मेरे विचार से नास्तिकता कोई धर्म नहीं हो सकता.
मानवता धर्म हो सकता है जहाँ वर्त्तमान धर्मों का कोई अस्तित्वा नहीं होगा .
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P M Panda --
नास्तिकता धर्म का विकल्प तो बनेगी..
दुनिया नियत से चलती है इसका नियंता कोई नहीं है।जिस प्रकार भगतसिंह ने "मैँ नास्तिक क्यों हूँ"के माध्यम से स्पष्ट किया है कि धर्म एक शोषण का तरीका है उसी प्रकार पैटर्न रसेल ने एक किताब "Why am I not christian?" के माध्यम से सैंकड़ों तर्क ईसाई धर्म के ऊपर किये लेकिन किसी भी तर्क का कोई काट पेश नहीं कर पाया।
दुनियाँ का सबसे पहला पूंजीवादी संगठन धर्म रहा है।धर्म एक ऐसी व्यवस्था है जो लोगों से सिर्फ लेती ही लेती है।धर्म ने दुनियाँ को क्या दिया इसका एक भी सबूत/प्रमाण आज तक कोई पेश नहीं कर पाया है!
पिछले दिनों स्टीफन हॉकिंग का देहांत हुआ तो दुनियाँ में फिर से एक बहस नास्तिकता पर छिड़ी है।हिन्दू धर्म के धर्मगुरुओं के बयान मैंने सुने है।कह रहे है कि ईसाई धर्म आम लोगों के सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता इसलिए पश्चिम के लोग नास्तिकता की तरफ ज्यादा जा रहे है।
स्टीफन हॉकिंग की पत्नी ईसाई धर्म की कट्टर समर्थक थी और वो घर मे हमेशा परम पिता परमेश्वर की ऐसी बचकानी बातें करती थी कि स्टीफन हॉकिंग हँसकर टाल देता था।स्टीफन हॉकिंग ने स्पष्ट कह दिया कि मैं नास्तिक हूँ।मैं ईश्वरीय सत्ता को नहीं मानता।एक अंधभक्त आस्तिक व एक नास्तिक के बीच के इसी द्वंद्व भरे द्वेष ने उनका तलाक करवा दिया।
हां इतना तो मैं भी मानता हूं कि पश्चिम के लोगों के पास धर्म के विकल्प कम है।कुलमिलाकर इसाई व इस्लाम के अलावा विकल्प नहीं है।भारत मे विकल्पों की कोई कमी नहीं है।गांव के किसी खेत के देवता से लेकर अति प्राचीन 33करोड़ देवता बैठे है!दिल्ली के लुटियन जॉन से लेकर झारखंड की सुदूर पहाड़ियां तक गिरिजाघर बने हुए है।कश्मीर की वादियों से लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की दहलीज तक मस्जिदें बनी हुई है।
रोज एक नया बाबा,मौलवी,पादरी नया प्रकट हो जाता है।विकल्प ही विकल्प है और एक दूसरे के बीच सत्य की खोज के लिए घूमते-घूमते ही जिंदगी गुजर जाएगी।हर धर्म गुरु यही कहता है सर्वशक्तिमान को खोजने में जीवन खपाना पड़ता है।कोई तर्क कर लेता है तो अंत मे धौंस दिखाई जाती है कि आस्था पर सवाल खड़े नहीं किये जाते!
ये विकल्प नहीं लूट व शोषण की ऐसी दुकाने है कि अगर एक से बच गए तो दूसरी फंसा लेगी।
मैंने पुष्कर से लेकर हरिद्वार के घाटों तक देखा है कि पश्चिम के लोग बाबा बने घूम रहे है।यूरोप से वो विकल्प की तलाश में निकले थे और यहां आकर फंस लिए!भांग घोलकर पी रहे है और झूम रहे है।
भारत मे तर्क करने लायक जनता जागरूक होगी तभी तो नास्तिकता गति पकड़ेगी!गरीब-अनपढ़-लाचार लोगों का जमावड़ा विज्ञान को समझने लायक होगा तभी तो अज्ञानता रूपी खड़े किए ईश्वर व उसके नाम पर धर्म का धंधा कर रहे लोगों के विरुद्ध बगावत होगी!
आजादी के बाद से इस देश मे उधारी से विज्ञान आई व लोगों के जीवन मे बदलाव आने लगे तो इन कट्टर धर्मावलंबियों की दुकानें कमजोर होने लगी।ऐसे माहौल में राजनेताओं ने धर्मगुरुओं के साथ मिलकर दुबारा जनता को धर्म के भ्रम में धकेलने का काम शुरू किया।
फायदा दोनों को होना था।राजनेताओं को सत्ता प्राप्त करनी थी व धर्मगुरुओं को अपनी दुकानें चमकानी थी।आज आप देखोगे तो दुनियाँ भर में धर्म को सत्ता से अलग कर दिया गया है।ईसायत को वेटिकन में बैठा दिया गया लेकिन भारत जैसे देश मे गली-गली में दुकाने लगा दी गई।वर्तमान सत्ता का हाल तो यह हो गया है कि समझ मे ही नहीं आ रहा है कि धर्मगुरु सरकार चला रहे है या राजनेता?धार्मिक दुकाने राजनेता चला रहे है या धर्म गुरु?
अब आजादी के प्रतीक लाल किले में हवन किया जाएगा जिसका नाम रखा गया है "राष्ट्र रक्षा यज्ञ"।अजीब हालात बना दिया गए है!हमे बढ़ना तो अज्ञानता को दूर करते हुए विज्ञान की तरफ लेकिन सत्ता धर्मगुरुओं के साथ मिलकर पूरे देश को बेवकूफ बनाकर धर्म के जंजाल में धकेलने का कुत्सित प्रयास कर रही है!
कुछ दिनों पहले एक ढोंगी संगठन का प्रमुख कह रहा था कि हमारे चड्डीधारी 3दिन में प्रशिक्षित होकर सीमा पर लड़ने जा सकते है!सिर्फ कहने से काम नहीं चलता है।हम तो चाहते है कि यह प्रैक्टिकल हो जाये ताकि सत्य का परीक्षण हो जाये!
सोमनाथ के मंदिर पर गजनवी की मार पड़ी थी तब भी हवन ही हो रहा था।हमे तो सच्चाई पता है कि कोई भगवान वगेरह नहीं होता है और कर्मकांडों के माध्यम से एक कर्महीन प्रजाति मुफ्त में गरीबों की मेहनत की कमाई खा रही है!कुछ लोग कहते है कि पढ़े लिखे भी बहुत ज्यादा धार्मिक क्यों हो रहे है!अरे भाई जब धर्म का व्यापार होगा व उनके नाम से दुकाने चलेगी तो व्यापार पढ़े-लिखे लोग ही तो करेंगे!
केदारनाथ त्रासदी में ज्यादातर पढ़े लिखे लोग ही मरे थे!उनका धर्म मे कोई विश्वास नहीं था और गर्मियों की छुट्टियों में हिमालय की वादियों में घूमने गए थे!अगर हकीकत में वो धार्मिक होते और उनका भगवान होता तो जब वो मर रहे थे तब भगवान कहाँ था?धर्मस्थलों पर भगदड़ मचती है और हर साल हजारों लोग मरते है तो उनका भगवान क्या कर रहा होता है!
जिस प्रकार आज पूंजीवाद विकृत रूप में कमजोरों को निगल रहा है उसी प्रकार धर्म नाम की यह पूंजीवादी लूट सदियों से चली आ रही है लेकिन अब अज्ञानता का यह दौर ज्यादा चलेगा नहीं!आज लोग धर्म व भगवान पर इसलिए सवाल करने से नहीं बच रहे है कि उनकी इसमें गहरी आस्था है बल्कि इसलिए बच रहे कि कहीं कट्टरपंथी लोग जीवन जीना दूभर न कर दें!गौरी लंकेश,कुलबर्गी जैसे लोगों की हत्याओं के द्वारा ख़ौफ़ फैलाया जा रहा है कि अगर सत्य की बात की तो यह अंजाम भी हो सकता है!धार्मिक दुकाने चलाने वाले लोग असंवेदनशील,निर्दयी प्रवृति के होते है।
धर्म झूठे षड्यंत्र व क्रूरता के बल पर चलता है।यह अज्ञानता का उपयोग करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र,श्लोक,हदीस,पैरा आदि रचकर आम लोगों को डराता है!भय पैदा करके जो दिमाग मे भ्रम पैदा किया जाता है उसी का नाम धर्म है!जो नहीं मानेगा,इनकी सत्ता को चुनौती देगा,इनके खिलाफ बगावत करेगा उसपर क्रूरतापूर्ण कब्जा किया जाएगा!
हर धर्म ग्रंथ में प्रेम व हिंसा की बातें आपको साथ मिलेगी।बाकी कहीं भी जहां प्रेम होता है वहां हिंसा नहीं होती।जहां हिंसा होती है वहां प्रेम नहीं मिलेगा।जो प्रेमपूर्ण धर्म के षड्यंत्र में फंस जाए वो ठीक नहीं तो हिंसा वाला अध्याय काम मे लेने लग जाते है।यही कारण है कि हर धर्म की उतपत्ति में हिंसा को माकूल जगह दी गई है व इन धार्मिक ग्रंथों में भी लिखा गया है।
मानवता नियत से चलती है,मानवता इच्छाओं,सपनो, अरमानों से चलती है।मानवता कठिनता से सरलता की तरफ गमन करना चाहती है।धर्म का धंधा एक सीमा तक हो तो चल जाता है लेकिन जब कर्मकांडों के माध्यम से जकड़न बढ़ती है,जब मानव जीवन घुटन महशूस करता है तो वो बगावत करने की सोचता है।अंदर ही अंदर भारतीय जनमानस घुट रहा है लेकिन बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।उम्मीद करता हूँ कि आने वाले दिनों में सैंकड़ों-हजारों भगतसिंह खुलकर सामने आएंगे और मानवता को सरल जीवन की तरफ लेकर जाएंगे।
पीढियां खप गई जंगल-पहाड़ काटकर खेत बनाने में!
ठगों को दो पल लगे अपनी-अपनी दुकान सजाने में!!
पृथ्वी....
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