शनिवार, 5 अगस्त 2017

भीख नहीं सहयोग

अपंग बूढ़े के अतिरिक्त अन्य भिखारियों को भीख देकर निठल्लापन को बढ़ावा देना है। इससे अच्छा है जरूरतमंद विद्यार्थियों को सहयोग करें।

गरीबों के दुश्मन

Dinesh Aastik
रुढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रुढ़ियों को तोड़ने के उदहारण पर्याप्त मात्र में नहीं हैं। लोगों को इस ख़्याल का जोर से प्रचार करना चाहिए की मज़हब और खुदा गरीबों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
– राहुल सांकृत्यायन
(9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963)

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता _ डाॅ मीनकेतन प्रधान

मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता
किसी व्यक्ति पर सायास कुछ लिखना कितना कठिन होता है, यह अभी महसूस कर रहा हूँ, खासकर ऐसे व्यक्ति पर जो बचपन से अब तक लगातार दिलोदिमाग में छाया रहे और अचानक संसार से उठ जाय, अभी उड़ीसा प्रवास से रायगढ़ लौटने पर पता चला - ‘‘दादा’’ पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता नही रहे... मंै धक् से रह गया, सोचता रहा.... नजरों के सामने उभर आता ....... खुला बदन, कमर के ऊपर नाभी से पैर तक पसरी सफेद धोती और दाहिने कंधे को कसता हुआ आखरी छोर-हल्का नील लगा हुआ.... जैसे भीतर का निर्विकार भाव था वैसा ही परिधान। तिलकता उन्नत माथा - दो तीन लकीरों का गंगा-जमुनी अन्तर्प्रवाह ...... जाने कहां से दौड़ रही होती सरस्वती की गुप्त धारा - धारीदार पुष्ट होठों में छलकती कभी न सूखने वाली स्वर-लहरियां, खींच लेने वाली ठसक भरी मोहक मुस्कान..... ओजस्वी वाणी...... जैसे कह रहे हों और प्रोफेसर साहब ...... मै संकुचित हो उठता........फूर्ति से आगे बढ़ प्रणाम् निवेदन करता तो.... कभी वे हथेली पकड़ हाथ मिलाते या कंधांे पर अपने स्नेहिल हाथों को रख इतने प्यार से हाल-चाल पूछते कि एहसास नहीं होता मेरी कुल उम्र 55 बरस से भी पहले स्वाधीनता आंदोलनों के सिपाही और महानतम् सामाजिक - मानवीय जीवन मूल्यों के पुरस्कर्ताओं में अग्रगण्य रहे हैं। नई पीढ़ी को इतनी ऊंचाई में प्रतिष्ठित कर उसके भीतर की समस्त सम्भावनाओं को दुलारने- उभारने की ऐसी उदार भावना आज के आत्मकेन्द्रित वैष्विक बाजार में भला कहाँ देखने को मिलती है।
दो-तीन बरसों से मैं उनसे मिलना चाह रहा था, नहीं मिल सका........... इसका अफसोस जीवन भर सालता रहेगा। आज उनके बारे मे जो कुछ सोचा जा रहा है, क्या बहुत पहले नहीं सोचा-लिखा जा सकता था? जीवन - संघर्ष के घने अंधेरे को चीर-फाड़कर पूनम की दूध धूली चांदनी रातों मंे जीवन चक्र पूर्ण कर वह शारदेय शीतल-चन्द्र अनंत आकाष की प्रभाती रष्मिवलयों मंे अब गुप्त एहसास दिलाता रहेगा अपने होने का.... ऐसे थे पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी।
बहरहाल ... बहुत पहले की एक साध थी - बहुआयामी व्यक्तित्व से महिमामण्डित श्रध्देय श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता के सामाजिक, राजनैतिक, संास्कृतिक प्रदेय को राष्ट्रीय-पृष्ठभूमि पर रेखंाकित होना चाहिए। उनके जीवन-काल में यह संभव न हो सका। होता भी कैसे- वे आत्मष्लाघा, भांैडा प्रदर्षन से कोसों दूर, कर्म के पथ पर संघर्षरत जननायक थे। प्रचार-प्रसार और छपास की भूख उन्हेें कभी छू न सकी। इसलिये यह बात सुकून दिलाती है कि उनके ज्येष्ठपुत्र डाॅ. सर्वेष षरण गुप्ता द्वारा यषस्वी काया के अस्थि-विसर्जन हेतु इलाहाबाद त्रिवेणी संगम प्रस्थित होने के बाद पैतृक गाँव लोई्रग के कर्मठ जनसेवी श्री सरोज गुप्ता द्वारा लिखित ‘‘रायगढ़ पूर्वांचल के पुरोधा श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता’’, स्मरणिका का प्रकाषन हो रहा है। स्वनाम धन्य बहुआयामी व्यक्तित्व सम्पन्न पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी के प्रेरक प्रसंगों को उजागर करने के उद्देष्य से ब्रिटिषकालीन राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता को झेलते हुए स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन-मूल्यों के उन्नयन की दिषा में समर्पित अक्षांषों को उभारा गया है। उनके स्नेहभाजक इस पुस्तक के लेखक श्री सरोज गुप्ता मूलतः ग्राम्य जन- संस्कृति की राजनैतिक - धारा के नैतृत्वकत्र्ता हैं, उनकी मार्मिक भावनाओं का यह अंष उल्लेखनीय है -
‘‘पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता ने महात्मागाँधी के ग्रामोदय की आस्था, नेहरु की उदारता, षास्त्री की सौम्यता, जयप्रकाष की निर्भीकता, लोहिया की कर्मण्यता, विनोबा की साधुता का अपने जीवन में अनुषरण किया ’’। वे लोकतन्त्र के हिमायती थे। गाँव में अपने विचारों को, अपने सिध्दान्तों को लोगों पर नहीं थोपते थे बल्कि लोगों का दिल जीतकर समझाबुझाकर कार्य करने वाले थे।
मनुष्यता के पर्याय कीर्तिषेष श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता छत्तीसगढ़ एवं रायगढ़ जिले के ग्राम्याचंलों मंे ‘‘पुरनो गौंटिया’’ के नाम से सर्वविख्यात थे; किसी पोस्टर-पम्पलेट के मोहताज बिल्कुल नहीं। उनके सर्वथा सुयोग्य कनिष्ठ पुत्र इंजिनियर श्री विक्रम गुप्ता के सद्प्रयासों से यह पुस्तक रुपाकार ग्रहण कर रही है यह मेरे लिये बहुत सुकून की बात है।
डाॅ. मीनकेतन प्रधान
शासकीय किरोड़ीमल कला विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय रायगढ़

सत्यनारायण पूजा

Bhante Budh_ 🎈ब्रामण की पोल खोल ???
गाँव में सत्य नारायण की पूजा बहुत होती थी।
🎈 हमने पूजा की पोल खोलने की ठानी।
मैंने एक मित्र को प्लानिंग के साथ पूजा में बिठाया। पंडितजी ने गोबर के गणेश बनाकर मित्र को कहा कि गणेशजी पर पानी प्राछन्न करो।
🎈 मेरे मित्र ने कहा कि यह तो गाय का गोबर है लेकिन आप गणेश कह रहे हैं। यह गलत है।
⛳ पंडितजी ने कहा मान लो गणेशजी हैं।
🎈मित्र ने कहा कैसे मान ले ?❓
⛳पंडित जी ने कहा अरे भाई मै कहता हूँ मान लो।
🎈 मित्र ने कहा ठीक है। पूजा शुरू हुई । पूजा में पंडितजी ने तमाम उदहारण देकर बताया की जिसने सत्य नारायण की पूजा की उसे लाभ हुआ जिसने नहीं सुनी उसे नुकसान हुआ।
🎈 मेरे मित्र ने कहा पंडित जी आपने बताया जिसने सुनी उसे फायदा हुआ, जिसने नहीं सुनी उसे नुकसान हुआ लेकिन वह कथा/मन्त्र क्या है।
⛳पंडितजी निरुत्तर।
खैर कथा समाप्त होने के बाद मेरे
🎈मित्र ने उसी गोबर गणेश को उठाया और उसे गोल-गोल करके पेड़ा (मिठाई) का आकार देकर ,,,,,, पंडित जी से कहा यह लो पंडितजी प्रसाद के रूप में पेड़ा खाओ।
⛳पंडितजी ने कहा यह तो गोबर है इसे कैसे खाऊ।
🎈 मित्र ने कहा मान लो पेड़ा है।
⛳पंडितजी ने कहा ऐसे कैसे मान लूँ।
🎈 मित्र ने कहा मै कह रहा हूँ मान लो।
⛳पंडितजी ने कहा क्यों ?
🎈मित्र ने कहा आपने मुझे गोबर को गणेश मानने के लिए कहा, मैंने मान लिया, फिर आप क्यों नहीं मानोंगे।
⛳ पंडितजी की सिट्टी पिट्टी गुम। थैला लेकर भागने लगे।
हम लोगों ने उनकी साईकिल पकड़ी और कहा ठीक है यह नहीं खाओगे तो जो प्रसाद (गुड चना की दाल) बना है उसे तो खा लो।
⛳पंडितजी ने थैली देकर कहा कि इसमें दे दो। हम लोगों ने कहा कि प्रसाद मेरे साथ आप भी खाओ। उन्होंने नही खाया और पूछने पर कहा कि मै "आपके घर का प्रसाद " नही खा सकता।
🎈हमने पूछा क्यों ? वही उत्तर आप नीच जाति के हो। फिर मैंने पूंछा अभी आपने कथा में कहा था कि जिसने प्रसाद का तिरस्कार किया उसका सर्वनाश हो गया था, लेकिन आप ही प्रसाद का तिरस्कार कर रहे हैं।
हम लोगो को यहाँ मुर्ख बनाने आते हो क्या ?❓
⛳ पंडितजी साईकिल छोडकर भागने लगे। हमने पूंछा अच्छा यह तो बताते जाओ की जो हर बार बचा हुआ प्रसाद ले जाते थे उसका क्या करते थे ?❓
⛳पंडितजी यह कहते हुए भाग गए कि वह प्रसाद मेरे जानवर खाते हैं।
साथियों मेरा अनुरोध है किसी बात को मानने से पहले जानो। जो प्रसाद आप खाते हो , वाही प्रसाद उनके जानवर खाते हैं अर्थात आपकी गिनती उनकी निगाह में जानवरों के समान है। मानसिक गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ दो। उनकी निगाह में जानवरों के समान है।
सोंचों और सत्य नारायण कथा सुनना बंद करो।
मानसिक गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ द

बोलो भारत की जय

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

जन गण मन की बात 94

https://youtu.be/Zu2lJoGPWDI

छद्म विज्ञान

Sharad Kokas
छद्मविज्ञान किसे कहते हैं :- छद्मविज्ञान या pseudoscience यह संप्रत्यय उस क्रियाकलाप या विधि के लिए प्रयुक्त होता है जो विधि वैज्ञानिक होने का आभास उत्पन्न करती है किन्तु सम्यक वैज्ञानिक विधि का अनुसरण नहीं करती । सम्यक वैज्ञानिक विधि वह होती है जो कार्य कारण सम्बन्ध पर आधारित होती है एवं जिसके लिए निरंतर प्रयोग किये जाते हैं । छद्मविज्ञानी जैसा शब्द उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो बिना किसी आधार के किसी भी बात को वैज्ञानिक कह देते हैं । जैसे आजकल सोशल मीडिया पर आपने देखा होगा , डायबिटीज़ की बहुत सारी दवाएं बताई जा रही हैं ,एक विधि में तो गेंहू को दस मिनट उबालकर अंकुर निकालने के लिए कहा गया है । कोई भी यह जान सकता है कि उबलने के बाद अंकुर नहीं निकलते । इस तरह की सोच वाले व्यक्ति को हम यदि मानसिक रूप से विकलांग कहें तो क्या हर्ज़ है ? वैसे मनुष्य के मस्तिष्क की विकलांगता का सिलसिला बहुत पुराना नहीं है लेकिन विज्ञान और छद्मविज्ञान को एक मान लेने के कारण सबसे अधिक नुकसान यह हुआ कि हमने विश्वास और अन्ध विश्वास मे अंतर करना छोड़ दिया ।
बहरहाल ऐसा होने के फलस्वरूप ऐसी अनेक मान्यताओं ने हमारे जीवन में अपना स्थान मज़बूत कर लिया जिनका वास्तविकताओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। मानव जीवन के प्रारम्भिक दौर में जब मनुष्य जन्म ,मृत्यु और प्रकृति के रहस्यों से नावाकिफ था ,बीमारियाँ और प्राकृतिक विपदायें उसे घेर लेती थीं और वह असमय ही काल के गाल में समा जाता था । कार्य और कारण का सम्बन्ध स्थापित कर पाने की क्षमता उसमें नहीं थी फलस्वरूप अपने जीवन में जन्म ,मृत्यु से लेकर भूख ,बीमारी और शिकार प्राप्त करने की स्थितियों में वह किसी अज्ञात शक्ति की कल्पना करने लगा । उसने अपने विवेकानुसार जीवन को सुरक्षित रूप से संचालित करने के लिए अनेक मान्यताएँ गढ़ लीं ।
यह प्रारंभिक मानव हर घटना को अत्यंत आश्चर्य भाव से देखता था तथा हर आश्चर्य के पीछे उसे किसी अज्ञात शक्ति का भास होता था । वह जिसका शिकार करता या जिस पेड़ से फल या कंदमूल प्राप्त करता उसे भी अपना आराध्य मानने लगा । उसने यह भी माना कि यह पशु- पक्षी,पेड़ ,पर्वत या नदी उसके पूर्वज हैं और इन्हीं से उसके वंश की उत्पत्ति हुई है । इन्हें ही हम ‘टोटेम’ कहते हैं । जैसे बंगाल के संथाली कबीले के लोग अपना टोटेम जंगली हंस या बतख को मानते हैं और अपने पूर्वजों को हंस के अंडे से उत्पन्न मानते हैं । जिस पेड़ से उन्हें फल मिलते थे या जिस जानवर का वे मांस खाते थे वे भी उनके टोटेम थे । कहीं कहीं पर टोटेम जीवों का मांस खाना या टोटेम पेड़ों के फल खाना सही माना जाता था इसलिए कि वे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे इसके विपरीत जहाँ इनकी संख्या नगण्य थी वहां इनका सेवन निषिद्ध था । आज भी कई घरों में कुछ चीजें या जीव खाने की मनाही होती है । सांप बिच्छू भी कुछ कबीलों के टोटेम थे इसलिए कि या तो वे उनके लिए संहारक थे अथवा उनकी रक्षा करते थे । यह टोटेम वाद आदिम अर्थव्यवस्था में धर्म का ही एक रूप था ।
शरद कोकास

जय संविधान

Viddya D Verma > ‎आओ तर्क करें
*पूरी रामायण और महाभारत 3-3 बार पढ़ा और यही समझा की।*
*1-जिस देश के महापुरुष ने छोटी सी बात पर स्त्री के नाक काट दिए थे वहां के समाज में तेजाब फेकना कौन सी बड़ी बात है।*
*2-जिस देश के महापुरुष ने केवल इस बात पे एक शुद्र की हत्या कर दी थी की उसने यज्ञ किया था वहाँ शूद्रों को मन्दिर में जाने से रोकना कौन सी बड़ी बात है।*
*3-पाँच पाँच पतियों के होते हुए अगर स्त्री का चिरहरण पुरे सभा के बिच में हो सकता है वहाँ के समाज में बलात्कार और छेड़छाड़ तो मामूली बात होगी*
*4-जहाँ स्त्री को ही हर बार अग्निपरीक्षा देनी पड़ी हो वहां के समाज में पुरुष के सामने स्त्री की कोई औकात नही ये कौन सी बड़ी बात है।*
*5-जहां देवता ही बलात्कार करता हो और दंड भुगतना पड़ता हो स्त्री को उस समाज में स्त्री हमेशा प्रताड़ित हो कौन सी बड़ी बात है (अहिल्याव् गौतम )*
*6-जहाँ गुरु ने सिर्फ इस बात पे शिष्य का अंगूठा काट लिया हो की वह शुद्र है वहाँ इनके पढने से रोका जाये कौन बड़ी बात है*
*एक और बड़ी बात------*
*दोनों ग्रन्थों में कोई भी normal तरीके से नही पैदा हुआ है कोई आम से तो कोई सूर्य से तो कोई मछली से पता नही कहाँ कहाँ से.....और हम विश्वास करते हैं ।*
*देश को आगे बढाना है संविधान पढो*
*संविधान पढ़ने से सबकुछ अपने से ठीक होना चालू हो जायेगा*

*"सारी समस्या का एक समाधान संविधान का सच्चा ज्ञान"*
*जय संविधान*

अफवाह

Sobran Kabir Yadav
चोटी कटवा, मंकी मैन , गणेश की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह के माध्यम से एक धर्मांध वर्ग अपने स्वार्थ के लिए ये चेक करता हैं कि जनता में वैज्ञानिक चेतना का कितना विकास हुआ।
और लोगों की मूर्खता के प्रदर्शन से हर बार बेहतर परिणाम मिले।।
वे ये भी चेक करता है कि अफवाह फैलाने की उसकी काबलियत कितनी ठीक है ?
कहते हैं यह सब आर एस एस करता है।

पवित्रता

Amita Ambedkar
"न नग्न रहने से, न सिर मुंडवाने से, न जटाएं रखने से, न भभूत लगाने से, न पूजापाठ से, न कलाई में धागा बाधने से, न नदियो मे स्नान करने से और न ईश्वर या किसी देवी देवता का नाम रटने से और न ही कोई कर्मकांड से कोई मनुष्य पवित्र नहीँ हो जाता......!
जिसमे सत्य है, सदाचार है, शीलवान है, वही मनुष्य पवित्र है.......!
"न जाति से, न वंश से, न जन्म, से कोई मनुष्य अपवित्र नही हो जाता !
जिसमें सत्य नही, सदाचार नहीं शीलवान नहीं, वही मनुष्य अपवित्र है !"
तथागत गौतम बुध्द

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

सुनी सुनाई बात

सब सुनी सुनाई,  पढ़ी हुई बात पर भरोसा कर लेते हैं । विरोध होते हैं जो सोच विचार कर मानते हैं ।

मैत्री दिवस मनाएं

संजय कुमार
आओ मित्रता दिवस मनाये
जो संग है उन्हें संभाले
जो रूठे हैं उन्हें मनाये
गैरो के कुछ करीब जाए
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम
सबको सबके करीब लाये
धर्म मजहब की नफरत भरी
ऊँची दीवारो को कमजोर बनाये
फाड़ दो पन्ने अपनी किताबो के
जो मानव से मानवता का क़त्ल कराये
तोड़ तो खुद ही अपने बुतख़ानो को
जो इंसानो को इंसानो से अछूत बनाये
चलो काल्पनिक ईश्वर की छाप मिटाये
प्रेम ,नैतिकता, मानवता जीवन में लाये
पाखंड अन्धविश्वास समाज से हटाये
आओ नास्तिकता की तरफ कदम बढ़ाये
- केशव (संजय)

आओ तर्क करें

Rattan Lal Gottra > ‎आओ तर्क करें
अब करो तर्क जिसे करना है ।
इन्सान ने ही भगवान का निर्माण किया है इसके तार्किक सबूत निम्नलिखित है
1.मनुष्य के अलावा दुनिया का एक भी प्राणी भगवान को नही मानता।
2.जहाँ इन्सान नही पहुँचा वहाँ एक भी मंदिर मस्जिद या चर्च नही मिला।
3.अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग देवता है।इसका मतलब इन्सान को जैसी कल्पना सुझी वैसा भगवान बनाया गया।
4.दुनिया मे अनेक धर्म पंथ और उनके अपने-अपने देवता है। इसका अर्थ भगवान भी एक नही।
5.दिन प्रतिदिन नये नये भगवान तैयार हो रहे है।
6.अलग-अलग प्रार्थनायें है।
7. माना तो भगवान नही तो पत्थर यह कहावत ऐसे ही नही बनी।
8.दुनिया मे देवताओं के अलग-अलग आकार और उनको प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग पुजा।
9.अभी तक किसी इन्सान को भगवान मिलने के कोई प्रमाण नही है।
10.भगवान को मानने वाला और नही मानने वाला भी समान जिंदगी जीता है।
11भगवान किसी का भी भला या बुरा नही कर सकता।
12.भगवान भ्रष्टाचार अन्याय चोरी बलात्कार आतंकवाद अराजकता रोक नही सकता।
13.छोटे मासुम बच्चों पर बंदुक से गोलियाॅ दागने वालों के हाथ भगवान नही पकड सकता।
14.मंदिर मठ आश्रम प्रार्थना स्थल जहाॅ माना जाता है कि भगवान का वास होता है वहाॅ भी बच्चे महिलाए सुरक्षित नही है।
15.मंदिर मस्जिद चर्च को गिराते समय एक भी भगवान ने सामनेआकर विरोध नही किया।
16.बिना अभ्यास किये एक भी छात्र को भगवान ने पास किया हो ऐसा एक भी उदाहरण आज तक सुनने को नही मिला।
17.बहुत सारे भगवान ऐसे है जिनको 25 साल पहले कोई नही जानता था। वह अब प्रख्यात भगवान हो गये है।
18.खुद को भगवान समझने वाले अब जेल की हवा खा रहे है।
19.दुनिया मे करोडों लोग भगवान को नही मानते फिर भी वह सुख चैन से रह रहे है।
20.हिन्दु अल्लाह को नही मानते। मुस्लिम भगवान को नही मानते। इसाई भगवान और अल्लाह को नही मानते। हिन्दु मुस्लिम गाॅड को नही मानते। फिर भी भगवानों ने एक दुसरेको नही पुछा कि ऐसा क्यो ?
21.एक धर्म कहता है कि भगवान का आकार नही।दुसरा भगवान को आकार देकर फेन्सी कपडे पहनाता है।तीसरा अलग ही बताता है।मतलबसच क्या है ?
22.भगवान है तो लोगों मे उसका डर क्यों नही ?
23.मांस भक्षण करने वाला भी जी रहा है और नही करने वाला भी जी रहा है।और जो दोनो खाता है वह भी जी रहा है।
23रूस, अमेरिका भगवान को नही मानते फिर भी वे महासत्ता है।
24. जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो फिर चार वर्ण की व्यवस्था सिर्फ भारत में क्यों पाई जाती है? अन्य देशों में क्यों नही पाई जाती है ? जब पिछले जन्म के कर्म के आधार पर जातियों का निर्माण किया गया है तो भारतीय जातियां अन्य देशों में क्यों नहीं पायी जाती है ?
25. जब वेद ईश्वर वाणी है तो भारत के अलावा अन्य देशों में वेद क्यों नहीं हैं ? तथा वेद सिर्फ ब्राह्मणों की भाषा संस्कृत में क्यों है अन्य भाषाओं जैसे बंगाली, उड़िया, उर्दू, अंग्रेजी, मलयालम,तेलगु, फारसी, आदि में क्यों नहीं है ?
बाबा साहब का मिशन अधूरा हमसब मिलकर करेंगे पूरा ।
क्या आप हमारे साथ है ?

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सोमवार, 31 जुलाई 2017

तर्क

Rattan Lal Gottra -

हमें मत बांटो

Sunil Vipassvi
ये पेड़ ये पत्ते ये शाखे भी परेशान हो जाते ,
अगर परिंदे भी हिन्दू और मुस्लमान हो जाते|
सूखे मेवे भी यह देख कर परेशान हो जाये ,
ना जाने कब नरिायल हिन्दू, खजूर मुसलमान हो जाये|
ना मंदिर को जानते है ,ना मस्जिद को जानते है ,,
जो भूखे पेट सोते है ,सिर्फ निवालों को जानते है |
मेरा यही अंदाज़ ज़माने को खलता है ,
क्यों मेरा चिराग़ हवा के खिलाफ जलता है |
मई अमनपसंद हुँ, मेरे शहर में दंगे रहने दो |
लाल और हरे में मत बांटो,
मेरे छत पर तिरंगा रहने दो
हम इंसान है हमें मत बांटो||

रविवार, 30 जुलाई 2017

गौमाता

हमारे देश में गौमाता की पूजा करते हैं लेकिन शहरों में रोज सुबह दाना पानी देकर दूध निकालने के बाद उन माताओं को भगा देते हैं। सड़क किनारे वे कूड़ा करकट खाते हैं, रात को बीच सड़क पर आराम फरमाते हैं।

भगवान से प्रेम?

Saurabh Varshney

आस्था का प्रभाव

Narendra Tomar > ‎नास्तिक The Atheist
लोगों को आस्था इस कदर बुद्धिहीन बना देती है कि अपने बच्चों के विवाह के निमंत्रण पत्रों पर लोग रामसीता अथवा राधाकृष्ण की तस्वीरें छाप देते है । क्या उनको यह नहीं मालूम पति पत्नी के रूप में राम और सीता का विवाह पूरी तरह से असफल था : जीवन के बहुत बडे भाग में उनको अलग अलग ही रहना पडा था और अंत में तो सीता को पृथ्‍वी में समा कर आत्म हत्या ही करनी पडी थी; और राधा और कृष्ण की तो शादी ही नहीं हुई थी। कहा यह भी गया है कि कृष्‍ण की हजारों रानियां थीं।
8 hrs ·
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क्या यही धर्म है

Ram Bahadur Pandey
क्या यही धर्म है ?
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दुनिया में बहुत से ऐसे देश हैं, देश में बहुत से ऐसे समाज और परिवार भी हैं जहां लोग धर्म और ईश्वर को न मानते हूए भी अच्छे ढंग से जीवन निर्वाह कर रहे हैं।
उदाहरण स्वरूप रुस को ही ले लीजिए जहाँ लोग धर्म और ईश्वर को तो नहीं मानते लेकिन नीति नियमों के अनुसार वे अपने प्राणों तक अर्पण करने को तत्पर रहते हैं। विचारणीय है कि ईश्वर अल्लाह व प्रचलित धार्मिक रीति रिवाजों के लिए प्राणों तक न्यौछावर करने वाले देश पाकिस्तान और हिन्दुस्तान से रूस किस क्षेत्र में आगे नही है? सच्चाई तो यह है कि विना धर्म और ईश्वर की मान्यता के देश , समाज और परिवार तो चल सकता है लेकिन जिस दिन परिवार में ,समाज में व देश में नैतिकता का विल्कुल ह्रास हो जायगा उस दिन उस परिवार ,समाज व देश में घड़ी भर शान्ति से रह पाना नामुमकिन हो जायगा।
दुनिया के सारे कथित धर्मों व धर्माचार्यों ने अपने अपने धर्मों के प्रचार प्रसार ,धर्म और धर्म गुरुओं का वर्चस्व बनाए रखने के लिए धर्म की आड़ में सत्ता की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए जितना अत्याचार किया है वह मानवता का सिर शर्म से झुका देने के लिए काफी है। इतिहास गवाह है कि व्यभिचार दुराचार के लिए कुख्यात जुआलय ,मदिरालय व वेश्यालयों में भी उतनी हत्याऐं नहीं हुई हैं जितनी धर्म व मंदिर ,मस्जिद और गिरजाघरों के नाम पर हुई हैं।
8 hrs ·
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धर्म का update

Rattan Lal Gottra
आप लंगोट से जौकी पर आ गये। पायजामे से पतलून पर आ गये। नाड़े से बेल्ट पर आ गये। खड़ाऊँ से बूट पर आ गये। कलम से कीबोर्ड पर आ गये। पगडंडियों से एक्सप्रेस वे पर आ गये। चूल्हे से इंडक्शन कुकर पर आ गये। जंगलो से अपार्टमेंट तक आ गये। हल से ट्रैक्टर पर आ गये। पैदल से लक्ज़री जहाज़ों पर आ गये। दीये-मशाल से एलईडी पर आ गये। तीर-कमान और गदा से ऑटोमैटिक बंदूकों और मिसाइलों पर आ गये। आप पाँच हज़ार ईसापूर्व और पाँचवी-छठवीं शताब्दी से इक्कीसवी शताब्दी में आ गये।
आप लगातार अपडेट होते रहे हैं।
.
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आपका धर्म कब अपडेट होगा?
आपकी आस्था कब अपडेट होगी?
आपका ईश्वर कब अपडेट होगा?
आपकी सोच कब अपडेट होगी?
आपके धर्म की किताबें कब अपडेट होंगी॥
ज्ञान का दीपक जलाओ ॥
अंधभक्ति मिटाओ ॥ 🙏🏽

मधुशाला

मधुशाला_ धर्मवीर भारती
धर्मग्रंथ सब जला चुकी है जिसके अंतर की ज्वाला‚
मंदिर‚ मस्जिद‚ गिरजे सबको तोड़ चला जो मतवाला|
पंडित‚ मोमिन‚ पाादरियों केफंदे को जो काट चुका|
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।