शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

यदा यदा हि..

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं युगे युगे|
           या
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत|
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मनं सृजाम्यहम् युगे युगे||
       ********
गीता के श्लोक को लिखने में  हम भूल कर सकते हैं/कर रहे हैं? मुझे संदेह हुआ| मैं गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा| जबाब आया -" संदेह न करें| आगे वही रटा रटाया सुना हुआ अर्थ बताया गया जो गीता में लिखा हुआ है| यह अर्थ तो मैं कक्षा 9 वीं से जान रहा हूं जब मैं मेरे दादा जी के कहने से रोज शाम को राम चरित और गीता के कुछ पन्ने उसमें दिए अर्थ सहित पढ़कर सुनाता था| मेरे दादा जी और ताऊ जी बैठकर सुनते थे|
     कई लोगों को मेरे संदेह को व्यक्त किया| समाधान नहीं हुआ|
   तब मैं मई 2015 में फेसबुक में लिखा| 2016, 2017, 2018 में फिर से शेअर किया|  17-06-2018 को  फेसबुक और वाट्सएप कई ग्रुप में शेअर किया|
     मेरे वाट्सएप ग्रुप "विचार मंच" में रचनाकार महेश शर्मा ने आज दिनांक 17-06-2018 के अर्थ बताया -
अभ्युत्थानम्=वृध्दि,उत्कर्ष
अधर्मस्य=पाप,धर्म के विपरीत कार्य
तद=तब
आत्मानं=स्वयं का
सृजाम्यहम=सृजन करता हूँ ।
       यही मैं भी समझा हूं| मेरे विचार से हमें लिखना चाहिए - "अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदातत्मनं सृजाम्यहम् |
   उसी दिन यथार्थवादी चिंतक, रचानाकार पद्ममुख पंडा महापल्ली मुझसे सहमत हुए| कुछ और भी| सहमत हुए|
      गीता का यह चित्र  श्लोक सहित बड़ा बोर्ड जिनके घर के दिवाल पर लगे देखा उन्हें यह कहा लेकिन किसी ने नहीं मानी मेरी बात|
     सोचने की बात है कि गीता में
"अधर्म के अभ्युत्थान के लिए" नहीं ,
"धर्म के उत्थान के लिए"
ही कहा गया होगा|
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य (अभ्युत्थामधर्मस्य)  नहीं, अभ्युत्थानम् घर्मस्य (अभ्युत्थानम् धर्मस्य) कहा गया होगा|.
         **"*"**"

रविवार, 2 सितंबर 2018

नागरिक होने का अधिकार

"जो कोई कुछ करता है उसे करने दो तुम क्यों उनको देखते हो?" कुछ भी हो रहा हो निस्पृह बने रहो|
वाह गजब का उपदेश है|
याने कोई रेप करता है कुछ भी करता है हमें क्या|
साधु संतों बाबाओं का यह उपदेश देश दुनियां से कोई मतलब नहीं रखने की शिक्षा देता है|

ऐसे तपस्वी बाबा साधु संत मंदिरों के पुजारी जो देश दुनियां से कोई मतलब नहीं रखते|  जब तक जागते हैं  जप तप, भजन कीर्तन, पूजा पाठ, यज्ञ हवन करते रहते हैं|

ऐसे लोगों को लोकतंत्र में नागरिक होने का, वोट देने का अधिकार होना चाहिए?

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

हमारे भगवान देवी देवता सबसे ज्यादा

हम हिंदुओं के सबसे अधिक भगवान और देवी देवता| तो हम हिंदू महान|हमारी संस्कृति महान| याद है हमारे भगवान देवी देवताओं के नाम? तैंतीस करोड़?

अपडेटेट धर्म संविधान

यः धारयति सः धर्मः| जो धारण करने योग्य हो वह धर्म है|
हमारा अपडेटेड धर्म है संविधान| संशोधन होता रहता है |
लेकिन लकीर के फकीर अपडेटेड धर्म को कम महत्व देते हैं पुराने धर्म से चिपके रहना पसंद करते हैं|

बुधवार, 29 अगस्त 2018

RSS का हाफ पेंट

कोई बता सकते हैं हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति के संरक्षक RSS राष्ट्रीय स्वयं सेवक का लगभग 90 साल तक गणवेष हाफ पेंट क्यों था? धोती कुरता क्यों नहीं?
यदि आधुनिक युग में धोती कुरता को उपयुक्त नहीं माना गया तो फुल पेंट क्यों नहीं?
वैसे भी ये स्वयं सेवक केवल उनके बैठक या लाठी चालन, परेड आदि के समय ही हाफ पेंट पहनते थे| अपने नीजी जीवन में सभी फुल  पहनते थे हाफ नहीं|

सोमवार, 13 अगस्त 2018

भारतीय गोबर विज्ञान बनाम गधों का विज्ञान-


विज्ञान का क ख ग नहीं जानने वाले बड़े पद पर आसीन हो जाने से खुद को विज्ञान का जानकार समझने लगते हैं| - -
हमारे देश के दो प्रधान मंत्रियों ने कहा -
#- हम बिना परीक्षण किए परमाणु बम बताएंगे|
#-  एक चाय वाला गंदे नाले में पाईप लगाकर नाले के गैस का उपयोग इंधन के रूप में करता था| यह सिम्पल टेकनिक है|
(इंधन के लिए यह सस्ता सरल सुलभ तरीका  है|)

त्याग

किसी ने राज पाट और पत्नी का त्याग किया सत्य पाने के लिए|
किसी ने पत्नी छोड़ा राजपाट पाने के लिए|

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

विश्वास

जो भगवान पर विश्वास करने की बात करते हैं वे मंदिर, घर, मोटर साइकिल. .   में अच्छी क्वालिटी का मजबूत ताला लगाते हैं| यह कैसा विश्वास?

गुरुवार, 17 मई 2018

परिवर्तन

समाज और संविधान के नियमों पर डिबेट होना गलत नहीं है| वाद विवाद से सभी पहलु सामने आते हैं तदनुसार सोच विचार कर कालांतर में नियम कानून में संशोधन परिवर्तन होते हैं जो आवश्यक है| परिवर्तन ही गति है| गति ही जीवन है| लकीर के फकीर परिवर्तन की कोई बात चर्चा सुनना भी नहीं चाहते|

रविवार, 13 मई 2018

स्वर्ग में हमारा एकाधिकार

नर्क में गैर हिंदुओं, विदेशियों की भीड़ है| हमारे पाप, भ्रष्टाचार, ..सब से मुक्त करने वाली गंगा माता की कृपा से स्वर्ग में हमारा एकाधिकार है ।

बुधवार, 2 मई 2018

भगवान

बहुत सारे लोग भगवान को जानते मानते हैं| छोटे छोटे बच्चे भी|
कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो जीवन भर जानने की की कोशिश करने के बाद भी नहीं जान पाते|

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

धर्म

यः धारयति सः धर्मः| जो धारण करें वह धर्म है| जो धारण करने योग्य हो वह धर्म है | धर्म = गुण धर्म|
सनय समय पर विचारकों ने धारण करने के लिए नियम सुझाए| सभी ने अलग अलग सुझाया| सबका सुझाव परस्पर विरोधी है| कई धर्म हैं संसार में| (हिंदू, मुस्लिम, इसाई, .... . ) इस परस्पर विरोधी धर्मों को समझकर गौतम बुद्ध ने कहा -"अप्प दीपो भव" अपना दीपक स्वयं बनो| अपना रास्ता स्वयं चुनो|
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  एक सर्वमान्य धर्म हो सकता है वह मानवता का धर्म|
इसी धर्म का विम्ब है हमारा संविधान| यही हमारा धर्म होना चाहिए|
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रविवार, 8 अप्रैल 2018

सकून

सच हो या न हो  ..
ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म की धारणा को मान लेने से मन को शांति मिलती है, एक आशा ..  हम फिर जन्म लेंगे| ये मरना और जन्म लेना चलता रहेगा,,,हमारी  आत्मा तो कभी मरेगी नहीं|
सारे प्रश्न समाप्त हो जाते हैं|

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

प्राण प्रतिष्ठा

मंत्रों से किसी पत्थर की मूर्ति पर प्राण प्रतिष्ठा कर जीवित कर सकते हैं लेकिन किसी  मृत प्राणी को जीवित नहीं कर सकते|
वे ठगते हैं| हम ठगाते हैं|

रविवार, 1 अप्रैल 2018

विद्यार्थियों के लिए

जो लकीर के फकीर नहीं बनना चाहते खास कर
युवा वर्ग के लिए_ ****
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लकीर के फकीर चालाक और स्वार्थी  लोग नहीं चाहते कि नई पीढ़ी के दिमाग खुले हों|
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जो बिना सोचे समझे दूसरों की हाँ में हाँ मिलाते हैं, लिखी हुई या सुनी हुई बात को बिना विचारे स्वीकार कर लेते हैं वे अपने दिमाग का उपयोग नहीं करते|
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उलट पुलट हर तरह के विचार पढ़ो| इतिहास विज्ञान खूब पढ़ो| पढ़ कर सुन कर सोच विचार करो|
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हर बात पर प्रश्न करो| क्या? क्यों? कैसे?
         सबसे महत्वपूर्ण है क्यों???
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जिनके पास कोई तर्क आधार युक्त जबाब नहीं होता वे गाली देने लगते हैं|
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जो इंटेलिजेंट होते हैं वे लकीर के फकीर नहीं हो सकते| वे विद्रोही होते हैं|
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दिमाग खुली रखो| तर्क करो| आधार सहित जबाब दो| जबाब न हो तो गाली मत दो|
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जो डिबेट पसंद नहीं करते वे सच जानना नहीं चाहते या जान बूझकर सच को उजागर होने देना नहीं चाहते |
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मंगलवार, 27 मार्च 2018

मेरे विचार से नास्तिकता कोई धर्म नहीं हो सकता.
मानवता धर्म हो सकता है जहाँ वर्त्तमान धर्मों का कोई अस्तित्वा नहीं होगा .
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कॉपी पेस्ट --
P M Panda --
नास्तिकता धर्म का विकल्प तो बनेगी..

दुनिया नियत से चलती है इसका नियंता कोई नहीं है।जिस प्रकार भगतसिंह ने "मैँ नास्तिक क्यों हूँ"के माध्यम से स्पष्ट किया है कि धर्म एक शोषण का तरीका है उसी प्रकार पैटर्न रसेल ने एक किताब "Why am I not christian?" के माध्यम से सैंकड़ों तर्क ईसाई धर्म के ऊपर किये लेकिन किसी भी तर्क का कोई काट पेश नहीं कर पाया।

दुनियाँ का सबसे पहला पूंजीवादी संगठन धर्म रहा है।धर्म एक ऐसी व्यवस्था है जो लोगों से सिर्फ लेती ही लेती है।धर्म ने दुनियाँ को क्या दिया इसका एक भी सबूत/प्रमाण आज तक कोई पेश नहीं कर पाया है!

पिछले दिनों स्टीफन हॉकिंग का देहांत हुआ तो दुनियाँ में फिर से एक बहस नास्तिकता पर छिड़ी है।हिन्दू धर्म के धर्मगुरुओं के बयान मैंने सुने है।कह रहे है कि ईसाई धर्म आम लोगों के सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता इसलिए पश्चिम के लोग नास्तिकता की तरफ ज्यादा जा रहे है।

स्टीफन हॉकिंग की पत्नी ईसाई धर्म की कट्टर समर्थक थी और वो घर मे हमेशा परम पिता परमेश्वर की ऐसी बचकानी बातें करती थी कि स्टीफन हॉकिंग हँसकर टाल देता था।स्टीफन हॉकिंग ने स्पष्ट कह दिया कि मैं नास्तिक हूँ।मैं ईश्वरीय सत्ता को नहीं मानता।एक अंधभक्त आस्तिक व एक नास्तिक के बीच के इसी द्वंद्व भरे द्वेष ने उनका तलाक करवा दिया।

हां इतना तो मैं भी मानता हूं कि पश्चिम के लोगों के पास धर्म के विकल्प कम है।कुलमिलाकर इसाई व इस्लाम के अलावा विकल्प नहीं है।भारत मे विकल्पों की कोई कमी नहीं है।गांव के किसी खेत के देवता से लेकर अति प्राचीन 33करोड़ देवता बैठे है!दिल्ली के लुटियन जॉन से लेकर झारखंड की सुदूर पहाड़ियां तक गिरिजाघर बने हुए है।कश्मीर की वादियों से लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की दहलीज तक मस्जिदें बनी हुई है।

रोज एक नया बाबा,मौलवी,पादरी नया प्रकट हो जाता है।विकल्प ही विकल्प है और एक दूसरे के बीच सत्य की खोज के लिए घूमते-घूमते ही जिंदगी गुजर जाएगी।हर धर्म गुरु यही कहता है सर्वशक्तिमान को खोजने में जीवन खपाना पड़ता है।कोई तर्क कर लेता है तो अंत मे धौंस दिखाई जाती है कि आस्था पर सवाल खड़े नहीं किये जाते!

ये विकल्प नहीं लूट व शोषण की ऐसी दुकाने है कि अगर एक से बच गए तो दूसरी फंसा लेगी।

मैंने पुष्कर से लेकर हरिद्वार के घाटों तक देखा है कि पश्चिम के लोग बाबा बने घूम रहे है।यूरोप से वो विकल्प की तलाश में निकले थे और यहां आकर फंस लिए!भांग घोलकर पी रहे है और झूम रहे है।

भारत मे तर्क करने लायक जनता जागरूक होगी तभी तो नास्तिकता गति पकड़ेगी!गरीब-अनपढ़-लाचार लोगों का जमावड़ा विज्ञान को समझने लायक होगा तभी तो अज्ञानता रूपी खड़े किए ईश्वर व उसके नाम पर धर्म का धंधा कर रहे लोगों के विरुद्ध बगावत होगी!

आजादी के बाद से इस देश मे उधारी से विज्ञान आई व लोगों के जीवन मे बदलाव आने लगे तो इन कट्टर धर्मावलंबियों की दुकानें कमजोर होने लगी।ऐसे माहौल में राजनेताओं ने धर्मगुरुओं के साथ मिलकर दुबारा जनता को धर्म के भ्रम में धकेलने का काम शुरू किया।

फायदा दोनों को होना था।राजनेताओं को सत्ता प्राप्त करनी थी व धर्मगुरुओं को अपनी दुकानें चमकानी थी।आज आप देखोगे तो दुनियाँ भर में धर्म को सत्ता से अलग कर दिया गया है।ईसायत को वेटिकन में बैठा दिया गया लेकिन भारत जैसे देश मे गली-गली में दुकाने लगा दी गई।वर्तमान सत्ता का हाल तो यह हो गया है कि समझ मे ही नहीं आ रहा है कि धर्मगुरु सरकार चला रहे है या राजनेता?धार्मिक दुकाने राजनेता चला रहे है या धर्म गुरु?

अब आजादी के प्रतीक लाल किले में हवन किया जाएगा जिसका नाम रखा गया है "राष्ट्र रक्षा यज्ञ"।अजीब हालात बना दिया गए है!हमे बढ़ना तो अज्ञानता को दूर करते हुए विज्ञान की तरफ लेकिन सत्ता धर्मगुरुओं के साथ मिलकर पूरे देश को बेवकूफ बनाकर धर्म के जंजाल में धकेलने का कुत्सित प्रयास कर रही है!

कुछ दिनों पहले एक ढोंगी संगठन का प्रमुख कह रहा था कि हमारे चड्डीधारी 3दिन में प्रशिक्षित होकर सीमा पर लड़ने जा सकते है!सिर्फ कहने से काम नहीं चलता है।हम तो चाहते है कि यह प्रैक्टिकल हो जाये ताकि सत्य का परीक्षण हो जाये!

सोमनाथ के मंदिर पर गजनवी की मार पड़ी थी तब भी हवन ही हो रहा था।हमे तो सच्चाई पता है कि कोई भगवान वगेरह नहीं होता है और कर्मकांडों के माध्यम से एक कर्महीन प्रजाति मुफ्त में गरीबों की मेहनत की कमाई खा रही है!कुछ लोग कहते है कि पढ़े लिखे भी बहुत ज्यादा धार्मिक क्यों हो रहे है!अरे भाई जब धर्म का व्यापार होगा व उनके नाम से दुकाने चलेगी तो व्यापार पढ़े-लिखे लोग ही तो करेंगे!

केदारनाथ त्रासदी में ज्यादातर पढ़े लिखे लोग ही मरे थे!उनका धर्म मे कोई विश्वास नहीं था और गर्मियों की छुट्टियों में हिमालय की वादियों में घूमने गए थे!अगर हकीकत में वो धार्मिक होते और उनका भगवान होता तो जब वो मर रहे थे तब भगवान कहाँ था?धर्मस्थलों पर भगदड़ मचती है और हर साल हजारों लोग मरते है तो उनका भगवान क्या कर रहा होता है!

जिस प्रकार आज पूंजीवाद विकृत रूप में कमजोरों को निगल रहा है उसी प्रकार धर्म नाम की यह पूंजीवादी लूट सदियों से चली आ रही है लेकिन अब अज्ञानता का यह दौर ज्यादा चलेगा नहीं!आज लोग धर्म व भगवान पर इसलिए सवाल करने से नहीं बच रहे है कि उनकी इसमें गहरी आस्था है बल्कि इसलिए बच रहे कि कहीं कट्टरपंथी लोग जीवन जीना दूभर न कर दें!गौरी लंकेश,कुलबर्गी जैसे लोगों की हत्याओं के द्वारा ख़ौफ़ फैलाया जा रहा है कि अगर सत्य की बात की तो यह अंजाम भी हो सकता है!धार्मिक दुकाने चलाने वाले लोग असंवेदनशील,निर्दयी प्रवृति के होते है।

धर्म झूठे षड्यंत्र व क्रूरता के बल पर चलता है।यह अज्ञानता का उपयोग करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र,श्लोक,हदीस,पैरा आदि रचकर आम लोगों को डराता है!भय पैदा करके जो दिमाग मे भ्रम पैदा किया जाता है उसी का नाम धर्म है!जो नहीं मानेगा,इनकी सत्ता को चुनौती देगा,इनके खिलाफ बगावत करेगा उसपर क्रूरतापूर्ण कब्जा किया जाएगा!

हर धर्म ग्रंथ में प्रेम व हिंसा की बातें आपको साथ मिलेगी।बाकी कहीं भी जहां प्रेम होता है वहां हिंसा नहीं होती।जहां हिंसा होती है वहां प्रेम नहीं मिलेगा।जो प्रेमपूर्ण धर्म के षड्यंत्र में फंस जाए वो ठीक नहीं तो हिंसा वाला अध्याय काम मे लेने लग जाते है।यही कारण है कि हर धर्म की उतपत्ति में हिंसा को माकूल जगह दी गई है व इन धार्मिक ग्रंथों में भी लिखा गया है।

मानवता नियत से चलती है,मानवता इच्छाओं,सपनो, अरमानों से चलती है।मानवता कठिनता से सरलता की तरफ गमन करना चाहती है।धर्म का धंधा एक सीमा तक हो तो चल जाता है लेकिन जब कर्मकांडों के माध्यम से जकड़न बढ़ती है,जब मानव जीवन घुटन महशूस करता है तो वो बगावत करने की सोचता है।अंदर ही अंदर भारतीय जनमानस घुट रहा है लेकिन बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।उम्मीद करता हूँ कि आने वाले दिनों में सैंकड़ों-हजारों भगतसिंह खुलकर सामने आएंगे और मानवता को सरल जीवन की तरफ लेकर जाएंगे।

पीढियां खप गई जंगल-पहाड़ काटकर खेत बनाने में!
ठगों को दो पल लगे अपनी-अपनी दुकान सजाने में!!

पृथ्वी....



गुरुवार, 22 मार्च 2018

लड़ा रहे हैं

कुछ स्वार्थी चालाक लोग जय भीम का नारा लगाकर गांधी और अम्बेडकर को लड़ाने में लगे हैं | महान अम्बेडकर जी को सबसे अधिक महान बनाने के लिए गाँधी जी के बारे में झूठ अफवाह फैलाकर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं|

बूढे माता पिता बेकार?

https://youtu.be/vio-w6eojG4

बुधवार, 21 मार्च 2018

स्वर्ग में आरक्षण

जीवन भर भले ही कामचोरी, भ्रष्टाचार ... किए हों  साठ- पैंसठ साल बाद सभी पाप धोने के लिए एक बार गंगा स्नान कर लें| फिर स्वर्ग में आरक्षण के लिए  समाज सेवा,  धर्म कर्म करना शुरू करें, भजन कीर्तन, सत्संग प्रवचन में शामिल होते रहें|

सोमवार, 19 मार्च 2018

रविवार, 11 मार्च 2018

हमारे भारत के महान आविष्कार

यज्ञ हवन भजन कीर्तन, झाड़ फू्क, तंत्र मंत्र...गोबर विज्ञान हमारे भारत के महान आविष्कार

जिंदगी है छोटी

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दिल से पढ़ियेगा
बहुत बढ़िया मैसेज है।

जिस पल आपकी मृत्यु हो जाती है, उसी पल से आपकी पहचान एक *बॉडी* बन जाती है।
अरे

"बॉडी" लेकर आइये,
"बॉडी" को उठाइये,
"बॉडी" को सुलाइये
ऐसे शब्दो से आपको पुकारा जाता है, वे लोग भी आपको आपके नाम से नहीं पुकारते ,
जिन्हे प्रभावित करने के लिये आपने अपनी पूरी जिंदगी खर्च कर दी।

इसीलिए

इधर उधर से ज्यादा इक्कठा करने की जरूरत नहीं है।

इसीलिए

अच्छे से कमाओ, अच्छे से खाओ, और अच्छे से सोओ

इसीलिए

जीवन मे आने वाले हर चुनौती को स्वीकार  करे।......
अपनी पसंद की चीजों के लिये खर्चा कीजिये।......
इतना हंसिये के पेट दर्द हो जाये।....

आप कितना भी बुरा नाचते हो ,
फिर भी नाचिये।......
उस खूशी को महसूस कीजिये।......
फोटोज के लिये पागलों वाली पोज दीजिये।......
बिलकुल छोटे बच्चे बन जाइये।

क्योंकि मृत्यु जिंदगी का सबसे बड़ा लॉस नहीं है।

लॉस तो वो है
के आप जिंदा होकर भी आपके अंदर जिंदगी जीने की आस खत्म हो चुकी है।.....

हर पल को खुशी से जीने को ही जिंदगी कहते है।

"जिंदगी है छोटी," हर पल में खुश हूं,
"काम में खुश हूं," आराम में खुश हू,

"आज पनीर नहीं," दाल में ही खुश हूं,
"आज गाड़ी नहीं," पैदल ही खुश हूं,

"दोस्तों का साथ नहीं," अकेला ही खुश हूं,
"आज कोई नाराज है," उसके इस अंदाज से ही खुश हूं,

"जिस को देख नहीं सकता," उसकी आवाज से ही खुश हूँ

"जिसको पा नहीं सकता," उसको सोच कर ही खुश हूँ

"बीता हुआ कल जा चुका है," उसकी मीठी याद में ही खुश हूँ
"आने वाले कल का पता नहीं," इंतजार में ही खुश हूँ

"हंसता हुआ बीत रहा है पल," आज में ही खुश हूँ
"जिंदगी है छोटी," हर पल में खुश हूँ

अगर दिल को छुआ, तो जवाब देना,
वरना मै तो बिना जवाब के भी खुश हूँ..!!

😀Be Happy Alway 😀

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

जला डालो

Dinesh Aggarwal 
जला डालो उन किताबों को जो काफिरों के कत्ल का हुक्म देती है,जो दलितों के कान मे सीसा पिघला कर डालने की बात करती है, जो एकलब्य का अगूठा काटने की बात करती है,जो शम्बूक का बध करने की बात करती है। जो वैज्ञानिकों को जिन्दा जलाने की बात करती है,।
लानत लानत लानत ।

मूर्तियाँ

मूर्तियाँ बनाई जाती हों भले ही श्रद्धा के निवेदन के लिये, एक बार बन जाने के बाद तरह तरह के निवेदनों का पात्र बनाई जाने के लिये अनावृत्त ओर असुरक्षित हो उठती हैं। सबसे पहले तो मौसम की मार। फिर कौवों कबूतरों की कृपा और मानुष मूर्तियाँ तो अन्ततः रोष-वितृष्णा और विरक्ति भी। मूर्तियाँ उपलब्ध हैँ तो दुश्‍मनी की सुविधा है। कमलेश्‍वर की जॉर्ज पंचम की नाक कहानी का शीर्षक याद आ रहा है, हालाँकि कहानी भूल गयी है। नाक ही क्यों, कालिख के लिये चेहरा, जूतों की माला के लिये गर्दन, तोड़ने के लिये सिर, गिराने के लिये धड़, गालियाँ लिखने के लिये पगाधार …
और यह जानने के बावजूद कि सबके पास अपने अपने देवता हैं, अपनी अपनी मूर्तियाँ और आदमी को प्रतिमा पूजन की तरह प्रतिमा भंजन का भी शौक है लेकिन अपने देवताओं की प्रतिमाएँ तोड़ने लायक हिम्मत शायद ही किसी मेँ हो। दूसरों के देवताओं के लिये तीसरे बन कर जाते रहना…
मूर्खता की हद है और हिमाकत की बेहद

चिंतन

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पोस्ट लंबी ज़रूर है, मगर ग़ौरो फिक्र वाली है। गुज़ारिश है पढ़े ज़रूर_ ahmed kaleem
एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि इस्लाम के साधक मक्का में हज के लिए जाते हैं, क्या वह भी ध्यान नहीं है?
वह भी ध्यान की एक प्रक्रिया है। लेकिन शायद ठीक नहीं होगा कहना कि है, कहना होगा ठीक कि थी, अब है नहीं। कभी थी। दुनिया में सारे धर्मों का जन्म, ध्यान की प्रक्रिया के बिना नहीं हुआ है। कोई धर्म दुनिया में जन्म नहीं ले सकता ध्यान की गहरी प्रक्रिया के बिना। लेकिन सब ध्यान की प्रक्रियाएं धीरे-धीरे रिचुअल हो जाती हैं, क्रियाकांड हो जाती हैं। लोग उनको औपचारिक ढंग से करने लगते हैं--फॉर्मल। अब चूंकि एक आदमी मुसलमान है, इसलिए हज कर आता है। किसी ध्यान के लिए नहीं, किसी परमात्मा के लिए नहीं। क्योंकि अगर ध्यान और परमात्मा का खयाल हो, तो मक्का तक जाने की जरूरत नहीं है, वह तो इसी जमीन के टुकड़े पर हो सकता है। मक्का तक जाने की जो जरूरत पैदा होती है, वह मुसलमान होने से पैदा होती है, वह ध्यान के लिए नहीं पैदा होती। काशी जाने की जरूरत हिंदू होने से पैदा होती है, ध्यान के लिए पैदा नहीं होती। गिरनार जाने की जरूरत जैन होने से पैदा होती है, ध्यान के लिए नहीं होती।
अब यह बड़े मजे की बात है कि जैन अगर मक्का में रह रहा होगा तो गिरनार आएगा। और मुसलमान अगर जूनागढ़ में रह रहा होगा तो मक्का में जाएगा। निपट पागलपन है। काशी का मुसलमान मक्का जाएगा, मक्का का हिंदू काशी आएगा। बिलकुल पागलपन है। अगर ध्यान का खयाल है तो यह कहीं भी हो सकता है। इस पृथ्वी का कोई भी कोना परमात्मा से वंचित नहीं है। मक्का में भी हो सकता है, मदीना में भी हो सकता है, बंबई में भी हो सकता है। और जिसे ध्यान की प्रक्रिया का कोई पता नहीं है उसे मक्का में भी नहीं होगा, काशी में भी नहीं होगा, कैलाश पर भी नहीं होगा।
इसलिए असली सवाल प्रक्रिया को समझने का है। हज की प्राथमिक प्रक्रिया ध्यान ही थी। समस्त तीर्थों का जन्म ध्यान के ही आधार पर हुआ था, समस्त धर्मों का भी। लेकिन फिर सब खो जाता है। और पीछे जो लोग जन्म से धार्मिक होते हैं, बाइ बर्थ, उनसे ज्यादा झूठे धार्मिक आदमी दुनिया में नहीं होते। लेकिन हम सभी लोग जन्म से धार्मिक होते हैं। और तो हमारा धार्मिक होने का कोई आधार ही नहीं होता।
जन्म से कोई धार्मिक हो सकता है? जन्म से किसी को शिक्षित बनाने लगें, उस दिन पता चलेगा आपको--शिक्षित बाप का बेटा शिक्षित हो जाए जन्म से और डाक्टर का बेटा डाक्टर हो जाए जन्म से--तब आपको पता चलेगा कि कितना खतरा दुनिया में हो जाएगा।
लेकिन मुसलमान, हिंदू, ईसाई, धार्मिक जन्म से हो रहे हैं। बाप भी जन्म से था, उनका बाप भी जन्म से था। अगर पिछला बाप भी डाक्टर रहा हो तो हो सकता है बाप के पास रहते-रहते थोड़ा आदमी सीख ले। लेकिन किसी का बाप चौदह सौ साल पहले मर चुका, किसी का पांच हजार साल पहले, किसी का दस हजार साल पहले। और जिसका बाप जितना पहले मर चुका, वह सोचता है, उसके पास उतना ही कीमती धर्म है। सारी धर्म की प्रक्रियाएं ध्यान से ही संबंधित हैं। लेकिन ध्यान को ही सीधे समझ लेना उचित है बजाय उन प्रक्रियाओं को समझने के।
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शिक्षा

"जिसने भी मनुस्मृति में यह लिखा है कि शूद्र को वेद शास्त्र पढ़ने की इजाजत नहीं है;यदि वह ऐसा करता है अथवा श्रवण करता है तो उसके कानों में गर्म पिघला हुआ शीशा डाल देना चाहिए। तभी उसका प्रायश्चित होगा।"
यह कितना क्रूर और हिंसक बात है कि किसी को विद्या अध्ययन और ज्ञान प्राप्ति के लिए न केवल रोकता है बल्कि उस पर अमानवीय अत्याचार करने पर भी आमादा है।
वर्ण व्यवस्था के इस कुरूप चरित्र की आजकल बहुत चर्चा हो रही है। बेहतर होगा मनुस्मृति को सरकार बैन कर दे तथा इसकी सभी प्रतियाँ सार्वजनिक रूप से नष्ट कर दी जाएँ।
यही प्रजातंत्र का तकाजा है अन्यथा सरकार के होने न होने का क्या मतलब है?वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा पर भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
इस कथन से क्या आप सहमत हैं अथवा कोई आपत्ति है?कृपया अपनी प्रतिक्रिया जरूर देवें।
पद्ममुख पंडा

गुरुवार, 8 मार्च 2018

धर्म

"नया टीचर"

क्लास में आते ही 
नये टीचर ने 

बच्चों को 
अपना लंबा चौड़ा परिचय दिया 

बातों ही बातों में 
उसने जान लिया की 
लड़कियों के इस क्लास में 
सबसे तेज और सबसे आगे 
कौन सी लड़की है ?

उसने खामोश सी बैठी 
उस लड़की से पूछा 

बेटा आपका नाम क्या है ?

लड़की खड़ी हुई और बोली 
जी सर , मेरा नाम है जूही

टीचर ने फिर पूछा

पूरा नाम बताओ बेटा ?

जैसे उस लड़की ने 
नाम मे कुछ छुपा रखा हो 

लड़की ने फिर कहा 

जी सर , मेरा पूरा नाम जूही ही है 

टीचर ने सवाल बदल दिया

और पूछा कि अच्छा 
तुम्हारे पापा का नाम बताओ ?

लड़की ने जवाब दिया
जी सर , मेरे पापा का नाम है शमशेर !!

टीचर ने फिर पूछा 
अपने पापा का पूरा नाम बताओ 

लड़की ने जवाब दिया

मेरे पापा का पूरा नाम
शमशेर ही है सर जी 

अब टीचर कुछ सोचकर बोला

अच्छा अपनी माँ का पूरा नाम बताओ

लड़की ने जवाब दिया 
सर जी , मेरी माँ का पूरा नाम है निशा 

टीचर के पसीने छूट चुके थे
क्योंकि अब तक 
वो उस लड़की की फैमिली के 
पूरे बायोडाटा में 
जो एक चीज 
ढूंढने की कोशिश कर रहा था 
वो उसे नही मिला था !!

उसने आखिरी पैंतरा आजमाया

बोला -अच्छा तुम कितने भाई बहन हो ?

टीचर ने सोचा कि 
जो चीज वो ढूंढ रहा है
शायद इसके भाई बहनों के नाम मे वो क्लू मिल जाये ?

लड़की ने टीचर के
इस सवाल का भी 

बड़ी मासूमियत से जवाब दिया

बोली -सर जी , मैं अकेली हूँ
मेरे कोई भाई बहन नही है !!

अब टीचर ने 
सीधा और निर्णायक सवाल पूछा 

बेटे तुम्हारा धर्म क्या है ?

लड़की ने 
इस सीधे से सवाल का भी 
सीधा सा जवाब दिया 

बोली -सर मैं एक विद्यार्थी हूँ
और ज्ञान प्राप्त करना ही
मेरा धर्म है !

मुझे पता है की 
अब आप मेरे पेरेंट्स का धर्म पूछोगे !!

तो मैं आपको बता दूं कि 
मेरे पापा का धर्म है मुझे पढ़ाना 
और मेरी मम्मी की जरूरतों को 
पूरा करना

और मेरी मम्मी का धर्म है 
मेरी देखभाल
और मेरे पापा की जरूरतों को 
पूरा करना 

लड़की का जवाब सुनकर
टीचर के होश उड़ गये 

उसने टेबल पर रखे 
पानी के ग्लास की ओर देखा
लेकिन उसे उठाकर पीना भूल गया !

तभी लड़की की आवाज 
एक बार फिर उसके कानों में 
किसी धमाके की तरह गुंजी 

सर मैं विज्ञान की छात्रा हूँ 
और एक साइंटिस्ट बनना चाहती हूँ !

जब अपनी पढ़ाई पूरी कर लुंगी 
और अपने माँ बाप के 
सपनों को पूरा कर लुंगी 

तब कभी फुरसत में 
सभी धर्मों के अध्ययन में जुटूंगी 

और जो भी धर्म 
विज्ञान की कसौटी पर 
खरा उतरेगा 
उसे अपना लुंगी

लेकिन अगर 
धर्मग्रंथों के उन पन्नों में 
एक भी बात विज्ञान के विरुद्ध हुई 
तो मैं उस पूरी पवित्र किताब को 
अपवित्र समझूँगी 

और उसे कूड़े के ढेर में
फेंक दूंगी !

क्योंकि साइंस कहता है 
एक गिलास दूध में 
अगर एक बूंद भी
केरोसिन मिली हो तो 

पूरा का पूरा दूध ही बेकार हो जाता है !

लड़की की बात खत्म होते ही 
पूरी क्लास 
साथी लड़कियों की 
तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी !!

टीचर के पसीने छूट चुके थे !!

तालियों की गूंज उसके कानों में
गोलियों की गड़गड़ाहट की तरह 
सुनाई दे रहे थे !

उसने आंखों पर लगे 
धर्म के मोटे चश्मे को उतार कर 
कुछ देर के लिए टेबल पर रख दिया

और पानी का ग्लास उठाकर
एक ही सांस में गटक लिया 

थोड़ी हिम्मत जुटा कर 
लड़की से बिना नजर मिलाये ही बोला !!

बेटा.....

I Proud of you....
***""
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महिला दिवस पर


यत्र नार्यस्तु पूज्न्ते
             रमन्ते  तत्र  देवता ।
       **************"
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारत के संदर्भ में प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए|