B L Yadav
: वह 'भगत सिंह' जिसे हम जानते नहीं :
भगत सिंह हम में से अधिकतर के बचपन से हीरो रहे हैं. लेकिन फिर भी हम में से अधिकतर लोग अपने इस हीरो के बारे में बहुत कम जानते हैं. बस इतना ही जानते हैं कि वह एक स्वतंत्रता सेनानी था .. जो अंग्रेज के खिलाफ लड़कर 23 साल की छोटी सी उम्र में फांसी पर झूल गया.
भगत सिंह के व्यक्तित्व के एक बहुत ही अहम् व महतवपूर्ण पक्ष के बारे में हमें न तो बताया गया और ना ही हमने जानने की कोशिश की. वह पक्ष है उनकी सोचने की शक्ती. भगत सिंह एक बहुत बड़े विचारक थे. 23 साल की छोटी सी उम्र में ही उसने ढेर सारी किताबें पढ़ डाली थी. भगत के सोचने का तरीका बेहद तार्किक व विवेकपूर्ण था. अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर 23 साल की छोटी सी उम्र में ही वह समझ गए थे कि समाज के असली दुश्मन ईश्वर व धर्म हैं.
भगत का सपना भारत को अंग्रेज से आजाद कराना मात्र नहीं था. भगत का सपना इससे कहीं बड़ा था. उसका सपना था भारतीय समाज को ईश्वर व धर्म की गुलामी से मुक्ती दिलाना. भगतसिंह तर्क और विवेक को जीवन का आधार मानते थे. उनकी मान्यता थी कि धर्म और ईश्वर पर आधारित जीवन पद्धति मनुष्य को कमजोर बनाती है. इसके विपरीत नास्तिकता मनुष्य को अपने भीतर शक्ति की प्रेरणा देता है. इस शक्ति के आधार पर उसके भीतर स्वाभिमान पैदा होता है और वह किसी प्रकार के समझौते नहीं करता. भगतसिंह इस बात को भी समझ गए थे कि धर्म का उपयोग धर्म के ठेकेदार व सत्ताधारी आम लोगों के शोषण हेतु एक हथियार के तोर पर करते हैं. वे ईश्वर का उपयोग आम जनता में भय के निर्माण हेतु करते हैं.
काश भगत सिंह की इतनी कम उम्र में मृत्यु ना हुई होती !
भगत सिंह ने ईश्वर व धर्म के बारे में अपने विचार अपने लेख " Why I am Atheist " में खुलकर लिखे हैं. यह लेख भगत ने 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी लगाये जाने के कुछ समय पहले लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ. इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.
इस लेख में भगतसिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे प्रारम्भ में नास्तिक नहीं थे, लेकिन फिर उन्होनें अध्ययन की शुरुआत की. उन्होनें बाकनिन को पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा. फिर लेनिन व ट्राटस्की के बारे में पढ़ा, निर्लंब स्वामी की पुस्तक “ कॉमन सेन्स ” पढ़ी. बुद्ध, चार्वाक आदि विभिन्न दर्शनों का अध्ययन किया. वे फ़ाँसी के तख्ते पर जाने से पूर्व भी अध्ययन कर रहे थे.
इस तरह यह सब अध्ययन करने के पश्चात अपने विवेक और तर्क शक्ती के आधार पर वे ईश्वर को नकारने में सक्षम हुए.
भगतसिंह को अगर सम्पूर्ण रूप में जानना है तो यह लेख पढ़ना आवश्यक है.
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इस लेख के कुछ अंश यहाँ दिए गए हैं -
“ प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना करनी होगी और उनको चुनौती देनी होगी.”
“ मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है. ”
“ आस्तिकों से कुछ प्रश्न - यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की ? कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं है.
कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.
नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.और उसका इतिहास में क्या स्थान है ? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं ? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो ? ”
“ मैं पूछता हूँ कि उस ईश्वर ने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी ? ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है. उसने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया ? आनंद लूटने के लिए ? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है ?”
“ मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ईश्वर व धर्म के बारे में ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है.
ईश्वर व धर्म के बारे में ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते रहे हैं.”
“ मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया? "
“ क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब ? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.”
“ समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था. इसी प्रकार मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे और यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए.”
“ ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ.”
“ मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.”
“ मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा. जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, - ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, - ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.”