शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

NDTV

Mag Tarkasheel_    दस बातें जिनके लिए NDTV इंडिया को बैन किया जाना चाहिए।
1- क्योंकि NDTV इंडिया जादू -टोना , करिश्मा ,चमत्कार जैसी खबरें नहीं दिखाता।
2- क्योंकि NDTV इंडिया चपड़गंजू बाबाओं को लाकर दिन का राशिफल और भविष्य नहीं दिखाता।
3- क्योंकि NDTV इंडिया जब सारे चैनल सास बहू और साज़िस, झगड़े चला रहे होते हैं तो वह देश से जुडी और खबरें चला रहा होता है।
4- क्योंकि NDTV इंडिया इंटरटेंमेंट के किन चैनलों TRP कहाँ पहुंची ,कौन सा सीरियल इस सप्ताह हिट जायेगा ,कौन सा पिछले सप्ताह फ्लॉप रहा ,ये सब नहीं दिखता।
5- क्योंकि NDTV इंडिया आपको सवाल करने को कहता है, किसी भी खबर पर आँख मूदकर भरोसा करने से रोकता है।
6-क्योंकि NDTV इंडिया सरकार की गलत नीतियों को खुलकर बिना चाटुकारिता के दिखाता है।
7- क्योंकि NDTV इंडिया दलितों पर अत्याचार ,आदिवासियों का मुद्दा ,ब्राह्मणवाद और संघ की करतूतों को बेझिझक दिखाता है।
8-क्योंकि NDTV इंडिया आम जनता को(not bhakts) निष्पक्ष चैनल लगता है और सेकुलरिज्म की बात करता है।
9-क्योंकि NDTV कुशवाहा समेत अन्य वंचित वर्गों की वर्तमान स्थिति और जनसँख्या व सम्राट अशोक महान पर डिबेट कराता है l
10- और सबसे अहम् और महत्वपूर्ण ये की NDTV इंडिया के एंकर Ravish kumar को बेस्ट एंकर का अवार्ड मिलता है।

आस्तिक नास्तिक

जब कोई भगवान के अस्तित्व को जान जाएगा तत्काल आस्तिक हो जाएगा| स्वाभाविक है मैं भी| फिलहाल मैं आस्तिक नहीं, नास्तिक भी नहीं हूं|

धर्म का व्यवसाय

इश्क इश्क़ शर्मा प्यार से _
भ्रष्टाचार पाप व् अपराध में फसे #पापी लोग उबरने को मंदिर मस्जिद जाते है। दान पुण्य कर के स्वर्ग में अपना आरक्षण करते है। उनका धार्मिक होना स्वभाविक है, पर किसी मूर्ति को कही रख वहाँ देवालय स्थापित कर के अपना व्यवसाय बना लेना... सिर्फ भारत देश में होता है..
अन्य देशों में प्रतियोगिता नही चलती मंदिर मस्जिद गिरजाघर या गुरुद्वारा की...!!
वहाँ के लोगो का हृदय के साथ साथ दिमाग भी चलता है।
कण कण में भगवन है, पर किसी particular पत्थर को उठा के भगवान बना देने की कला में भारतवर्ष से आगे कोई नही...💐💐💐
मेरी सोच है, किसी भी धर्म या जाती को ठेस पहुँचाना मकसद नही।।

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

आईना

सरोज गुप्ता_
आईने के सामने
सजता सँवरता है हर कोई,
मगर आइनों सी साफ जिंदगी,
जीता है कोइ-कोई..



सहसंबध

हमारे देश में बहूत धार्मिक लोग हैं, भ्रष्टाचार पाप भी बहुत है| क्या दोनो में धनात्मक सहसंबंध है?

धर्म और स्वर्ग

अधिकतर लोग जीवन भर पाप करते हैं | अंत समय के पहले वह बहुत धार्मिक हो जाते हैं| पूजा पाठ, भजन कीर्तन करने लगते हैं भगवान का मस्का लगाते हैं स्वर्ग में आरक्षण के लिए|

धर्म

[11/3, 17:14] N R  Pradhan: *दुनिया का सबसे बड़ा मजाक और ढकोसला क्या है* 😜😀😀❓❓❓❓❓

    *आप जब भी किसी धामिक व्यक्ति से भगवान् के बारे में पूछेंगे तो वो अपने धर्म संप्रदाय को ही सत्य और एकलौता प्रमाणिक भगवान बताएगा ।।*
      *लकिन जब आप उससे दो चार तार्किक प्रश्न पूछेंगे तो वो कहेगा*😀😀👆👆
   *सभी धर्म का स्वरुप भले ही अलग अलग हो किन्तु ईश्वर एक है ।।*
👆👆😀😀😀😇😇😇
  *इसके बाद जब आप किसी धार्मिक हिन्दू या धार्मिक मुस्लिम से कहेंगे की जब ईस्वर एक है तो किसी  मंदिर  में अल्लाह मिया की फ़ोटो रख के पुजा करो*😀😀
*या किसी मस्जिद में हिन्दू देवी देवता की फ़ोटो रखकर नमाज पढ़ो*😀😀😀
*तब इन पाखंडियो की सारी धूर्तता और धार्मिक पागलपन सामने आ जाता है ।।*
😀😀😀
*पाखंडियो अब कहो ईस्वर एक है और कहा रहता है ये भी बता देना ।।*
👆👆😀😀😀😜😜😜✔✔✔✔✔✔✔✔

*नास्तिक बनो ।।*
*तर्कशील बनो ।।*
*सच्चे देश भक्त बनो ।।*

*प्रकृति ही एक मात्र प्रमाणिक भगवान् है ।। जिसकी कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति चाहे वो किसी भी धर्म का हो ......एक मिनट भी जिन्दा नहीं रह सकता ।।*
   *ऑक्सीज़न  मंदिर या मस्जिद की मूर्ति पैदा नहीं करती ये प्रकृति के अनुपम भेंट है सभी जीव धारियों को ।।*
    *चाहे वो धार्मिक इंसान हो या बिना धर्म के पशु पक्षी ।।*
👆👆😀😀😀✔✔✔
[11/3, 17:15] N R  Pradhan: Yugal Pradhan ne whatsapp group विचार मंच में भेजा है|

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

शिव लिंग

नेहा नरुका की कविता 'पार्वती योनि'

ऐसा क्या किया था शिव तुमने ?
रची थी कौन-सी लीला ? ? ?
जो इतना विख्यात हो गया तुम्हारा लिंग
माताएं बेटों के यश, धन व पुत्रादि के लिए
पतिव्रताएँ पति की लंबी उम्र के लिए
अच्छे घर-वर के लिए कुवाँरियाँ
पूजती है तुम्हारे लिंग को,

दूध-दही-गुड़-फल-मेवा वगैरह
अर्पित होता है तुम्हारे लिंग पर
रोली, चंदन, महावर से
आड़ी-तिरछी लकीरें काढ़कर,
सजाया जाता है उसे
फिर ढोक देकर बारंबार
गाती हैं आरती
उच्चारती हैं एक सौ आठ नाम

तुम्हारे लिंग को दूध से धोकर
माथे पर लगाती है टीका
जीभ पर रखकर
बड़े स्वाद से स्वीकार करती हैं
लिंग पर चढ़े हुए प्रसाद को

वे नहीं जानती कि यह
पार्वती की योनि में स्थित
तुम्हारा लिंग है,
वे इसे भगवान समझती हैं,
अवतारी मानती हैं,
तुम्हारा लिंग गर्व से इठलाता
समाया रहता है पार्वती योनि में,
और उससे बहता रहता है
दूध, दही और नैवेद्य...
जिसे लाँघना निषेध है
इसलिए वे औरतें
करतीं हैं आधी परिक्रमा

वे नहीं सोच पातीं
कि यदि लिंग का अर्थ
स्त्रीलिंग या पुल्लिंग दोनों है
तो इसका नाम पार्वती लिंग क्यों नहीं ?
और यदि लिंग केवल पुरूषांग है
तो फिर इसे पार्वती योनि भी
क्यों न कहा जाए ?

लिंगपूजकों ने
चूँकि नहीं पढ़ा ‘कुमारसंभव’
और पढ़ा तो ‘कामसूत्र’ भी नहीं होगा,
सच जानते ही कितना हैं?
हालांकि पढ़े-लिखे हैं

कुछ ने पढ़ी है केवल स्त्री-सुबोधिनी
वे अगर पढ़ते और जान पाते
कि कैसे धर्म, समाज और सत्ता
मिलकर दमन करते हैं योनि का,

अगर कहीं वेद-पुराणऔर इतिहास के
महान मोटे ग्रन्थों की सच्चाई!
औरत समझ जाए
तो फिर वे पूछ सकती हैं
संभोग के इस शास्त्रीय प्रतीक के-
स्त्री-पुरूष के समरस होने की मुद्रा के-
दो नाम नहीं हो सकते थे क्या?
वे पढ़ लेंगी
तो निश्चित ही पूछेंगी,
कि इस दृश्य को गढ़ने वाले
कलाकारों की जीभ
क्या पितृसमर्पित सम्राटों ने कटवा दी थी
क्या बदले में भेंट कर दी गईं थीं
लाखों अशर्फियां,
कि गूंगे हो गए शिल्पकार
और बता नहीं पाए
कि संभोग के इस प्रतीक में
एक और सहयोगी है
जिसे पार्वती योनि कहते हैं

(नेहा नरुका महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शोध सहायक हैं.)

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

धनतेरस के दिन खरीदी

कहते हैं कि धन तेरस के दिन सामान सोना चांदी बर्तन जमीन कार बंगला... खरीदने से शुभ होता है, धन की वर्षा होती है|
लेकिन मैं इस दिन खरीदने से डरता हूँ मैं भी धनी न हो जाऊँ| फिर धन संपत्ति की रक्षा की चिंता में मेरी नींद में कमी न हो जाए|

राय दें

नीचे दिए गए दो वाक्यों पर अपनी राय दें|
अ - पहले नियम कानून बनाने वाले बड़े बेवकुफ थे, पर अब नही|
ब - पहले की अपेक्षा आज के लोग अधिक इंटेलिजेंट हैं|

धर्म का झुनझुना

Ram Bahadur Pandey _
🌹प्रायः सभी कथित धर्मों के धर्माचारियों  ने एक अन्धों का समाज निर्मित किया और कहा  कि तुम्हें अपनी आंखों की कोई आवश्यकता नही है| तुम्हें देखने की नहीं, बस भरोसे की ,श्रद्धा की अनुकरण करने की जरूरत है| इन धर्माचारियों ने यह कहते हुए कि तुम सोचोगे ,विचार करोगे और चिन्तन करोगे तो असली मार्ग से भटक जाओगे , सोचने समझने व चिन्तन करने के अधिकार से वंचित कर दिया ।
              ऐसा लगता है कि यह तथाकथित धर्माचारी नही चाहते  किसी की सन्देह की धार तेज हो या बुद्धि पैनी हो । वह यही चाहते हैँ कि सब  मरे मरे से , किसी तरह अपने को घसीटते हुए मन्दबुद्धि और प्रतिभाहीन बने रहें । इन धर्माचारियों ने मन्दबुद्धि बनाने मे सफलता ही नहीं हासिल की बल्कि इनके हाथ मे विश्वास और श्रद्धा नामक झुनझुना भी पकड़ा दिया , जिसे हम आंख बन्द करके बजाते फिर रहे हैँ ।🌷

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

आतंकवाद

धार्मिक कट्टरता सर्वाधिक मुस्लिम. अपेक्षाकृत हिंदू कम| यह कट्टरता दूसरे धर्म के लिए नफरत और आतंकवाद को जन्म देती है|

धर्म

किसी भी धर्म में तर्क, प्रश्न करने की इजाजत नहीं होती क्या?

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

सुश्री सोमू मिश्रा की कविता- क्यों दिया यह जान

https://youtu.be/M0jzEpVnj2E

राम राज्य

राम राज्य- ओशो

राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो। हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना | एक बार जो भूल हो गई, हो गई। अब दुबारा मत करना

रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर थी बात कि डाक्टर अंबेदकर जैसा शूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था| असंभव। खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था यह उसका अपराध था। और राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे। क्या करना है? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है? उसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना| शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ|
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा| मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी|
और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं|
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया|
एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति! उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो| यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं।
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी| हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे| इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका समादर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास था |पद कौरवों के पास था|  प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे।
और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है?
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था।
और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं|
निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे? उस गरीब का कसूर क्या था अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है|
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी।
तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया! शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए!
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो| मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी।
उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे|
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा| तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया। osho

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

शबरी के बेर

[10/25, 12:11] N R  Pradhan: तथाकथित उच्च जाति के ब्राह्मण आज भी शुद्रों के तोड़े गए फल खाते हैं|
[10/25, 12:14] N R  Pradhan: यह फल खा लेना शुद्रों से प्रेम नहीं होता| आज भी शुद्रों के प्रति अन्य जाति की भावना प्रेम या सम्मानजनक नहीं है, नफरत करते है् दिल से भले ही वोट के लिए कुछ भी दिखावा करें|

Debate

मैं कोई  सर्वज्ञ नहीं कि लोगों के विचार को सही गलत निर्णय कर सकूं| मैं लोगों के पोस्ट पढ़कर शेअर कर देता हूं| डिबेट के लिए| डिबेट से सत्य उजागर होता है|

मजहब


Avdhesh Nigam _
मजहब किताबों में क़ैद हैं
यह किला दुर्भेध है
कोई गीता कोई कहता कुरान है
सबकी अपनी अपनी दुकान है
मालिक बन बैठा इन दुकानों का
वह आदमी नहीं हैवान है
वेद की ऋचाएं और कुरान की आयतें
इनका मुख्य हथियार है
चलो चलें उस पार कहीं
यहाँ सुरक्षित नहीं इंसान है  |

मूर्खों की हँसी

गणित का महत्व

महान विचारक प्लेटो ने कहा था कि गणित में बहुत कमजोर बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं देना चाहिए| उन्हें पढ़ने की जरूरत नहीं|  मैं इससे सहमत नहीं| समझदारी बढ़ाने, एक अच्छा नागरिक बनाने के लिए पढाई तो जरूरी है|

विज्ञान

विज्ञान ही सत्य है| विज्ञान गणित को जानना समझना सत्संग है| कथित प्रवचन कथा सत्संग कम, असत्संग अधिक  होता है|

नशापान

नशापान का कारण है माता पिता का  परिवार के प्रति जिम्मेदारी और प्यार का अभाव| लड़कों के नशाखोरी के जिम्मेदार माता पिता को दंडित किया जाना चाहिए||

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

धर्म

यः धारयते सः धर्मः| जो धारण करने योग्य हो उसे हम धारण करें वही धर्म है| बाकी सब बकवास है|  हमारा धर्म देश दुनियाँ समाज के हित में हो|

सत्संग

कहते हैं सत्संग करना चाहिए| किधर कहां होता है? पंडित जी कथा सुनाते हैं वही है? सत्संग का सत्य से कितना और कैसे संबंध होता है? कोई बताएगा|

निवेदन

निवेदन_ आप भी अपने गांव में ऐसा करें पढ़ाई का माहौल बनाने में मदद करें|,,,,
  *********
दिनांक 23-10-2016, रविवारीय स्वाध्याय केंद्र ( पढ़ो पढ़ाओ) लोइंग जिला रायगढ़ में 27  विद्यार्थी उपस्थित हुए| संयोजक डॉ एस एस गुप्ता  सेवा निवृत आयुर्वेद अधिकारी ने सबका स्वागत किया| सेवा निवृत शिक्षक एन आर प्रधान, आन्द प्रधान, के बी प्रधान , सुश्री इंदिरा त्रिपाठी अध्यापिका स्वामी विवेकानंद प्राथमिक शाला लोइंग, सुश्री रजनी निषाद अध्यापिका गुरू द्रोणाचार्य स्कूल रायगढ़, कु ममता भोय कक्षा 12 वीं, कु आंचल निषाद कक्षा 9 वीं ने लिद्यार्थियों को हिंदी, अंग्रेजी, भूगोल पढ़ाया|  इंदिरा त्रिपाठी ने प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों को अंग्रेजी वर्णमाला लिखने का अभ्यास कराया| श्री आनंद प्रधान ने  जल थल नभ तथा मान चित्र में दिशा ज्ञान के बारे में समझाया| श्री क्षिति भूषण प्रधान ने  कक्षा 8 वीं के विद्यार्थियों को  कर्क, मकर, अक्षांश तथा देशांतर रेखाओं की जानकारी दी| सुंगर लिखावट का महत्व समझाकर सुलेख  प्रतियोगिता  का आयोजन किया गया| उत्तम लिपि के लिए कु अदिती निषाद को डॉ एस एस गुप्ता ने एक लेखनी देकर पुरष्कृत किया| तत्पश्चात रजनी निषाद ने  सबको पी टी कराया| अंत में केंद्र के संस्थापक एन आर प्रधान सेवा निवृत शिक्षक पंडरीपानी ने अध्यापकों को धन्यवाद ज्ञापन किया| सामाजिक कार्यों में सहयोग के लिए सदैव तत्पर श्री श्रवण विश्वाल को विशेष धन्यवाद देकर  उनका आभार प्रगट किया| ज्ञातब्य है कि श्री विश्वाल जी ने केंद्र के लिए दरी टाटपट्टी उपलब्ध कराते हैं तथा भविष्य में भी उपलबध कराने का आश्वासन दिया है|

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

जय भीम

भीम राव अम्बेडकर महान थे बेशक| लेकिन उन्हें  महान साबित करने के लिए ये दिन रात जय भीम का नारा लगाने वाले सच के साथ कुछ झूठ मिलाकर अफवाह फैला रहे हैं| यह घटिया हथकंडा अपना रहे हैं|
एक पोस्ट में इसी तरह कोई गधा  श्रीराम चंद्र के साथ किसी दलित नेता की तुलना क्का था शायद भीम जी के साथ| मूर्खता है यह| दोनों एक साथ होते तो कोई प्रतियोगिता करा देते कि कौन महान है ज्यादा कम!

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

मजहब

यादव अभिषेक _    "एक मज़हब आओ ऐसा भी चलाये, जिसमे बस इंसान को इंसा बनाये, सुख दुःख में हो साथ हमेशा हम सारे, खुद भी जीयें औरों को जीना सिखलाये।

कुटुम्बकम्

सपने में देखा  किसी ने कहा -     "हिंदु एव कुटुम्बकम् बाकी सब बुड़बकम्" | याद नहीं हो रहा किसने कहा.

हमारे भगवान

हम हिंदुओं के सभी भगवान, देवी देवताओं का जन्म भारत में ही जन्म लिए? उन्हें बाकी दुनियां की जानकारी नहीं थी क्या?

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

भक्ति बनाम प्रशंसा

इंसान

Sushma Sharma_ रंगोली

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

अंध विश्वास

राम राज्य

पाकिस्तान को भस्म कर दो

हरिजन , दिब्या्ग

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

मोदी जी को सलाम

छप्पन भोग बनाम दो रोटी

करवा चौथ.. कहाँ गए वो दिन

मिलावट का खेल

मिलावट का खेल

मिलावट का खेल

आजादी की लड़ाई

जिम्मेदारी

अंध विश्वास

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

सीता की ब्यथा

Secular

कन्या पूजन

ठग

बैठ जाता हूं मिट्टी में अक्सर _ हरिवंश राय बच्चन की कविता

https://youtu.be/sGnASaK6S5U

अजब गजब plastic girl

https://youtu.be/qQ8IOHp6zcc

बैठ जाता हूँ मिट्टी में अक्सर _ हरिवंश राय बच्चन

बैठ जाता हूँ मिट्टी में अक्सर _ हरिवंश राय बच्चन

अजब गजब plastic

धंधा

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

सावधान सावधान

सावधान सावधान

Shashi Atulkar _

तलाक-- दिनेश कुमार प्रजापति _ कोई आलिमे दीन जब निकाह के समय लड़की की हाँ जरूरी होती हे तो तलाक के समय क्यों नही ??

विज्ञान _ वैज्ञानिक सोच से किसे नुकसान? मुल्ला मौलवियों, पंडित पुरोहित, साधू संतों को..

आस्था पर चोंट- किसी वैज्ञानिक विश्लेषण / विचार का कोई जबाब न हो तो कहते हैं हमारी धार्मिक आस्था पर चोंट पहुंचा रहे हैं| अरे वाह! ये सड़ी गली परम्पराएं हमारी वैज्ञानिक आस्था पर चोंट पहुंचाती है| तो कानून को इस पर भी विचार करना चाहिए|

हम सब धार्मिक हैं | हमें भगवान पर पूरा विश्वास है | वे हमारे हर गलत काम को माफ कर देंगे| तो फिर हम भ्रष्टाचार में अब्बल रहेंगे ही|

संजय कुमार _ जानिए क्या है मनोचकित्सा- मेरे एक रिस्तेदार हैं( किसी कारण से उनका नाम नहीं ले सकता) . कल उनके घर जाना हुआ तो पता चला की उनकी पत्नी कई दिनों से बीमार हैं , कई डॉक्टर्स से उन्हें दिखाया किन्तु कोई लाभ न हुआ ।उनका दावा है की डॉक्टर्स तो उनकी पत्नी के रोग के बारे में पता भी न कर पाएं । इसलिए थक हार के वे निराश हो चुके थे तब एक दिन किसी पडोसी ने उन्हें गाजियाबाद के एक बाबा का नाम बताया ।यह बाबा मंत्रो के जरिये लोगो को ठीक करता है , मन्त्र मार जल पीने को देता है मरीजो को । उस तांत्रिक के अभिमंत्रित जल से रिस्तेदार की पत्नी ठीक होने लगी हैं और पहले से आराम है ऐसा वह कह रहे हैं । पर ,जंहा तक मुझे समझ आया है की यह सब ढोंग है ,वह बाबा लोगो को मुर्ख बना रहा है । तन्त्र मन्त्र से ठीक होने का दावा करने वाला व्यक्ति 99.9% कंही न कंही मनोरोगी होता है जिसके बारे में उसे भी नहीं पता होता है । मनोचकित्सको के अनुसार मनोरोग सैकड़ो प्रकार के होते है जिसे फोबिया भी कहते हैं ,अमूमन भारत में मनोरोग के बारे में बहुत कम जागरूकता है ।गाँव -देहात में ही नहीं शहरों में भी लोग या तो मनोरोग के बारे में जानते ही नहीं या मानते ही नहीं की उन्हें मनोरोग हुआ है ।जबकि अधिकतर व्यक्ति मनोरोग के शिकार होते हैं जिसमे सनक से लेके पागलपन तक शामिल है । मेरा एक मित्र है जो मंगलवार को शराब नहीं पीता जबकि अन्य दिन खूब पी सकता है । मंगलवार को शराब या मांस से परहेज करने वाले आप के आस पास भी बहुत होंगे ।इसका कारण बेशक वे 'श्रद्धा 'अथवा 'आस्था ' कहें किन्तु मनोचकित्सको के अनुसार यह 'मनोरोग ' है । यदि भूल से वह व्यक्ति मंगलवार को मांस या शारब पी ले तो उसे यह भयंकर अपराध बोध लगेगा जो और यह अपराधबोध सामान्य से पागलपन की हद तक जा सकता है ।जिसमे यदि व्यक्ति का कभी कोई अनिष्ट हो जाता है तो उसका कारण वह उसी अपराधबोध को मानेगा , अतः वह टोने टोटके करेगा या पागलपन वाली हरकत करेगा। यही मनोरोग है ,यह कम या ज्यादा इस पर निर्भर करेगा की वह आपनी आस्था के प्रति कितना अंधभक्त है । आपने अभी हाल की घटना सुनी या पढ़ी होगी की एक जैन परिवार ने आस्था के चलते अपनी 13 वर्षीय पुत्री को 64 दिनों से उपवास पर रखा जिसके चलते उस लड़की की मृत्यु हो गई ।यह मनोरोग का चरम था जिसके चलते परिवार ने लड़की को भूँखा मार दिया । प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रायड ने सिद्ध किया था की मानव मन के तीन धरातल होते है जो इस प्रकार है - 1-चेतन 2-अचेतन 3-अवचेतन मन तीन प्रकार के कार्य करता है -इच्छाओ का निर्माण, इच्छाओं पर नियंत्रण और उनकी संतुष्टि । पहला काम भोगा पर आश्रित मन का है ,दूसरा नैतिक मन का और तीसरा अहंकार का ।इच्छाओं का निर्माण अचेतन मन में होता है , उसका नियंत्रण अवचेतन मन में और उसकी संतुष्टि चेतन मन में । जब भोग की इच्छित मन और नैतिक मन का संघर्ष अवचेतन मन में चला जाता है और इच्छाओं को संघर्षपूर्वक कठोरता से नैतिक मन द्वारा दबा दिया जाता है तब यह संघर्स अचेतन मन में चलने लगता है तब यही संघर्ष ही ' रोग' बन जाता है ।यह इच्छाये अनगिनत प्रकार की हो सकती है अतः मनोरोग भी अनगिनत प्रकार के होते हैं । फ्रायड ने इस संघर्ष से व्यक्ति के मन को मुक्त करने की प्रक्रिया को ही ' मनोचकित्सा 'कहा है ।अचेतन मन में चल रहे नैतिक और इच्छित मन के संघर्ष के रेचन और चेतन मन को संतुष्टि ही मनोचकित्सा है । बहुत बार ऐसा होता है की लंबे समय तक डॉक्टर्स की दवाइयाँ खाने के बाद व्यक्ति जब ठीक होने की अवस्था में पहुंचता है तब वह बाबा या तांत्रिक की शरण में पहुँच जाता है ।चुकी उस उसे लगता है की दवाइयाँ खाने से कुछ नहीं हो रहा है इसलिए वह बाबा पर आस्था रख के आता है , और यही आस्था उसे यह विश्वास दिलाती है की बाबा उसे ठीक कर देंगे ।बाबा उन्हें अहसास दिला देता है की उसका मन्त्र तंत्र उसे ठीक कर देगा , तब यब आस्था काम आती है और दवाईयो का श्रेय बाबा ले जाता है ।चेतन मन संतुष्ट हो जाता है और मरीज को लगता है की वह ठीक हो गया है। यही सब मेरे उस रिस्तेदार की पत्नी के साथ भी हुआ , बाबा के प्रति आस्था और उसका विश्वाश दिलाने से उनके चेतन मन को संतुष्टि हुई और उन्हें लगा की वह ठीक हो रही हैं ।जबकि तंत्र मन्त्र केवल बकवास है और इससे कोई लाभ नहीं होता । http://kahaniyakeshavki.blogspot.in/2016/10/blog-post_13.html?m=1 -संजय(केशव)

जो देश काल परिस्थिति अनुसार अपने धर्म, परम्पराओं में परिवर्तन संशोधन करना न चाहें वही कट्टरता है

जो देश काल परिस्थिति अनुसार परिवर्तन संशोधन न चाहें वही कट्टरता है

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

Sudhir Kumar Jatav _ साभार : Manoj Abhigyan एक हिन्दू धर्मगुरू शिवानन्द ने अपनी एक पुस्तक मे गायत्री मंत्र के बारे मे लिखा कि इसका जाप करने से आदमी सभी प्रकार की बीमारियों से मुक्त हो जाता है. ये बात एक जर्मन जर्नलिस्ट ने पढ़ी और उछल पड़ा. उसने सोचा... ये आदमी जीनियस है, जिसने इतनी बड़ी ईजाद कर दी. दुनिया भी पागल है... पता नही किस किस को नोबल पुरस्कार दे देती है... यह पुरस्कार तो इस डॉ शिवानंद को देना चाहिए. सारी बीमारियाँ एक झटके मे ख़तम!! उसे शक की कोई गुंजाइश भी नही लगी क्योंकि शिवानंद एक क्वालिफाइड डॉक्टर था... सो ऐसा आदमी जब आध्यात्म मे उतरेगा तो तथ्य के साथ ही बोलेगा.. पूरा निरीक्षण करके ही बोलेगा. अब उस बेचारे को क्या पता कि भारत मे ऐसे बोलने वाले गली- गली मे मिल जाएगें. क्या डॉक्टर और क्या इंजिनियर... यहाँ सारे पढ़े लिखे पागल बसते हैं... विज्ञान पढ़ लिया है पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी का नही है. अंततः वो जर्नलिस्ट भारत आया और ढूँढता-ढूँढता डॉ शिवानंद के आश्रम पहुँच गया. उसे वहाँ शिवानंद का चेला मिला. उसने चेले से कहा कि मुझे डॉ. शिवानंद से मिलना है. चेला बोला कि आप अभी गुरुजी से नही मिल सकते. कारण पूछने पर चेले ने बताया कि गुरुजी बीमार हैं सो अभी नही मिल सकते, दो चार दिन बाद आना. वो जर्मन जर्नलिस्ट हैरान रह गया. उसने कहा कि खुद शिवानंद ने लिखा है कि इस मंत्र से समस्त बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं तो वो इसका जाप करके ठीक क्यों नही हो जाते ? अब चेला बेचारा क्या बोलता, असलियत तो सभी को पता है. असल धंधा कुछ और होता है, ये तो दिखावे के बोल बचन है. खैर, चेले ने उसे सारी असली बात बता दी कि ऐसा कहते तो हैं पर होता कुछ नही. वो बेचारा जर्नलिस्ट अवाक् रह गया... इतना बड़ा फ्रॉड !!! वो वापस जर्मनी चला गया.

गरबा नृत्य

गरबा नृत्य
https://youtu.be/ftW6vc4esZ4

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

शिल्पा शर्मा _ युवाओं की सोच समंदर सी गहरी होनी चाहिए

वंदे मातरम् कविता_ दिनेश देवांगन " दिव्य"

सचिन देव टंडन कविता- पढ़ाई और मोहब्बत में उलझी मेरी जिंदगी मुझे वो भी प्...

दिनेश देवांगन "दिव्य" कविता - वतन की लाज रखने को

भावेश्वर राणा की कविता नटवर नंद किशोर

रेणु मिश्रा_ खुश रहना

September 30, 2016

September 30, 2016

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

कविता कैसे जीवन गीत सुनाएं

कविता.. देश गया भाड़ में

कविता.. देश गया भाड़ में

कविता.. देश गया भाड़ में

कविता पाठ .. सूना सूना