देखो तो कैसे ज़ोर-ज़ोर से हँस
रही है लड़कों की तरह//
मर्दों की तरह सीना ताने चल
रही है! बेशर्म कहीं की//
इतनी उम्र हो गयी! न खाना बनाने
आता और न ही कढ़ाई-बुनाई, सिलाई// भाइयों को खा लेने दे,
उसके बाद खाना! चली आयी मुह
बाये// खड़ी-खड़ी मुह क्या देख
रही है? जा पानी ला दौड़ के! लड़कियों को बचपन से
ही ग़ुलामी की ट्रेनिंग मिलने
लगती है घर पे! ज़ोर-ज़ोर से हंसने
पे तो सिर्फ़ लड़कों का एकाधिकार
बना दिया जाता है! हंसी आये
भी तो लड़कियों को मुंह ढककर हंसने की सलाह दी जाती है!
सीना तान के चलना लड़कों के लिए
जहां बहादुरी और निडर होने
की निशानी मानी जाती है,
वहीं लडकियां ऐसे चलें तो शर्म
की बात! भाई को भले ही अपना पिछवाड़ा धुलना न
आता हो लेकिन बहन
को खाना बनाना, कढ़ाई-बुनाई, सिलाई
सब आना ही चाहिए
नहीं तो पढ़ना लिखना सब बेकार!
कितनी भी तेज़ भूख लगी हो लेकिन खाना भाइयों के
खा लेने के बाद
ही मिलेगा कि कहीं खाना घट न
जाए! भाइयों का पेट ज़रूर
भरना चाहिए वो भले ही भूखी रह
जाए! उम्र में लड़की भले ही अपने भाइयों से बड़ी हो लेकिन खाना,
पानी, अचार, रोटी दौड़-दौड़ के
लाना उसके आदर्श बहन और आगे
चलकर आदर्श पत्नी बनने के
लक्षण हैं! हमारे देश
को सीता या सती सावित्री की ज़रुरत
नहीं, फूलन देवी जैसी बहादुर
बग़ावती स्वभाव की महिलाओं
की ज़रुरत है!
..........तारा शंकर
सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है.
गुरुवार, 25 मई 2017
लड़की
बुधवार, 24 मई 2017
धरती में आदमी नहीं रहते
मंगलवार, 23 मई 2017
बुर्का
दोपहर की चिलचिलाती धूप और लगभग 40 डिग्री गर्मी , ऐसे में महिला सर से पाँव तक सिंथेटिक के काले कपड़े के बने बुर्के में पूरी तरह ढंकी हुई ।
ऐसा देख के ही उसकी दयनीय स्थिति का अंदाजा हो जाता है कि बुर्के में कितनी गर्मी और घुटन का सामना करना पड़ रहा होगा उस महिला को।
जबकि साथ में बैठा उसका पति गर्मी से बचाव के लिए हाफ स्लीव की शर्ट , पैंट और सैंडिल पहने हुए था।
जिस प्रकार की भारतीय जलवायु है उसमें बुर्का पहनने की जरूरत नहीं होती है , किन्तु आस्था के नाम पर अरब की नकल की जाती है जिसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है ।
महिलाओं को इस जबरन थोपे है 'काली कैद' से भी आज़ादी की मांग करनी चाहिए , उन्हें ऐसे परिधान पहनने का हक़ मिलना चाहिए जो मौसम के अनुसार सही हों । अरब की नकल से उन्हें मुक्ति की मांग करनी चाहिये, उन्होंने अरब का धर्म अपनाया है परिधान नहीं ।
- संजय
सोमवार, 22 मई 2017
आत्मा
"जरा सोचिये!"
************
आत्मा तो हम सभी की एक जैसी ही होती होगी। भले ही शरीर किसी का भारी भरकम तो कोई दुबला पतला हो सकता है।
जब कोई चिंटी मर जाती है तो उसकी आत्मा और जब कभी कोई हाथी मर गया तो उसकी आत्मा दोनों आपस में मिलते होंगे तो क्या बात चीत होती होगी?
मनुष्य बेचारा कितना अधिक सोचता रहता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ मेरे पास अब अधिक समय नहीं है। मैं मर गया तो मेरे परिवार का क्या होगा?
मनुष्य को अपनी आत्मा के बारे में कुछ ज्यादा ही फिक्र रहती है। जीवन भर तो कमाने खाने के चक्कर में पिसता रहता है मरते समय भी चिंता उसका पीछा नहीं छोड़ती है।
दोस्तों! आज तक आत्मा के बारे में कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हुई है और भविष्य में भी दूर दूर तक इसकी जानकारी मिलने की कोई संभावना नहीं है।
जो सामने है;उस पर विश्वास करना ठीक है कि जो कल्पना पर आधारित है उस पर विश्वास करना चाहिए?
अब तक अनगिनत शरीरों ने प्राण त्याग दिए हैं और आने वाले समय में भी यही सब कुछ होने वाला है!
मन को मजबूत बनाकर जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर सुखी जीवन व्यतीत करें। परिवार तथा खुद को स्वस्थ रखने का प्रयास कर देश की दशा और दिशा बदलने में भागीदार बनें।
मरने के बाद क्या होगा? कैसे होगा?यह सब परेशान करने वाली बातों से खुद को दूर रखें।
आप यदि किसी का बुरा नहीं करते तो कोई भी ताकत आपका अनिष्ट नहीं कर सकती है।
अस्तु आमीन..!
विचारक. पद्ममुख पंडा
महापल्ली
शनिवार, 20 मई 2017
स्त्री
स्त्री:- जब कोई स्त्री
रास्ते से जा रही हो चाहे छोटे कपडे पहने
हो या अजीब सा वस्त्र पहने हो
या वो कहीं स्नान कर रही हो
या कपड़े बदल रही हो
या किसी से एकांत में बात कर
रही हो तो क्यों
पुरुषों को उलझन होती है क्यों
उनके भीतर बैचनी होने लगती है।
वो तो अपनी सहजता से चल रही है
स्नान कर रही है। तो पुरुषों को क्यों
परेशानी होती है।
ये कष्ट पुरुषों का है क्यों उनके भीतर बैचेनी हो रही है।
मुश्लिम में अपने भीतर के बेचैनी का
ईलाज ना करके स्त्री को पर्दे में
नकाब में डाल दिया तो क्या
उनकी बेचैनी कम हो गयी है।
नही वो और कामुक हो गये।
""ईलाज किसका होना चाहिये था
और किसका हो रहा है।""
इस अवस्था में पशु हमसे ठीक दिख रहे है
""जो सत्य पुरुष होगा वो
अपने भीतर का ईलाज करेगा
ना किसी दूसरों को छिपाएगा य
पर्दे में रखेगा।"""
मन का ईलाज होना
चाहिए कि ये बेचैनी हममे
कहाँ से जन्म ले रही है।..........
धन्यवाद ......ओशो
शुक्रवार, 19 मई 2017
इंसानियत
अमेरिका में गोरे और काले का भेदभाव था। कालों से नफ़रत करते थे। आज उन्हीं कालों के साथ ख़ुशी ख़ुशी रह रहे हैं। नफ़रत और भेदभाव चाह कर भी संभाल नहीं पाए।
इसी अमेरिका में रूस से नफ़रत करने वाले करोड़ों लोग हैं। लेकिन। इसी अमेरिका में हज़ारों रुसी बिना भेदभाव के समान अधिकार के साथ रह रहे हैं। रूस के साथ युद्ध और दुश्मनी चाह कर भी जारी नहीं रख पाए।
जर्मनी में एक हिटलर ने एक पूरी नस्ल को ख़त्म करने का बीड़ा उठाया था। हिटलर खुद ख़त्म हो गया लेकिन वो काम नहीं हो पाया जो वो और उसके जैसे हज़ारों चाहते थे। जर्मनी आज सभी संप्रदायों को ख़ुशी से जगह देता है और इस पर गर्व कर सकता है।
भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था। भारत में आज भी मुसलमान बड़ी गिनती में रह रहे हैं और कमोबेश बराबरी से रह रहे हैं। समय समय पर नफ़रतें सर उठाती रहती हैं लेकिन खुद मिट जाती हैं और अमन बरक़रार रह जाता है।
इजराइल फिलिस्तीन में कितने ही ऐसे हैं जिन्हें सरहद के दूसरी तरफ़ होना चाहिए था, लेकिन वो उस तरफ़ जी रहे हैं जहाँ उन्हें नहीं होना चाहिए था। वो जी रहे हैं और नफ़रतों के बावजूद अपनी जगह बनाये हुए हैं। सालों की नफ़रत भी उनकी इस मिलावट का ईलाज खोज नहीं पा रही।
असल में इंसान फितरतन अमन पसंद है। जहाँ सुकून से दो वक़्त गुज़ारने का मौका मिला, वहीँ का हो के रह जाता है। उसे सच में सरहदों से, नियमों से बहुत लगाव नहीं होता। उसे आगे बढ़ने का शौक होता है। जहाँ बेहतरी दिखी, वहीँ का हो के रह गया। खुद को ही देख लीजिए। हममें से नब्बे फ़ीसदी लोग गाँव छोड़ आए हैं। क्योंकि वहां ज़िन्दगी बसर करना शहर के मुक़ाबले मुश्किल है। बेवजह की चिकचिक नहीं चाहते। कोई नहीं चाहता।
दुनिया में जितनी भी दुश्मनी की कहानियां हैं, उनमें एक भी सफल नहीं हुई है। दायरे बांध कर शुद्धता अपनाने का अरमान रखने वालों ने हमेशा मुंह की खाई है। तो, बात ये है कि चाहे जो भी धर्म हो, चाहे जो भी रंग हो, चाहे जो भी संस्कृति हो, चाहे जो भी भाषा हो, उसे आप सिर्फ अपने लिए आरक्षित नहीं रख सकते। लाख कोशिश कर लीजिए, मिलावट तो हो ही जायेगी। वो मिलावट जिसे हम इंसानियत के नाम से जानते हैं, और आख़िर में यही इंसानियत ही बचती है। बहुत ज़िद्दी, बेशर्म और ढींठ होती है न। इसलिए, इंतज़ार कीजिये। वक़्त है, गुज़ार देना है। साथ गुजारेंगे तो मुहब्बत बढ़ेगी, अलग अलग गुजारेंगे तो अफ़सोस बढ़ेगा। नफ़रत तो एक रोज़ ख़त्म हो ही जानी है।
इक़बाल के लिखा तो किसी और बात पर था , लेकिन यहाँ बैठता सही है :
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा..
प्रार्थना
जिसे तुम प्रार्थना समझते हो, वो अज्ञान है
मैं बहुत चमत्कृत हो जाता हूं यह देखकर कि लोग जाकर मंदिरोंमें झुक जाते है, जो आकाश को तारों से भरा देखकर नहीं झुकते। इनका मंदिर में झुकना झूठा होगा, निश्चित झूठा होगा। इसमें हार्दिकता नहीं हो सकती। आदमी की बनाई हुई मूर्ति में इन्हें क्या दिखाई पड़ सकता है ? आदतवश झुक जाते होंगे। बचपन से झुकाए गए होंगे इसलिए झुक जाते होंगे मां - बाप ने कहा होगा, झुको, इसलिए झुक जाते होंगे, भय के कारण झुक जाते होंगे -- कि कहीं नरक न हो, कहीं दंड न मिले। या लोभ के कारण झुक जाते होंगे कि झुकने से स्वर्ग मिलेगा,पुरस्कार मिलेंगे।लोग अपने भय, कमजोरी, नपुंसकता के कारण झुक जाते हैं और समझ लेते हैं कि हम खुदा के सामने झुक रहे हैं।अज्ञान है; तुमने प्रार्थना समझी है उसे ? वहां प्रार्थना बिल्कुल नहीं है, प्रेम बिल्कुल नहीं है। सरासर झूठ है। क्यों ?
क्योंकि अगर आंखों में प्रेम होता तो इन पास खड़े वृक्षों के पास तुम्हारे झुकने का मन न होता ? कोयल कूकती और तुम न झुकते ? मोर नाचता और तुम न झुकते ? आकाश बादलों से भर जाता और तुम न झुकते ? चांदनी के फूल झर - झर झरते और तुम न झुकते ? कोई हंसताऔर तुम न झुकते ? मिट्टी में और हंसी ? किस चमत्कार की प्रतीक्षाकर रहे हो ? उसके चरण - कमल प्रत्येक पल हैं, प्रत्येक स्थल पर हैं। एक - एक रेत के दाने पर उसके हस्ताक्षर हैं, लेकिन संवेदनशीलता चाहिए।
~ ओशो ~
(नाम सुमिर मन बावरे, प्रवचन #9)
सत्य
| सत्य को जानने की कोशिश करनी चाहिए. सत्य जानने के लिए उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ कर सोचना चाहिए. किसी लोखी गई या कही गई बात को आँख बंद कर नहीं मानना चाहिए. सत्य ही सुन्दर है. सत्य ही कल्याणकरी है. |
भगवान कहां कहां रहते हैं
-अरे नहीं, वे मजदूर के पसीना में होते हैं |
-नहीं, वे खलिहान में होते हैं|
- नहीं, वे मां के चरणों में होते हैं |
## सब बकवास, वे कण कण में होते हैं |
सुगंध में दुर्गंध में, कुत्ते बिल्ली में, विषाणु वेक्टेरिया में, चोर डाकू में, आसाराम में, नटवर लाल में, बाथ रुम में, तालाब में.. ....... ...
भ्रमजाल
धर्म के सही अर्थ से भटकाव के कारण धर्म ने मानव जाति का भला नहीं किया , उल्टे शोषण किया है . आज धर्म से मानवता गायब है | आज धर्म एक संगठन के रूप में काम कर रहा है और इस संगठन की कमान जिसके भी हाथ में है , जिसका ही वर्चस्व है उसने अपने ही हित में धर्म की व्याख्या की है जिसके कारण बस उसी का भला हो रहा है , बाकी आबादी उनके हाथ की कठपुतली है | यह प्रचारित किया गया कि धर्म की समीक्षा समय के अनुसार नही हो सकती | धर्म को भ्रमजाल बना दिया गया है |
काश कोई नजहब न होता
Ajay Kumar
शकील प्रेम जी की कविता धर्म के मर्म को बताती हुई व्हाट्सएप ग्रुप (TARKSH EEL-1) से ।
ना मस्जिद आजान देती, ना मंदिर के घंटे बजते
ना अल्ला का शोर होता, ना राम नाम भजते
ना हराम होती रातों की नींद अपनी
मुर्गा हमें जगाता, सुबह के पांच बजते
ना दीवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता....
…….काश कोई मजहब ना होता....
ना अर्ध देते , ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती , नदिओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती , नदिओं का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों
का नाटक होता,ना देशों की सीमा होती ,
ना दिलों का फाटक होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
…….काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई, बेखबर ना होता
ना ही गीता होती , और ना कुरान होता
ना ही अल्ला होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.
ना मैं हिन्दू होता, ना तू मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।
...... काश कोई धर्म ना होता.....
…….काश कोई मजहब ना होता....
शकील प्रेम ।
copied
गुरुवार, 18 मई 2017
ईश्वर के नाम पर शोषण
चलिए मान लिया दुनिया इश्वर ने बनायी है... तो क्या उसने इसलिए बनायी की अरबों साल बाद इंसान होंगे जो उसकी चाटुकारी करेंगे, उसके नाम पर लड़ेंगे,खून खराबा करेंगे.. दुनिया में उसके नाम पर ठगी करेंगे, अपनी ही प्रजाती का शोषण करेंगे ???? इश्वर को मनाने वाले लोग ही, उसके नाम को डुबोये हैं, इश्वर को सबसे बड़ा खलनायक बनाए हुए हैं... न.रूका
किशोर राठोट हरदा
इतिहास
इतिहास
***
महाभारत युद्ध की समाप्ति पर
श्रीकृष्ण ने मौसी कुंती से कहा__
" यदि मैैं चाहता तो इस महायुद्ध को
निश्चित ही रोक सकता था
किन्तु युद्ध अनिवार्य था
इसे टाल देना स्वीकार्य नहीं था!
अचंभित कुंती हतप्रभ रह गई
अस्फुट स्वर में क्या कुछ कह गई
"जब युद्ध तुमसे रोका जा सकता था
फिर क्यों नहीं रोक लिया?
हजारों को अनाथ;विधवा
और पुत्र हीन हो जाने दिया?
यह कैसा तुम्हारा धर्म बासुदेव!
होकर समर्थ भी तुमने
यह निंदनीय कार्य किया?
इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा
तुम्हें भी चक्रधर!
अपनों से बिछडने का
दुःख क्या होता है
तुम्हें भी पता चल जाएगा
यह कुंती का अभिशाप ही था
यादव वंश निर्मूल हो गया
सब कुछ प्रतिकूल हो गया।
इतिहास गवाह है
महापुरुषों की ऐसी ही भूलों की सजा
हम भुगत रहे हैं
अपनों से ही नफरत करते
लड़ने को उद्यत रहे हैं!
महापुरुषों का अंधानुकरण
हम नहीं करेंगे
अपने ही लोगों के हाथ
अब नहीं मरेंगे
हमें उन तथ्यों से यही सीखना है
इतिहास खुद को दोहरा न सके
ऐसा नया इतिहास लिखना है!
पद्ममुख पंडा
महापल्ली
कश्मीर समस्या
नबील अहमद की अहमियत:
***************************
जब हम कश्मीर के बारे में सोचते हैं, तो आतंकवाद के बारे में सोचते हैं, उन नौजवानों के बारे में सोचते हैं, जो हाथों में पत्थर लेकर उन्हें सुरक्षा बलों पर फेंकते हैं। लेकिन आतंकवाद और पत्थर फेंकते नौजवान कश्मीर का अधूरा सच हैं। कश्मीर का इससे बड़ा सच वह है, जो अक्सर खबरों की सनसनी के बीच अपने लिए जगह नहीं बना पाता। अचानक किसी घटना के बाद हम ऐसे सच से रूबरू हो पाते हैं और फिर जल्द ही उसे भूल भी जाते हैं। जैसे हम नबील अहमद वानी को लगभग भूल चुके थे। पिछले साल उनका नाम सुर्खियों में तब आया था, जब उन्होंने सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ़ में कमांडेंट पद के लिए हुई प्रवेश परीक्षा में टॉप किया था। हमने इसे एक छोटी सी खबर मानकर भुला दिया। नबील को मिलने वाला कवरेज आतंकवादी बुरहान वानी को मिलने वाले कवरेज का दसवाँ हिस्सा भी नहीं था, जबकि बुरहान वानी जहां नौजवानों से एक हाथ में पत्थर और दूसरे में हथियार लेने की बात कह रहा था, तो वहीं नबील वानी कह रहे थे कि नौजवानों को हाथ में कलम पकड़नी होगी, वे पढ़-लिख कर ही आगे बढ़ सकेंगे, पत्थर फेंक कर नहीं। हम उन गुमराह नौजवानों के बारे में खूब चर्चा करते रहे हैं, जो बुरहान वानी को अपना रोल मॉडल मानते हैं, लेकिन उन बहुसंख्य नौजवानों को भुला दिया गया, जिनके रोल मॉडल नबील अहमद वानी हैं।नबील अहमद वानी इन दिनों फिर से चर्चा में हैं। उन्होंने महिला कल्याण मंत्री मेनका गांधी को एक चिट्ठी लिखी है। यह चिट्ठी उनकी बहन के बारे में है, जो पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में पढ़ रही हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें महिला छात्रवास छोड़ने को कहा है। नबील ने अपनी चिट्ठी में यह भी लिखा है कि उन्हें अपने परिवार को लेकर हमेशा चिंता रहती है, क्योंकि आतंकवादी संगठन उनके खिलाफ हैं। नबील की इस तरह की चिंता जायज भी है। पिछले दिनों कश्मीर घाटी में जिस तरह आतंकवादियों ने लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की निर्मम हत्या की, वह बताता है कि आतंकी समूह उन सभी लोगों से नफरत करते हैं, जो भारतीय तंत्र में ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं और कश्मीरी नौजवानों के असली रोल मॉडल हैं। आतंकी संगठनों की दिक्कत यह है कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। कश्मीरी नौजवान सिविल सर्विसेज, पीसीएस, आईआईटी सभी प्रवेश परीक्षाओं में मेहनत करके अपने लिए जगह बना रहे हैं। यहां तक कि वे खेलों के क्षेत्र में भी तेजी से आगे आ रहे हैं। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि ये उस प्रदेश के नौजवान हैं, जहां कई दूसरे प्रदेशों जैसी बेहतर शिक्षा व्यवस्था नहीं है। और आए दिन आयोजित होने वाले बंद से उनकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होती है।ऐसे नौजवानों और उनके परिवार वालों को पूरी सुरक्षा देना देश का पहला दायित्व है। आज के कश्मीर की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि उसे ऐसे और रोल मॉडल मिलें। आतंकवाद और अलगाववाद आज के कश्मीर की एक हकीक़त है और हमें उससे हर कदम पर, हर तरह की लड़ाई लड़नी ही होगी। इसमें किसी तरह की कोई रियायत नहीं दी जा सकती, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी जरूरत यह भी है कि हम एक नए कश्मीर के निर्माण में जुट जाएं। यह काम कश्मीर को एक नई सोच वाली नई पीढ़ी देकर ही किया जा सकता है। एक ऐसी पीढ़ी, जो अपने वर्तमान और भविष्य को कश्मीर समस्या के अतीत से जोड़कर न देखती हो। कश्मीरी नौजवानों को अच्छी शिक्षा और रोज़गार देकर हम न सिर्फ उनके, बल्कि अपने सपनों को भी पूरा कर सकते हैं। यही पीढ़ी आगे चलकर कश्मीर को समाधान के रास्ते पर लेकर जाएगी।
~साभार - हिंदुस्तान
मर्दानगी
लड़की उम्र में बड़ी हो तो मर्दानगी को ठेस लग जाती है, लड़की लंबाई में बड़ी हो तो भी मर्दानगी को चोट लग जाती है, लड़की अधिक कमाती हो तो मर्दानगी हर्ट होती है, लड़की आर्ग्यूमेंटेटिव हो तो मर्दानगी को ठेस, राह चलते समय लड़की दो क़दम आगे चलने लगे तो मर्दानगी घायल हो जाती है, लड़की 'न' कह दे तब तो पक्का मर्दानगी छलनी हो जाती है, बिना पूछे या एक्सप्लेन किये पत्नी किसी पुरुष दोस्त से बात कर ले तो डाह के मारे मर्दानगी दांत पीसने लगती है, फेसबुक पे लड़की की फ़ोटो पे अधिक लाइक आने से भी अधिकांश मर्दों को कलेजा भभक उठता है....मतलब ये कि स्त्री पुरुषों से कमतर रहे, उनके नियंत्रण में रहे, उनपे निर्भर रहे और उनका एहसान मानती रहे तभी मर्दानगी साबित होती है!
मर्दानगी (मैस्क्युलिनिटी) एक कुंठित श्रेष्ठताबोध है! इसका शारीरिक बल से कोई लेना देना नहीं बल्कि ये मानसिक दुर्बलता है, रोग है!
Tara Shanker
धर्म का चेहरा
आर कृष्णन शर्मा
कुछ साल पहले की बात है। मैं ट्रैन से कही जा रहा था। उस ट्रैन में जिस सीट पर बैठा था वह सीट दो ही व्यक्ति के लिए था लेकिन मेरे बगल में एक बुढ़िया आकर बैठ गयी। उसपे मेरी नजर पड़ी तो देखा माथे पर लम्बी टिका लिए , गला में कंठीमाला लिए हुए और हाथ में कोई माला फेर रही थी और मन ही मन बुदबुदा रही थी। जैसे देखने से प्रतीत हुआ सम्पूर्ण धर्म का ठेका लेकर चल रही हो और ट्रेन में सफर के साथ। अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि उस बुढ़िया के तरफ से मेरे मान में एक सवाल गूंजा मैं स्तब्ध रह गया। बुढ़िया ने कहा कौन जाट हो बाबू मैं सकपका गया क्यूं कि मुझको इसकी उम्मीद कतई न थी। लेकिन कुछ छन मैं अपने नास्तिक मन टटोलने के बाद तपाक से जवाब दिया डोम हूँ। उसने कहा मजाक करते हो बबुआ देखने में तो नही लगते । मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था मैंने कहा चेहरे पर लिखा होता है क्या या फिर मैं आपको अपनी जाति सर्टिफिकेट दिखाऊं। इतने बोलने के बाद बुढ़िया ने मुझे गुरेर कर देखा और कहा बहुत बिगड़ल बच्चा है। और उसने राम राम कहते हुए अपनी सीट बदल ली। मै अब सीट पर आराम से पैर फैला कर बैठा था और मुझे सुकून मिल रही थी । ट्रैन के पैसेंजर मुस्कुरा रहे थे। तब एक बगल के बुजुर्ग ने कहा बिलकुल सही जवाब दिए । उस दिन धर्म का जीता जागता चेहरा देखते हुए मुझे भयावह महसूस हो रहा था और कई सवाल सोचते हुए ढूंढते हुए वो ट्रैन का सफर कट गया लेकिन ये घटना मेरे स्मृति पटल पर छप गयी।
© #आर_कृष्णन
कमजोर दिमाग
यादें_
ट्रेन में मेरे सामने सीट पर दो लोग बात कर रहे थे|
एक ने कहा- कमजोर दिमाग वाले लकीर के फकीर होते हैं, मूढ़ होते हैं| वे ही भक्त होते हैं|
दूसरा हां हूं कर रहा था|
पहला समझा रहा था जो ठीक से मुझे सुनाई नहीं दे रहा था,हल्ला गुल्ला के कारण|
मुझे ये भक्त वाली बात समझ में नहीं आई| पूछने का मन कर रहा था| बहुत सारे लोग मंदिर मस्जिद में भक्ति करते हैं वे सब के सब मूढ़ नहीं हो सकते| मोदी जी भी भक्त हैं हमारे देश को चला रहे हैं|
कुछ कहना ठीक नहीं लगा दो की बातचीत में जबर्दस्ती घुसना |
बुधवार, 17 मई 2017
अचानक परिवर्तन
यह समझ में नहीं आता की साठ बासठ के बाद लोगों को समाज सेवा, भजन कीर्तन, मंदिर मस्जिद, तीर्थ यात्रा, .... की कैसे सूझती है/ यह सब थोडा बहुत पहले से क्यों नहीं होता? कुछ लोग सेवा निवृत्ति पश्चात् पेंट शर्ट छोड़ कर धोती कुरता पहनते हैं, कोई दाढ़ी रखने लगते हैं/ यह अचानक परिवर्तन,,, ..?
एक शिक्षक अपनी सेवानिवृत्ति के अवसर पर बोले "मैं अब भागवत शरण में जीवन बिताऊंगा/ पता नहीं वे अब तक किसके शरण में थे?