रविवार, 18 जून 2017

लाउड स्पीकर का प्रयोग

संजय कुमार

क्यों न बंद हो धर्मिक/मजहबी कामो में लाउडस्पीकर का प्रयोग ?

आज किसी भी धर्मिक या मजहबी स्थल की सबसे ज्यादा जरुरी चीज बन गई है तो वह है लाउडस्पीकर ।
पूजा प्रार्थना करनी हो या नमाज पढ़ना हो लाउडस्पीकर की तेज आवाज चाहिए सभी को,बिना लाउडस्पीकर के फुल वॉल्यूम किये धार्मिकों को लगता ही नहीं की उनकी आवाज खुदा या भगवान् तक जायेगी ही ।

धर्मिक मजहबी लोग जैसे अपने खुदा या भगवान् को नहीं बल्कि चीख चीख दूसरे लोगो को बताना चाहते हैं की देखो हम अल्लाह ईश्वर की पूजा प्रार्थना कर रहे हैं ।

अरे भाई!जैसा की आप लोग मानते हैं की ईश्वर सातवे आसमान में विराजमान है या ब्रह्माण्ड में कंही तो वैसे भी आपके लाउडस्पीकर की आवाज ब्रह्माण्ड या सातवे आसमान तक नहीं पहुचने वाली ।
तब काहे को आस पास के लोगो के कान बहरे कर देते हो ? 
अगर आप कहते हो की आप लाउडस्पीकर में अपने जैसे धर्मिक मजहबी लोगो को आगाह करते हैं या सूचना देते है अपने धार्मिक क्रियाकलापो की ।
तो , साहब घर जाके बताइये न उन्हें ... क्या जिसको बताने का आप दावा कर रहे है लाउडस्पीकर में चिल्ला के उसे धर्म की नियमावली नहीं पता ?उसे टाइमटेबल नहीं पता? 
यदि वह आपके बताने पर भी भूल जाता है और आपको उसको लाउडस्पीकर में चिल्ला के बताना पड़ रहा है तो इसका मतलब वह जिसे आप समझाने गए थे उसे आपके धर्म मजहब में कोई इंट्रेस्ट नहीं है.....आप पीछा छोड़िये उसका .... चिल्लाना बंद किजिये।
जिसे इंट्रेस्ट होगा वह खुद आएगा आपके पास ।

इस प्रकार लाउडस्पीकर में चिल्लाना ईश्वर अल्लाह की पूजा इबादत नहीं बल्कि अपना अपना संख्याबल दिखाना भर है और दूसरे लोगो को परेशान करना भर है।

तरह तरह के प्रदूषण से तो वैसे ही इंसान की जान निकल रही है , आप लोग क्यों रात दिन चिल्ला चिल्ला के ध्वनि प्रदूषण और बढ़ा के लोगो का जीना दूभर कर रहे हैं ।

मैं चाहता हूँ की सरकार धर्मिक /मजहबी स्थलो में लाउडस्पीकर का प्रयोग बंद करवा दे ताकि गैर धर्मिक लोगो को परेशनी न हो ।
पूजा पाठ नमाज पढ़नी हो तो बिना लाउडस्पीकर के प्रयोग के की जाए ताकि दूसरे लोग जो आपके पूजा पाठ या नमाज में इंट्रेस्ट नहीं रखते वे चैन से जी सके ।

- केशव ( संजय)

शनिवार, 17 जून 2017

धर्म और विज्ञान


Sukhvinder Sidhani

#विज्ञान_और_धर्म-2

विज्ञान और धर्म के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि जहाँ विज्ञान अग्रमुखी है यानी आगे की ओर देखता है, वहीं धर्म पश्चमुखी है यानी पीछे की ओर देखता है। उदाहरण के लिए विज्ञान के अनुयायियों के लिए विज्ञान के प्रकाशन जितने आधुनिक होंगे, अद्यतन(अपडेट) होंगे, उतने ही बेहतर माने जाएँगे। जबकि धर्म के अनुयायी जिन शास्त्रों पर निर्भर होते हैं, वे आमतौर पर प्राचीन होते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में वर्तमान वैज्ञानिकों का सबसे अधिक महत्व होता है जबकि धर्मक्षेत्र, धर्म के वे संस्थापक सबसे सम्मानित माने जाते हैं जो सुदूर अतीत में कार्यरत रहे हों। विज्ञान के समर्थकों के लिए जो घटनाएँ आज घट रही हैं और जो कल घट सकती हैं, उनका सबसे अधिक महत्व है, जबकि धर्म के अनुयायियों के लिए जो अतीत में घटा वही सर्वोपरि है। समय बीतने के साथ विज्ञान की तकनीकों में सुधार और निखार आता जाता है और इस सुधार की प्रेरणा विज्ञान की विधि के बुनियादी ढांचे में ही गुँथी हुई है। दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांड में समयानुसार बुनियादी तौर पर कोई खास सुधार नज़र नहीं आता। अगर कुछ परिवर्तन धर्म में होते भी हैं तो धर्म से बाहर के दबाव से होते हैं, जैसे कि स्वयं विज्ञान के दबाव से।

विज्ञान का एक आंतरिक गुण है, प्रश्न पूछने का अधिकार। लोग प्रश्न पूछने के अधिकार का उपयोग करते हैं, उसी से ज्ञान का विस्तार होता है और विज्ञान प्रगति करता है। दूसरी ओर धर्म अपने सिद्धांतों और रूढ़िवादी मान्यताओं के बारे में चाहता है कि उन पर कोई सवाल उठाए बिना सब लोग उन्हें स्वीकार कर लें। अगर धर्म पर सवाल उठाया जाए तो केवल किसी बात को समझने के लिए उठाया जा सकता है, शंका या संदेह प्रकट करने के लिए नहीं।

वैज्ञानिक तो किसी अपराध-बोध या संकोच के बिना यह स्वीकार कर सकता है कि 'मैं नहीं जानता'। लेकिन कोई धर्मगुरु ऐसा कहे तो उस पर तो पहाड़ ही टूट पड़ेगा। वह तो होता ही है सर्वज्ञ। प्रत्येक धर्म के संस्थापक अतीत कल से ही, ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर देते रहते हैं, जो कि पूछे जा सकते हैं। विज्ञान में तो ऐसा दावा करना आडंबर और विडम्बना माना जाएगा। ऐसा पाखंड धर्म ही दिखा सकता है।
Promeethews Pratap Singh Thakur की वाल से

शुक्रवार, 16 जून 2017

ईश्वर/अल्लाह पर भरोसा


संजय कुमार

यदि आपको ईश्वर / अल्लाह पर विश्वास है तो जीवन बीमा मत करवाइये। जीवन बीमा दरसल ईश्वर के प्रति अविश्वास है ,आप जीवन बीमा इस लिए करवाते हैं कि यदि आप मर गएँ तो आपके परिवार का क्या होगा? अपने मरने के बाद अपने परिवार वालो के जीवनयापन की फ़िक्र भौतिकतावाद है । जीवन बीमा करवाके आप ईश्वर के प्रति शुद्ध रूप से अविश्वास प्रकट कर देते हैं और स्वयं नियति के निर्माता बन जाते हैं।

आशा है प्रतेक ईश्वरवादी/ अल्लाहवादी जीवन बीमा नहीं करवायेगा या जिसने करवा लिए है वह कैंसिल करवा देगा ।

' होइये सोई जो राम रची राखा।

जीवन बीमा ईश्वर /अल्लाह की सर्वोच्चता को चुनौती है ।

कर्मेण्येव... फल में अधिकार नहीं


उपदेशक, शिक्षक ज्ञानी जन कहते हैं_
भगवद् गीता के अनुसार कर्म करना चाहिए किंतु फल की आशा नहीं करनी चाहिए|
गीता में ऐसा नहीं कहा गया है|
""""""'
गीता के "कर्मेण्येव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" में परिणाम की आशा नहीं करने के लिए नहीं कहा गया है| कर्म में हमारा अधिकार है चाहे हम करें न करें जैसा करें| कर्म करने के बाद हमारे कर्म के परिणाम में हमारा कोई अधिकार नहीं होता| हर विद्यार्थी परीक्षा में सफलता के लिए मेहनत करता है किंतु उसके परिणाम में उसका अधिकार नहीं होता| किसान फसल लगाता है.... व्यापार, खेल, युद्ध, ...
वांछित परिणाम की आशा से ही कर्म करते हैं|  फल की आशा करें किंतु फल के प्रति आसक्त न हों| आसक्ति होने से इच्छानुसार परिणाम प्राप्त करने के लिए गलत तरीके अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं | परिणाम के प्रति आसक्ति न हो तो इच्छानुसार परिणाम नहीं मिलने से कर्ता दुःखी नहीं होता हताश नहीं होता, कोई गलत कदम नहीं उठाता आत्म हत्या नहीं करता| पुनः पुनः श्रम करता है |

गुरुवार, 15 जून 2017

आस्था का दीपक

Suresh Katariya

आस्था का दीपक अंधविश्वास के तेल से जलता है,और 
तर्क के फूंक से बुझ जाता है

विज्ञान बनाम धर्म

Suresh Soni

विज्ञान सवाल करने वालों को प्रोत्साहित करता है जबकि धर्म दुत्कारता है , क्योंकि यहां सवाल करना निषेधित है

नास्तिकता

Rattan Lal Gottra

*नास्तिक* न तो बना जा सकता है और न तो बनाया जा सकता है बल्कि यह एक स्थिति है जब व्यक्ति शैक्षिक,बौद्धिक,तर्क व विचारशील हो जाता है तो उसके अंदर से अंधविश्वास व पाखण्ड समाप्त हो जाता है इसके बाद जो स्थिति बचती है वह है नास्तिकता!
जय विज्ञान

दूसरों के भगवान

-- Stephen F. Roberts

हिन्दी अनुवाद :
"जब आप इस बात को समझ जाओगे कि आप दूसरों के भगवान (Gods ) को क्यों नहीं मानते, तब आपको यह भी समझ आ जायेगा कि हम आपके भगवान को क्यों नहीं मानते."

सीधी सी बात है .... 
जिन कारणों से आप दूसरों के भगवान को काल्पनिक मानते हो, ठीक उन्हीं कारणों के आधार पर हम आपके भगवान को काल्पनिक मानते हैं.

विवेक की बलि

Vasant Sonawane_आस्था का अर्थ ही है, अपने विवेक की बली देना.

धर्म एक पाखंड

धर्म एक पाखण्ड है और ईश्वर झूठ

चलो एक बार मान लेते कि हैं सबको तथा सबकुछ अल्लाह ने बनाया है। लेकिन भाई हिन्दुओं, ईसाईयोें, यहूदियों, सिक्खों, नास्तिकों, काफिरों और विधर्मियों को क्यों बनाया है?

चलो एक बार मान लेते हैं कि सबको तथा सब कुछ ब्रम्हा ने बनाया है लेकिन भाई मुस्लिमों, ईसाईयों, यहूदियों सिक्खों, जैनियों नास्तिकों, काफिरों और विधर्मियों को क्यों बनाया है?

नहीं जानता


Padmamukh Panda

"मैं नहीं जानता!"
**************
मैं किसी परमसत्ता के बारे में
कुछ भी नहीं जानता!
लोग अक्सर ईश्वर;खुदा या पैगंबर की
चर्चा करते रहते हैं
मैं सुन लेता हूँ;सुनता रहता हूं
मगर ऐसे किसी को भी नहीं मानता।
बचपन से लेकर आज तलक
मेरा किसी ईश्वर से सामना नहीं हुआ
मैंने तो सिर्फ लोगों को
मंदिरों के सामने कीर्तन भजन गाते
मंदिरों के भीतर गिडगिडाते देखा है
मैंने कभी भी नहीं देखा
कि ईश्वर किसी पर पसीजा हो
मैंने देखा है कई बार
लोग उपवास व्रत लेकर
कई कई दिनों तक
भूखे ही दिन गुजार देते हैं
मैं साक्षी हूँ उन भक्तों का
जो भगवान को पाने के प्रयास में
प्राण त्याग देते हैं।

मुझे ज्ञात है किस तरह एक माँ
अपने नवजात शिशु की लाश पर
आँसू बहाती है
एक नव विवाहिता वधू
पति की मृत्यु पर गश खाती है
सारे अरमान टूट बिखर जाते हैं
दुनिया फिर तमाशा बनाती है।

मैं ऐसे किसी भगवान को नहीं जानता
जो किसी दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति को
बचाने के लिए सामने आया हो
बाढ़ में डूबता कोई आदमी 
भगवान का नाम लेकर बच पाया हो
किताबों में पढ़ते हैं
बुजुर्गों से सुनते हैं
कभी आँखों के सामने से
ऐसा कुछ भी नहीं गुजरा
जो हमें भगवान के होने का यकीन दिला सके!

पद्ममुख पंडा; महापल्ली

बुधवार, 14 जून 2017

मंगलवार, 13 जून 2017

कांग्रेस पार्टी


आजादी के बाद गांधी जी ने कांग्रेस पार्टी को भंग करने की सलाह दी थी क्योंकि कांग्रेस के गठन का मकसद पूरा हो चुका था| लेकिन पार्टी को भंग नहीं किया गया| किसी सलाह को मानने की बाध्यता नहीं होती|
अगर आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर पुनः "कांग्रेस" नाम से ही एक पार्टी का गठन कर लेते| उसमें वही पूर्व कांग्रेसी सदस्य होते| तो क्या नए कांग्रेस दल को बहुमत नहीं मिलता? किसे बहुमत मिला होता| भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा या आर एस एस को?

रविवार, 11 जून 2017

हमारा धर्म महान

हमारा हिंदू धर्म महान है| हम विधर्मियों को क्यों शामिल करें?

Rattan Lal Gottra

इतिहास साक्षी है कि हिन्दु धर्म से लोग ईसाई बने, यहूदी बने, सिख बने, जैन बने,बौद्ध बने और इस्लाम धर्म भी ग्रहण किया ।
किन्तु क्या कोई ऐसा एक भी उदाहरण है कि इन धर्मो के लोगो ने अपना धर्म त्याग कर कभी हिन्दु धर्म ग्रहण किया हो?
या वर्तमान मे कर रहे हो?
कोई तो विशेष कारण होगा, कि हिन्दू धर्म को ही त्यागकर नया धर्म बनाने और ग्रहण करने के अनगिनत उदाहरण है। 
कोई तो कमी जरूर होगी?
महान संस्कृति व उच्च सभ्यता, धर्म और सास्वत सत्य का प्रतीक??
हिन्दू धर्म??
यानि अपने ही मुँह मियां मिट्ठू बनने की कहावत को चरितार्थ करता हिन्दू धर्म 😊😊

शनिवार, 10 जून 2017

अवतरण

यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थाम्यहं युगे युगे.. पाप भ्रष्टाचार तो खूब हो रहे हैं| अवतरित कब होंगे?

नाप तौल

अम्बेडकर महान थे कोई शक नहीं लेकिन आजकल जय भीम वाले यही जप रहे हैं| वे गांधी से बड़े थे, मार्क्स से बड़े थे... पता नहीं कैसे नाप जोख कर रहे हैं?

भगत सिंह के विचार


B L Yadav

: वह 'भगत सिंह' जिसे हम जानते नहीं :

भगत सिंह हम में से अधिकतर के बचपन से हीरो रहे हैं. लेकिन फिर भी हम में से अधिकतर लोग अपने इस हीरो के बारे में बहुत कम जानते हैं. बस इतना ही जानते हैं कि वह एक स्वतंत्रता सेनानी था .. जो अंग्रेज के खिलाफ लड़कर 23 साल की छोटी सी उम्र में फांसी पर झूल गया.

भगत सिंह के व्यक्तित्व के एक बहुत ही अहम् व महतवपूर्ण पक्ष के बारे में हमें न तो बताया गया और ना ही हमने जानने की कोशिश की. वह पक्ष है उनकी सोचने की शक्ती. भगत सिंह एक बहुत बड़े विचारक थे. 23 साल की छोटी सी उम्र में ही उसने ढेर सारी किताबें पढ़ डाली थी. भगत के सोचने का तरीका बेहद तार्किक व विवेकपूर्ण था. अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर 23 साल की छोटी सी उम्र में ही वह समझ गए थे कि समाज के असली दुश्मन ईश्वर व धर्म हैं.

भगत का सपना भारत को अंग्रेज से आजाद कराना मात्र नहीं था. भगत का सपना इससे कहीं बड़ा था. उसका सपना था भारतीय समाज को ईश्वर व धर्म की गुलामी से मुक्ती दिलाना. भगतसिंह तर्क और विवेक को जीवन का आधार मानते थे. उनकी मान्यता थी कि धर्म और ईश्वर पर आधारित जीवन पद्धति मनुष्य को कमजोर बनाती है. इसके विपरीत नास्तिकता मनुष्य को अपने भीतर शक्ति की प्रेरणा देता है. इस शक्ति के आधार पर उसके भीतर स्वाभिमान पैदा होता है और वह किसी प्रकार के समझौते नहीं करता. भगतसिंह इस बात को भी समझ गए थे कि धर्म का उपयोग धर्म के ठेकेदार व सत्ताधारी आम लोगों के शोषण हेतु एक हथियार के तोर पर करते हैं. वे ईश्वर का उपयोग आम जनता में भय के निर्माण हेतु करते हैं.

काश भगत सिंह की इतनी कम उम्र में मृत्यु ना हुई होती !

भगत सिंह ने ईश्वर व धर्म के बारे में अपने विचार अपने लेख " Why I am Atheist " में खुलकर लिखे हैं. यह लेख भगत ने 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी लगाये जाने के कुछ समय पहले लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ. इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.

इस लेख में भगतसिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे प्रारम्भ में नास्तिक नहीं थे, लेकिन फिर उन्होनें अध्ययन की शुरुआत की. उन्होनें बाकनिन को पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा. फिर लेनिन व ट्राटस्की के बारे में पढ़ा, निर्लंब स्वामी की पुस्तक “ कॉमन सेन्स ” पढ़ी. बुद्ध, चार्वाक आदि विभिन्न दर्शनों का अध्ययन किया. वे फ़ाँसी के तख्ते पर जाने से पूर्व भी अध्ययन कर रहे थे.
इस तरह यह सब अध्ययन करने के पश्चात अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर वे ईश्वर को नकारने में सक्षम हुए.

भगतसिंह को अगर सम्पूर्ण रूप में जानना है तो यह लेख पढ़ना आवश्यक है. 
[please click to read - http://therationalistsociety.com/blogging/?p=56]

इस लेख के कुछ अंश यहाँ दिए गए हैं -

“ प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना करनी होगी और उनको चुनौती देनी होगी.”

“ मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है. ”

“ आस्तिकों से कुछ प्रश्न - यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की ? कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं है.

कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.

नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.और उसका इतिहास में क्या स्थान है ? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं ? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो ? ”

“ मैं पूछता हूँ कि उस ईश्वर ने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी ? ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है. उसने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया ? आनंद लूटने के लिए ? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है ?”

“ मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ईश्वर व धर्म के बारे में ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है.
ईश्वर व धर्म के बारे में ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते रहे हैं.”

“ मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया? "

“ क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब ? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.”

“ समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था. इसी प्रकार मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे और यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए.”

“ ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ.”

“ मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.”

“ मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा. जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, - ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, - ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.”

शुक्रवार, 9 जून 2017

गोबर विज्ञान


तुलसी पीपल रात में भी आक्सीजन छोड़ते हैं| _ गोबर विज्ञान

Sukhvinder Sidhani

Ajaib Jalalana
रात को अब कैसे सम्भव है पीपल का आक्सीजन छोड़ना,, जब सूर्य का प्रकाश ही नहीं होगा,, तो प्रकाश संश्लेषण क्रिया भी नहीं,, जब क्रिया नहीं तो आक्सीजन भी नहीं,,,
सजीव कोशिकाओं के द्वारा प्रकाशीय उर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिन्थेसिस) कहते है। प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगो जैसे पत्ती, द्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बनडाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधों की हरी पत्तियों की कोंशिकाओं के अन्दर कार्बन डाइआक्साइड और पानी के संयोग से पहले साधारण कार्बोहाइड्रेट और बाद में जटिल काबोहाइड्रेट का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सूक्रोज, ग्लूकोज, स्टार्च (मंड) आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है। जल, कार्बनडाइऑक्साइड, सूर्य का प्रकाश तथा क्लोरोफिल (हरितलवक) को प्रकाश संश्लेषण का अवयव कहते हैं। इसमें से जल तथा कार्बनडाइऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण का कच्चा माल कहा जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैवरासायनिक अभिक्रियाओं में से एक है।[1] सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं। प्रकाश संश्वेषण करने वाले सजीवों को स्वपोषी कहते हैं।[2]

तर्कशील ग्रुप...

गुरुवार, 8 जून 2017

बच्चन की कविता

Salauddin Meer_

आर एस एस


Radheshyam Mahaseth _
बतौर गृह मंत्री सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस ( RSS) को प्रतिबंधित कर दिया | गोलवलकर सहित तमाम संघियों को जेल में ठूस दिया | आगे काफी समय तक प्रतिबंध लगा रहा | बाद में गोलवलकर के गिरगिराने और काफी अनुनय -विनय के पश्चात पटेल ने प्रतिबंध तो हटाया लेकिन इस शर्त के साथ कि संघ भविष्य में किसी राजनैतिक गतिविधियों में शामिल नही होगा सिर्फ सांस्कृतिक -सामाजिक कार्य ही करेगा | दरअसल संघ के उन्मादी -मनुवादी जिहादी मानसिकता का भान सरदार साहब को बखूबी हो चला था ,इसलिए उन्हें शक था कि अगर यह भड़काऊ -उन्मादी संगठन कभी राजनीति में आ गया तो देश में दंगा -हिंसा -हत्या की बाढ़ होगी और फिर मुल्क की अखंडता को सुरक्षित रखना नामुमकिन हो जाएगा | आज इस बात को लेकर बहस चल रही है कि क्या आरएसएस इस देश में कुछ वैसी ही मानसिकता को सींचने का काम कर रहा जैसा कि दुनिया के तमाम आतंकवादी संगठन करते है | इस बात पर बहस की गुंजाइश है और लोग अपने हवाले से तथ्यों और तर्कों के साथ आ भी रहे है | कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में | पिछले लगभग साल भर से मैं खुद निजी तौर से संघ की गतिविधियों को समझने की कोशिश में लगा हूँ | इस दौरान हमने गोलवलकर लिखित पुस्तकों सहित संघ से जुड़े कई किताबों और पत्रिकाओं का अध्ययन किया , संघ के विभिन्न शाखाओं -कार्यालयों में जा कर जुड़े लोगो -पदाधिकारियों से मिला और तमाम मुद्दों पर उनकी राय जानी | सभी चीजों को जानने समझने के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा उसका लब्बोलुआब यही कि कट्टरता ,मनुवादी व्यवस्था और मुस्लिम विरोध ,यह तीन वह केंद्र बिंदु है जिसके इर्दगिर्द संघ की सारी गतिविधियाँ संचालित होती है | छोटे -छोटे बच्चे को दिमाग में मुसलमानों के खिलाफ जहर बोया जाता है , मनु की रचनाओं और विचारों को धर्म की चासनी में लपेट उस पुरातन मनुवादी युग को इस रूप में दिखाया जाता है मानों वह कोई सभ्यता का स्वर्णकाल रहा हो और हर बात में मुसलमानों के आगमन से पूर्व के भारत को ऐसे पेश किया जाता कि तमाम जातियों और वर्णों के होते हुए भी आपस में कोई वैर -भाव नही था ,हिन्दुस्तान में सब संपन्न और खुशहाल थे , आज जो भी समस्या है सबकी मूल वजह मुस्लिम शासन ही है | इस तरह के बिष उन बच्चों में भरा जाता और दिन -रात सुबह -शाम कट्टरता की जो घुट्टी पिलाई जाती वह किसी आतंकवादी को मिलने वाले कट्टर जिहादी प्रशिक्षण जैसा ही होता है | हालांकि संघ से जुड़े कई लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से माना कि संघ को अब अपने उस पुराने मोड से बाहर आना होगा क्योकिं आज के इस हिन्दुस्तान में उन पुरानी बातों की प्रसंगिकता नही रह गई | यानी संघ के भीतर भी कुछ प्रगतिशील लोग है लेकिन उनकी चलती नही जब तक कि वह मोदी जैसी किसी मजबूत स्थिति में न पहुँच जाए |