गुरुवार, 8 जून 2017

आर एस एस


Radheshyam Mahaseth _
बतौर गृह मंत्री सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस ( RSS) को प्रतिबंधित कर दिया | गोलवलकर सहित तमाम संघियों को जेल में ठूस दिया | आगे काफी समय तक प्रतिबंध लगा रहा | बाद में गोलवलकर के गिरगिराने और काफी अनुनय -विनय के पश्चात पटेल ने प्रतिबंध तो हटाया लेकिन इस शर्त के साथ कि संघ भविष्य में किसी राजनैतिक गतिविधियों में शामिल नही होगा सिर्फ सांस्कृतिक -सामाजिक कार्य ही करेगा | दरअसल संघ के उन्मादी -मनुवादी जिहादी मानसिकता का भान सरदार साहब को बखूबी हो चला था ,इसलिए उन्हें शक था कि अगर यह भड़काऊ -उन्मादी संगठन कभी राजनीति में आ गया तो देश में दंगा -हिंसा -हत्या की बाढ़ होगी और फिर मुल्क की अखंडता को सुरक्षित रखना नामुमकिन हो जाएगा | आज इस बात को लेकर बहस चल रही है कि क्या आरएसएस इस देश में कुछ वैसी ही मानसिकता को सींचने का काम कर रहा जैसा कि दुनिया के तमाम आतंकवादी संगठन करते है | इस बात पर बहस की गुंजाइश है और लोग अपने हवाले से तथ्यों और तर्कों के साथ आ भी रहे है | कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में | पिछले लगभग साल भर से मैं खुद निजी तौर से संघ की गतिविधियों को समझने की कोशिश में लगा हूँ | इस दौरान हमने गोलवलकर लिखित पुस्तकों सहित संघ से जुड़े कई किताबों और पत्रिकाओं का अध्ययन किया , संघ के विभिन्न शाखाओं -कार्यालयों में जा कर जुड़े लोगो -पदाधिकारियों से मिला और तमाम मुद्दों पर उनकी राय जानी | सभी चीजों को जानने समझने के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा उसका लब्बोलुआब यही कि कट्टरता ,मनुवादी व्यवस्था और मुस्लिम विरोध ,यह तीन वह केंद्र बिंदु है जिसके इर्दगिर्द संघ की सारी गतिविधियाँ संचालित होती है | छोटे -छोटे बच्चे को दिमाग में मुसलमानों के खिलाफ जहर बोया जाता है , मनु की रचनाओं और विचारों को धर्म की चासनी में लपेट उस पुरातन मनुवादी युग को इस रूप में दिखाया जाता है मानों वह कोई सभ्यता का स्वर्णकाल रहा हो और हर बात में मुसलमानों के आगमन से पूर्व के भारत को ऐसे पेश किया जाता कि तमाम जातियों और वर्णों के होते हुए भी आपस में कोई वैर -भाव नही था ,हिन्दुस्तान में सब संपन्न और खुशहाल थे , आज जो भी समस्या है सबकी मूल वजह मुस्लिम शासन ही है | इस तरह के बिष उन बच्चों में भरा जाता और दिन -रात सुबह -शाम कट्टरता की जो घुट्टी पिलाई जाती वह किसी आतंकवादी को मिलने वाले कट्टर जिहादी प्रशिक्षण जैसा ही होता है | हालांकि संघ से जुड़े कई लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से माना कि संघ को अब अपने उस पुराने मोड से बाहर आना होगा क्योकिं आज के इस हिन्दुस्तान में उन पुरानी बातों की प्रसंगिकता नही रह गई | यानी संघ के भीतर भी कुछ प्रगतिशील लोग है लेकिन उनकी चलती नही जब तक कि वह मोदी जैसी किसी मजबूत स्थिति में न पहुँच जाए |

मातृ/पितृ सत्ता


संजय कुमार

मनुष्य के शिकारी बनने से पहले स्त्री और पुरुष के आधिकर बराबर थे क्यों की उस समय तक मुख्य जरूरत भोजन थी जो की कंदमूल ,फल आदि एकत्रित करने से पूरी हो जाती थी । संचय करने की प्रवृति नहीं थी अतः वर्चस्व को लेके संघर्ष नगण्य था ।

भालों के प्रयोग आ जाने के बाद पुरुष द्वारा शिकार करना आसान हो गया। चुकी शिकार के पीछे भागना ,पकड़ना आदि कार्यो में शारीरिक ऊर्जा अधिक लगती थी जो की पुरुष के शारीरिक बनावट के अनुरूप थी । स्त्रियों के साथ दूसरी समस्या उनका गर्भवती होना भी थी,गर्भवती अवस्था में स्त्री शिकार नहीं कर सकती थी अतः वह महीनो शिकार करना छोड़ देती ।

शिकार में कम सक्रियता के कारण शिकार करना मुख्य रूप से पुरुषो का पेशा हो गया , शिकार के बाद पशुपालन और चरवाही का उदय हुआ जो की पशुओं से ही जुड़े थे जिससे पूर्ण रूप से आर्थिक सत्ता पुरुषो के हाथ में आ गई और इस प्रकार पितृसत्तामक पक्ष उभर के सामने आया।

जब स्त्रियों ने कृषि की खोज की तो स्थति पलटी और आर्थिक सत्ता स्त्रियों के पक्ष में आ गई । तब मातृसत्ता के उदय से पितृसत्तामक या तो खत्म हो गया या निष्क्रिय प्रभाव में आ गया। आज भी जंहा कृषि प्रमुख राज्य है जैसे बंगाल / असम उनमे मातृसत्तामक पक्ष की मजबूती आसानी से देखी जा सकती है ।

किन्तु हल की खोज ने फिर से सत्ता पलट दी और कृषि पुरुषो के हाथ आ गई । हल और अन्य कृषि औजारों की खोज ने कृषि को सरल और अधिक लाभकारी बना दिया जिससे पुरुषो का अधिक से अधिक कृषि में भाग लेना जारी रहा , अतः वह वक्त भी आ गया जब कृषि पर पूर्ण रूप से पुरुष का कब्ज़ा हो गया और मातृसत्तत्मक पक्ष को खत्म कर पितृसत्तामक पक्ष कायम हो गया।

आर्यो की मूल प्रवृति पशु चरवाही ही रही , ईरान में कृषि इतनी उन्नत नहीं थी अतः वँहा पशुचारवाही ही मूल आर्थिक संपन्नता का आधार बनी रही।
आप ऋग्वेद में देखेंगे कि इसमें मूल रूप से पशुधन की ही कामना की गई है , इंद्र से अनार्यो से उनके पशु( गाय आदि) छीनने की स्तुतियाँ हैं।

ब्राह्मणिक ग्रन्थो में कृषि को इतना घृणित कार्य माना गया कि इसे शूद्रों का कार्य घोषित कर दिया गया । ब्राह्मण के लिए हल की मुठिया पकड़ना भी पाप निर्धारित कर दिया गया ।

संभवतः स्त्री और शूद्र को इसी लिए एक श्रेणी में रखा गया ...

क्रमशः

- संजय

मंगलवार, 6 जून 2017

कसम खाई है

Sneha Singh_कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है

आस्था और बुद्धि में ऋणात्मक सहसंबंध

Sneha Singh _ये कुछ कुछ अर्कमडीज़ के सिद्धान्त की तरह है । जितनी आस्था दिमाग में घुसेगी उतनी बुद्धि दिमाग से निकल जाएगी ।

कथा सार

Santosh Vishwakarma

पंडित जी ने एक कथा सुनाई।।।।।
"कथा का सार था इंसान साथ कुछ नहीं ले जाता"
कथा खत्म होने के बाद एक शंखनाद और सारा माल समेट पंडित जी चलते बने।।।।

शनिवार, 3 जून 2017

ढकोसला

Santosh Sharma

धार्मिक कर्मकांडों का ढकोसला है श्राद्ध कर्म

संतोष शर्मा

मृत्यु के बाद मृत्य आत्मा की मुक्ति के नाम पर पाखंडी पंडितों और पुरोहितों द्वारा विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों के जरिये अपनी उल्लू सीधा कर रहे हैं।

इंसान की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा की भी मौत हो जाती है। किन्तु पाखंडी पुरोहित और पंडित द्वारा मृत आत्मा को सदगति प्राप्त कर के नाम पर श्राद्ध जैसे कर्मकांडों को बनाया गया है। और इन कर्मकांडों के सहारे इन पाखंडों की दुकान आज भी चल रही है।

परन्तु मेरे जैसे युक्तिवादी इन कर्मकांडों को अन्धविश्वास बताकर उसे मानने से इंकार करता तो , उस व्यक्त ये पंडित या पुरोहित विभिन्न प्रकार से यह समझने या डराने का प्रयास किया करते हैं कि यदि मृत व्यक्ति का धार्मिक रीति-रिवाज के साथ दाह-संस्कार नहीं किया गया तो उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। आत्मा भटकती रहेगी।

किन्तु सच तो यह है कि किसी इंसान की मृत्यु के साथ ही उसकी आत्मा की भी मृत्यु हो जाती है। और मृत्य आत्मा के भटकने की बात एक कल्पना मात्र है।

वास्तव में धर्म और अंधविश्वास के नाम पर ठगी का धंधा चलने वाले इन पंडितों और पुरोहितों को यह पता है कि अगर लोग आत्मा , ईश्वर में विश्वास करना छोड़ दे तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी। दूसरों की खून-पसीने की कमाई पर हाथ मरने के मौका नहीं मिलेगा।

आज मुझ जैसे युक्तिवादीओं की वजह से मुफ्त की कमाई खाने वाले पंडितों और पुरोहितों की रातों की नींद उड़ने लगी हैं।

पौधा लगाएं


ममता गुप्ता ने वाट्सएप ग्रुप विचार मंच में भेजा है_
अपील 
आज लोगों को लग रहा है कि गर्मी बहुत लग रही है। 
पर कब तक AC का सहारा लेंगे, आज हिन्दुस्तान में 150 करोड़ पेड़ की जरूरत है।
अभी तो यह शुरुआत हैं। 45 से 50 डिग्री को 55 से 60 होने में देर नहीं लगेगी। अभी से समझ जाओ और पौधे लगाने की शुरुआत कर दें। क्योंकि एक पौधे को बड़ा होने मे 5 से 7 साल लग जाएगे। 
सब कुछ सरकार पर मत छोडिये, कुछ तो खुद किया करे। 
आज से नियम ले किसी भी शुभ अवसर पर कम से कम एक पौधा जरूर लगाएं और उसे अपनी पसंद का नाम दे एवं उनका ख्याल रखना। 
यकीन मानिए यह आपका एक अच्छा अनुभव होगा।,,,,,,,, आपका🙏🙏

अंधविश्वासों की खेती

PM Panda_
"अंधविश्वासों की खेती!"
********************
कल्पना करें कि यदि अंधविश्वास कोई फसल होती और मनुष्य के खाने के काम आती तो कितना मज़ा आता?
मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारा देश विश्व में सदैव प्रथम स्थान पर रखता और अग्रणी कहलाता।
अंधविश्वासों के बीज हमारे देश में प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। गाँव हो या शहर हर जगह इसकी उपस्थिति देखी जा सकती है।
पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ कोई बात नहीं दोनों अंधविश्वासों पर विश्वास करने में बराबर योग्यता रखते हैं।
हमारे देश में अंधविश्वासों की खेती करने के लिए न केवल उपयुक्त उर्वरा भूमि है वल्कि इसकी फसल को लहलहाने के लिए योग्य मजदूर और किसान भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं।
रेती से तेल निकालने से लेकर कोई भी कठिन कार्य अंधविश्वासों के सहारे किया जा सकता है!
हमारे अंधविश्वासी अपने हुनर में इतने माहिर हैं कि वे मूर्तियों के आंख से आँसू निकलवा सकते हैं। यही नहीं मूर्तियों को दूध पिलाने में भी सिद्ध हस्त हैं।
आज से हजारों साल पहले समुद्र का मंथन किया गया था।[क्या आज की तारीख में हम समुद्र का मंथन कर सकते हैं?बिलकुल नहीं]
समुद्र मंथन से क्या क्या पाया वह आपने जरूर सुना होगा।
एक चीज का जिक्र करूँगा वह है""अमृत"
उस अमृत को पता नहीं कौन कौन पी गये?लेकिन जिसने भी पिया था वह सामने क्यों नहीं आता है?
खैर;अंधविश्वासों की खेती तो बिना कुछ किये हो ही रही है देखते हैं यह खेती कब तक होती रहेगी।
[पद्ममुख पंडा महापल्ली]

शुक्रवार, 2 जून 2017

प्रेम बर्ताव


Ravi Kumar > ‎तर्कशील समाज

एक हिन्दू के साथ बुरा बर्ताव हुआ।
सभी हिंदुओं को बुरा लगा ।
एक मुस्लिम के साथ बुरा बर्ताव हुआ।
सभी मुस्लिमों को बुरा लगा ।
ये कैसी मानसिकता?
हमारे दिल में दूसरे समुदाय के लिय प्रेम क्यों नही ।

गौमाता


Dinesh Aastik

आप गाय को माता मानते हैं, मुझे कोई आपत्ति नहीं। आपके पशु प्रेम का दिल से स्वागत है। पर भैंस, बकरी, मुर्गी आदि को भी कुछ मानिये। इनसे भी किसी तरह का रिस्ता जोड़िये। इनकी हत्या पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग कीजिये।

अंधविश्वास

Rattan Lal Gottra

मोर के आँसुओं से, 
ऐनटीना धारी पैदा होते हैं, 
मुख से, 
नाक से, 
कान से, 
भुजाओं से, 
उदर से,
जंघाओ से, 
पैरो से, 
ऐ चमत्कार दुनियाँ के किसी कोने में ,
कहीं नही हो सकते ऐसे अविष्कार...
सिर्फ और सिर्फ ,
ऐनटीनाधारी ही कर सकते हैं, 
ऐ बिना संभोग के ही, 
मोर के आँसुओ से ,
मोरनी को गर्भवती कर सकते हैं, 
रावण की दहाड से,
छःमहीने का मंदोदरी का, 
गर्भ गिरा,
मटके में रखा, 
जमी में दफन किया 
फिर सीता पैदा कर सकते हैं...!!
वही मंदोदरी को, 
मेंढकी से पैदा बता सकते हैं, 
हिरनी के साथ संभोग करते कश्यप ,
मानव पैदा कर सकते हैं, 
हनुमंत के, 
पसीने की एक बूँद से, 
मछली गर्भधारण करती, 
मकराध्वज पैदा कर सकते हैं, 
ऐ अपने ही पुत्र का, 
जिसे जानते भी नहीं, 
सिर काट देते हैं, 
पुत्रमोह में पागल, 
निरीह हाँथी के बछड़े का, 
सिर काटकर लगा सकते हैं, 
इतने ही बडे चमत्कारक हो, 
तो क्यो नहीं... 
जो सिर काटा था गनेश का, 
वही सिर लगा देते, 
या फिर बदलकर ,
गनेश का सिर ,
हाँथी के बच्चे के धड से जोड देते,
तो थोडी इज्जत बच जाती ,
ऐंटिनाधारियों सुने...! 
ऐ मैं नहीं तुम और तुम्हारे, 
तथाकथित धर्मग्रंथ बोलते हैं, 
तथा स्वयंभू बने तैतीस करोड, 
देवी, देवता न जाने ,
कहाँ कहाँ से पैदा हो जाते हैं, 
किस किस का रुप, 
कैसे कैसे रख लेते हैं, 
मसलन गाय के शरीर में, 
तैतीस करोड समा जाते हैं, 
और कोई जानवर नहीं मिला, 
कुछ नहीं मिला तो जानवरों को, 
बाँट लिया सवारी के लिए, 
पंक्षीयों को भी नहीं बक्शा, 
इमरत इकलावी....

अच्छा या खराब समय


Saleem Ahmed Wastik

वक्त या समय,,,,, कभी ख़राब नहीं होता,,,! 
जो समय आपके लिए ख़राब है,,, वही समय औरों के लिये अच्छा हो सकता है ! 
समय को अपने अनुकूल करने वाला ही मनुष्य है ! 
किसी ख़ुदा-भगवान के चक्कर में अपनी लाईफ़ मत खराब करें !!!!

मोर, गाय और मुर्खों के विज्ञान


Uday Singh

मोर और गाय पर अंधविश्वास जाने सही तथ्य -
=======================इस देश को क्या हो गया है ? जज से लेकर पढे लिखे लोग तक बेवकूफी की बात करने लगे है और फेसबुक पर बहस होने लगती है जबकि ऐसी चीजो पर बहस नही होनी चाहिए उसका पुरजोर खंडन कर देनी चाहिए ।
मोर सिर्फ आसू पीकर गर्भवती हो जाती है कि जानकारी के लिए मै एक प्रोफेसर डाक्टर अजय पांडेय को फोन किया जो zoology मे पीएचडी है ।पहले तो वह हसने लगे और हमे ही बोलने लगे कि आप डाक्टर होकर इस बात को क्यो पूछे ।मोर एक विकसित पक्षी है उसके शरीर की एनाटामी है फिजियोलॉजी है जनन अंग है ।विना sperm और ovum के संयोग से कोई गर्भवती कैसै होगा ।जो ऐसा कहता है बेवकूफ और पागल होगा और बेवकूफ पागलो की बात पर बहस नही करते । जब मैने कहा कि जज ने बोला है तो वे कहने लगे यार कोई काल्पनिक कहानी मे कह दिया होगा ।
×××××××××××××××××××××××
एक दुसरा अंधविश्वास खूब लिखा जा रहा है और भाजपा के विद्वान उसका खूब समर्थन कर रहे है कि गाय आक्सीजन लेती है और आक्सीजन देती है इसलिए पूजनीय है ।उस पर मेरे मित्र ने कहानी वैसै पागलो के कमरे मे दस गाय बांधकर कमरा बंद कर रात भर भक्त को सुला दो सुबह पता चल जायेगा कि आक्सीजन देती है कि कार्बन डाई आक्साईड देती है ।कोई जीव अगर आक्सीजन लेगा तो भोजन पचाने मे आक्सीजन खपत होगी और कार्बन डाई आक्साइड निकलेगी । यह भैस सुवर गदहा सबके लिए सत्य है ।पर कुछ लोग इतने भावुक है कि मान रहे है कि नही गाय आक्सीजन लेती है और छोडती भी है ।यह सोच एकदम वेवकूफी भरा है । 
इस समय मुरखो का जमाना है जरा बच कर रहे ।

गुरुवार, 1 जून 2017

झूठ

Dinesh Aastik

संसार के तीन बड़े झूठ, जिस पर धार्मिक मूर्ख आज भी यकीन करते हैं।

1. मुहम्मद साहब का चाँद के दो टुकड़े कर देना।
2. हनुमान का सूरज को निगल जाना।
3. ईसा महीस का पुनः जिन्दा हो जाना।

सच है धर्म मूर्खता और झूठ का संकलन है।

हमारे आविष्कार

सरकारी नौकरी-( Indian Government Jobs in Central/State Government)

एक अमेरिकन बोला भाई साहब बताइये अगर
आपका भारत महान है तो सँसार के इतने
आविष्कारों में आपके देश का क्या योगदान
है ??
हिन्दुस्तानी - अरे अमरीकन सुन !!
१. संसार की पहली फायर प्रूफ लेडी भारत में
हुई !! नाम था "होलिका" आग में
जलती नही थी !!
इसीलिए उस वक्त फायर ब्रिगेड
चलती नही थी!!
२. संसार की पहली वाटर प्रूफ बिल्डिँग
भारत
में हुई !! नाम था भगवान विष्णु
का"शेषनाग" !!
काम तो ऐसे जैसे "विशेषनाग" !!
३. दुनिया के पहले पत्रकार भारत में हुए !!
"नारदजी" जो किसी राजव्यवस्था से
नही डरते थे !! तीनों लोक की सनसनी खेज
रिपोर्टिँग करते थे !!
४. दुनिया के पहले कॉँमेन्टेटर"संज य" हुये,
जिन्होंने नया इतिहास बनाया !!महाभारत के
युद्ध का आँखो देखा हाल अँधे "ध्रतराष्ट"
को उन्ही ने सुनाया !!
५. दादागिरी करना भी दुनिया हमने
सिखाया क्योंकि वर्षो पहले हमारे"शनिदेव"
ने
ऐसा आतँक मचाया कि "हफ्ता"
वसूली का रिवाज
उन्ही के शिष्यो ने चलाया !! आज भी उनके
शिष्य
हर शनिवार को आते है ! उनका फोटो दिखाकर
हफ्ता ले जाते है !!
6-दुनिया का पहला Bodybuilder -अंजलि पुत्र हनुमान और दूसरा Bodybuilder - भीम 
तब तुमरा American Arnold पैदा भी नहीं हुआ था
अमेरिकन बोला दोस्त फालतू की बातें मत
बनाओ !
कोई ढ़ंग का आविष्कार हो तो बताओ !! जैसे
हमने
इँसान की किडनी बदल दी, बाईपास
सर्जरी कर
दी आदि !!
हिन्दुस्तानी बोला रे अमरीकन
सर्जरी का तो आइडिया ही दुनिया को हमने
दिया था !! तू ही बता "गणेशजी"
का ऑपरेशन
क्या तेरे बाप ने किया था !!
अमरीकन हडबडाया !! गुस्से मेँ बडबडाया!!
देखते ही देखते चलता फिरता नजर आया !!
तब से
पूरी दुनिया को हम पर मान है!!! दुनिया में
देश कितने ही हो पर सबमें मेरा "भारत" महान
है..

बुधवार, 31 मई 2017

ट्यूब वेल .. पानी कहां देगा


Natthu Ram Pradhan

.S@rose ne whatsapp group me bheja h-

पप्पु को खेत में टयूबवेल
लगवाना था !
सोचा कि
बाबा जी से पूछ लू कि पानी कहां होगा ?
.
बाबा जी ने सारे खेत में घूम कर एक कोने में हाथ
रख दिया और बोला कि यहां टयूबवेल लगा ले
और 1100 रु. ले लिये !
.
पप्पु बेचारा भुरभुरे स्वभाव का था !
.
बाबा जी से बोला:
मैं बहुत खुश हूं...आप मेरे घर खाना खाने आओ !
.
बाबा ने सोचा कि फंस गई सामी आज तो...
और हां कर दी !
.
पप्पु घर जा कर अपनी पत्नि से बोला," बाबा
जी
आयेंगे पकवान बना ले और एक कटोरी
में
नीचे देसी घी और उपर चावल डाल दिये !
.
पत्नि बोली कि घी तो उपर होता है!
.
पप्पु बोला कि आज तू घी नीचे रख !
.
बाबा जी आ गये और चावल वाली कटोरी देख
कर
बोले ," पप्पु बेटा इसमें घी तो है ही नहीं !
.
पप्पु ने चप्पल निकाल के एक धरी बाबा के
कान
के नीचे और बोला," आपको खेत में 250 फुट नीचे
का
पानी दिख गया ...कटोरी में 2 इंच नीचे घी नहीं दिखता ?

मंगलवार, 30 मई 2017

सरलता

यादें-
सरलता और ईमानदारी_
छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल जशपुर जिला में महादेवडांड़ के साप्ताहिक बाजार में मैं गुड़ खरीद  रहा था--
## क्या भाव है गुड़ का?
# पाँच रूपये किलो|
## कुछ कम नी करस का? ( कुछ कम नहीं करोगे क्या?)
# बाबू! ओ देख. ओहां चार रूपया मं देवथे| मोर ले उकर हर निकता हे| ( उधर चार रूपये में दे रहा है| मेरे से उसका गुड़ अच्छा है|)
## तो तुम महंगा क्यों बेंच रहे हो?
# का करिहं बाबू, मैं महंगा मं बिसाय हँ| (क्या करूँ बाबू, मैं महंगे दाम देकर खरीदा हूँ|)
**** मैं उसी से गुड़ लिया पाँच रूपये में|

मांसाहार


मांसाहार बंद हो

Sushobhit Saktawat

मांसभक्षियों का तर्क :

"सरकार यह कैसे तय करेगी कि हम क्या खाएं और क्या नहीं."

अत्यंत वीभत्स, धूर्ततापूर्ण तर्क!

यह ठीक वैसे ही है, जैसे हत्यारों द्वारा यह कहना कि सरकार कैसे तय करेगी कि हम किसको मारें और किसको नहीं. या बलात्कारियों द्वारा यह कहना कि यह सरकार कैसे तय करेगी कि हम किसके साथ बलात् यौनाचार करें और किसके साथ नहीं!

सर, बहुत पुराना समाचार यह है कि, यह सरकार ही तय करेगी!

यह सरकार का ही काम है कि नियम क़ानून बनाए. और यह आपका काम है कि नियम का पालन करें.

"सरकार यह कैसे तय करेगी कि हम क्या खाएं और क्या नहीं", महोदय, इस कथन में कितने पक्ष हैं?

सरकार और अवाम!

और, जिन्हें मारकर खाया जाना है वे? नहीं, उनका क्या पक्ष हो सकता है?

लोकतंत्र लोक के लिए है.

लंपट लोक की लालसा और लोभ की पूर्ति के लिए लोक के ही द्वारा रचा गया छल छद्म! नदी, पहाड़, जंगल, पशु, पक्षी, इस अधिकार-चेतना से विलग हैं. उनका कैसा अधिकार!

मनुष्य को लगता है कि वो इस संसार का ईश्वर है, इसका अधिष्ठाता! धूर्त, निर्लज्ज मनुष्य!

यह आप तय करेंगे कि किसको खाएं. किंतु किसे जीवित रहना है किसे नहीं, यह तय करने का अधिकार कहां से पाया, प्रिय मनुष्य? संविधान से? और संविधान किसने रचा?

सुना है, चोरों ने मिलकर कुछ क़ानून बनाए हैं! हास्यास्पद!

पशुवध पर पूर्ण और प्रभावी प्रतिबंध. इससे कम कुछ नहीं. क्या गाय, क्या सुअर, क्या धर्म, क्या अधर्म! सभी पशुओं को मनुष्यों के अनैतिक, जघन्य अत्याचारों से मुक्ति मिले!

और जो राक्षस नहीं जी सकते मांसभक्षण के बिना, वे पशुओं की स्वाभाविक मृत्यु की प्रतीक्षा करें, गिद्धों की तरह! मनुष्यों के बीच निकृष्ट तो वे ख़ैर तब भी कहलाएंगे!

राष्ट्र भाषा और मातृ भाषा का महत्व

अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाला आपका बच्चा अपनी मातृ भाषा या राष्ट्र भाषा में ठीक से बात नहीं कर सकता या नहीं समझ सकता तो यह गर्वित होने की नहीं लज्जित होने की बात है|

धर्मेन्द्र गूगल

मोहल्ले की दुकान पर खड़ा था। 12-13 साल की एक लड़की आई और उसने दुकानदार से कॉर्न-फ्लैक्स मांगा। दुकानदार ने रैक से निकालकर दे दिया। लड़की ने पूछा, कितने पैसे दूं। दुकानदार बोला, पैंतीस रुपये। लड़की के चुप रह जाने पर दुकानदार दो-तीन बार पैंतीस-पैंतीस कहता रहा। अंत में लड़की बोली, मींस..। तब दुकानदार बोला, थर्टी फ़ाइव। थर्टी फ़ाइव कहने पर लड़की समझ पाई। यह है हमारे बदलते समाज की स्थिति। बच्चों को हिंदी के अक्षर और अंकों का ज्ञान भी नहीं हो पा रहा और वे अंग्रेजी में फटाफट बोलने लगे हैं। चेतन भगत का कहना है कि अंग्रेजी के सिवा कोई चारा नहीं। अंग्रेजी हमें इंटरव्यू फ़ेस करना सिखाती है। यह हमें सबसे बेहतर टेक्स्ट बुक उपलब्ध कराती है और दुनिया से इंटरनेट के जरिये साक्षात्कार कराती है। बात बहुत हद तक सही है। लेकिन, अंग्रेजी पढ़ना और अंग्रेजी दां बनना, बिल्कुल दो बातें हैं। अंग्रेजी पढ़ने का मतलब यह नहीं कि हम अपने समाज को भूल जाएं। अपनी मातृ-भाषा को त्याग दें। चेतन भगत कहते हैं कि हिंदी हमारी मां है, तो अंग्रेजी पत्नी। लेकिन पत्नी के प्रेम में पागल होकर मां की ममता को भूल जाना सभ्य होने का सूचक नहीं। हम चाहे जितनी अंग्रेजी जान लें, अगर इस लड़की की तरह पैंतीस का अर्थ नहीं समझ पाएंगे, तो हमारा विकास अधूरा रहेगा।
~बिपेन्द्र

राम राज्य और मनुवाद

श्रीराम जी ने शुद्र शंबुक की हत्या क्यों की? यह मनुवाद नहीं था क्या? दलित नफरत पीड़न दलन सब मनुवाद नहीं है?

हमारे देश के प्रधान मंत्री मोदी जी

लगता ह हमारेे देश के प्रधान मंत्री मोदी जी का मन सरल है| प्रधान मंत्री शपथ ग्रहण पश्चात गांधी नेहरू को प्रणाम किया| अम्बेडकर जयंती के अवसर पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया| भा ज पा और आर एस एस वाले पता नहीं कैसे कोई विरोध नहीं किए|
प्रधान मंत्री बनने के बाद गाँधी जयंती से भारत स्वच्छता अभियान आरंभ किए|
उन्होंने चुनाव के पहले कहा .. मंदिर के पहले शौचालय की जरुरत है| एक सच्चे दिल से ही यह बात निकल सकती है| किंतु इस पर भाजपाइयों ने स्पष्टीकरण दिया था कि उनका मतलब मंदिरों में शौचालय से था, मंदिरों में इसकी जरुरत है|
लेकिन मोदी जी ने अपने कही हुई बात पर अमल किया| हर शहर हर गांव के हर घर में शौचालय निर्माण के लिए प्रयत्नशील हैं|