गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

आस्तिक नास्तिक

Swami Balendu नास्तिकता की जरुरत क्यों और कब तक* कुछ लोग खामखाँ कुतर्क करते है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों एक ही बात है या एक ही सिक्के को दो पहलू हैं या नास्तिकता भी एक धर्म अथवा विश्वास है और मैं न तो आस्तिक और न ही नास्तिक बल्कि वास्तविक हूँ. वैसे इस तरह की बातें केवल कन्फ्यूज आस्तिक ही करते हैं, जो वस्तुतः नास्तिक है वो कभी नहीं करेंगे! अब आइये जरा इसका विश्लेषण करते हैं कि यह कुतर्क कैसे है: मैंने यह बातें पहले भी कही हैं एक बार फिर से- नास्तिकता स्वयं में कोई पथ या मार्ग नहीं है बल्कि एक विरोध और विद्रोह है, आस्तिकता के ईश्वर रूपी असत्य और भ्रम के खिलाफ! यदि आस्तिकता न होती तो नास्तिकता की कोई आवश्यकता ही नहीं थी. और जब आस्तिकता न होगी तब नास्तिकता भी न होगी. किसी बच्चे के पैदा होने पर यदि उसे धर्म, आस्तिकता और ईश्वर की छाया से दूर रखा जाये और उसके मन में किसी काल्पनिक सर्वशक्तिमान की छवि को स्थापित न किया जाये तो वो बच्चा सहज मनुष्य ही होगा न कि नास्तिक! मतलब यह कि आस्तिकता कृत्रिम है, ओढ़ी हुई तथा असहज है. बच्चे को कभी जातकर्म संस्कारों द्वारा हिन्दू, सुन्नत के द्वारा मुस्लिम और बप्तिस्मा करके ईसाई बना दिया जाता है. और फिर उसके मन में किसी सर्वशक्तिमान की कृपा का लालच और दण्ड का भय बैठा दिया जाता है. नास्तिकता वस्तुतः इसी मिथ्या जाल और शोषण के खिलाफ एक विद्रोह की आवाज है न कि आस्तिकता के सिक्के का दूसरा पहलू! नास्तिकता की जरुरत तो मुझे पड़ी क्योंकि मैं आस्तिकता के मिथ्या भ्रम में पड़ा हुआ था. परन्तु मेरी साढ़े तीन साल की बेटी के लिए बन्दर और हनुमान में या गणेश और हाथी में कोई अंतर नहीं, उसे अभी ही पता है कि भगवान किसी कार्टून कामिक्स का भूत, स्पाइडर मैन इत्यादि की तरह एक ऐसा पात्र है जोकि केवल किताबों में होता है वास्तविकता में नहीं! वो जिसके अन्दर ईश्वर के प्रति कोई श्रद्धा, आस्था, विश्वास या आस्तिकता नहीं है, वो अथवा उसके जैसे बच्चे बड़े होकर हिन्दू, मुसलमान का तो सवाल ही नहीं उठता बल्कि नास्तिक भी नहीं बनेंगे बल्कि सहज मनुष्य ही रहेंगे. नास्तिक तो मैं बना क्योंकि मैं आस्तिक था. और जब तक धर्म और काल्पनिक सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति आस्तिकता का मिथ्या भ्रम बना रहेगा केवल तब तक ही नास्तिकता की जरुरत रहेगी! इसके साथ ही दुनिया भर में होने वाले सर्वे बताते हैं कि पूरी दुनिया में ही लोग धर्म और ईश्वर की मिथ्या कल्पना से दूर होकर नास्तिक हो रहे हैं. तथा जहाँ विकास नहीं है और गरीबी जादा है वहां ही धर्म और ईश्वर का प्रभाव जादा है तथा जहाँ विकास और सम्पन्नता है वहां धर्म और ईश्वर का प्रभाव कम है. एक बात और भी कह दूँ कि यह सब बातें केवल उसी को समझाई जा सकतीं हैं जोकि समझने की इच्छा रखे परन्तु आस्थावान आस्तिक जोकि अपनी समझ को संगठित धर्मों के समक्ष गिरवी रख चुके हों, स्वयं की नहीं बल्कि हजारों साल पहले लिखी किसी किताब के अनुसार चलते हों उन्हें आप कभी नहीं समझा पाएंगे. मैं भी एक सीमा तक ही बात करने का प्रयास करता हूँ और यदि मुझे यह लगे कि यह लाइलाज केस है तो उसमें अपनी उर्जा और समय नष्ट न करके, क्विट करके आगे बढ़ जाता हूँ.

विवाह

अंतर्जातीय, अंतरदेशीय, अंतर्राज्यीय विवाह पर तर्क आधार सहित पक्ष विपक्ष में अपना विचार दें।

धर्म के मंदिर में दिमाग बाहर रखो

Anuj Guliani-

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

परिवर्तन

कहने लिखने पढ़ने सोचने सुनने से ही समाज अब तक बहुत कुछ बदल चुका है|  इसी तरह भविष्य में और परिवर्तन होगा|

सत्संग

विज्ञान ही सत्य है| विज्ञान गणित को जानना समझना सत्संग है| कथित  प्रवचन कथा सत्संग नहीं, असत्संग अधिक होता है|

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

*राम राज्य कभी नही आना चाहिए*

*राम राज्य कभी नही आना चाहिए* 
----- ओशो----
राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो। हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना! एक बार जो भूल हो गई, हो गई। अब दुबारा मत करना।
राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे। कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता! और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगे, तो दरिद्रता निश्चित रही होगी, नहीं तो कोई बिकेगा कैसे ? किसलिए बिकेगा ? दीन और दरिद्र ही बिकते होंगे, कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे। कोई टाटा, बिड़ला, डालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं।
स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं! वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी। उनकी ही बेटियां होंगी। कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी। उसका तो स्वयंवर होता था। तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में ? और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे। क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग--आदमी और औरतें दोनों, विशेषकर स्त्रियां--राजा तो खरीदते ही खरीदते थे, धनपति तो खरीदते ही खरीदते थे, जिनको तुम ऋषि-मुनि कहते हो, वे भी खरीदते थे! गजब की दुनिया थी! ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे! 
अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ। अब तो हम शादी होती है नई-नई, तो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं। हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं! राम के समय में, और राम के पहले भी--वधु का अर्थ होता था, खरीदी गई स्त्री! जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक है, लेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा! पत्नी और वधु में यही फर्क था। सभी पत्नियां वधु नहीं थीं, और सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं। *वधु नंबर दो की पत्नी थी।* जैसे नंबर दो की बही होती है न, जिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं! ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु।
*ऋषि-मुनि भी वधुएं रखते थे!* और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे। कुछ खास गजब के लोग नहीं थे। वैसे ऋषि-मुनि अभी भी तुम्हें मिल जाएंगे।
इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए। आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी! मगर यह जारी थी!
*रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर की बात थी, कि डाक्टर अम्बेडकर जैसा अतिशूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था!* असंभव !! खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था; यह उसका अपराध था। और *राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे।* क्या करना है? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है ? उसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ...! 
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा; मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। *ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी! और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात खराब हैं!'*
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे ? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया! एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति! 
उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान! क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो! यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं। 
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी! हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे; इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका आदर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास था; पद कौरवों के पास था; प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे। और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है ? 
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
*यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था।* और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं!' 
निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे ? उस गरीब का कसूर क्या था ? अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो ? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है !!!
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी। 
*तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया!* शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए! 
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! *जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो!* मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी। 
उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? *मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे!*
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया। 
*---ओशो--*

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

इमानदारी और भ्रष्टाचार 17-10-2017

"बिका हुआ"/
"hired"/
"बोलने के लिए कितना पगार मिलता है"/ ........
ऐसा किसी पर कामेंट करने वाले निश्चित ही इमानदार होंगें। वरना ऐसा किसी को कहने का सहस कोई नहीं करेगा/
पता नहीं और दूसरे लोग कितने इमानदार हैं? बेहतर है सभी अपनी इमानदारी का परिचय दें विस्तार से। ईमानदारी और भ्रष्टाचार पर बहुत भाषण देते हैं। अपनी इमानदारी की गाथा भी सुनाएं । 
बहुत लोग किसी संस्था संगठन के पदाधिकारी होंगे, कोई नौकरी कर रहे होंगें । वे बताएं कि उन्होंने कभी किसी का निजी या सरकार का कोई रूपया या टाइम नहीं खाया है ।
*********
यादें - एक विवाह कार्यक्रम में बातचीत.. 
एक वरिष्ठ व्याख्याता इमानदारी और भ्रष्टाचार पर बहुत अच्छा बोले। चाय पीने के बाद उनके लड़के का हाल चाल मैंने पूछा । उन्होंने अपने लड़के की पढ़ाई आदि की बात बताए. फिर आगे बताए कि वह कहीं भी जाता है ट्रेन टिकट नहीं लेता । बहुत होशियार है। जिधर से टिकट चेकर आता है दूसरे तरफ चला जाता है या बाथ रूम चला जाता है।

दैवीय किताब में लिखी है

आप किसी बात से सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन कोई भी बात बुद्धि और तर्क के आधार पर ही ठीक हो सकती है। इस आधार पर नहीं कि ये किसी "दैवीय" किताब में लिखी है या किसी महान आदमी ने कही है।

कैसी कैसी धारणाएं!

कैसी कैसी धारणाएं!
*****************
€1} कोई कितना ही पापी दुष्ट और नीच हो मृत्यु के समय यदि वह भगवान का नाम लेता है तो वह मोक्ष या स्वर्ग धाम जाने का पात्र बन जाता है।
(2}तीर्थ यात्रा करने पर सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
{3}दान देने वाले को कई गुना बढ़ कर
धन संपत्ति की प्राप्ति होती ।
{4}गंगा नदी में अस्थियां विसर्जन किया जाता है तो मृतक को मोक्ष मिल जाता है।
{5}मृतक भोज का आयोजन करने पर पुरखों को तृप्ति मिलती है।
उपरोक्त बिन्दुओं का तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाए तो कह सकते हैं कि यह सब काल्पनिक व निराधार हैं।
ये सब भक्तों की संख्या बढ़ाने के लिए तथा अपना धंधा पक्का करने के लिए किया गया चतुराई भरा प्रयास है।
विचारक पद्ममुख पंडा

भावनाओं को ठेस

हम किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं चाहते किंतु समाज व देश हित में जो कुछ उचित है उसे सार्वजनिक करने का प्रयास करते हैं। यदि किसी को आपत्ति हो तो वे तथ्य सहित विरोध कर सकते हैं। आस्था और विश्वास यदि युक्तिसंगत न हो तो उनका महत्व नहीं होता।

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

जाति धर्म आधार पर मतदान

लोकतंत्र में जाति धर्म आधार पर मतदान उचित नहीं गलत है। क्या सभी अग्रवाल,  अघरिया ... ..  अपने ही जाति के उम्मीदवार को वोट देते हैं?  नहीं । फिर भी अपनी योग्यता ये विधायक सांसद बनते हैं ।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

खतरे में है

कुमार संदीप _
हिन्दू धर्म से नफ़रत,
ये कुरान नहीं कहता।
भारत की मस्जिदें तोड़ो,
ये श्रीराम नहीं कहते।
रोटी का कोई *"धर्म"*नहीं होता
पानी की कोई *"जात"*नहीं होती।
जहाँ *"इंसानियत"* जिन्दा है वहाँ
"मजहब" की बात नहीं होती।
किसी को लगता हिन्दू खतरे में है,
किसी को लगता मुसलमान खतरे में है,
धर्म का चश्मा उतार कर देखो यारो...
पता चलेगा की नेताओं के कारण  हमारा हिन्दुस्तान खतरे में है !!

आय व्यय की अपारदर्शिता (फेसबुक 13-10-2017)

कृपया पूरा पढ़कर अपनी राय दें ।..
लोग सोशल मिडिया पर या कहीं माइक मिल जाए तो इमानदारी भ्रष्टाचार पर बहुत अच्छा भाषण सुनाते हैं ।
**********
प्रस्तुत है
आय व्यय की अपारदर्शिता के कुछ उदाहरण -
आय व्यय की अपारदर्शिता -
#-मैं तीस साल से अपने सामाजिक संगठन के लिए काम कर रहा हूँ । मैं समाज सेवा करता हूँ और करूंगा । मैं सारे समाज को एकजूट करने के लिए चालीस साल से लगा हूँ । मेरा बहुत समय इसी समाज सेवा में जाता है। मुझे समय नहीं है कि समाज के आय व्यय का हिसाब रखूं । मैं समाज सेवा करूंगा कि रूपये का हिसाब किताब करता रहूंगा । मैं नहीं करता ये सब।
#- हम पंचायत बैठक में आय व्यय का हिसाब बताते तो हैं । और किसके बताएंगे?  सबको पूरे गांव के एक अक लोगों को बताएं?  अरे हम अपने घर का काम धंधा छोड़ कर पंचायत के काम में लगे रहते हैं । सबको हिसाब बताने के लिए हमारे पास समय नहीं है।
#- हम अपने सामाजिक संगठन के कार्यकारिणी बैठक में आय व्यय बताते हैं। समाज के हर एक सदस्य को,  सबको बताना तो संभव नहीं है।
     *******
आज सोशल मिडिया अपनी बात रखने,  विचार व्यक्त करने,  जानकारी देने के लिए सशक्त माध्यम है।
सभी सरकारी गैर सरकारी, पंजीकृत अपंजीकृत सभी संस्थाओं/ संगठनों, एन जी ओ,  राजनीतिक दलों,  ग्राम पंचायत नगर निगम,  क्लब,  समितियों,  जाति समाज / संगठनों.... सबको हर माह आय व्यय की जानकारी सोशल मिडिया और प्रिंट मिडिया के माध्यम से दी जानी चाहिए । संभव हो तो पिछले कुछ वर्षों की भी जानकारी देनी चाहिए ।
***
इस क्रम में स्कूलों में विद्यार्थियों से ली गई शुल्क का भी हिसाब बताना चाहिए ।

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

मतभेद

मत भेद होना गलत नहीं है। होना चाहिए वर्ना सब रोबोट हो जाएंगे मनुष्य नहीं ।

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

क्या आप भगवान या ईस्वर को मानते हैं ?

Ashiq Khan to The Nastik World ( नास्तिक विश्व )

क्या आप भगवान या ईस्वर को मानते हैं ? शीर्षक पढकर आप चौंक गये होंगे... क्या मैं नास्तिक हूँ... बिलकुल नहीं... फ़िर मैं क्यों ऐसी बात कह रहा हूँ ? लेकिन जरा आगे तो पढिये जनाब, कई सवाल हैं जो मेरे दिलो-दिमाग को मथते हैं और जिनका कोई तर्कपूर्ण जवाब मुझे नहीं मिलता, एक विशिष्ट प्रकार का "कन्फ़्यूजन" (Confusion) है..., इन विषयों पर हमेशा मैनें प्रत्येक बहस में सामने वाले से जवाब माँगा है, लेकिन नतीजा सिफ़र... वही गोल-मोल जवाब... वही ऊटपटाँग तर्क... लेकिन मेरी बात कोई मानने को तैयार नहीं... सोचा कि ब्लोग पर इन प्रश्नों को डालकर देखूँ, शायद कोई विद्वान मेरी शंकाओं का समाधान कर सके... और नहीं तो मुझ से सहमत हो सके... खैर बहुत हुई प्रस्तावना.... क्या आप भगवान को मानते हैं.... क्यों मानते हैं ? ... क्या आपको विश्वास है कि भगवान कहीं है ? ...यदि है तो वह क्या किसी को दिखाई दिया है ? ये सवाल सबसे पहले हमारे मन में आते हैं लेकिन बाल्यकाल से हमारे मनोमस्तिष्क पर जो संस्कार कर दिये जाते हैं उनके कारण हम मानते हैं कि भगवान नाम की कोई हस्ती इस दुनिया में है जो सर्वशक्तिमान है और इस फ़ानी दुनिया को चलाती है... चलो मान लिया... हमें सिखाया जाता है कि भगवान सभी पापियों का नाश करते हैं... भगवान की मर्जी के बिना इस दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता... जो प्राणी सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना करते हैं उनको सुफ़ल अवश्य मिलता है... लेकिन ईश्वर मौजूद है तो फ़िर इस दुनिया में अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, बीमारी आदि क्यों बनी हुई है ? शैतान (Satan) क्या है और नरक का निर्माण किसने किया ? क्या भगवान ने ? यदि हाँ तो क्यों ? यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों ना उसे ईश्वर की लीला समझकर माफ़ कर दिया जाये, क्योंकि उसकी मर्जी के बिना तो कुछ हो ही नहीं सकता । बाढ, सूखा, सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी सभी ईश्वर की ही देन हैं, मतलब इन्सान को प्रकृति बिगाडने का दोषी नहीं माना जाना चाहिये. कहा जाता है कि मनुष्य, भगवान की सर्वोत्तम कृति है, फ़िर यह "सर्वोत्तम कृति" क्यों इस संसार को मिटाने पर तुली है... ? इसके जवाब में लोग कहते हैं कि यह तो मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्मों का फ़ल है... लेकिन हमें तो बताया गया था कि चौरासी लाख योनियों के पश्चात ही मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, फ़िर इस मनुष्य ने पाप किस जन्म में किये होंगे.. जब वह गाय-बकरी या कीडे-मकोडे के जन्म में होगा तब...? लेकिन मूक प्राणी तो कोई पाप नहीं करते... फ़िर ? और मनुष्य के पाप-पुण्य का हिसाब भी बडा मजेदार है... अब देखिये.... भगवान पापी, दुराचारी, पाखण्डी को अवश्य सजा देते हैं... लेकिन कब ? भगवान की बनाई हुई दुनिया उजडी जा रही है... लेकिन वह चुप है... अन्याय, लूट-खसोट चरम पर है, लेकिन वह कुछ नहीं करता...ईश्वर के नाम पर तमाम पाखण्ड और ढोंग चल रहा है... लेकिन वह चुप है... बडे-बडे लुटेरे, कालाबाजारिये, घूसखोर अफ़सर आदि लाखों रुपये चन्दा देकर विशाल भण्डारे और प्रवचन आयोजित कर रहे हैं... लेकिन भगवान को वह भी मंजूर है... दिन भर पसीना बहाने वाला एक ठेलाचालक भी उतना ही धार्मिक है लेकिन वह ताजिन्दगी पिसता और चूसा जाता रहेगा धनवानों द्वारा, ऐसा क्यों... ? धनवान व्यक्ति के लिये हर बडे मंदिर में एक वीआईपी कतार है, जबकि आम आदमी (जो भगवान की प्रार्थना सच्चे मन से करता है) वह लम्बी-लम्बी लाईनों में खडा रहता है....क्या उसकी भक्ति उस धनवान से कम है ? या भगवान को यह अन्याय मंजूर है... नहीं... तो फ़िर वह कुछ करता क्यों नहीं ? खैर... बहुत बडा ब्लोग ना हो जाये कहीं... और पाठक मुझे कोसने लगें, इसलिये यहीं खत्म करता हूँ.... अन्त में एक एक छोटी लेकिन महत्व पूर्ण बात बताइये भगवान दिखाई क्यों नहीं देता ? तो भईये... जैसे इन्सान उसने बनाये हैं.. उसके कारण वह किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा.... बाकी अगले ब्लोग में... किसी की भावनाओं को चोट पहुँचती हो तो माफ़ करें...

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

हम ओ बी सी राक्षस कुल के हैं

हम भारत के ओ बी सी (अन्य पीछड़ी जाति ) राक्षस कुल के हें । (हम खुद को क्षत्रिय या वैश्य मान लें तो वह सही नहीं हो जाता। अपने पुरोहित से पूछ लें हमारा कुल क्या है? ) । हम विदेशी आर्य नहीं हैं।  आर्यों के चारों वर्णों में से किसी में भी नहीं|
अपनों से क्षमा याचना के साथ।
 ****************
हमारे देश के मूल निवासी हैं जंगलों में रहने वाले वानर, भील, बिरहोर, कोरवा, उरांव  ..... आदिवासी और मैदानी इलाके में रहने वाले राज करने वाले राक्षस । बाद में बाहर से आर्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) आए। सेवा के लिए कुछ दास साथ में लेकर लेकर आए थे जिन्हें वे शुद्र कहते थे।
 आदिवासी और राक्षस बलशाली थे लेकिन चालाक नहीं थे। आदिवासी भोले थे। राक्षस उनसे ज्यादा बुद्धिमान थे।  आर्य बुद्धिमान और चालाक थे । आर्यों के पास उन्नत अश्त्र शस्त्र थे।
   क्षत्रिय ब्राह्मणों के दिमाग के सहयोग से इस देश के राक्षस राजाओं को येन केन प्रकारेण, साम दाम दंड भेद से जीतकर कर राजा बन गए। राज्य का नाम रखा आर्यावर्त ।
शिव शंकर, रावण सभी राक्षस कुल के थे जिनकी संस्कृति "वयं रक्षामः" थी| रक्ष संस्कृति । याने सबकी रक्षा करेंगे, अपने राक्षस कुल के अलावा जंगलों में रहने वाले मनुष्य और प्राणियों की भी।| यः रक्षति सः राक्षसः| 
शंकर जी को हराना उनके लिए संभव नहीं था इसलिए उन्हें देवों के देव महादेव का सम्मान देकर (मस्का लगाकर) खुश कर लिए| शंकर जी भोले थे। उनकी चालाकी नहीं समझ सके । वे अब आर्यों के मित्र हो गए।
आर्य स्वयं को देवता, सुर कहते थे। राक्षसों को दानव और असुर कहते थे। सुरा पान करने वाले सुर (आर्य) सूरा पान नहीं करने वाले राक्षसों को असुर कहते थे। आर्य यज्ञ हवन में प्राणियों की बलि देते थे जिसका वयं रक्षामः अर्थात रक्ष संस्कृति वाले राक्षस विरोध करते थे। आर्य शुद्रों आदिवासी,  राक्षसों का तिरस्कार करते थे। उन्हें हीन मानते थे। 
बुद्धि के धनी ब्राह्मण सिर्फ क्षत्रिय तथा वैश्य के घर में पूजा पाठ यज्ञ हवन कर कमाई करते थे। वे अछूत शुद्रों के घर नहीं जाते थे। बाद में चालाक ब्राह्मण अधिक कमाई के लिए बहुजन राक्षसों के घर भी जाने लगे। उनके घर में भी पूजा पाठ यज्ञ हवन करने लगे ।
आर्य शुद्रों को अछूत मानते थे। उन्हें हीन नीच मानते थे| अब राक्षस कुल के लोग भी जंगल में रहने वाले आदिवासियों और शुद्रों को नीच हीन मानकर उनका तिरष्कार करते हैं  स्वयं को आर्यों की भांति श्रेष्ठ मानते हैं| याने हम महान ||.

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

प्यार


प्यार करने वालों को आर्थिक स्तर, ऊंचा खानदान, उच्च जाति का दंभ विलग कर देता है। विवाह करने से उन्हें से मना कर देता है। फलस्वरूप कुछ मन मारकर, नियति मानकर स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं। कुछ घर छोड़ कर भाग कर शादी कर लेते हैं। दुखद होता है जब परिवार, जाति समाज, खाप पंचायत द्वारा उन्हें बहिष्कार की सजा देते हैं ।
बहुत दुखद होता है जब आत्महत्या कर लेते हैं या मार दिए जाते हैं।
ऐसे दंभी और क्रूर लोगों को आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए ।
**********
अपना विचार दें बेझिझक ।
मन की बात प्रकट करें ।
यह न सोचें कि लोग क्या कहेंगे ।
तर्क आधार युक्त कामेंट करें ।
गाली गलौज वाले दूर रहें दूर्र..

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

आस्था


बात #आस्था_श्रद्धा की होती तो लोग जानवरों का नही,
स्वयँ का #दूध_माँस पत्थरों पर चढ़ाते
#ग़ुलाम

ईश्वर के अस्तित्व पर आओ विचार करें

आओ विचार करें
***************
दोस्तों! हम ठंडे दिमाग से बिना किसी दुराग्रह के ईश्वर के अस्तित्व पर चर्चा करते हैं।
ईश्वर का नाम पूरे विश्व में है।प्रत्येक धर्म के लोग ईश्वर को अलग अलग रूप से मानते हैं। हमारे माता पिता तथा गुरूजनों ने हमें ईश्वर के बारे में जो कुछ बताया हमने उसे मान लिया। हम लोग माता पिता तथा गुरूजनों का सम्मान करते हैं। वे हमारे हितैषी व हमें प्यार करने वाले लोग हैं।
  पर हम जब बड़े हो गए तो हमारे मन में ईश्वर को लेकर अनेकों सवाल उठने लगे।समय के साथ चलना हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है। सत्य को जानने का सबको अधिकार है।सत्य को जाने बिना जीवन निरर्थक है।
ईश्वर के अस्तित्व पर चर्चा होती रही है तथा ईश्वर के पक्ष में तमाम तरह की दलीलें दी जाती रही हैं। ईश्वर के होने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है तथा अप्रत्यक्ष रूप से भी ईश्वर न्याय नहीं करता है। पूरी दुनिया में सामाजिक आर्थिक धार्मिक तथा जातीय संघर्ष होता रहा है। विषमता तथा विसंगतियों में कोई कमी नहीं है।
  धर्म के नाम पर ठगी का धंधा फलता फूलता रहा है। लोग सत्य प्रेम न्याय सहयोग दया को न मानकर ईश्वर का ही गुणगान करते रहते हैं। ईश्वर की आड़ में आतंक व अन्याय को बढ़ावा दिया करते हैं।
    ईश्वर के स्थान पर यदि हम मानवोचित गुणों को स्वीकार कर लें तथा सभी को समान रूप से जीवन जीने का अधिकार दे दें तो संसार स्वर्ग बन जाएगा। सब सुखमय जीवन व्यतीत करेंगे तथा मृत्यु के समय भी संतोष के साथ देह त्याग करेंगे इसमें कोई शक नहीं है।

विचारक पद्ममुख पंडा. महापल्ली

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

सत्यार्थी बनो।

मोदी जी मन के सच्चे

मोदी जी मन के सच्चे हैं| जो मन में आया कह दिया. अब पूरा कर रहे हैं|
केले प्रवाह ०६-१०-२०१३ समाचार

विवेक


Rattan Lal Gottra
*और जिसका विवेक शून्य हो जाता है वह इंसान तर्क नही कर सकता,तर्क सुन भी नहीं सकता...*
*और फिर यहीं से शुरू होती है मानसिक गुलामी और बाबाओं का खेल।*
*भारत में करोड़ो लोग इस समस्या से पीड़ित हैं
संविधान पढ़िए आगे बढ़िए
जय संविधान जय संविधान

धर्म -- Saurabh Varshney's post.


मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

हत्या की सच्चाई

कृपया पूरा पढ़ें अवश्य पढ़ें ।
तर्कसम्मत आधार सह अपनी राय दें । गाली गलौज वाले दूर रहें दूर्र... बकवास न करें ।
Nikhilesh Mishra
21 hrs
हत्या की सच्चाई
आपके सामने ला रहा हूं। अब तक आप
जो नही जान पाये वो आज जाने ----
"गांधी ह्त्या के पीछे ये मतान्ध
हिन्दुवादी तीन कारण बताते है
* पहला मिथ यह है
कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के
पक्षपाती थे।*दूसरा 'मिथ' यह है
कि गांधीजी की हत्या 55
करोड रुपयों के कारण की गयी *
तीसरा 'मिथ' यह है
गांधी की हत्या करनेवाले बहादुर,
देशभक्त और प्रामाणिक व्यक्ति थे। परन्तु सत्य यह है
कि ये तीनों 'मिथ' बिलकुल गलत हैं। आइये इन
तीनो कारणो की सच्चाई बताते है
नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे
कलेजे से
गांधीजी की हत्या की थी।
===============
'पन्नास कोटीचे बली' नाथूराम
का अदालत में दिया हुआ बचावनामा है, और
'गांधी आणि मी' गोपाल गोडसे
की, आजीवन कैद
की सजा होने के बाद
लिखी गयी पुस्तक है। ये दोनों पुस्तकें
पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे
धर्मजनूनी जरूर था, मगर पागल
नहीं था। हम जिसको सिरफिरा कहते हैं,
ऐसा तो वह हरगिज नहीं था।
मुसलमानों ने भारत का विभाजन करवाया, फिर
भी मुसलमानों, उनके संगठन मुस्लिम
लीग तथा नवनिर्मित पाकिस्तान के
प्रति गांधीजी ने नरम रुख अपनाया था,
ऐसी दलीलें उन पुस्तकों में
तथा अन्यत्र भी हिन्दुत्ववादी देते रहे
हैं। उनकी नजर में, तब तो हद
ही हो गयी, जब
गांधीजी ने पाकिस्तान को, उसके हिस्से
के, 55 करोड रुपये देने की जिद की,
और उपवास की धमकी तक दे
डाली। पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार
तथा कश्मीर पर हमला करनेवालों को 55 करोड
रुपये देने की बात से उनेजित होकर नाथूराम गोडसे ने
गांधीजी की हत्या की थी,
ऐसा उन पुस्तकों में कहा गया है। आम तौर पर
गांधीजी की हत्या के
सम्बन्ध में, आम
लोगों की भी धारणा ऐसी ही है।
अनेक इतिहासकार और पत्रकार
भी ऐसा ही मानते हैं। इतिहास
की पाठय़पुस्तकों में
भी हत्या का यही कारण
बताया जाता है।
गोडसे-बन्धुओं की पुस्तकों को पढने के बाद
हत्या का सही कारण जानने के लिए मैंने अन्य
अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। प्यारेलाल लिखित 'द लास्ट
फेज', गांधी हत्या का केस
जिनकी अदालत में चला था उन
न्यायमूर्ति खोसला की लिखी पुस्तक,
ग्वालियर के बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट
इनामदार के संस्मरण, और गोडसे- बन्धुओं का प्रतिवाद
करनेवाली कई दूसरी पुस्तकें पढने के
बाद मुझे यकीन
हो गया कि गांधीजी की हत्या 55
करोड रुपये के प्रकरण से उनेजित होकर
नहीं की गयी थी।
भारत का विभाजन और 55 करोड रुपये का प्रश्न खडा हुआ,
उसके बहुत पहले ही इस टोली ने
गांधीजी की हत्या करने
का निश्चय कर लिया था और कई बार
गांधीजी की हत्या करने के
प्रयास भी किये
गये थे।
============
पाकिस्तान को 55 करोड़ देने के प्रश्न पर
की हत्या ?? ये बात पूरी तरह झूठ
है
===================
55 करोड रुपये का प्रश्न तो 12 जनवरी, 1948
को यानी गांधीजी की हत्या के
18 दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले, चार बार
गांधीजी की- हत्या के
प्रयास हिन्दुत्ववादियों ने क्यों किये थे, इसका उनर
उनको देना चाहिए।
नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणील् नाम
की मराठी पत्रिका निकालता था।
गांधीजी की 125 वर्ष
जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद
'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर
जीने कौन देगा ?' यानी कि 125 वर्ष
आपको जीने ही कौन देगा ?
गांधीजी की हत्या से डेढ
वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह कथन साबित
करता है कि वे
गांधीजी की हत्या के लिए
बहुत पहले से प्रयासरत थे। 'अग्रणी' का यह
अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है।
फिर 55 करोड़ का सवाल कहा से आया ?
प्रथम बार हत्या का प्रयास :
===================
गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !
गांधीजी भारत आये उसके बाद
उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934
को किया गया। पूना में गांधीजी एक
सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब
उनकी मोटर पर बम फेंका गया था।
गांधीजी पीछे
वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये। हत्या का यह
प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले
के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र
पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है। 1934 में
तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज
पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल
ही कहा! से पैदा होता ?
==============
गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास
1944 में पंचगनी में किया गया।
---------------------------------------------
--------------------
जुलाई 1944 में
गांधीजी बीमारी के
बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। तब
पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर
पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे गांधी-
विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे
को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया।
मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए
इन्कार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में
छुरा लेकर गांधीजी की तरफ
लपका। पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर
पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के
युवक ने नाथूराम को पकड लिया। पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम
नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित
तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-
हत्या की जा!च करने वाले कपूर-
कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम
इस घटना पर अपना बयान देते समय लिया था। भीलारे
गुरुजी अभी जिन्दा हैं। 1944 में
तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका खुद मुहम्मद
अली जिन्ना को भी भरोसा नहीं था।
ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि 1946 तक मुहम्मद
अली जिन्ना प्रस्तावित पाकिस्तान का उपयोग सना में
अधिक भागीदारी हासिल करने के लिए
ही करते रहे थे। जब पाकिस्तान का नामोनिशान
भी नहीं था, तब क्यों नाथूराम गोडसे ने
गांधीजी की हत्या का प्रयास
किया था ?
=================
गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास
==============
भी इसी वर्ष 1944 सितम्बर में,
वर्धा में, किया गया था।
गांधीजी मुहम्मद
अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए
बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी बम्बई न
जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहु!चा।
उसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था। उस गुट के थने के नाम के
व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ था। यह बात पुलिस-रिपोर्ट
में दर्ज है। यह
छुरा गांधीजी की मोटर के
टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था, ऐसा बयान थने ने
अपने बचाव में दिया था।
" यह बहुत ही उनेजित स्वभाववाला,
अविवेकी और अस्थिर मन
का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ
चिंता होती थी। गिरफ्तारी के
बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला।
(महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ
114)
===============
गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास
===============
29 जून, 1946 को किया गया था।
गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से
पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के
बीच में रेल पटरी पर बडा पत्थर
रखा गया था। उस रात को डांइवर की सूझ-बूझ के
कारण गांधीजी बच गये।
हिन्दुत्ववादियों की आँख में
गांधीजी किरकिरी की तरह
खटकते थे। 55 करोड रुपयों की तो बात
ही क्या, पाकिस्तान किसी के सपने में
नहीं था, तब से ये
गांधीजी की हत्या करने के
प्रयास में जुट गये थे। दुखद तथ्य यह है कि भारत में
गांधीजी की हत्या के
जो प्रयास हुए हैं, उनमें सबमें अधिक पूना के लोग
ही शामिल थे। इस प्रकार के तीन
प्रयासों में, और अन्त में हत्या में, खुद नाथूराम गोडसे शामिल
था। 55 करोड रुपये का प्रश्न तो 12 जनवरी,
1948
को यानी गांधीजी की हत्या के
18 दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले, चार बार
गांधीजी की- हत्या के
प्रयास हिन्दुत्ववादियों ने क्यों किये थे, इसका उनर
उनको देना चाहिए।
पाकिस्तान का निर्माण किसने किया ?
==========================
1937 में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद-अधिवेशन में खुद
सावरकर ने द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था।
मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए प्रस्ताव किया,
उससे तीन वर्ष पूर्व ही सावरकर ने
हिन्दू और मुसलमान, ये दो अलग-अलग
राष्टींयताए! हैं, यह प्रतिपादित किया था। जब
दो साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ काम करने
लगती हैं, तब दोनों एक ही लक्ष्य
की ओर अग्रसर होती हैं, और वह
होता है आत्मविनाश का। हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने ऐसा करके
अंग्रेजों और भारत-विभाजन चाहने वाले
मुसलमानों को फायदा ही पहु!चाया था।
मतान्ध हिन्दुत्व वादियो ने किया 1942
की आजादी के आन्दोलन का विरोध
==============================
==========
इन महान देशप्रेमियों ने 1942
की आजादी के आन्दोलन में तो भाग
नहीं ही लिया था, उल्टे ब्रिटिश सरकार
को पत्र लिखकर यह
जानकारी भी दी थी कि हम
आन्दोलन का समर्थन नहीं करते हैं।
गांधीजी आये, उसके पहले
राष्टींय राजनीति का नेतृत्व उनके पास
ही था। लेकिन तब भी उन्होंने उन
दिनों कोई बडा पराव्म नहीं किया था, यह हम
सबकी जानकारी में है ही।
गांधी के आने के बाद भी इन लोगों ने
राष्टंहित में कोई मामूली काम करने
की भी जहमत
नहीं उठाई।
गुरु गोलवलकर ने ऐडाल्फ हिटलर का अभिनन्दन किया, फिर
भी अंग्रेजों ने उनको गिरफ्तार
नहीं किया। रु गोलवलकर
की लिखी
"We, Our Nationhood Defined" शीर्षक
पुस्तक तो हिटलर
की भी तारीफ करने
वाली एक गन्दी पुस्तक है।
यद्यपि आर.एस.एस. ने इस पुस्तक का प्रकाशन अब बन्द
कर दिया है, लेकिन इस पुस्तक में व्यक्त विचारों में संघ
की आस्था अब
नहीं रही,
ऐसी घोषणा आर. स. स. ने आज तक
नहीं की है।
कारण यह कि अंग्रेज मानते थे कि ये दो कौडी के
निकम्मे लोग हैं। ये लोग तो तला पापड
भी नहीं तोड सकते ! अंग्रेजों का यह
आकलन था उनकी ताकत के बारे में।
भारत-विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग
तथा अंग्रेज हैं, उतने ही ये मतान्ध
हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं।
==========================
आजाद भारत में हिन्दू ही हुकूमत करेंगे, ऐसा शोर
मचाकर हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के
लिए एक ठोस आधार दे दिया था। ये विभाजनवादी लोग
मुहम्मद अली जिन्ना, सावरकर, हेडगेवार,
गोलवलकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि का भय
दिखाकर उनका चालाकीपूर्वक उपयोग करते थे।
हिन्दुत्ववादी अभी भी अपनी बेवकूफियों पर
गर्व का अनुभव करते हैं। अंग्रेजों को जिन्हें
कभी जेल में रखने की जरूरत
ही नहीं पडी, उन
गोलवलकर की अदृश्य ताकत का उपयोग अंग्रेज
गांधीजी के खिलाफ करते थे।
शहाबुद्दीन राठौड की भाषा में कहें
तो उस समय की राष्टींय
राजनीति में यो लोग जयचन्द थे। भारत का विभाजन
गांधी के कारण नहीं हुआ है, इन
लोगों के कारण हुआ है। गांधीजी ने
तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था।
गांधीजी ने अलग राष्ट्र
नही पाकिस्तान को स्टेट माना था।
====================
(देखें प्यारेलाल लिखित 'लास्ट फेज')
गांधीजी सर्वसमावेशक उदार
राष्टंवादी थे। इसीलिए उन्होंने सब
कौमों को अपनाया था, मात्र
मुसलमानों को ही नहीं। प्रत्येक
छोटी अस्मिता व्यापक राष्टींयता में मिल
जाय, यह चाहते थे गांधीजी। एक
राष्टींय नेता की यह
दूरदृष्टि थी।
विभाजन रोकने के लिए इन लोगों ने क्या किया ?
। गांधीजी को भारत-विभाजन
रोकना चाहिए था, यह मांग ये लोग किस मु!ह से करते हैं ?
गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए
उपवास करना चाहिए था, ऐसी अपेक्षा करने
का इनको क्या नैतिक-अधिकार है ? जिसको आप देश के लिए
कलंक समझते हैं, जिसका वध करना जरूरी मानते
हैं, उसी से आप ऐसी अपेक्षाए!
भी रखते हैं?
आपने क्यों नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ
किया ? सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के विरुद्ध
क्यों नहीं आमरण उपवास किया ?
क्यों नहीं इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक
आन्दोलन चलाया ? जिसको गालिया! देते हों, उसी से
देश बचाने की गुहार भी लगाते हो ?
और जब गांधीजी अकेले पड जाने के
कारण देश का विभाजन रोक नहीं पाये, तब आप
उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश
रचते हो ? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता ?
गोपाल गोडसे तथा अन्य दूसरे अनेक मतान्ध
हिन्दुत्ववादी विद्वानों के समक्ष ऐसे सवाल उठाये
गये हैं, लेकिन किसी के पास इसका कोई उत्तर
नहीं है। इन सबके बावजूद भी ये
अपनी डिंगे हांकने से बाज नहीं आते
हैं। सत्य को जानते हुए भी जो असत्य का प्रचार
करे, उसको धूर्त ही कहेंगे। ये मतान्ध
हिन्दुत्ववादी पहले दर्जे के धूर्त हैं।
भारत-विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार
नहीं थे। भारत-विभाजन के लिए कई ऐतिहासिक
तथा सामयिक तन्व एवं ताकतें जिम्मेदार थी। ब!
टवारा चाहने वाले मुसलमान जिम्मेदार थे, अंग्रेज जिम्मेदार थे
तथा उनके कारनामों के लिए अनुकूल राह बनाने-दिखाने वाले
मतान्ध हिन्दुत्ववादी जिम्मेदार थे।
ये मतान्ध हिन्दुत्ववादी लगातार जो तीन
झूठ बोल रहे हैं, उन झूठों की पोल इस लेख
को पढने के बाद खुल गई होगी ।
गांधी-हत्या की प्रेरक शक्तिया और
गोडसे जैसे हिन्दू राष्ट्रवादियों को पहचानें
============================
गांधी की हत्या के साथ 55 करोड
रुपयों का कोई सम्बन्ध नहीं हैं, इस बात
की स्पष्टता के बाद अब हिन्दुत्ववादियों
द्वारा प्रस्थापित तीसरे, 'मिथ'
की भी चर्चा कर लें। यह
तीसरा, 'मिथ' है
कि गांधीजी के हत्यारे प्रामाणिक
देशभक्त और बहादूर थे।
जैसा कि इनके द्वारा प्रचारित किया जाता है।
'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक में नाथूराम
की ऐसी ही छवि उभारने
की कोशिश की गयी है।
जो लोग असत्य तथा अर्धसत्य का सहारा लेते हैं
क्या उनको प्रामाणिक और बहादुर कहा जा सकता है ? जो लोग
सन्दर्भ को तोड-मरोड कर झूठ फैलाते हैं उनको बदमाश कहते
हैं या बहादूर ? इन लोगों ने
गांधीजी की हत्या का असली कारण
बताने का साहस किया होता तो जरूर उनको प्रामाणिक
कहा जा सकता था।
गांधीजी की हत्या के लिए
किये गये पिछले निष्फल
प्रयासों की जिम्मेदारी भी कबूल
की होती, तो भी कुछ भिन्न
बात होती। एक अहिंसानिष्ठ निःशस्त्र
व्यक्ति की हत्या करना कोई
मर्दानगी नहीं,
कोरी नपुंसकता है। जो लोग तार्किक
रीति से अपनी बात
दूसरों को समझा नहीं सकते, वे ही लोग
हिंसा का सहारा लेते हैं। हिंसा बुजदिलों का मार्ग है,
शूरवीरों का नहीं।
अपनी निष्फलता और हताशा में
ही हिन्दुत्ववादियों ने
गांधीजी की हत्या की थी।
जिस व्यक्ति के कारण अपने अस्तित्व पर संकट आता है,
वह व्यक्ति कांटे की तरह चुभने लगता है और
तब उस कांटे को निकलाने का प्रयत्न होता है।
हिन्दुत्ववादी समाचार-पत्रों में
गांधीजी की कटु आलोचनाए!
छपती थी।
गांधीजी को अभद्र गालिया! देने
वाली छोटीगछोटी पत्र-
पत्रिकाए!,प्रचारगपुस्तिकाए! तो इतनी छपवाते थे
कि यदि उनका संग्रह किया जाता तो एक
कमरा ही भर जाता। कुछ महान देशभक्त तो इतने
शूरवीर थे कि अपना नाम भी छापने
की उनकी हिम्मत
नहीं होती थी।
गांधी-द्वेष और मुस्लिम-द्वेष से ये हिन्दू
राष्टंवादी इतने पीडित थे कि राष्टंहित
किसमें है यह उनकी समझ में
ही नहीं आता था। उनके पेट में दर्द
तो इस बात का था कि गांधीजी के आने के
बाद नेतृत्व उनके हाथ से चला गया था।
इतना ही नहीं,
उनकी 'हिन्दूगब्राण्डराजनीति'
भी कालबाह्य
हो चुकी थी।
ब्रांणवादी राष्टंवाद की जगह ले
ली थी उदार
गांधीवादी राष्टंवाद ने। जाति-पा!ति, पंथ,
लिंग आदि भेदभावों को भूलकर
जनता गांधीजी के पीछे
चलने लगी थी।
राजनीति की बुनियाद से
साम्प्रदायिकता को हटाकर, गांधीजी ने
उसकी जगह अध्यात्म को प्रस्थापित कर दिया था।
अध्यात्म की बुनियाद पर
मानवतावादी राजनीति की इस
नयी धारा ने
गांधीजी को महात्मा बना दिया और
हिन्दुत्ववादी क्षीण होतेगहोते हासिये
पर चले गये थे। जो बहुत
महन्वाकांक्षी नहीं थे ऐसे कई
साम्प्रदायिक लोग राजनीति से अलग हो गये।
जनूनी और
महन्वाकांक्षी सम्प्रदायवादियों
की हालत पतली हो गयी।
वे गांधीजी के साथ
जा नहीं सकते थे और जनता उनके साथ आने के
लिए तैयार नहीं थी।
नाथूराम गोडसे का आर.एस.एस. से सम्बन्ध
नहीं रहा है, ऐसा घोषित करने
की भीख आर.एस.एस. के नेताओं ने
नाथूराम से ही मांगी थी।
हकीकत यह है कि गांधी-हत्या के
पाच वर्ष पहले तक नाथूराम आर.एस.एस. का प्रचारक था।
ये लोग योजनाबद्ध तरीके से सरदार पटेल
को हिन्दुत्ववादी साबित करने
की नीच हरकतें कर रहे थे।
===============
आर.एस.एस. पर से प्रतिबन्ध उठाया जा सके, इसके लिए सरदार
पटेल ने नाथूराम को ऐसा घोषित करने के लिए कहा था, यह
दावा गोपाल गोडसे करते हैं। इस प्रकार सरदार पटेल
हिन्दुत्ववादी थे, और आर.एस.एस. से मिले हुए
थे.
ऐसा गन्दा संकेत ये दो लोग बेशर्मी से करते हैं।
आरम्भ में गुरु गोलवलकर
की लिखी 'Our Nationhood
Defined" पुस्तक का उल्लेख किया गया है। इस पुस्तक
का प्रकाशन 1939 में हुआ था। इस पुस्तक के कारण जब
आर.एस.एस. के लिए कठिनाइया! बढने लगी, तब
तुरन्त उससे छुटकारा पाने के लिए गुरु गोलवलकर ने इस पुस्तक
के लेखक का नाम बदलकर बाबाराव सावरकर कर दिया। दूसरे के
नाम की पुस्तक अपने नाम पर प्रकाशित कराने
की बात हमने सुनी है। परन्तु इस
आदमी ने
तो अपनी चमडी बचाने के लिए
अपनी ही पुस्तक दूसरे के नाम कर
दी। ऐसे कायर और
कपटी आदमी को क्या प्रामाणिक,
बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ? गोपाल गोडसे ने
जेल से छूटने के लिए भारत सरकार को एकगदो बार
नहीं, 22 बार
अर्जी दी थी और ऐसे लोग
अपने को शूरवीर कहते हैं।
नाथूराम ने
गांधीजी की हत्या करने के
प्रयास अधिकतर प्रार्थना-सभाओंमें ही किये। जब
सब लोग प्रार्थना में लीन हों, उस वक्त ये 'नरबा!
कुरे'
गांधीजी की हत्या करना चाहते
थे। पूजा-प्रार्थना कर रहे आदमी पर
हमला नहीं करना चाहिए, ऐसा हिन्दुत्ववादियों के
प्रिय हिन्दू-युद्ध शास्त्र में कहा गया है। ये नामर्द
तो अपनी संस्कृति का भी अनुसरण
नहीं कर सकते।
हजारों लोगों की उपस्थिति वाली,
गांधीजी की प्रार्थना-सभा में
बम फेंकने में भी इन लोगों को शर्म
नहीं आयी। जिन लोगों के लिए निर्दोष
व्यक्तियों की जान की कोई
कीमत नहीं, उनको क्या प्रामाणिक,
बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ?????" -----
कमल राजपुरोहित