रविवार, 28 मई 2017

गाँधी जी और सेक्स

मैं पढ़ा था कि  गांधी जी ने सेक्स फिलिंग पर अपने कंट्रोल की परीक्षा के लिए एक रात दो नंगी लड़कियों के साथ सोए थे| उन्होंने स्वीकार किया था कि वे सेक्स फिलिंग से परे नहीं हो पाए हैं| यह एक प्रयोग था| हिम्मत है किसी में इस तरह की बात कोई बता सके? जागते हुए आपके मन में और सपने में सेक्स की जो बातें आती है , क्या कोई इमानदारी से उजागर करने का साहस करेगा? नहीं| हममें यह हिम्मत नही् है|
हूंह. दो चार लाइन गांधी के बारे में पढ़ लिए सुन लिए . उन्हें जान लिए?
सभी साधू संत खुद को सेक्स से परे बताते हैं | काम क्रोध लोभ माया से दूर रहने की सलाह देते हैं| लेकिन सच नहीं लगता|
1980-1985 में मैंने कुनकुरी में मिशनरी फादर से पूछा था| उन्होंने कहा वे सेक्स फिलिंग से परे नहीं हो सके. -"जब फिलिंग होती है तो ईशू ईशू बोलता हू्ँ, मन को उधर से हटाता हू्ँ| ऐसे सच को सहजता पूर्वक स्वीकार करना उनकी सरलता और ईमानदारी का परिचायक है|

वैचारिक मतभेद

वैचारिक मतभेद का जबाब गोली या गाली से देने वाले नीच घटिया संकीर्ण स्वार्थी देशद्रोही होते हैं|

नेहरू जी

Nikhilesh Mishra

#पं_नेहरू_को_बाजपेयी_जी_द्वारा_संसद_में_दी_गई_श्रद्धांजलि !
पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहावसान के पश्चात संसद में अटल बिहारी वाजपेई के उद्बोधन के मुख्य अंश---
महोदय,
एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।
मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे।
वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।
मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे।
महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे।
संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
*-श्री अटल बिहारी वाजपेयी*
(29 मई, 1964 को संसद में दिया गया भाषण)
साभार : - इशनाथ झा वाया Randhir Jha भाई

पूज्य

Padmamukh Panda

कोई पूज्य नहीं होता श्रद्धेय या आदरणीय ही हो सकता है।

शनिवार, 27 मई 2017

भगवान पर भरोसा

Veeru Ji

जो पंडित रात-दिन भगवान की पूजा करता है,,उसे भी भगवान पे भरोसा नहीं है,,

घर जाते वक्त वो भी मंदिर में ताला लगा कर  जाता है।

और आप कहते है,,सब भगवान भरोसेे छोड दो|

सच से परहेज क्यों


"सत्य से परहेज क्यों?"
* * * * *
बच्चा जब मुश्किल से बोलना व चलना सीख रहा होता है उस समय लोग बच्चे को पूजा पाठ में शामिल कर लेते हैं जैसे वह उनका परम कर्तव्य हो!
क्या आप बता सकते हैं कि किस बिना पर आपने उसे उस पूजा में शामिल किया?वह तो मासूम व इस तथ्य से सर्वथा अपरिचित है कि कोई भगवान या ईश्वर भी है जिसकी पूजा की जानी चाहिये?
इस तरह आपने उसके वैचारिक स्वतंत्रता के खिलाफ काम किया है।
वह मासूम है तो है ही अपने हित अहित से भी अंजान है। यदि उसके कुछ बड़े होने तक यदि उसे मौका दिया जाता तो क्या उचित नहीं होता? क्या जल्दी थी बेचारे को एक महत्वपूर्ण निर्णय में जबरदस्ती उतारने की?
वह पहले अध्ययन करता सही गलत बात पर गौर करता उसकी मीमांसा करता और फिर भगवान या ईश्वर को लेकर कोई निर्णय लेता?
आज प्रजातंत्र का युग है। अपने प्रतिनिधि के 5 वर्ष तक के चुनाव के लिए उसे कम से कम 18 वर्ष की उम्र का होना जरूरी है तो जीवन भर के लिए कोई महत्वपूर्ण निर्णय हेतु जल्दबाजी क्यों?

पद्ममुख पंडा
महापल्ली

शुक्रवार, 26 मई 2017

"सत्य से परहेज क्यों?"


"सत्य से परहेज क्यों?"
* * * * *
बच्चा जब मुश्किल से बोलना व चलना सीख रहा होता है उस समय लोग बच्चे को पूजा पाठ में शामिल कर लेते हैं जैसे वह उनका परम कर्तव्य हो!
क्या आप बता सकते हैं कि किस बिना पर आपने उसे उस पूजा में शामिल किया?वह तो मासूम व इस तथ्य से सर्वथा अपरिचित है कि कोई भगवान या ईश्वर भी है जिसकी पूजा की जानी चाहिये?
इस तरह आपने उसके वैचारिक स्वतंत्रता के खिलाफ काम किया है।
वह मासूम है तो है ही अपने हित अहित से भी अंजान है। यदि उसके कुछ बड़े होने तक यदि उसे मौका दिया जाता तो क्या उचित नहीं होता? क्या जल्दी थी बेचारे को एक महत्वपूर्ण निर्णय में जबरदस्ती उतारने की?
वह पहले अध्ययन करता सही गलत बात पर गौर करता उसकी मीमांसा करता और फिर भगवान या ईश्वर को लेकर कोई निर्णय लेता?
आज प्रजातंत्र का युग है। अपने प्रतिनिधि के 5 वर्ष तक के चुनाव के लिए उसे कम से कम 18 वर्ष की उम्र का होना जरूरी है तो जीवन भर के लिए कोई महत्वपूर्ण निर्णय हेतु जल्दबाजी क्यों?
पद्ममुख पंडा
महापल्ली

धर्म और जाति


Padmamukh Panda

संपूर्ण संसार से धर्म और जाति को विलोपित कर मानवता और मानव को प्रतिष्ठित किया जावे।"

गुरुवार, 25 मई 2017

मेरी मर्जी


Dinesh AastikMithilesh K Sinha और 11 अन्य लोगों के साथ.

मैं आस्तिक हूँ
क्योंकि मुझे त्यौहार मनना पसंद हैं, मुझे रँगोली पसंद है, मुझे पुराने मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे पसंद हैं। मुझे गीता, बाइबिल कुरान के अच्छे उपदेश भी पसंद हैं। मुझे धर्म का सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक पहलू भी पसंद है। मैं धर्म की अच्छाईयों की चोरी की है। धर्म के अनुसार चोरी करना पाप है। हाँ मैंने पाप किया है। ऐसा पाप करके मैं गौरान्वित अनुभव करता हूँ।

मैं नास्तिक हूँ
क्योंकि मैं किसी ईश्वर को नहीं मानता, किसी देवता या अलोकिक शक्ति को नहीं मानता, किसी फरिश्ते को नहीं मानता।

मैं धर्म के चमत्कारों को नहीं मानता, मैं धार्मिक पाखण्डों और आडम्बरों को नहीं मानता।

छद्म धार्मिकों से निवेदन
लेकिन तथाकथित छद्म धार्मिकों से मेरा कहना है कि हम अनीश्वरवादियों से बेहूदे सवाल न पूछे कि आपने अपना नाम फलां क्यों रखा? अपने धर्मिकों की तरह शादी क्यों की? आपने धार्मिको की तरह बच्चे पैदा क्यों किये? आप ईश्वर की बनाई हुई हवा क्यों लेते हैं? 
मुझे जो अच्छा लगेगा मैं वह करूँगा। आप कौन होते हो मुझे रोकने वाले? यदि आपका अपने ईश्वर पर पूरी तरह यकीन हो तो उससे पूछो कि इन नास्तिकों को क्यों पैदा किया। इन्हें नास्तिक क्यों बनाया?

क्या लिखें क्या नहीं


Ruba Ansari

बड़ी छोटी सी बात है अगर समझ में आ जाय तो ठीक ही है-
एक दर्जी से ये शिकायत करना की तुम सिर्फ कपडे ही क्यों सिलते हो, चप्पल क्यों नही? या एक कुम्हार से शिकायत करना की तुम सिर्फ बर्तन ही क्यों बनाते हो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण क्यों नही? फेसबुक पर शिकायत करने वालों का हाल भी कुछ ऐसा ही है हमें समझना होगा की ह्यूमन टेस्ट (taste) अलग अलग होते हैं, हर कोई अलग खाना, अलग पहनना पसंद करता है, हमारी हॉबीज और इंटरेस्ट अलग अलग होते हैं, हर कोई हर किसी मुद्दे से प्रभावित नही होता। अब आप दिलीप सी मंडल से शिकायत करने लगें की आप सिर्फ दलितों के मुद्दे पर ही क्यों लिखते हैं तो ये आपकी मूर्खता को दर्शायेगा। न्यूज़ रिपोर्ट्स भी अलग अलग बीट पर रिपोर्टिंग करते हैं कुछ स्पोर्ट्स, कुछ पॉलिटिक्स, कुछ क्राइम, तो क्या हमें उनसे शिकायत करनी चाहिए की तुम सिर्फ क्राइम के बारे में क्यों लिखते हैं मनोरंजन के बारे में क्यों नही? रही बात मेरी तो मैं उन्ही मुद्दों पर लिखूंगी जो मुझपर असर छोड़ते हों या जिनमे मैं सुधार या बदलाव की ज़रूरत महसूस करती हूँ, आप जो पढ़ना चाहते हैं मैं वो नही लिख सकती, इसलिए यहाँ शिकायत का नगाड़ा बजाने की ज़रूरत नही🙏

लड़की


Nikhilesh Mishra

देखो तो कैसे ज़ोर-ज़ोर से हँस
रही है लड़कों की तरह//
मर्दों की तरह सीना ताने चल
रही है! बेशर्म कहीं की//
इतनी उम्र हो गयी! न खाना बनाने
आता और न ही कढ़ाई-बुनाई, सिलाई// भाइयों को खा लेने दे,
उसके बाद खाना! चली आयी मुह
बाये// खड़ी-खड़ी मुह क्या देख
रही है? जा पानी ला दौड़ के! लड़कियों को बचपन से
ही ग़ुलामी की ट्रेनिंग मिलने
लगती है घर पे! ज़ोर-ज़ोर से हंसने
पे तो सिर्फ़ लड़कों का एकाधिकार
बना दिया जाता है! हंसी आये
भी तो लड़कियों को मुंह ढककर हंसने की सलाह दी जाती है!
सीना तान के चलना लड़कों के लिए
जहां बहादुरी और निडर होने
की निशानी मानी जाती है,
वहीं लडकियां ऐसे चलें तो शर्म
की बात! भाई को भले ही अपना पिछवाड़ा धुलना न
आता हो लेकिन बहन
को खाना बनाना, कढ़ाई-बुनाई, सिलाई
सब आना ही चाहिए
नहीं तो पढ़ना लिखना सब बेकार!
कितनी भी तेज़ भूख लगी हो लेकिन खाना भाइयों के
खा लेने के बाद
ही मिलेगा कि कहीं खाना घट न
जाए! भाइयों का पेट ज़रूर
भरना चाहिए वो भले ही भूखी रह
जाए! उम्र में लड़की भले ही अपने भाइयों से बड़ी हो लेकिन खाना,
पानी, अचार, रोटी दौड़-दौड़ के
लाना उसके आदर्श बहन और आगे
चलकर आदर्श पत्नी बनने के
लक्षण हैं! हमारे देश
को सीता या सती सावित्री की ज़रुरत
नहीं, फूलन देवी जैसी बहादुर
बग़ावती स्वभाव की महिलाओं
की ज़रुरत है!
..........तारा शंकर

बुधवार, 24 मई 2017

धरती में आदमी नहीं रहते

RaviPrakash Sinha

धरती में आदमी नहीं रहते
केवल हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई बौद्ध जैन नास्तिक आदि रहते हैं

मंगलवार, 23 मई 2017

बुर्का


संजय कुमार

दोपहर की चिलचिलाती धूप और लगभग 40 डिग्री गर्मी , ऐसे में महिला सर से पाँव तक सिंथेटिक के काले कपड़े के बने बुर्के में पूरी तरह ढंकी हुई ।

ऐसा देख के ही उसकी दयनीय स्थिति का अंदाजा हो जाता है कि बुर्के में कितनी गर्मी और घुटन का सामना करना पड़ रहा होगा उस महिला को।
जबकि साथ में बैठा उसका पति गर्मी से बचाव के लिए हाफ स्लीव की शर्ट , पैंट और सैंडिल पहने हुए था।

जिस प्रकार की भारतीय जलवायु है उसमें बुर्का पहनने की जरूरत नहीं होती है , किन्तु आस्था के नाम पर अरब की नकल की जाती है जिसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है ।

महिलाओं को इस जबरन थोपे है 'काली कैद' से भी आज़ादी की मांग करनी चाहिए , उन्हें ऐसे परिधान पहनने का हक़ मिलना चाहिए जो मौसम के अनुसार सही हों । अरब की नकल से उन्हें मुक्ति की मांग करनी चाहिये, उन्होंने अरब का धर्म अपनाया है परिधान नहीं ।

- संजय

सोमवार, 22 मई 2017

आत्मा


Padmamukh Panda

"जरा सोचिये!"
************
आत्मा तो हम सभी की एक जैसी ही होती होगी। भले ही शरीर किसी का भारी भरकम तो कोई दुबला पतला हो सकता है।
जब कोई चिंटी मर जाती है तो उसकी आत्मा और जब कभी कोई हाथी मर गया तो उसकी आत्मा दोनों आपस में मिलते होंगे तो क्या बात चीत होती होगी?
मनुष्य बेचारा कितना अधिक सोचता रहता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ मेरे पास अब अधिक समय नहीं है। मैं मर गया तो मेरे परिवार का क्या होगा?
मनुष्य को अपनी आत्मा के बारे में कुछ ज्यादा ही फिक्र रहती है। जीवन भर तो कमाने खाने के चक्कर में पिसता रहता है मरते समय भी चिंता उसका पीछा नहीं छोड़ती है।
दोस्तों! आज तक आत्मा के बारे में कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हुई है और भविष्य में भी दूर दूर तक इसकी जानकारी मिलने की कोई संभावना नहीं है।
जो सामने है;उस पर विश्वास करना ठीक है कि जो कल्पना पर आधारित है उस पर विश्वास करना चाहिए?
अब तक अनगिनत शरीरों ने प्राण त्याग दिए हैं और आने वाले समय में भी यही सब कुछ होने वाला है!
मन को मजबूत बनाकर जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर सुखी जीवन व्यतीत करें। परिवार तथा खुद को स्वस्थ रखने का प्रयास कर देश की दशा और दिशा बदलने में भागीदार बनें।
मरने के बाद क्या होगा? कैसे होगा?यह सब परेशान करने वाली बातों से खुद को दूर रखें।
आप यदि किसी का बुरा नहीं करते तो कोई भी ताकत आपका अनिष्ट नहीं कर सकती है।
अस्तु आमीन..!

विचारक. पद्ममुख पंडा
महापल्ली

शनिवार, 20 मई 2017

स्त्री

आर कृष्णन शर्मा

स्त्री:- जब कोई स्त्री
रास्ते से जा रही हो चाहे छोटे कपडे पहने
हो या अजीब सा वस्त्र पहने हो 
या वो कहीं स्नान कर रही हो 
या कपड़े बदल रही हो 
या किसी से एकांत में बात कर 
रही हो तो क्यों 
पुरुषों को उलझन होती है क्यों 
उनके भीतर बैचनी होने लगती है। 
वो तो अपनी सहजता से चल रही है 
स्नान कर रही है। तो पुरुषों को क्यों 
परेशानी होती है। 
ये कष्ट पुरुषों का है क्यों उनके भीतर बैचेनी हो रही है।
मुश्लिम में अपने भीतर के बेचैनी का 
ईलाज ना करके स्त्री को पर्दे में 
नकाब में डाल दिया तो क्या 
उनकी बेचैनी कम हो गयी है। 
नही वो और कामुक हो गये। 
""ईलाज किसका होना चाहिये था 
और किसका हो रहा है।"" 
इस अवस्था में पशु हमसे ठीक दिख रहे है
""जो सत्य पुरुष होगा वो 
अपने भीतर का ईलाज करेगा 
ना किसी दूसरों को छिपाएगा य 
पर्दे में रखेगा।""" 
मन का ईलाज होना 
चाहिए कि ये बेचैनी हममे 
कहाँ से जन्म ले रही है।..........
धन्यवाद ......ओशो

स्वर्ग में प्रवेश के लिए धोती कुरता| जन्नत के लिए दाढ़ी|

शुक्रवार, 19 मई 2017

इंसानियत


नीतीश के. एस.

अमेरिका में गोरे और काले का भेदभाव था। कालों से नफ़रत करते थे। आज उन्हीं कालों के साथ ख़ुशी ख़ुशी रह रहे हैं। नफ़रत और भेदभाव चाह कर भी संभाल नहीं पाए। 
इसी अमेरिका में रूस से नफ़रत करने वाले करोड़ों लोग हैं। लेकिन। इसी अमेरिका में हज़ारों रुसी बिना भेदभाव के समान अधिकार के साथ रह रहे हैं। रूस के साथ युद्ध और दुश्मनी चाह कर भी जारी नहीं रख पाए। 
जर्मनी में एक हिटलर ने एक पूरी नस्ल को ख़त्म करने का बीड़ा उठाया था। हिटलर खुद ख़त्म हो गया लेकिन वो काम नहीं हो पाया जो वो और उसके जैसे हज़ारों चाहते थे। जर्मनी आज सभी संप्रदायों को ख़ुशी से जगह देता है और इस पर गर्व कर सकता है।
भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था। भारत में आज भी मुसलमान बड़ी गिनती में रह रहे हैं और कमोबेश बराबरी से रह रहे हैं। समय समय पर नफ़रतें सर उठाती रहती हैं लेकिन खुद मिट जाती हैं और अमन बरक़रार रह जाता है। 
इजराइल फिलिस्तीन में कितने ही ऐसे हैं जिन्हें सरहद के दूसरी तरफ़ होना चाहिए था, लेकिन वो उस तरफ़ जी रहे हैं जहाँ उन्हें नहीं होना चाहिए था। वो जी रहे हैं और नफ़रतों के बावजूद अपनी जगह बनाये हुए हैं। सालों की नफ़रत भी उनकी इस मिलावट का ईलाज खोज नहीं पा रही।

असल में इंसान फितरतन अमन पसंद है। जहाँ सुकून से दो वक़्त गुज़ारने का मौका मिला, वहीँ का हो के रह जाता है। उसे सच में सरहदों से, नियमों से बहुत लगाव नहीं होता। उसे आगे बढ़ने का शौक होता है। जहाँ बेहतरी दिखी, वहीँ का हो के रह गया। खुद को ही देख लीजिए। हममें से नब्बे फ़ीसदी लोग गाँव छोड़ आए हैं। क्योंकि वहां ज़िन्दगी बसर करना शहर के मुक़ाबले मुश्किल है। बेवजह की चिकचिक नहीं चाहते। कोई नहीं चाहता।

दुनिया में जितनी भी दुश्मनी की कहानियां हैं, उनमें एक भी सफल नहीं हुई है। दायरे बांध कर शुद्धता अपनाने का अरमान रखने वालों ने हमेशा मुंह की खाई है। तो, बात ये है कि चाहे जो भी धर्म हो, चाहे जो भी रंग हो, चाहे जो भी संस्कृति हो, चाहे जो भी भाषा हो, उसे आप सिर्फ अपने लिए आरक्षित नहीं रख सकते। लाख कोशिश कर लीजिए, मिलावट तो हो ही जायेगी। वो मिलावट जिसे हम इंसानियत के नाम से जानते हैं, और आख़िर में यही इंसानियत ही बचती है। बहुत ज़िद्दी, बेशर्म और ढींठ होती है न। इसलिए, इंतज़ार कीजिये। वक़्त है, गुज़ार देना है। साथ गुजारेंगे तो मुहब्बत बढ़ेगी, अलग अलग गुजारेंगे तो अफ़सोस बढ़ेगा। नफ़रत तो एक रोज़ ख़त्म हो ही जानी है।

इक़बाल के लिखा तो किसी और बात पर था , लेकिन यहाँ बैठता सही है :
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा..

प्रार्थना


Rajesh Pippal

जिसे तुम प्रार्थना समझते हो, वो अज्ञान है

मैं बहुत चमत्कृत हो जाता हूं यह देखकर कि लोग जाकर मंदिरोंमें झुक जाते है, जो आकाश को तारों से भरा देखकर नहीं झुकते। इनका मंदिर में झुकना झूठा होगा, निश्चित झूठा होगा। इसमें हार्दिकता नहीं हो सकती। आदमी की बनाई हुई मूर्ति में इन्हें क्या दिखाई पड़ सकता है ? आदतवश झुक जाते होंगे। बचपन से झुकाए गए होंगे इसलिए झुक जाते होंगे मां - बाप ने कहा होगा, झुको, इसलिए झुक जाते होंगे, भय के कारण झुक जाते होंगे -- कि कहीं नरक न हो, कहीं दंड न मिले। या लोभ के कारण झुक जाते होंगे कि झुकने से स्वर्ग मिलेगा,पुरस्कार मिलेंगे।लोग अपने भय, कमजोरी, नपुंसकता के कारण झुक जाते हैं और समझ लेते हैं कि हम खुदा के सामने झुक रहे हैं।अज्ञान है; तुमने प्रार्थना समझी है उसे ? वहां प्रार्थना बिल्कुल नहीं है, प्रेम बिल्कुल नहीं है। सरासर झूठ है। क्यों ?
क्योंकि अगर आंखों में प्रेम होता तो इन पास खड़े वृक्षों के पास तुम्हारे झुकने का मन न होता ? कोयल कूकती और तुम न झुकते ? मोर नाचता और तुम न झुकते ? आकाश बादलों से भर जाता और तुम न झुकते ? चांदनी के फूल झर - झर झरते और तुम न झुकते ? कोई हंसताऔर तुम न झुकते ? मिट्टी में और हंसी ? किस चमत्कार की प्रतीक्षाकर रहे हो ? उसके चरण - कमल प्रत्येक पल हैं, प्रत्येक स्थल पर हैं। एक - एक रेत के दाने पर उसके हस्ताक्षर हैं, लेकिन संवेदनशीलता चाहिए।

~ ओशो ~
(नाम सुमिर मन बावरे, प्रवचन #9)

सत्य


भगवान कहां कहां रहते हैं

-भगवान मंदिरों में रहते हैं |
-अरे नहीं, वे मजदूर के पसीना में होते हैं | 
-नहीं, वे खलिहान में होते हैं|
- नहीं, वे मां के चरणों में होते हैं |
## सब बकवास, वे कण कण में होते हैं |
सुगंध में दुर्गंध में, कुत्ते बिल्ली में, विषाणु वेक्टेरिया में, चोर डाकू में, आसाराम में, नटवर लाल में, बाथ रुम में, तालाब में.. ....... ...