नीति से करवाने में यकीं रखते हैं । बच्चो को ईमानदारी का पाठ पढवाते नहीं थकते पर खुद ईमानदारी के ' ई'में भी विश्वास नहीं रखते।
हम दुनिया को दिखाने के लिए बेशक ' अहिंसा' के पुजारी कहलवाते नहीं हिचकिचाते पर हमारे आदर्श हमेशा से ' लौह पुरुष' ही रहते हैं। हम ताकतवर के सामने तुरंत हथियार दाल देते हैं और कमजोरो को दबाने के लिए हमेशा तैयार।

8- धर्म कर्म /मज़हब की बाते और ढोंग सारा दिन करेंगे किन्तु मानव मानव फर्क इतना करते हैं की दूसरे को अछूत और काफ़िर कह अपने से नीचा समझते हैं।

ये तो केवल कुछ मुख्य बाते थी,कोई भी विदेशी आसनी से ऐसी बहुत सी बातो के भारतीयों के जीवन में देख सकता है जो कहने और करने में सर्वदा भिन्न है रहती हैं ।यानि भारतीयों के आदर्शो में और कार्यो में एक दम उलट बाते मिलती हैं।

ऐसा क्यों है कुछ समझ आता है आपको?

- संजय

योग से इलाज

Ajaibjalalanela _
यदि आप योग करना चहते हैं तो कीजिये, लेकिन बहुत ही हल्का-फुल्का योग कीजिये. यदि मुश्किल योग क्रियाएं करेंगे तो बहुत चान्सस हैं कि आप अपनी बॉडी के nerves व muscles को डेमेज कर लेंगे.
पिछले कुछ वर्षों में योग एक बहुत बड़ा बिज़्नेस बन गया है. योग के बारे में बहुत बढ़-चढ़ कर दावे किये गये हैं, जो कि एकदम गलत हैं. उन दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मकसद योग को बेचकर मुनाफा कमाना है. मेडिकल साईंस के हिसाब से योग में किसी बीमारी का कोई इलाज नहीं है. इसलिये इन दावों के झांसे में ना आयें. जब भी कोई बीमारी हो तो तुरंत किसी क्वालिफाईड डॉक्टर को ही दिखाये.
योग भी बस एक एक्सर्साइज़ है जैसे और बहुत सी एक्सर्साइज़ हैं. मैं योग से बेहतर एक्सर्साइज़ वॉक, जोग्गिँग, स्विम्मिंग या कोई हल्के गेम खेलने को मानता हूं. मैंने कभी योग नहीं किया. लेकिन एक्सर्साइज़ ज़रूर करता हूं. 59 साल की उम्र हो चुकी है. अभी तक मेरा शरीर बीमारियों से बचा हुआ है.
बी एल यादव

बच्चों को तर्कशील बनाएं

Ajay Kumar

*जैसे सोचोगे*
*वैसे बनोगे*

पापा पापा धरती किसने बनाई ?
बेटा भगवान ने बनाई।

आसमान किसने बनाया ?
भगवान ने।

सितारे किसने बनाए ?
भगवान ने।

हमें किसने बनाया ?
भगवान ने।

पेड़-पौधे कैसे उगते है ?
भगवान की मर्जी से।

लोग कैसे मरते है ?
भगवान की मर्जी से।

लोग पैदा कैसे होते है ?
भगवान की मर्जी से।

रोशनी कैसे मिलती है ?
भगवान की कृपा से।

अँधेरा कैसे हो जाता है ?
भगवान की इच्छा से।

बेटा इतने सवाल मत पूछो, इस धरती पर, ब्रह्माण्ड में जो भी कुछ होता है सब भगवान की मर्जी से होता है।

एक दिन बच्चे के विज्ञान टीचर बच्चे के घर आते है। देखिये वर्मा जी, आपका बच्चा पढने में बहोत कमजोर है, पढ़ाई-लिखाई में ध्यान ही नहीं देता है।

टेस्ट में सवाल पूछा गया,
बल्ब रौशनी कैसे देता है ?
जवाब में लिखा, भगवान की मर्जी से।

टेलीफोन किसने बनाया ?
भगवान ने बनाया।

धरती पर दिन और रात कैसे होते है ?
भगवान की मर्जी से।

माफ़ कीजिये बताते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन आपका लड़का फेल हो गया है।

वर्मा जी ने गुस्से से कांपते हुए लड़के को बुलाया, डांटते हुए, क्यों बे ? हमारे लाड-प्यार का नाजायज फायदा उठाता है, पढ़ाई-लिखाई में दिमाग क्यों
नहीं लगाता है ? और दो तमाचे रसीद करते हुए बोले, कमबख्त फेल हो जाएगा तो जिन्दगी में क्या करेगा ? और बेचारा बच्चा समझ ही नहीं पाया कि उससे
गलती कहाँ हुई ?

काश! वर्मा जी ये समझ पाते कि बच्चे की जिज्ञासा को अगर वो भगवान से तुष्ट न करते, तो बच्चा उन सवालों के जवाब विज्ञान में ढूंढता।

उस बच्चे की सारी कल्पनाएं, जिज्ञासाएं, खोजी प्रवृत्ति तो एक भगवान पर आकर ही खत्म हो
गयीं, भला इसमें उस बच्चे की क्या गलती है जो उसे विज्ञान की समझ न आई ?

क्या आप भी चाहते है कि आपके बच्चे फ़ैल हो ? ....नहीं ना ? ...तो फिर आपके बच्चों को विज्ञान की कहानियां सुनाओ... देवी-देवता और भगवान की नहीं ! उन्हें विज्ञान का रहस्य समझाओ, जूठी-मुठी कहानिया नहीं... उन्हें तर्क करना सिखाओ...

विज्ञान को धर्म बनाओ... आपका बच्चा अवश्य तरक्की करेगा।

अपना विकास स्वयं करो, आपका उद्धार आपको खुद ही करना होगा। कोई भगवान,अल्लाह ,गॉड आपका उद्धार करने नहीं आनेवाले।

*जागो और जगाओ*
*तर्क करना सिखाओ*

4 घंटे · सार्वजनिक

योगासन से इलाज

योगासन करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बहुत अच्छा है,, लेकिन इससे रोगों का इलाज न करें, न कराएं!

कांग्रेस ने क्या किया

तुम क्या जानेगे नेहरू और कांग्रेस ने देश के लिए क्या किया? जिस साधन से आज तुम नेहरू जी को, कांग्रेस पार्टी को स्वार्थी कह रहे हो वह सब साधन भाजपा के कारण देश में नहीं आया है| भाजपा नई तकनिक का विरोध करती रही है. कम्प्युटर का विरोध इन्होंने ही किया था| तुम अपने दादा दादी से पूछो पहले देश की क्या हालत थी और देखो आज की हालत | यह सच है कि कांग्रेस काल में भ्रष्टाचार खूब हुआ है लेकिन विकास भी खूब हुआ है| याद रखो हम सब भ्रष्टाचारी हैं इसलिए हर पार्टी में भ्रष्टाचार व्याप्त है| अपने आसपास ठीक से देखो समझो| होशियार हो तो सब साफ साफ दिखाई देगा|

हर कोई डॉक्टर

Sanjeev Mongia

हमारे समाज में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग बहुधा होता है . आप अपने दो चार , दोस्तों , रिश्तेदारों या परिचितों के बीच , अपनी शरीर की कोई तकलीफ का जिक्र क्या कर दे , उनमे से कोई शर्तिया , आपको कोई एक देशी इलाज बता देगा और उसका जादुई प्रभाव भी .

इस तरह योग और आयुर्वेद की अपनी सीमाए है . इसे वैकल्पिक तौर पर ही अजमाए . यह डाक्टर सात साल से दस साल , यू ही अपना सिर नही खपाते . रही बात रामदेव बाबा की और आयुष जैसे सरकारी विभाग की , दोनों ने अपनी ' दूकान ' चलानी है.

विज्ञान किधर से कहाँ आया

विज्ञान पूर्व से पश्चिम में आया या पश्चिम से पूर्वी देशों में?

मंगलवार, 20 जून 2017

कर्म फल

संजय कुमार

चंदू लाल-" तो! तुम ईश्वर को नहीं मानते हो ? फिर तो भगवान कृष्ण के कहे कर्मफल को भी नहीं मानते होंगे जो गीता में उन्होंने कहा है की इस जन्म के कर्मो का फल अगले जन्म में जरूर मिलता है ?

मैं- " जी.....कर्मफल और पुनर्जन्म जैसा कुछ नहीं"

चन्दूलाल को मेरी बात पर गुस्सा आ गया और नथुने फुलाते हुए बोलें-
" कैसी मूर्खता वाली बात करते हो? कर्मफल होता है 
इंसान को आपने कर्मो की सजा जरूर मिलती है ,इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में .... "

मैं और चन्दूलाल बाते करते हुए अभी कुछ दूर आगे बढ़े ही थे की मोड़ पर एक 15-16 साल का लड़का तेजी से मोटर साईकिल चलाते हुआ सामने आ गया। हमें सामने देख घबराहट में उसने तेज ब्रेक लगाएं ,किन्तु अचानक ब्रेक लगाने से बाइक अनियंत्रित हो गई । हम दोनों उछल के एक तरफ हो गएँ किन्तु फिर भी मोटरसाइकिल चन्दूलाल से टकरा ही गई। चन्दूलाल के पैर पर मोटरसाइकिल का पहिया टकराया और वह झटके से सड़क पर गिर गया । टांग में चोट आई गई , मैंने उसे सहारा देके खड़ा कर दिया।

खड़े होते ही चन्दूलाल का चेहरा दर्द और गुस्से से लाल हो गया ,वह माँ बहन की गलियां देते हुए लड़के को मारने दौड़ा। मैंने चंदू लाल को रोकते हुए कहा-

" चन्दूलाल भाई! इसमें लड़के की कोई गलती नहीं है,गलती तुम्हरी थी ... कर्मफल के अनुसार तुम्हे अपने पिछले जन्म के कर्मो की सजा मिली है ....."

अब चन्दूलाल लड़के को छोड़ मुझे गालियां देने लगा .....मैंने कुछ गलत कह दिया था क्या?😛

-संजय

सूर्य को प्रणाम क्यों?

Dinesh Aastik

#सूर्य_नमस्कार_एक_पाखण्ड

धार्मिक लोग कहते हैं कि सूर्य हमें प्रकाश देता है अतः हमें उसे नमस्कार करके उसका धन्यवाद देना चाहिये। अरे भाई सूर्य जड़ पदार्थ है। वह हमारा नमस्कार कैसे ग्रहण करेगा? क्या आप मोबाइल से बात करने के बाद अपने मोबाइल को धन्यवाद या नमस्कार करते हैं? क्या आप अपने कम्प्यूटर से कई तरह के काम करने के बाद उसे धन्यवाद देते हैं या नमस्कार करते हैं? नहीं करते न! क्योंकि आप जानते हैं कि मोबाइल जड़ पदार्थ है और जड़ पदार्थ को धन्यवाद देना या उसे नमस्कार करना हमारी मूर्खता है। क्योंकि न तो वह हमारा धन्यवाद ही ग्रहण करने में सामर्थ है और न ही नमस्कार। अतः सूर्य आदि ग्रहों को नमस्कार करना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

सब उपर वाले की मर्जी


दिनेश आस्तिक_
मित्रों संसार में अशुभ भी ईश्वर की ही देन है। समानता में भी कहीं न कहीं उसका हाथ है। जब कहा जाता कि उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर संसार में जो भी गलत होता है उसमें उसकी सहमति निश्चित है।

रविवार, 18 जून 2017

अम्बेडकर वादी

अम्बेडकर जी हिंदू धर्म की संकीर्णता से परेशान होकर बौद्ध धर्म अपनाए| लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि बौद्ध धर्म केवल अम्बेडकरवादियों का है|
""""""
ये अम्बेडकर वादी तो अम्बेडकर जी को केवल दलितों के नेता प्रचारित कर उनकी महानता को कम कर रहे हैं| यह सोच उनकी संकीर्णता है|

हिंदू मुसलमान

Raman Sandhu

एक आम आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है, 
बाहर आ कर साबुन से हाथ धोता है,
दाँत ब्रश करता है,
नहाता है,
कपड़े पहनकर तैयार होता है, 
अखबार पढता है,
नाश्ता करता है,
घर से काम के लिए निकल जाता है,
बाहर निकल कर रिक्शा करता है,
फिर लोकल बस या ट्रेन में या अपनी सवारी से ऑफिस पहुँचता है,
वहाँ पूरा दिन काम करता है, 
साथियों के साथ चाय पीता है, 
शाम को वापिस घर के लिए निकलता है,
घर के रास्ते में एक सिगरेट फूँकता है,
बच्चों के लिए टॉफी,
बीवी के लिए मिठाई वगैरह लेता है,
मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, 
और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है,

अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई
"हिन्दू" या "मुसलमान" मिला ?

क्या उसने दिन भर में किसी "हिन्दू" या "मुसलमान" पर कोई अत्याचार किया ?
उसको जो दिन भर में मिले वो थे.. 
अख़बार वाले भैया,
दूध वाले भैया,
रिक्शा वाले भैया,
बस कंडक्टर,
ऑफिस के मित्र,
आंगतुक,
पान वाले भैया,
चाय वाले भैया,
टॉफी की दुकान वाले भैया,
मिठाई की दूकान वाले भैया..

जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो 
इनमें "हिन्दू" या "मुसलमान" कहाँ है ?

"क्या दिन भर मेंउसने किसी से पूछा कि भाई, तू "हिन्दू" है या "मुसलमान" ?

अगर तू "हिन्दू" या "मुसलमान" है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा,

तुझसे सिगरेट नहीं खरीदूंगा,
तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा,
तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा,
क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, मिठाई खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले "हिन्दू" हैं या "मुसलमान" ?

"जब हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मिलने वाले लोग "हिन्दू" या "मुसलमान" नहीं होते तो फिर क्या वजह है कि "चुनाव" आते ही हम "हिन्दू" या "मुसलमान" हो जाते हैं ?

समाज के तीन जहर
टीवी की बेमतलब की बहस
राजनेताओ के जहरीले बोल
और कुछ कम्बख्त लोगो के सोशल मीडिया के भड़काऊ मैसेज 
इनसे दूर रहे तो शायद बहुत हद तक समस्या तो हल हो ही जायेगी.
_______हिंदुस्तान जिंदाबाद ____

लाउड स्पीकर का प्रयोग

संजय कुमार

क्यों न बंद हो धर्मिक/मजहबी कामो में लाउडस्पीकर का प्रयोग ?

आज किसी भी धर्मिक या मजहबी स्थल की सबसे ज्यादा जरुरी चीज बन गई है तो वह है लाउडस्पीकर ।
पूजा प्रार्थना करनी हो या नमाज पढ़ना हो लाउडस्पीकर की तेज आवाज चाहिए सभी को,बिना लाउडस्पीकर के फुल वॉल्यूम किये धार्मिकों को लगता ही नहीं की उनकी आवाज खुदा या भगवान् तक जायेगी ही ।

धर्मिक मजहबी लोग जैसे अपने खुदा या भगवान् को नहीं बल्कि चीख चीख दूसरे लोगो को बताना चाहते हैं की देखो हम अल्लाह ईश्वर की पूजा प्रार्थना कर रहे हैं ।

अरे भाई!जैसा की आप लोग मानते हैं की ईश्वर सातवे आसमान में विराजमान है या ब्रह्माण्ड में कंही तो वैसे भी आपके लाउडस्पीकर की आवाज ब्रह्माण्ड या सातवे आसमान तक नहीं पहुचने वाली ।
तब काहे को आस पास के लोगो के कान बहरे कर देते हो ? 
अगर आप कहते हो की आप लाउडस्पीकर में अपने जैसे धर्मिक मजहबी लोगो को आगाह करते हैं या सूचना देते है अपने धार्मिक क्रियाकलापो की ।
तो , साहब घर जाके बताइये न उन्हें ... क्या जिसको बताने का आप दावा कर रहे है लाउडस्पीकर में चिल्ला के उसे धर्म की नियमावली नहीं पता ?उसे टाइमटेबल नहीं पता? 
यदि वह आपके बताने पर भी भूल जाता है और आपको उसको लाउडस्पीकर में चिल्ला के बताना पड़ रहा है तो इसका मतलब वह जिसे आप समझाने गए थे उसे आपके धर्म मजहब में कोई इंट्रेस्ट नहीं है.....आप पीछा छोड़िये उसका .... चिल्लाना बंद किजिये।
जिसे इंट्रेस्ट होगा वह खुद आएगा आपके पास ।

इस प्रकार लाउडस्पीकर में चिल्लाना ईश्वर अल्लाह की पूजा इबादत नहीं बल्कि अपना अपना संख्याबल दिखाना भर है और दूसरे लोगो को परेशान करना भर है।

तरह तरह के प्रदूषण से तो वैसे ही इंसान की जान निकल रही है , आप लोग क्यों रात दिन चिल्ला चिल्ला के ध्वनि प्रदूषण और बढ़ा के लोगो का जीना दूभर कर रहे हैं ।

मैं चाहता हूँ की सरकार धर्मिक /मजहबी स्थलो में लाउडस्पीकर का प्रयोग बंद करवा दे ताकि गैर धर्मिक लोगो को परेशनी न हो ।
पूजा पाठ नमाज पढ़नी हो तो बिना लाउडस्पीकर के प्रयोग के की जाए ताकि दूसरे लोग जो आपके पूजा पाठ या नमाज में इंट्रेस्ट नहीं रखते वे चैन से जी सके ।

- केशव ( संजय)