मूर्तियाँ बनाई जाती हों भले ही श्रद्धा के निवेदन के लिये, एक बार बन जाने के बाद तरह तरह के निवेदनों का पात्र बनाई जाने के लिये अनावृत्त ओर असुरक्षित हो उठती हैं। सबसे पहले तो मौसम की मार। फिर कौवों कबूतरों की कृपा और मानुष मूर्तियाँ तो अन्ततः रोष-वितृष्णा और विरक्ति भी। मूर्तियाँ उपलब्ध हैँ तो दुश्मनी की सुविधा है। कमलेश्वर की जॉर्ज पंचम की नाक कहानी का शीर्षक याद आ रहा है, हालाँकि कहानी भूल गयी है। नाक ही क्यों, कालिख के लिये चेहरा, जूतों की माला के लिये गर्दन, तोड़ने के लिये सिर, गिराने के लिये धड़, गालियाँ लिखने के लिये पगाधार …
और यह जानने के बावजूद कि सबके पास अपने अपने देवता हैं, अपनी अपनी मूर्तियाँ और आदमी को प्रतिमा पूजन की तरह प्रतिमा भंजन का भी शौक है लेकिन अपने देवताओं की प्रतिमाएँ तोड़ने लायक हिम्मत शायद ही किसी मेँ हो। दूसरों के देवताओं के लिये तीसरे बन कर जाते रहना…
मूर्खता की हद है और हिमाकत की बेहद
और यह जानने के बावजूद कि सबके पास अपने अपने देवता हैं, अपनी अपनी मूर्तियाँ और आदमी को प्रतिमा पूजन की तरह प्रतिमा भंजन का भी शौक है लेकिन अपने देवताओं की प्रतिमाएँ तोड़ने लायक हिम्मत शायद ही किसी मेँ हो। दूसरों के देवताओं के लिये तीसरे बन कर जाते रहना…
मूर्खता की हद है और हिमाकत की बेहद
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