बुधवार, 9 अगस्त 2017

लंबा है। अवश्य पढें।

Girdhari Lakhani
मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।
अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो।
उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।
जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।
इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।
मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।
अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।
वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।
थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था।
बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ।
खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।
सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।
वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।
अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगा तार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।
उसकी माँ रोते रोते घर चली गय

ढोंग

Amita Ambedkar
ढोंगी बाबाओं और माताओं से ये देश इतना सम्मोहित कैसे हो जाता है? ये बहुत गजब की बात है. न सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित लोग बल्कि डिग्रीधारी और विश्वविद्यालयों में पढ़े लिखे लोग भी इस मूर्खता में शामिल हैं. मैंने कई उच्च शिक्षितों के घरों में नीबू मिर्ची लटकते हुए देखा है, वे रोज सोने से पहले एक झाडू से अपने बच्चों की नजर उतारते हैं, खाना खाने के लिए, नहाने के लिए, सोने के लिए जागने के लिए और हर काम के लिए उनके पास कोई मन्त्र होता है.
ऐसे सभी बाबाओ गुनियाओं ओझाओं का समाज पर इतना प्रभाव बना हुआ है. बचपन से ही मूर्खतापूर्ण शास्त्रों और कथाओं से बच्चों के मन में देवी देवता भूत प्रेत और चमत्कारों की बात बैठा दी जाती है. वे विज्ञान और तर्क सीख पायें इसके पहले ही बाबाजी उनके दिमाग में घुस जाते हैं.
इस धंधे को बंद करने का एक ही तरीका है. अपने बच्चों को इन बाबाओं गुरुओं से बचाइये. देवी देवताओं से बचाइये. हो सके तो उन्हें किसी पूजा, यज्ञ, हवन बलि और कथा पंडाल आदी से दूर रखिये. पहले खुद इस मूर्खता को समझिये और अपने बच्चों को समझाइये कि ये सब षड्यंत्र हैं जो तुम्हें कमजोर और डरपोक बनाने के लिए रचा गया है. आप देखेंगे एक बार बच्चा थोड़ा सा नास्तिक और निडर हो जाए उसके बाद उसमे वैज्ञानिक चेतना और तर्कशीलता का जन्म कितनी तेजी से होता है. एक नया ही व्यक्तित्व उसमे उभरता है.
आपको अगर बाबाओं, गुरुओं और माताओं का धंधा बंद करना है तो खुद नास्तिक बनिए और अपने बच्चों को भी इंसान बनाइये अपने बच्चों को किसी मूर्ख का भक्त होने से बचाना आपकी जिम्मेदारी है |
ये वो महिलायें हैं जो घर के बाहर हल्दी की छाप लगा रही है ताकि इनके बाल ना कटे अन्धविश्वास की भी कोई हद होती है यार 😡😡😡

आईना

Usha yadav

शनिवार, 5 अगस्त 2017

तर्क

RKrishnan Sharma
😀😀होशियार बच्चा और रामायण की कहानी, अवश्य पढ़ें। 😀😀
अध्यापक :-बच्चों रामचंद्र जी ने समुद्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया
पप्पू :- सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
अध्यापक :- कहो बेटा
पप्पू :- रामचंद्र जी का पुल बनाने का निर्णय गलत था।
अध्यापक :- वो कैसे।
पप्पू :- सर, उनके पास हनुमान थे
जो उडकर लंका जा सकते थे।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी
अध्यापक :- हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकी रीछ और वानर तो नहीं उडते थे।
पप्पू :- सर वो हनुमान की पीठ पर बैठ कर जा सकते थे।
जब हनुमान पुरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे।
तो.....
अध्यापक :- भगवान की लीला पर सवाल नहीं उठाया करते नालायक
पप्पू :- वैसे सर एक उपाय और था।
अध्यापक :- (गुस्से में ).....क्या ?
पप्पू :- सर, हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे
जैसे सुरसा के मुंह से निकलने के लिए छोटे हो गये थे और सूर्य को मुंह में लेते समय सूर्य से भी बडे..........
तो वो अपने आकार को भी तो समुद्र की चौडाई से बड़ा कर सकते थे और समुद्र के ऊपर लेट जाते।
और सारे बन्दर 🙊 हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुंच जाते और रामचंद्र को भी समुद्र की अनुनय विनय करने की जरूरत नहीं पड़ती।
वैसे सर एक बात और पूछूँ?
अध्यापक :- पूछो।
पप्पू :- सर सुना है।
समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर "राम" नाम लिखा था.....
जिससे वो पत्थर पानी 💧 में तैरने लगे।
अध्यापक :- हाँ तो ये सही है।
पप्पू :- सर, सवाल ये है बन्दर भालूओ को पढना लिखना किसने सिखाया था?
और श्री राम लिखे पत्थर तैर जाते थे लेकिन श्री राम जी खुद डूब जाते थे ऐसे क्यों सर?
अध्यापक :- हरामखोर पाखंडी बन्द कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा
पप्पू :-ठीक है सर, सदियों से हम मूर्ख बनते आ रहे हैं.....
चलो आज मुर्गा बन जाते हैं!!!!!

तर्क

RKrishnan Sharma
😀😀होशियार बच्चा और रामायण की कहानी, अवश्य पढ़ें। 😀😀
अध्यापक :-बच्चों रामचंद्र जी ने समुद्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया
पप्पू :- सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।
अध्यापक :- कहो बेटा
पप्पू :- रामचंद्र जी का पुल बनाने का निर्णय गलत था।
अध्यापक :- वो कैसे।
पप्पू :- सर, उनके पास हनुमान थे
जो उडकर लंका जा सकते थे।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी
अध्यापक :- हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकी रीछ और वानर तो नहीं उडते थे।
पप्पू :- सर वो हनुमान की पीठ पर बैठ कर जा सकते थे।
जब हनुमान पुरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे।
तो.....
अध्यापक :- भगवान की लीला पर सवाल नहीं उठाया करते नालायक
पप्पू :- वैसे सर एक उपाय और था।
अध्यापक :- (गुस्से में ).....क्या ?
पप्पू :- सर, हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे
जैसे सुरसा के मुंह से निकलने के लिए छोटे हो गये थे और सूर्य को मुंह में लेते समय सूर्य से भी बडे..........
तो वो अपने आकार को भी तो समुद्र की चौडाई से बड़ा कर सकते थे और समुद्र के ऊपर लेट जाते।
और सारे बन्दर 🙊 हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुंच जाते और रामचंद्र को भी समुद्र की अनुनय विनय करने की जरूरत नहीं पड़ती।
वैसे सर एक बात और पूछूँ?
अध्यापक :- पूछो।
पप्पू :- सर सुना है।
समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर "राम" नाम लिखा था.....
जिससे वो पत्थर पानी 💧 में तैरने लगे।
अध्यापक :- हाँ तो ये सही है।
पप्पू :- सर, सवाल ये है बन्दर भालूओ को पढना लिखना किसने सिखाया था?
और श्री राम लिखे पत्थर तैर जाते थे लेकिन श्री राम जी खुद डूब जाते थे ऐसे क्यों सर?
अध्यापक :- हरामखोर पाखंडी बन्द कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा
पप्पू :-ठीक है सर, सदियों से हम मूर्ख बनते आ रहे हैं.....
चलो आज मुर्गा बन जाते हैं!!!!!

उलट पुलट

उलट पुलट हर तरह के  विचार  पढ़कर सोच विचार करना चाहिए । वरना लकीर के फकीर बन जाओगे ।

God?

Ajay Kumar _
मान लीजिये कि God होता है
लेकिन समस्या ये है कि दुनिया में हज़ारों किस्म के छोटे-बड़े God हैं, किसको असली God माना जाये ?
कोई भी God अपनी शक्ल नहीं दिखाता, अपना पता-ठिकाना नहीं बताता तो किसको असली माना जाये ?

कुछ लोगों ने God के रिश्तेदार होने का दावा किया है,
ैलेकिन दिक़्क़त ये है कि किस रिश्तेदार पे विश्वास किया जाये, और क्यों विश्वास किया जाये ?
कभी God ने तो कहा नहीं कि वो मेरा रिश्तेदार या ख़ास बंदा है..
कुछ अध्यात्मक इन्सान हुए, जो आज के धार्मिक लोगों की तरह जीवनभर किसी God का गुणगान करते रहे, उन्होंने रिश्तेदार होने का दावा नहीं किया,
लेकिन भक्तों ने उनको भी God का रिश्तेदार मान लिया,
या उनको ही God मान लिया.

सदियों पहले कुछ लोगों ने कहानियां लिखी, उन कहानियों के कुछ पात्रों को God मान लिया गया,
सदियों पहले कुछ समझदार इन्सानों ने जीवन उपयोगी चीज़ों और कुदरती शक्तियों के प्रतीक बनाये, करोड़ों लोगों ने उन प्रतीकों को God मान लिया..
पिछली सदियों में अलग-अलग तरीक़े से हज़ारों God बनाये गये.. आज भी हज़ारों किस्म के God बनते हैं.

एक बंदे ने धार्मिक पहनावा पहनकर जादू के चार ट्रिक दिखाये तो करोड़ों लोगों ने उसको God मान लिया,
एक फ़क़ीर मांगकर खाता था,
वो मर गया तो करोड़ों लोगों ने उसको God मान लिया..

लोग तो मानसिक विकलांगों को भी God बना देते हैं, कोई शातिर बनना चाहे तो क्या मुश्किल है ?
इस वक़्त देशभर में जीते-जागते हज़ारों God हैं, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं.
रोज़ नये-नये God सामने आते हैं , और आते रहेंगे..

अब हज़ारों किस्म के God हैं, किस God को असली माना जाये ?.. मानने की ज़रूरत भी क्या है ?
किसी झूठ में आस्था रखने वाले को अगर आस्तिक कहते हैं, तो मुझे गर्व है कि मैं सच में आस्था रखने वाला नास्तिक हूँ..

हर आस्तिक को ये पता होना चाहिये, ,कि दूसरे धर्मों के लोग उसको भी नास्तिक मानते हैं..
हर आस्तिक पांच-छह सौ करोड़ लोगों की नज़र में नास्तिक होता है...

भगवान के शरण में सारे पापों से मुक्ति

Hirday Nath
अनैतिकता और भ्रष्टाचार के लिए अध्यात्मिक लाईसेंस !
हमारे देश में धार्मिक पाखंड एवं धार्मिक क्रियाकलापों का पालन करनेवाला, घोर दुराचारी परम आदरणीय धर्मात्मा कहलाता है जबकि अनेक देशों में चरित्र की पवित्रता से ही व्यक्ति को सम्मान योग्य धर्मात्मा या श्रेष्ठ माना जाता है. कमाल देखिए हमारे हां तथाकथित भगवान के स्वयंभू "अधिकृत " ठेकेदार डंके की चोट पर ऐलान करते हैं कि एक जन्म में क्या, लाखों जन्मों में किया हुआ पाप भी केवल "भगवान " का नाम लेने/शरण में जाने से माफ हो जाता है अथवा किसी तीर्थ स्थल में जाकर स्नानादि से धुल जाता है. बिना किसी शर्त के खुला लाईसेंस है. ऐसी हालत में कोई धर्म अनुयायी भला काहे को पाप से दूर रहेगा.
अध्यात्मिक लाईसेंस के कुछ संदर्भ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ
# अन्य क्षेत्रे कृतं पापं काशिक्षेत्रे विनाश्यति (काशीमाहात्मय).अर्थात कहीं भी किया गया पाप काशी(प्रयाग) यात्रा से नष्ट हो जाता है.
# गंगा गंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि,
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति. (ब्रह्मपुराण अध्याय 175,पद्य्मपुराण अध्याय 13).
अर्थात जो भक्त सेंकड़ों सहस्त्रों कोश (मील/किलोमीटर)से भी गंगा गंगा बोलता रहे, वह सभी पापों से मुक्त होकर मरनोपरान्त विष्णुलोक /वैकुंठ को जाता है.
# प्रातः काले शिवं दृष्टवा निशिपापं विनश्यति,
आजन्मकृतं मध्याह्ने सायाह्ने सप्तजन्मानाम्. (तीर्थदर्पण, परिच्छेद 2).जो भक्त प्रातःकाल में शिव अर्थात लिंग या उसकी मूर्ति का दर्शन करता है, तो रात्रि, दोपहर,संध्या और सात जन्मों के पाप से वह मुक्त हे जाता है.
# अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्
साधरेव स मन्तव्यः सभ्यग्व्यसितो हि सः (गीता 9/30).
अर्थात यदि कोई जघन्य से जघन्य अपराध करता है किन्तु वह मेरी भक्ति में लीन रहता है तो उसे साधु/महात्मा मानना चाहिए क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है.
# क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति
कौन्तीय प्रतिजानिह न स मे भक्तः प्रणश्यति. (गीता 9/31).अर्थात वह जघन्य अपराधी तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है. हे कुन्तीपुत्र, निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है.
# सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः (गीता, 18/66).अर्थात सम्सत प्रकार के धर्मों का परित्याग करो, और मेरी शरण में आओ, डरो मत, मैं सभी पापों से तुम्हें मुक्त कर दूंगा.🤔🤔🤔

नामकरण

दलितों को भी कोई महान नाम देकर सम्मान देना चाहिए ।
*********
Panchanan Mishra_
दिव्यांग की ही तरह दलित का भी नया नामकरन क्यों न किया जावे ?

ईश्वर? इंसानियत

Chandra Prakash Barmate
मेरे लिए प्रकृति ही ईश्वर है
विज्ञान ही सत्य है
इंसानियत ही धर्म है
और कर्म ही पूजा हैं ।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण 

Ajaib Jalalana
वर्तमान भारतीय समाज के कायाकल्प की आवश्यकता है, क्योंकि इस देश में जिसे वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिला है, उनमें भी दूर-दूर तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण नज़र नहीं आता और यह स्थिति बेहद निराशाजनक है।
हमारे वैज्ञानिक जैसे ही घर पहुँचकर जूते उतारकर कपड़े बदलते हैं कि उसके साथ ही उनके मन-मष्तिष्क से तर्कशीलता और प्रयोगशीलता भी उतर जाती है और वे हर तरह की रूढ़ियों, रिवाजों और भ्रमजाल से बुनी आरामकुर्सी पर पसर जाते हैं। डॉक्टरों को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती कि उनके मरीज तिरुपति के बालाजी के मंदिर या स्थानीय मंदिर में अपने रोग मुक्ति के लिए पूजा-अर्चना करें, बल्कि वे स्वयं भी इस तरह के कर्मकांड से कोई परहेज नहीं करते। जब भी कोई नया वैज्ञानिक संस्थान बनता है या कोई बड़ा प्रयोग या अभियान शुरू किया जाता है तो हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी नारियल फोड़कर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाना और देवता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते, जैसे कि उनका प्रयास विज्ञान से नहीं, दैवी कृपा से ही सफल होगा। लेकिन मौका मिलने पर वैज्ञानिकों के बीच वे भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण की हिमायत करेंगे।
जो अन्धविश्वास में फंसे हैं उनके लिए हमारे देश के दैनिक समाचार-पत्र और साप्ताहिक-मासिक पत्रिकाएँ तमाम तरह की आकर्षक मगर तर्कहीन सामग्री छापने से नहीं चुकती। हर बड़े अख़बार में 'अपना भविष्यफल जानिए' जैसे स्तम्भों के लिए जरूर जगह रखी जाती है, जिसमें अगले सप्ताह के राशिफल दिए जाते हैं। इस सप्ताह लक्ष्मी की कृपा, स्वास्थ्य संबंधी, प्रेम, विवाह योग इत्यादि। यात्रा के लिए कुछ दिन शुभ-अशुभ माने जाते हैं। कुछ दिनों, संख्याओं और रंगों को विशेष रूप से भाग्यशाली माना जाता है।
वैज्ञानिकों का भी रूढ़िवादिता की ऐसी कीचड़ में लोट-पोट होना और इसके बावजूद लोगों में अन्धविश्वास और दैवी सत्ता पर ऊँगली उठाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, इसकी आशा करना? क्या इसकी कोशिश करना भी सम्भव है या उपयोगी है?

भीख नहीं सहयोग

अपंग बूढ़े के अतिरिक्त अन्य भिखारियों को भीख देकर निठल्लापन को बढ़ावा देना है। इससे अच्छा है जरूरतमंद विद्यार्थियों को सहयोग करें।

गरीबों के दुश्मन

Dinesh Aastik
रुढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रुढ़ियों को तोड़ने के उदहारण पर्याप्त मात्र में नहीं हैं। लोगों को इस ख़्याल का जोर से प्रचार करना चाहिए की मज़हब और खुदा गरीबों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
– राहुल सांकृत्यायन
(9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963)

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्ण चंद्र गुप्ता _ डाॅ मीनकेतन प्रधान

मनुष्यता के पर्याय श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता
किसी व्यक्ति पर सायास कुछ लिखना कितना कठिन होता है, यह अभी महसूस कर रहा हूँ, खासकर ऐसे व्यक्ति पर जो बचपन से अब तक लगातार दिलोदिमाग में छाया रहे और अचानक संसार से उठ जाय, अभी उड़ीसा प्रवास से रायगढ़ लौटने पर पता चला - ‘‘दादा’’ पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता नही रहे... मंै धक् से रह गया, सोचता रहा.... नजरों के सामने उभर आता ....... खुला बदन, कमर के ऊपर नाभी से पैर तक पसरी सफेद धोती और दाहिने कंधे को कसता हुआ आखरी छोर-हल्का नील लगा हुआ.... जैसे भीतर का निर्विकार भाव था वैसा ही परिधान। तिलकता उन्नत माथा - दो तीन लकीरों का गंगा-जमुनी अन्तर्प्रवाह ...... जाने कहां से दौड़ रही होती सरस्वती की गुप्त धारा - धारीदार पुष्ट होठों में छलकती कभी न सूखने वाली स्वर-लहरियां, खींच लेने वाली ठसक भरी मोहक मुस्कान..... ओजस्वी वाणी...... जैसे कह रहे हों और प्रोफेसर साहब ...... मै संकुचित हो उठता........फूर्ति से आगे बढ़ प्रणाम् निवेदन करता तो.... कभी वे हथेली पकड़ हाथ मिलाते या कंधांे पर अपने स्नेहिल हाथों को रख इतने प्यार से हाल-चाल पूछते कि एहसास नहीं होता मेरी कुल उम्र 55 बरस से भी पहले स्वाधीनता आंदोलनों के सिपाही और महानतम् सामाजिक - मानवीय जीवन मूल्यों के पुरस्कर्ताओं में अग्रगण्य रहे हैं। नई पीढ़ी को इतनी ऊंचाई में प्रतिष्ठित कर उसके भीतर की समस्त सम्भावनाओं को दुलारने- उभारने की ऐसी उदार भावना आज के आत्मकेन्द्रित वैष्विक बाजार में भला कहाँ देखने को मिलती है।
दो-तीन बरसों से मैं उनसे मिलना चाह रहा था, नहीं मिल सका........... इसका अफसोस जीवन भर सालता रहेगा। आज उनके बारे मे जो कुछ सोचा जा रहा है, क्या बहुत पहले नहीं सोचा-लिखा जा सकता था? जीवन - संघर्ष के घने अंधेरे को चीर-फाड़कर पूनम की दूध धूली चांदनी रातों मंे जीवन चक्र पूर्ण कर वह शारदेय शीतल-चन्द्र अनंत आकाष की प्रभाती रष्मिवलयों मंे अब गुप्त एहसास दिलाता रहेगा अपने होने का.... ऐसे थे पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी।
बहरहाल ... बहुत पहले की एक साध थी - बहुआयामी व्यक्तित्व से महिमामण्डित श्रध्देय श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता के सामाजिक, राजनैतिक, संास्कृतिक प्रदेय को राष्ट्रीय-पृष्ठभूमि पर रेखंाकित होना चाहिए। उनके जीवन-काल में यह संभव न हो सका। होता भी कैसे- वे आत्मष्लाघा, भांैडा प्रदर्षन से कोसों दूर, कर्म के पथ पर संघर्षरत जननायक थे। प्रचार-प्रसार और छपास की भूख उन्हेें कभी छू न सकी। इसलिये यह बात सुकून दिलाती है कि उनके ज्येष्ठपुत्र डाॅ. सर्वेष षरण गुप्ता द्वारा यषस्वी काया के अस्थि-विसर्जन हेतु इलाहाबाद त्रिवेणी संगम प्रस्थित होने के बाद पैतृक गाँव लोई्रग के कर्मठ जनसेवी श्री सरोज गुप्ता द्वारा लिखित ‘‘रायगढ़ पूर्वांचल के पुरोधा श्री पूर्णचन्द्र गुप्ता’’, स्मरणिका का प्रकाषन हो रहा है। स्वनाम धन्य बहुआयामी व्यक्तित्व सम्पन्न पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता जी के प्रेरक प्रसंगों को उजागर करने के उद्देष्य से ब्रिटिषकालीन राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता को झेलते हुए स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन-मूल्यों के उन्नयन की दिषा में समर्पित अक्षांषों को उभारा गया है। उनके स्नेहभाजक इस पुस्तक के लेखक श्री सरोज गुप्ता मूलतः ग्राम्य जन- संस्कृति की राजनैतिक - धारा के नैतृत्वकत्र्ता हैं, उनकी मार्मिक भावनाओं का यह अंष उल्लेखनीय है -
‘‘पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता ने महात्मागाँधी के ग्रामोदय की आस्था, नेहरु की उदारता, षास्त्री की सौम्यता, जयप्रकाष की निर्भीकता, लोहिया की कर्मण्यता, विनोबा की साधुता का अपने जीवन में अनुषरण किया ’’। वे लोकतन्त्र के हिमायती थे। गाँव में अपने विचारों को, अपने सिध्दान्तों को लोगों पर नहीं थोपते थे बल्कि लोगों का दिल जीतकर समझाबुझाकर कार्य करने वाले थे।
मनुष्यता के पर्याय कीर्तिषेष श्री पूर्णचन्द्र्र्र गुप्ता छत्तीसगढ़ एवं रायगढ़ जिले के ग्राम्याचंलों मंे ‘‘पुरनो गौंटिया’’ के नाम से सर्वविख्यात थे; किसी पोस्टर-पम्पलेट के मोहताज बिल्कुल नहीं। उनके सर्वथा सुयोग्य कनिष्ठ पुत्र इंजिनियर श्री विक्रम गुप्ता के सद्प्रयासों से यह पुस्तक रुपाकार ग्रहण कर रही है यह मेरे लिये बहुत सुकून की बात है।
डाॅ. मीनकेतन प्रधान
शासकीय किरोड़ीमल कला विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय रायगढ़